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टुकड़े-टुकड़े आईना : दलितों की व्यथा-कथा और प्रतिरोध-प्रतिवाद का जीवंत इतिहास

यदि कोई हिंदी पट्टी का इतिहास सबसे बड़े मेहनतकश हिस्से दलित को केंद्र में रखकर देखना-पढ़ना-लिखना चाहे तो दलित आत्मकथाएं इसका सबसे बड़ा स्रोत हैं। ऐसी ही एक आत्मकथा बुद्ध शरण हंस की आत्मकता ‘टुकडे-टुकडे आईना’ है, जिसे एक प्रामाणिक दस्तावेज के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। पढ़ें, डॉ. सिद्धार्थ रामू द्वारा यह पुनर्पाठ

बुद्ध शरण हंस ने पांच खंडों में अपनी कथात्मक संस्मरण लिखा है। सभी खंडों का मुख्य शीर्षक ‘टुकड़े-टुकड़े आईना’ है। प्रत्येक खंड के उपशीर्षक हैं– (1) उत्पीड़न खंड, (2) संघर्ष खंड, (3) प्रेरणा खंड, (4) सन्मार्ग खंड और (5) कांतिबाला खंड। बुद्ध शरण हंस को करीब 85 वर्ष (8 अप्रैल, 1942 – 22 जनवरी, 2026) का जीवन मिला। उनके जीवन की कथा-व्यथा का पहला संस्मरण 1950 का है और अंतिम संस्मरण 2014 का। यह सब इन खंडों में है। सहज ही हम यह कह सकते हैं कि यह जीवन-कथा अपने दायरे में 64 वर्षों के कालखंड समेटती है। खासकर बिहार के दलित-बहुजनों के जीवन की व्यथा, पीड़ा, प्रतिवाद, प्रतिरोध से लेकर हार-जीत तक।

बुद्ध शरण हंस का जन्म संयुक्त बिहार (वर्तमान बिहार और झारखंड) के एक ‘अछूत’ ठहरा दिए गए और आर्थिक तौर पर गरीबी के सबसे निचले पायदान पर खड़े परिवार में हुआ था। अपने संघर्षों के दम पर वे भारत सरकार की नौकरशाही के सबसे उच्च पायदान भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) तक पहुंचे। इसके चलते उनके जीवन अनुभवों का दायरा बहुत ही व्यापक, विविध और बहुस्तरीय है।

जो भोगा और देखा, वही लिखा

जब बुद्ध शरण हंस ने इन कथात्मक संस्मरणों की योजना बनाई थी, तब वे इसे तीन खंडों तक समेटना चाहते थे, लेकिन अंततोगत्वा यह पांच खंडों में सामने आई। इस संदर्भ में वे स्वयं लिखते हैं, “मैंने अपने संस्मरण कथा को तीन खंडों में प्रकाशित करने की योजना बनाई है– ‘टुकडे़-टुकड़े आईना : उत्पीड़न खंड, संघर्ष खंड तथा प्रेरणा खंड’। समाज में पीड़ित घटनाओं पर लिखी संस्मरण कथा उत्पीड़न खंड, उत्पीड़न का डटकर संघर्ष करने संबंधित संस्मरण कथाएं संघर्ष खंड और प्रेरणादायी घटनाओं पर आधारित संस्मरण कथाएं प्रेरणा खंड में संग्रहित हैं।”[1] जैसा कि जिक्र किया जा चुका है कि यह कथा संस्मरण पांच खंडों में आखिरकार सामने आया। इसका पांचवा खंड और भी अनोखा है। यह खंड उन्होंने अपनी जीवनसंगिनी कांतिबाला के इर्द-गिर्द बुना है। उनकी, उनके साथ अपने संबंधों, उसकी उनके जीवन और उनकी सामाजिक भूमिका को रेखांकित किया है।

‘टुकड़े-टुकडे आईना’ के पहले भाग – उत्पीड़न खंड – में इन किताबों की विधा के बारे में स्वयं ही लेखक ने कहा है कि, “इस पुस्तक में मैंने अपनी सिलसिलेवार जीवनी लिखने का प्रयास नहीं किया है। मेरे जीवन में शुरू से अंत तक जो भी मर्मस्पर्शी, भावोत्तेजक और मर्माहत करने वाली घटनाएं घटी हैं, उन घटनाओं पर मैं कथात्मक संस्मरण लिखने का अनोखा प्रयास किया है। … इस पुस्तक में संकलित कथाएं न सिलसिलेवार हैं और न एक-दूसरे से अनुस्यूत (क्रमबद्ध)। इसी कारण से मैंने इन संस्मरण कथाओं का शीर्षक गढ़ा– ‘टुकड़े-टुकड़े आईना रखा।’”[2]

