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‘लोकविद्याधर’ : लोककला, श्रम और असमान विकास की विडंबना की कहानी

रामजी यादव की कहानी ‘लोकविद्याधर’ लोककला के क्षरण, पारंपरिक कारीगर जातियों के रोजगार-संकट, बाजार के अमानवीय दबाव और जाति-वर्ग से निर्मित सामाजिक दूरी को एक ही कथासूत्र में पिरोती है। बता रहे हैं अरुण नारायण

एक अच्छी कहानी वह होती है जो अपने अंदर कई अर्थ संकेतों को मुखर करे। अपने समय, समाज के सवालों से टकराए, और पाठक को बेचैन करे। उनके भीतर जमी पूर्व धारणाओं पर पुनर्विचार की सलाहियत पैदा करे और सबसे बढ़कर अपने पाठकों को यथार्थ की उस मंजिल की सैर कराए, जिन्हें समाज अक्सर देखकर भी अनदेखा करता रहा है।

रामजी यादव की कहानी ‘लोकविद्याधर’ इन अर्थों में एक बड़े फलक की कहानी है। इसे साहित्यिक पत्रिका ‘बयां’ (अप्रैल-सितंबर, 2026) ने प्रकाशित किया है। यह लोककला के क्षरण, पारंपरिक कारीगर जातियों के रोजगार-संकट, बाजार के अमानवीय दबाव और जाति-वर्ग से निर्मित सामाजिक दूरी को एक ही कथासूत्र में पिरोती है। सबसे बढ़कर, यह उस मनुष्य की गरिमा की रक्षा करती है, जिसके हाथों में हुनर तो है, लेकिन जिसकी कला को पहचानने और उसका उचित मूल्य देने वाली व्यवस्था लगातार कमजोर होती जा रही है।

कहानी बाजार, श्रम, जाति, वर्ग, कला और लोक जीवन के उन सवालों से टकराती है, जिन्हें आधुनिक विकास की चकाचौंध में अनदेखा किया गया। बाजार के दबाव में दम तोड़ती लोककलाएं, रोजगार से वंचित होती कारीगर जातियां और भौतिक विकास की मृगतृष्णा में खंडित जीवन जीने को अभिशप्त शहरी मध्यवर्ग– इन्हीं परस्पर संबद्ध यथार्थों से निर्मित होती है यह कहानी।

कथा की शुरुआत चौधरी शिवप्रसाद की पीठ में असह्य खुजली से पैदा हुई बेचैनी से होती है। उनके बेटे पिता के इलाज के लिए एलोपैथी, आयुर्वेद और होम्योपैथी तक की शरण लेते हैं, लेकिन कोई खास फायदा नहीं होता। अंततः डॉक्टर की सलाह सामने आती है कि यदि चौधरी साहब को शुद्ध सन की खटिया पर सुलाया जाए, तो उन्हें राहत मिल सकती है। इसके बाद खटिया की तलाश शुरू होती है।

बेटे देवदत्त ने घर से बाजार तक अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन खाट के नाम पर लोहे की फोल्डिंग, चारपाइयां और प्लास्टिक के पट्टों से बनी खाटें ही मिलती हैं। सन की खटिया कहीं नहीं मिलती। इसकी जगह रेडीमेड फर्नीचर की बढ़ती दुकानों ने ले ली है। खटिया बनाने वाले कारीगरों की तलाश अंततः देवदत्त को शहर से दूर एक गांव की नट बस्ती तक ले जाती है। वहां उसकी मुलाकात लालता बनाफर से होती है, जो खांची बनाने, बलिया तैयार करने, नार गांठने और खटिया बुनने जैसी अनेक लोककलाओं का जानकार है, लेकिन उम्र ने उसके शरीर को जर्जर कर दिया है।

खाट बुनतीं एक महिला कारीगर

कहानी में आर्थिक असमानता के दो छोर हैं– एक ओर चौधरी शिवप्रसाद का कुलीन परिवार है और दूसरे छोर पर लालता सरीखे हाशिए का जीवन जीनेवाले लोग। दोनों दो परस्पर भिन्न पृष्ठभूमि से हैं। कथाकार ने इन दो भावभूमि पर खड़ी दो परस्पर विरोधी दुनिया का बहुत ही गझिन और विविधवर्णी यथार्थ अंकित किया है। चौधरी शिवप्रसाद के बेटे देवदत्त और ज्ञानदत्त के व्यवहार, उसकी आशंकाओं और उसके जातीय-वर्गीय पूर्वाग्रहों के माध्यम से इसे कथा के भीतर ही उभारा है।

