पिछले दिनों 17 मार्च, 2026 को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के रामकृष्ण नामक एक निजी अस्पताल में मानव मल की टंकी को साफ करते हुए तीन सफाई कर्मियों की मौत हो गई। मृतकों के नाम गोविंद सेंद्रे (लगभग 35 वर्ष), अनमोल मांझी (लगभग 25 वर्ष), सत्यम कुमार (लगभग 22 वर्ष)। बताया जा रहा है कि तीनों सफाई कर्मचारी बिना उपकरण के मल की टंकी में घुसे थे, जहां जहरीली गैस रिलीज होने के कारण उनकी मौत हो गई। रायपुर में ऐसे सैंकड़ो निजी अस्पताल हैं, कल-कारखाने हैं, होटल और मॉल आदि हैं, जहां हर महीने मल की टंकी की सफाई करनी पड़ती है। इससे पहले भी अशोका बिरियानी नामक होटल में मल की टंकी के भीतर जाने के कारण दो सफाईकर्मियों की मौत हो गई थी।
राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के अनुसार 1993 से 2025 तक पूरे देश में 1313 व्यक्तियों की मौत सीवर या मल की टंकी में जाने के कारण हुई। यह आंकड़ा गंभीर है क्योंकि आधुनिक युग में सीवर साफ करने के लिए सारी सुविधाएं मौजूद हैं। अत्याधुनिक मशीनों का आविष्कार हो चुका है। इसके बावजूद हमारे देश में एक मनुष्य को मानव मल साफ करने के लिए सीवर या मल की टंकी में उतरने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। यह बहुत ही घृणित कार्य है। असल में सीवर और मल की टंकी साफ करने के लिए मशीन का प्रयोग करने की इच्छा शक्ति नहीं है। दुखद यह है कि थोड़े पैसे बचाने के लिए एक गरीब मजलूम को महीने पर, दिहाड़ी पर, काम करने वाले मजदूर को गंदगी साफ करने के लिए सीवर या मल की टंकी के भीतर घुसने को मजबूर कर दिया जाता है। यह संवैधानिक अपराध है।
केंद्र शासन का हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम 2013 का कानून कहता है कि किसी मनुष्य को सीवर में उतारना अपराध है और यदि मौत होती है तो नियोक्ता को सजा और पीड़ित को भारी भरकम मुआवजा देना पड़ेगा। बावजूद इसके सीवर में मौत का सिलसिला नहीं थम रहा है। बहुत सारे नियोक्ता अपने संस्थान में व्यक्तियों को मल उठाने, सीवर में घुसने और सफाई कार्य में लगाए हुए हैं।

सोच में बदलाव की जरूरत
भारत के कुछ लोगों की सोच आज भी सामंती है, वह गरीब पिछड़े और दलितों से चंद पैसे के एवज में ख़तरनाक काम में लगा देते हैं। उनको लगता है कि इनके जान की कोई कीमत नहीं है। कानून का भी इन्हें कोई डर नहीं है, तभी लगातार ऐसी घटनाएं घट रही हैं।
करीब 20-25 वर्षों से सफाई कर्मचारियों की बीच काम करने वाले सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बैजवाड़ा विल्सन कहते हैं कि “सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार सीवर में मौत होने पर 30 लाख रुपए मुआवजा एवं परिवार का पुनर्वास किये जाने का प्रावधान है। लेकिन करीब 50 प्रतिशत लोगों को यह मुआवजा अब तक नहीं मिला है।” वह कहते हैं कि मैन्युअल स्कैवेंजिंग में काम आने वाली मशीन का निर्माण भारत में नहीं होता है न ही इसे आवश्यक मात्रा में इंपोर्ट किया जाता है। इसलिए भारत में इस तरह की मशीन की भारी कमी है। जिस नगर निगम में ऐसी 100 मशीन होनी चाहिए वहां पर दो या तीन मशीन होती हैं। कई नगर निगम/पंचायत के पास में ये मशीन हैं भी नहीं। वह कहते हैं कि “सरकार को इस मामले में पहल करना चाहिए ताकि बहुत बड़ी मात्रा में मशीनों का उत्पादन हो सके। हम चंद्रयान के लिए तो संसाधन जुटा लेते हैं लेकिन इस मामले में मौन हो जाते हैं।”
सफाई कर्मचारी आंदोलन के राज्य संयोजक राजू भारतवासी कहते हैं कि “ज्यादातर मामलों में रसूखदार नियोक्ता राजनीतिक पकड़ होने के कारण बच जाते हैं। थोड़ा बहुत पैसा देकर मामले को रफा दफा कर देते हैं और पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाता है।” उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ में करीब 7 ऐसे मामले हैं जिनमें मृतकों के आश्रितों को मुआवजे का इंतजार है।
कौन है जो इस काम में लगे हुए हैं ?
वैसे तो इस काम में हर वर्ग के लोग लगे हुए हैं लेकिन सबसे ज्यादा संख्या दलित और पिछड़े वर्ग की है। ऐसे लोग जो बाहर से शहर आए हुए हैं जिन्हें काम की तलाश है, बेरोजगारी और घर पालने के लिए जीवनयापन के लिए वे कोई भी काम करने के लिए मजबूर हैं। ऐसे लोग ही इस काम में शामिल हो जाते हैं। कॉलोनी में भी सीवर को साफ करने के लिए इनकी जरूरत पड़ती है। घर, माल, रेस्टोरेंट, होटल, कारखाने, अस्पताल के मालिक पैसे बचाने के चक्कर में इन लोगों से साफ सफाई करवाते हैं, क्योंकि मशीन की कमी होने के कारण इसका प्रयोग महंगा पड़ता है।
विकल्प क्या हैं?
वैज्ञानिक युग में सीवर और गंदगी साफ करने के लिए बहुत सारे यंत्रों का आविष्कार हो चुका है। उन्हें भारत में मंगवाने की जरूरत है। कई लोग किराए में भी इस मशीन को उपलब्ध करा सकते हैं। कई नगरपालिकाओं के पास भी यह मशीन होती है और उसका प्रयोग किया जाता है। किसी व्यक्ति के जान को जोखिम में डालने के बजाय मशीनों का प्रयोग करना चाहिए, ताकि मानव मल हाथ से उठाने जैसे कार्य में किसी को लगाने से बचाया जा सके। उनकी जिंदगी बचाई जा सके। साथ ही इस संबंध में नजरिए को भी बदलना होगा।
बहुत सारे मीडिया संस्थानों की रपटों में इस तरह के मामले में हरिजन, स्वीपर, मेहतर, भंगी जैसे आपत्तिजनक/ प्रतिबंधित शब्दों का प्रयोग कर एक खास समुदाय को इस काम से जोड़ने का प्रयास किया जाता है। इस पर रोक लगाई जानी चाहिए।
(संपादन : नवल/अनिल)