विधा चाहे जो हो, शीर्षक चाहे जो हो, मूल रूप में पांचों खंड बुद्ध शरण हंस का जीवन-वृतांत है, जो स्वाभाविक तौर पर दलित समाज और अपमानित एवं शोषित-उत्पीड़ित लोगों और समाज का भी वृतांत बन गया है।

वैसे भी दलित समाज के किसी व्यक्ति की आत्मकथा या कथात्मक संस्मरण निहायत निजी नहीं होता, चाहे वह डॉ. आंबेडकर का आत्मकथात्मक संस्मरण ‘वीजा के इंतजार’ में हो या ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा ‘जूठन’, तुलसीराम की आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ एवं ‘मणिकर्णिका’ या श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ की आत्मकथा ‘बचपन मेरे कंधों पर’ या कोई अन्य हो। दलितों की आत्मकथा या आत्मकथात्मक संस्मरण पूरे दलित समाज की कथा होती है। हां, उसमें प्रदेश विशेष या क्षेत्र विशेष की विशिष्ट छाप भी रहती है। चूंकि अपने सामाजिक-आर्थिक हालात में दलित समाज के हालात अन्य पिछड़े वर्गों और आदिवासियों से कई मामलों में नजदीकी से जुड़े रहे हैं, इस कारण इन आत्मकथाओं में इन समुदायों की जीवन हालातों के दृश्य और दलितों से उनका साझापन भी मौजूद होता है।

वर्ण-जातिवादी ब्राह्मणवादी व्यवस्था में ब्राह्मण-द्विज ही मुख्य रूप से दलितों के उत्पीड़क के रूप में सामने आते हैं। इसके चलते स्वाभाविक है कि इन वर्ण-जातियों का चित्र भी स्वाभाविक तौर पर इन आत्मकथाओं में मौजूद रहता है। इसके साथ ही, अन्य पिछड़े वर्गों के साथ इनके अंतर्विरोध और गैर-बराबरी के विद्रूप चित्र भी हैं। यहां तक कि दलितों की विभिन्न जातियों-उपजातियों के बीच मौजूद ऊंच-नीच के बंटवारे के विवरण भी हैं। चाहे यह बंटवारा कितना ही झीना ही क्यों न हो। बुद्ध शरण हंस का आत्मकथ्य भी इन चीजों को समेटता है।

लोकनायकों और लोकनायिकाओं का ब्राह्मणीकरण

‘टुकड़े-टुकड़े आईना’ का पहला खंड – ‘उत्पीड़न खंड’ – सन् 1950 से शुरू होता है। 26 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान पूरी तरह लागू हो जाता है। लेकिन गांवों में मनु का संविधान ही चल रहा है। मनु ने हर जाति के लोगों का काम निर्धारित कर रखा था। गांव में ‘ग्राम माता पूजा’ शुरू होती है। पूरे गांव की सामूहिक पूजा। गांव के हर सदस्य को चंदा देना है। भोज तैयार होता है, लेकिन सबका अंतिम फल ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन और दान-दक्षिणा के रूप में प्राप्त होता है। गांव की पंचायत ने निर्णय लिया कि इस बार कम से कम 50 या 100 ब्राह्मणों को भोजन कराना है और दान-दक्षिणा देना है। दलित के हिस्से ढोलक बजाकर पूरे गांव को सूचना देने का काम आता है– “गांव का चमार गांव के नुक्कड़ों पर जगह-जगह ढोल पीटता।”[3] और कोई अन्य दलित ऊंची आवाज में सबको सूचना देता। ऊंची आवाज में सूचना देने का यह काम लेखक के चाचा का था।

इतिहास दृष्टि से संपन्न लेखक यह चिह्नित करता है कि पहले इन ग्राम माता की पूजा में ब्राह्मणों के लिए कोई जगह नहीं थी– “देवियों में सतिया, पर्वतीया, नगिया, अगिया, असिमा, उपास, बतास – सात बहिनों की पूजा होती थी। इन देवियों की जगह दुष्ट ब्राह्मण घुस गया। अब वह अपनी पूजा कराने लगा। जमात की जमात ब्राह्मण पूजा के नाम पर छककर खाता, पसेरी भर कच्चा-पक्का अनाज गेठरी, पोटरी में बांधता और दस-पांच रुपए दक्षिणा में लेकर चलता बनता। ..अब न कुलदेवता रहे, न ग्राम देवता, न कुल देवी रही, न ग्राम देवी। अब ब्राह्मण देवता बन गए, ब्राह्मणी देवी बन गई?”[4] अपने गांव के हुए इस परिवर्तन के माध्यम से लेखक ने बहुजनों के देवी-देवताओं के ब्राह्मणीकरण की प्रक्रिया को रेखांकित किया है, जो पूरे देश में घटी। उत्पादन, शिल्पकारी, दस्तकारी और मेहनत से जुड़े समुदायों की मातृ देवियों और देवताओं का इस प्रक्रिया में पूरे देश में ब्राह्मणीकरण कर दिया गया। यह आज भी जारी है। ब्राह्मणीकरण की इस प्रक्रिया ने पूरे देश में ब्राह्मणों के वर्चस्व को कायम करने में अहम भूमिका निभाई।