खटिया बुनने के लिए लालता को अपने घर बुलाने के सवाल पर देवदत्त का मन जिस तरह ऊहापोह से गुजरता है, वह उसके सामाजिक संस्कारों को उजागर करता है। लालता की उम्र और शारीरिक असमर्थता उसे एक ओर रोकती है, लेकिन दूसरी ओर उसकी बस्ती और जीवन-स्थितियों के प्रति घृणा भी उसके निर्णय को प्रभावित करता है। उसके मन में आशंका है कि लालता के यहां खटिया बुनवाई गई तो लोग उसी पर लोटेंगे और सारी गंदगी खटिया पर उतार देंगे।

कहानी में दर्ज यह प्रसंग जाति और वर्ग के अंतर्संबंधों को सामने लाता है। इस तरह कहानी में खटिया की तलाश केवल एक घरेलू जरूरत पूरी करने का साधन भर नहीं रह जाती, वह उस सामाजिक दूरी को भी उजागर करती है, जो श्रम का लाभ उठाने वालों और श्रम करने वालों के बीच बनी हुई है। कहानी में लोककलाओं के विस्थापन के कारणों की भी शिनाख्त की गई है। रेडीमेड फर्नीचर और प्लास्टिक से बनी वस्तुओं ने बाजार में पारंपरिक उत्पादों की जगह किस तरह अपनी जगह बनाई है इसके कई संकेत कहानी में दर्ज हैं।

कहानीकार रामजी यादव

इस कहानी को पढ़ते हुए प्रेमचंद और रेणु की कई कहानियों की अंतर्ध्वनियां सुनाई देती हैं। प्रेमचंद की कहानी ‘मंत्र’ में जिस तरह मनुष्य के व्यवहार और सामाजिक नैतिकता के बीच के अंतर्विरोध उभरते हैं, उसी तरह ‘लोकविद्याधर’ भी मनुष्य की संवेदना और उसके सामाजिक पूर्वग्रहों के बीच की दूरी को उजागर करती है। रेणु की ‘पहलवान की ढोलक’, ‘रसप्रिया’ और ‘ठेस’ की याद भी आती रही, जहां लोकजीवन, लोककला और बदलती सामाजिक परिस्थितियों के बीच कलाकार के अस्तित्व का प्रश्न केंद्रीय हो उठता है। हालांकि रामजी यादव की कहानी की अपनी स्वतंत्र डगर है। वह लोककला के क्षरण को पुरानी संस्कृति की त्रासदी के रूप में नहीं देखती, बल्कि उसे श्रम, बाजार, जाति और वर्ग की संरचनाओं से जोड़कर समझती है।

कहानी का सबसे प्रभावशाली हिस्सा वह है, जहां खटिया बुनने का काम पूरा होने के बाद मेहनताने का सवाल उठता है। देवदत्त पूछता है, कितनी मजदूरी हुई दादा? लालता का जवाब है, “मजदूरी नहीं हुनरमंदी है बाबू, बेइज्जत काहे करते हैं।”

यहां ‘मजदूरी’ और ‘हुनरमंदी’ के बीच के अंतर को कहानी में एक अलग अंदाज में विश्लेषित किया गया है। लालता के लिए खटिया बुनना एक कला है। वह अपने श्रम का मूल्य चाहता है, लेकिन उस मूल्य को केवल मजदूरी के प्रचलित अर्थ में सीमित नहीं करना चाहता।