जब जातिवादी शिक्षक ने कहा, आलू खाना तुम्हारी किस्मत में नहीं

ब्राह्मणवादी व्यवस्था में ब्राह्मणों द्वारा अछूत ठहरा दिए गए दलितों के बच्चे जब स्कूलों में पढ़ने जाते हैं, वहां भी उनके साथ द्विज जातियों के शिक्षक अछूत जैसा ही व्यवहार करते हैं। जिन शिक्षकों को गुरु से नवाजा जाता है, जिनके हर शिष्य (छात्र) एक समान होना चाहिए, इसका आदर्श बघारा जाता है। उन शिक्षकों के लिए दलित का बच्चा-बच्ची अछूत ही होते हैं। कैसे उनके प्राथमिक विद्यालय के भूमिहार शिक्षक स्कूल में आलूदम बनवा कर खाते हैं। आलू लाने, धोने, आग तैयार करने, मसाला तैयार करने का सारा काम दलित बुद्ध शरण हंस के जिम्मे आता है, लेकिन अंत मे पकाने के काम से उनको दूर रखा जाता है। यह काम दूसरे ठाकुर या यादव समाज के लड़कों को दिया जाता है। आए दिन आलूदम तैयार होता है, लेकिन एक भी टुकड़ा इस दलित बच्चे को नहीं मिलता है। अगर वह आलूदम जहां बन रहा है, उसके चूल्हे के पास जाता है, तो उसे सख्त चेतावनी दी जाती है– “देख! चूल्हे से दूर और दूर रहो, कोई चीज छूना नहीं।”[5] एक दिन तो हद हो गई। भूमिहार मास्टर का दिल पसीजा। उन्होंने थोड़ा आलू इस दलित लड़के को भी देने का निर्णय लिया। लड़के ने एक पत्ता हाथ में लेकर मास्टर जी की ओर कांपते हाथों से बढ़ाया। मास्टर जी चिल्लाए– “अरे रे! छू देगा क्या? पत्ता नीचे करो।” मास्टर ने आलू पत्ते पर दूर से फेंका। आलू नीचे धूल में गिर पड़ा।

मास्टर ने टिप्पणी की– “अभागा! तुम्हारी किस्मत में आलू खाना लिखा ही नहीं है। चलो हटो।” एक गैर-दलित लड़का, जो मजे से आलूदम खा रहा था, ने मजाक उड़ाते हुए कहा– “अरे उठाकर खा जाओ। पानी में डालकर साफ करके खा जाओ।”[6] बुद्ध शरण हंस एक लेखक के रूप में टिप्पणी करते हैं– “ब्राह्मणों का सिखाया हुआ छुआछूत प्रत्येक हिंदू को याद है।… हिंदू धर्म के इस कलंक से हर हिंदू कलंकित है। … यह हिंदू धर्म का ही कलंक नहीं है, मानवता का भी कलंक है।”[7]

भूमिहार शिक्षक ने जब छात्रवृत्ति की राशि हड़प ली

इसी खंड में एक संस्मरण कथा का शीर्षक ‘चौथा चंदा’ है। चौथा चंदा भादो महीने की चौथी तारीख से शुरू होता था, इसके चलते इसका नाम चौथा चंदा पड़ा। इस महीने में स्कूलों के मास्टर बच्चों के अभिभावकों से संर्पक करते थे। इसके नाम पर पैसे या सामान के रूप में चंदा उगाहतेते थे। मास्टरों के साथ उनके स्कूल के बच्चे भी होते। गाना गाकर लोगों से संपर्क किया जाता और चंदा जुटाया जाता। यह दलित बालक गीत बनाने और गाने में बेजोड़ था। वह गाने वाले और चंदा मांगने वालों की अगुवाई करता, लेकिन यहां भी जाति उसका पीछा नहीं छोड़ती। उसे गैर-दलितों और मास्टर से दूरी बनाए रखने की हिदायत होती। सामानों का बोझा ढोना और सारी कठिन जिम्मेदारी उसकी होती, लेकिन उसके हिस्से सिर्फ और सिर्फ अपमान होता।

हद तो तब हो गई, जब एक सरजू सिंह (भूमिहार) मास्टर ने बुद्ध शरण हंस के पहले वजीफे को जबरन से दस्तखत कराकर हड़प लिया। प्रति महीने दस रुपए के हिसाब से कुल 70 रुपए की छात्रवृत्ति आई थी। यह छात्रवृत्ति न केवल इस दलित लड़के के लिए, बल्कि पूरे परिवार के लिए पेट भरने की एक उम्मीद थी। उस समय पूरा परिवार करीब-करीब भूखे दिन काट रहा था। कई दिनों तक चूल्हा नहीं जला था। उस समय की अपनी और अपने परिवार की हालात का वर्णन करते हुए लेखक लिखता है, “परिवार कर्ज में डूबा रहता। आधे पेट खाकर प्राय: जिंदगी गुजरती थी। रोटियों की जगह अगर एक या डेढ़ रोटी भी नमक मिर्च के साथ मिल जाती, तो इस दिन भूखे रहना नहीं समझते। इस कारण से ऐसा प्राय: रोज हुआ करता था। हां, किसी दिन अनाज के अभाव में अगर रात या दिन में खाना नहीं मिलता, तब उसे भूखा रहना कहते। जमीन-जायदाद वालों के यहां से डेवढ़िया (डेढ़ गुणा) दर पर अनाज कर्ज में आता। कर्ज में मडुआ, मकई, खेसारी, गेहूं मांगने पर किसान नहीं देते।”[8] वे आगे लिखते हैं, “स्कूल से जब भी आता, तब सबसे पहले ओसारे में बने चूल्हे को ध्यान से देखता। चूल्हे के पास गोइठा, लकड़ी जमा रहती, या चूल्हे में धुआं होता रहता, तो मैं समझ जाता कि आज रात घर में कुछ-न-कुछ खाना बनेगा। जिस दिन चूल्हे के पास गोइठा, लकड़ी जमा नहीं देखता, घर पर मां, भाभियां, दीदीयों को उदास जहां-तहां बैठे देखता, तो समझ जाता कि आज घर में अनाज नहीं है। उस कारण आज खाना नहीं बनेगा।”[9]

घर के इन्हीं हालातों में यह पता चला कि 70 रुपया वजीफा मिलेगा। पूरे परिवार में खुशी और उम्मीद की एक लहर उठी। इस 70 रुपए में कुछ महीने भर से अधिक का घर में खाने का इंतजाम हो जाता, क्योंकि उस समय में 17 रुपए में एक मन (40 किलोग्राम) चावल और 11 रुपए में एक मन गेहूं मिल जाता था। एक रुपए किलो घी मिलता था। दो रुपए में एक किलो सरसों का तेल मिल जाता था। पांच रुपए में एक साड़ी या धोती मिल जाती थी। वजीफे के इस 70 रूपए से इस परिवार के कई भूख के मुक्ति के साथ कुछ और अरमान जगे थे। लेकिन इस पूरे के पूरे सत्तर रूपए को भी भूमिहार मास्टर सरजू सिंह ने दबा लिया। लेखक टिप्पणी करता है, “जीवन में कभी छात्रवृत्ति मिली नहीं थी। पहली बार आई, तो इस हरामी टीचर ने अपने बाप की संपत्ति मानकर रख लिया और मुझसे डांट कर लिखवाया कि सत्तर रुपए पाया।”[10]

मास्टर से सारा पैसा रख लिया, यह सुनकर परिवार में रोना-धोना मचा। लेखक टिप्पणी करते हैं, “गरीब के लिए दुख में रोना बहुत बड़ा सहारा होता। यह रोना गरीबी का हमदर्द है। इसी तरह रोते-रोते जिंदगी की बड़ी से बड़ी मुसीबतों को गरीबों ने झेला है, आज भी झेल रहे हैं और जब तक गरीबी रहेगी, गरीबों का सहारा यही रूदन और क्रंदन ही रहेगा।”[11]

यह संस्मरणात्मक विवरण वर्ष 1957 का है, जब लेखक 9वीं क्लास में था। इसका शीर्षक ‘शातिर बदमाश शिक्षक’ है।