इसके बाद मेहनताने को लेकर दोनों के बीच दिलचस्प संवाद होता है। देवदत्त सात सौ रुपये देने की बात करता है, लेकिन लालता चार उंगलियों के संकेत से चार हजार मांगता  है। देवदत्त असहज होकर कहता है, लूट मचाते हो, क्या? इस पर लालता का जवाब है कि वह अपना मेहनताना ही मांग रहा है, लूटकर क्या करेगा? इस संवाद में बाजार के मूल्य-बोध और कलाकार के आत्मसम्मान के बीच का अंतर खुलकर सामने आता है। देवदत्त की उलझन यह है कि वह लालता की हुनरमंदी की कीमत कैसे तय करे। वह उस ज्ञान का मूल्यांकन करना चाहता है, जिसकी सामाजिक उपयोगिता से वह स्वयं लाभान्वित हो रहा है, लेकिन उसके अर्जन की प्रक्रिया और श्रम की जटिलता से वह अपरिचित है। लालता का यह आग्रह कि उसने मजदूरी नहीं, कलाकारी की है, श्रम के मूल्यांकन की प्रचलित व्यवस्था पर एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है। क्या श्रम का मूल्य केवल उसमें लगे समय और शारीरिक परिश्रम से तय होगा, या उसमें निहित ज्ञान, कौशल, अनुभव और सृजनात्मकता को भी उसका हिस्सा माना जाएगा?

यहीं कहानी श्रम और कला के मूल्यांकन से जुड़ी एक व्यापक बहस का हिस्सा बन जाती है। मार्क्सवादी दृष्टि से देखें तो उत्पादन और बाजार के संबंधों में श्रम का मूल्य, श्रमिक की स्थिति और उत्पाद पर उसके अधिकार के प्रश्न केंद्रीय हैं। लेकिन लालता का संवाद इस बहस में एक और महत्वपूर्ण आयाम जोड़ता है। वह अपने कौशल को केवल उत्पादन की प्रक्रिया का हिस्सा नहीं मानता, बल्कि उसे अपनी सांस्कृतिक पहचान और आत्मसम्मान से भी जोड़ता है।

लालता का यह कथन कि राजा पत्थर की प्रतिमा पर अपना नाम लिखवा देता है, जबकि बाकी काम तो हम ही करते हैं, कहानी के सबसे अर्थगर्भित प्रसंगों में से एक है। इसमें सत्ता और सृजन के संबंधों पर एक तीखी टिप्पणी है। सत्ता अपने नाम को स्थायित्व देना चाहती है, लेकिन उस स्थायित्व को संभव बनाने वाले श्रम और कौशल को अक्सर अदृश्य बनाए रखती है। लालता का यह सहज देशज ज्ञान उस सामाजिक व्यवस्था की पोल खोलता है, जिसमें श्रम करने वाले और श्रम का श्रेय पाने वाले के बीच गहरी खाई बनी रहती है।

यहां कथाकार की संवेदनशीलता विशेष रूप से उल्लेखनीय है। लालता को किसी दयनीय, असहाय या केवल अतीत की स्मृतियों में जीने वाले बूढ़े कलाकार के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है। वह अपने हुनर को जानता है, उसकी कीमत समझता है और अपने श्रम के सम्मान के लिए तर्क भी करता है। उसकी आर्थिक विवशता के बावजूद उसका आत्मसम्मान अक्षुण्ण है। वह आधुनिक शिक्षित मध्यवर्ग के प्रतिनिधि देवदत्त से जीवन और श्रम के बारे में ऐसे सवाल पूछता है, जिनका उत्तर उसके पास आसानी से उपलब्ध नहीं है।

‘लोकविद्याधर’ कहानी की सफलता इस बात में भी निहित है कि वह अपने पाठकों का मनोरंजन ही नहीं करती अपितु उन्हें प्रश्नाकुल भी करती है कि जिस समाज को अपनी जरूरतों के लिए लोककलाकारों के श्रम और ज्ञान की आवश्यकता है, उसी समाज में इन कलाकारों की आजीविका और प्रतिष्ठा क्यों संकटग्रस्त है? बाजार के विस्तार को विकास का पर्याय मान लेने वाली व्यवस्था में उन लोगों के लिए जगह कहां है, जिनकी पीढ़ियों ने समाज की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने हुनर को विकसित किया? और क्या किसी कलाकार के कौशल का लाभ उठाना पर्याप्त है, यदि हम उसके जीवन और उसके आत्मसम्मान को बराबरी का दर्जा देने के लिए तैयार नहीं हैं?

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अरुण नारायण

हिंदी आलोचक अरुण नारायण ने बिहार की आधुनिक पत्रकारिता पर शोध किया है। इनकी प्रकाशित कृतियों में 'नेपथ्य के नायक' (संपादन, प्रकाशक प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन, रांची) है।

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