‘टुकड़े-टुकड़े आईना’ के पांचों खंडों का आवरण पृष्ठ

सत्यनारायण कथा का खेला

यह सच है कि पिछड़ी कही जाने वाली जातियां भी दलितों के साथ छुआछूत का व्यवहार करती थीं, लेकिन दलितों और पिछड़ों के बीच छूत-अछूत की यह विभाजन रेखा कभी चीन की दीवार की तरह अल्लंघ्य नहीं रही है। इनमें आपस में उठना-बैठना और साथ कुछ-कुछ अवसरों पर खाना-पीना रहा है। ऐसे ही एक महतो (कोईरी जाति) मित्र के साथ बैठकर उनके दरवाजे पर लेखक मूंगफली खा रहा था। एक ब्राह्मण परिवार का युवा भी उसमें शामिल हो गया। यह दृश्य एक दूसरे ब्राह्मण ने देख लिया। पूरे गांव में हंगामा मच गया। पंचायत बुलाई गई। उस महतो परिवार को दंडित करने का निर्णय हुआ। उस महतो लड़के को पंचायत ने कान पकड़कर उठक-बैठक करने का दंड दिया। अपने गांव में जातिवाद और जाति के आधार इस भेदभाव का वर्णन करते हुए ‘कोईरी बादाम’ शीर्षक इस संस्मरण में लेखक लिखता है, “मेरे गांव में छुआछूत चरम सीमा पर थी। ब्राह्मण, भूमिहार के रसोई का भात नहीं खाता था। भूमिहार कोईरी, ग्वाला के रसोई का पका हुआ भात नहीं खाता था। कोईरी, यादव, दुसाध रजवार के रसोई का भात नहीं खाता था। दुसाध चमार के घर के रसोई का पका भात नहीं खाता था। यों कहें कि घर-घर में किसी-न-किसी जाति के लोगों के लिए छुआछूत कायम था। गांव में दो घर ब्राह्मण, बीस घर भूमिहार, चालीस घर कोईरी तथा आठ-आठ घर दुसाध, ग्वाला, मुसलमान थे। मगर गांव में भूमिहारों का दबदबा था। भूमिहारों के रोआब से गांव की अन्य जातियां दबी रहती थीं।”[12] यह संस्मरण 1960 का है।

लेखक के गांव में पिछड़ी जातियों के लड़कों से लेखक की दोस्ती थी। आना-जाना था, लेकिन उन घरों में भी बुर्जुग लोग, विशेषकर महिलाएं जाति के आधार पर अवसर आने पर दलितों को अपमानित करती रहती थीं। ऐसा ही संस्मरण लेखक ने ‘सत्यनारायण की चाची’ शीर्षक से लिखा है। यह लेखक को अछूत कहकर अपमानित करने का संस्मरण है। सत्यनारायण लेखक का दोस्त था। ब्राह्मण अपनी दान-दक्षिणा और अन्य सामग्री पाने के लिए दलितों के यहां भी सत्यनारायण की कथा कहने आने लगे थे। ऐसी एक कथा लेखक के घर भी आयोजित हुई। इस कथा में सारी सामग्री तो लेखक के परिवार ने जुटाया, लेकिन कथा के दौरान किसी भी सामग्री को उस परिवार को न छूने का ब्राह्मण ने सख्त निर्देश दिया। पूरा परिवार दूर से कथा सुनता रहा। जब सबको प्रसाद बांट दिया गया, तो बचा-खुचा प्रसाद इस अछूत ठहरा दिए गए परिवार की ओर खिसका दिया गया। ब्राह्मण दान-दक्षिणा लेकर चला गया। स्वयं लेखक और पूरे परिवार ने किस कदर अपमान की पीड़ा झेली, उसका मार्मिक वर्णन ‘अछूत के घर सत्यनाराणय कथा’ शीर्षक से इस संस्मरण में है। हालांकि इस अपमान के बाद इस परिवार ने इस तरह का कोई भी आयोजन न करने का निर्णय लिया।

रामलीला में जाति

भले ही ‘टुकड़े-टुकड़े आईना’ के इस पहले खंड का नाम उत्पीड़न खंड है, लेकिन इसमें दलितों-पिछड़ों के प्रतिवाद और प्रतिरोध की कहानियां भी दर्ज हैं। ऐसा एक संस्मरणात्मक कथा (1961 की) ‘रामलीला’ शीर्षक से है। गांव में हर साल रामलीला होती थी, जिसकी मुख्य जिम्मेदारी पिछड़े-दलित लड़कों की थी। वे ही उसमें अभिनय भी करते थे। लेखक स्वयं सीता की भूमिका निभाता था। साहित्यिक तौर यह बहुत ही सृजनात्मक वर्णन है। गांव के ब्राह्मण-भूमिहारों के कुछ लड़के भी इसमें शामिल होते थे, लेकिन अभिनय की बेहतर क्षमता पिछड़े-दलित लड़कों में थी। ब्राह्मण-भूमिहारों के लड़के अक्सर राक्षस या बंदर-भालू बनते थे। एक ऐसा लड़का राम की भूमिका निभाता था, जिसकी एक आंख खराब थी, एक लंगड़ा लड़का लक्ष्मण बनता था। उनमें अभिनय प्रतिभा थी। एक तरफ लोग रामलीला का मजा लेते थे, दूसरी तरफ ऐसे लड़कों के राम-लक्ष्मण बनने पर कुछ लोग नांक-भौं भी सिकोड़ते थे। बुर्जुग ऐसी टिप्पणियां करते थे, “इस काना को राम बनाके और लंगड़े को लक्ष्मण बनाके भगवानो के हंसी उड़ाए हो तुम लोग। … एक साल बकरी चोरवा को तुम लोग राम बना दिया और दूसरे साल हिजड़ा को बना दिया जानकी। यह रामलीला है कि भंडुआ के तमाशा कर रहे हो? …जेकरा हगे के लूर नै है, उ कोईरिया के बना देते दशरथ और नशेबाज को बना देते हो कौशल्या।”[13] अक्सर ब्राह्मणों-भूमिहारों के लड़के बंदर-भालू के साथ राक्षस की भूमिका निभाते थे। एक जातिवादी महिला का जातिवादी अहंकार जाग उठा। उसने कहा, “मुंहझौंसा दुसाध, चमार, कोईरी, गोबार के राम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान बनाके बभन के लइकन के राक्षस बना देलकै और सबके (राक्षसों को) गोवरावाला पनिया पिला देलकै।”[14] लेखक उस समय नास्तिक हो चुका है। उसके लिए रामलीला और उसमें अभिनय मनोविनोद का विषय था। गांव वालों के लिए यह एक मनोरंजन ही था। लेखक स्वयं लिखता है, “यही गांव वालों का चकल्लस था। अभाव और गंदगी में जीता हुआ गांव, ऐसे ही मनोरंजन करते रहता था।”[15]

इस खंड में रामलीला की तरह की कई अन्य अत्यंत ही मनोरंजक और सृजनात्मक संस्मरण हैं। ऐसा ही एक संस्मरण ‘सुंदर भूतनी’ है। इसमें भूतनी के साथ लेखक के रागात्मक संबंध और भूत-भूतनी के अंधविश्वास की पोल भी खूबसूरत तरीके से खोली गई है। ऐसा ही कथा ‘विष्णु लिंग’ शीर्षक से है।

उच्च शिक्षण संस्थानों में भी जाति

जाति लेखक का पीछा उच्च शिक्षा संस्थानों में पहुंचने पर भी नहीं छोड़ती। लेखक एम.ए. फाइनल का विद्यार्थी है। विभाग के अध्यक्ष विश्वनाथ मिश्रा हैं। लेखक को एम.ए. फाइनल में 300 अंकों का लघु शोधप्रबंध (डिसर्टेसन पेपर) प्रस्तुत करना है। यह सबके लिए अनिवार्य था। अन्य विद्यार्थियों ने परंपरानुसार सूर, तुलसी, कबीर, मीरा, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा को चुना। लेखक ने अलग रास्ता पकड़ा। अपना विषय ‘बिहार में पेशेवर लोगों के बीच अपने पेशों में बोले जानेवाले शब्दों का शब्दकोश’ चुना। विभागाध्यक्ष पंडित जी को यह विषय कबाड़ लगा। उन्होंने कहा, “यह तुमने कैसा कबाड़ लाकर मेरे सामने रख दिया।”… शोधार्थी के तौर पर लेखक ने जवाब दिया, “भाषाशास्त्र का यह उम्दा विषय है, सर। आज तक काम नहीं हुआ है। पेशेवर लोग जिन औजारों से काम करते हैं, वे शब्द हिंदी शब्दकोश में भी नहीं है।”[16]

इस विषय पर विभागाध्यक्ष और लेखक के बीच तीखा संवाद-विवाद हुआ। अंत में विभागाध्यक्ष ने जातिवादी टिप्पणी करते हुए कहा, “यानी तुम्हारे अनुसार मैं चमारों और जुलाहों के साथ बैठकर तुम्हारी थीसिस जांचने की नीचाई पर उतरूं। तुम्हें लिखना है थिसिस तो तुलसी या सूर पर लिखो। ऐसा कहकर हेड ने मेरे द्वारा चुने गए विषय सूची को फाड़कर मेरे ऊपर फेंक दिया।” अंत में लेखक ने एम.ए. की पढ़ाई ही छोड़ दी। उसने यूनिवर्सिटी ही छोड़ दिया। लेखक के दो साल बेकार हो गए।

मंदिर में जाति

जाति जन्म के साथ मिलती है और मृत्यु तक जाति-जनित वर्चस्व और अपमान कायम रहता है। लेखक ने एक ऐसी जाति में जन्म लिया था, जिसके हिस्से अछूत होने की मुहर लगा दी गई थी। वह कुछ करके भी इससे मुक्त नहीं हो सकता था। जाति उसका पीछा हमेशा करती रही। लेखक नौकरी की साक्षात्कार के लिए उड़ीसा गया। आर्थिक तंगी के चलते स्टेशन पर उतरा। लेखक की ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थलों को देखने में गहरी दिलचस्पी थी। लेखक अपने साथी के साथ भुवनेश्वर के चर्चित लिंगराज मंदिर को देखने गया। वहां भी उसे अछूत होने का अपमान झेलना पड़ा। मंदिर में प्रवेश नहीं मिला। उसे मंदिर बिना देखे ही अपमानित होकर, यहां तक कि मार खाते-खाते बचकर वापस आना पड़ा। इस संस्मरण का शीर्षक ‘लिंगराज मंदिर’। यह घटना 1965 की है। करीब-करीब यही स्थिति कोलकाता के कालीघाट मंदिर में हुई, जब लेखक नौकरी पाने के बाद सपरिवार कोलकाता गया था और कालीघाट मंदिर देखने गया। यही स्थिति लेखक की पत्नी के साथ मातामाईन मंदिर में हुई, जहां उन्हें बुरी तरह अपमानित किया गया। इसी तरह निर्दयी स्थिति लेखक ने अयोध्या में देखी, जहां एक ब्राह्मण वैतरणी पार कराने के नाम पर एक गाय को कई-कई घंटों पानी में खड़ा रखता था, बिना दाना, बिना पानी के। गाय की हालात इतनी खराब थी कि लेखक का मन उस गाय की इस दयनीय स्थिति को देखकर शांत नहीं रह पाया। उसने ब्राह्मण को गाय के साथ ऐसा हृदयहीन व्यवहार न करने के लिए कहा। ब्राह्मण आपा खो बैठा और लेखक के साथ ही गाली-गलौच करने लगा।

लेखक की सर्वे अफसर के तौर पर दरभंगा में नियुक्ति हुई। यहां मैथिली ब्राह्मणों का साम्राज्य रहा है। रास्ते में ही जाति और जाति आधारित अपमान से उसका सामना हुआ। लेखक को टिकने के लिए कोई घर नहीं मिला। लेखक के सबआर्डिनेट एक कर्मचारी लेखक के साथ सहानुभूतिपूर्वक कहा, “जाने दीजिए कानूनगो और इंस्पेक्टर साहेब। यह तो ब्राह्मणों की बनाई हुई व्यवस्था है। वह भी याज्ञवल्क्य जैसे दकियानूसी ब्राह्मण की कर्मभूमि मिथिला में आप हैं। सरकारी जमीन या बगीचे में टेंट शामियाना लगाइए और जमीन की खानापूरी (सर्वे का काम) शुरू करिए।”[17] हालांकि यह कहने वाला सबार्डिनेट कर्मचारी राजपूत था, लेकिन ब्राह्मणों के प्रति उसके मन में बहुत घृणा थी। हालांकि अंत में सभी ब्राह्मण-बनिया और अन्य लोग लेखक के सामने नाक रगड़ने आ गए। सब इंतजाम किए। दुर्गा मंदिर में टिकाए। मीट-मांस और अंडे का इंतजाम भी किए, क्योंकि पता चल गया था कि सर्वे अधिकारी के तौर यह व्यक्ति उनका बहुत कुछ बना-बिगाड़ सकता है।


एक मददगार नौकरशाह

इन संस्मरणों में एक खूबसूरत और उर्जा देने वाला संस्मरण ‘पिछले दरवाजे का सूर्य’ शीर्षक से है। लेखक सर्वे के दौरान एक अत्यंत ही गरीब परिवार में जाता है। इस गरीब की झोपड़ी में गांव की सबसे उम्रदराज महिला रहती थीं। सर्वेयर के तौर पर लेखक उनसे मिलना चाहता था। घर के लोग मिलवाने में संकोच कर रहे थे। लेखक को अचानक झोपड़ी के अंदर से सिसकने की आवाज आई। अंदर गरीबी और भूख पसरी हुई थी। अनाज के अभाव में कई दिनों से घर में खाना नहीं बना था। बुढ़िया मां भूख से बेहोश हो गई थी। परिवार का पुरुष सदस्य कर्ज में अनाज मांगने बाहर गया हुआ था। इस परिवार और बूढ़ी मां के हालात देखकर लेखक अपनी इस तरह की प्रतिक्रिया प्रकट की, “सुनकर मेरे पैर के नीचे की जमीन खिसक गई। मेरा मन शोकमग्न हो गया। मेरा हाकिमी ताव छूमंतर हो गया। क्या देश है? क्या सरकार है? क्या व्यवस्था है?”[18]

लेखक ने अपनी जेब से कुछ तत्काल इंतजाम किए। यह सब सुनकर एक जमींदार परिवार की महिला दौड़ती हुई उस झोपड़ी में आईं। उन्हें पिता से वामपंथी/मार्क्सवादी विचार विरासत में मिल थे। उन्होंने ही लेखक को पिछले दरवाजे का सूर्य कहकर संबोधित किया। बहुत ही सम्मान के साथ अपने घर ले गईं। चाय-नाश्ता कराया। बोली– आप पहले अधिकारी हैं, जो गरीब की झोपड़ी में गए। उस महिला के पति और पुत्र सभी उनसे खफा रहते थे, उनसे दूरी बनाकर रहते, क्योंकि गरीबों से सहानुभूति थी। वह मार्क्स की बातों में विश्वास करती थीं। उस महिला ने उस गरीब परिवार के लिए छह महीने का राशन लेखक के सामने ही भेजा।

बुद्ध शरण हंस सचमुच में वंचितों और गरीबों के लिए पिछले दरवाजे के सूर्य के रूप ही थे। जिन लोगों के जीवन में हमेेशा अंधेरा रहता था, वहां उन्होंने उजाला फैलाने की हर कोशिश की। कई बार सफल हुए, कई बार असफल हुए, लेकिन जीवन भर उन्होंने अपना यह प्रयास जारी रखा।

ब्राह्मण के घर अंडा, मेहतर के घर पंडा

अनेक नौकरियां करने के दौरान ही बुद्ध शरण हंस बिहार लोक सेवा आयोग (बीपीसीएससी) की तैयारी करते रहे और चयनोपरांत अधिकारी बने। कुछ प्रारंभिक प्रतिनियुक्तियों के बाद 1975 में उनकी पोस्टिंग आदिवासी बहुल जिले सिंहभूम में हुई। एक संवेदनशील और न्यायप्रिय अधिकारी के रूप में उन्होंने आदिवासियों और वंचित-गरीब तबकों के लिए अपने को समर्पित कर दिया। लेकिन यहां भी जाति ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। उनके समकक्ष अधिकारी या यहां तक उनके सबआर्डिनेट तरह-तरह से उनके पीछे पड़े रहते। उनकी पूरी कोशिश होती थी कि उन्हें न काम करने की परिस्थिति मुहैया हो और उन्हेें सम्मानजनक स्थान न मिल सके। हालांकि अपनी योग्यता, कार्यक्षमता और विद्वता के दम पर लेखक ने इन परिस्थितियों का सामना किया। इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए वे लिखते हैं, “ब्राह्मण किसी तरह बहुजन को अपमानित करके जीना चाहता है। ब्राह्मण के आगे कोई बहुजन सम्मान से जिये, यह ब्राह्मण को कभी पंसद नहीं है, न बर्दाश्त है। यही ब्राह्मणवाद है।…जिस दिन बहुजन अपने को ब्राह्मणों से श्रेष्ठ मानना शुरू कर देंगे, बहुजनों का राज हो जाएगा। यह सीधा गणित है। बहुजनों को इसी सिद्धांत पर जीना होगा।”[19]

भूख, गरीबी और जातिदंश का शिकार लेखक अपने तरह से हर कोशिश करता कि ऐसे लोगों की जिंदगी में कैसे तब्दीली आए। लेखक के लिए अधिकारी का पद व्यक्ति प्रतिष्ठा या पैसा कमाने का साधन नहीं था, बल्कि ऐसे दुखियारे लोगों की जिंदगी में जितनी भी रोशनी लाई जा सके, उसका माध्यम था। ऐसा ही संस्मरण ‘मुशहर कथा’ कथा शीर्षक से है। यह घटना 1998 की है। मुसहरों का एक समूह सूअरपालन के लिए कर्ज की गुजारिश करने आया। उस समय सरकार की अलग-अलग तबकों के लिए जीविकोपार्जन के लिए ऐसी योजनाएं चल रही थीं। एक अधिकारी के तौर पर लेखक उन्हें अपने घर में बैठने के लिए आग्रह करता है, लेकिन आज तक वह किसी अधिकारी के सामने बैठे नहीं थे। अंत में किसी तरह बैठते हैं, चाय पीते हैं। उन्हें आश्चर्य होता है कि हम भी अधिकारी के सामने बैठ सकते हैं, यह उनकी जिंदगी का पहला अनुभव था। फिर बात सूअरपालन के लिए कर्ज पर शुरू होती है। लेखक उनसे यह सवाल करता है कि आखिर वे सूअरपालन ही क्यों करना चाहते हैं। वे इसका जवाब देते हैं कि यह उनका पीढ़ी-दर-पीढ़ी का पेशा है। बुद्ध शरण हंस उनसे पूछते हैं कि आखिर आप जो काम पीढ़ी-दर-पीढ़ी करते आएं है, वही क्यों करना चाहते हैं? लंबी बात-चीत के बाद यह राय बनती है कि नहीं, सूअर की जगह वे फिलहाल बकरी पालन करें, इसके लिए उन्हें कर्ज मिल जाएगा। इसके पहले का कोई अधिकारी किसी अन्य काम के लिए उन्हें कर्ज देने को तैयार नहीं होता था। मुसहरों की जिंदगी में जैसे कोई क्रांति आ गई हो। उन्हें पहली बार लगा कि वे भी इंसान हैं। वे भी हर इंसान की तरह बराबरी और सम्मानजनक व्यवहार के हकदार हैं। यह काम वंचित तबके का एक संवेदशील अधिकारी ही कर सकता था। वे खुशी-खुशी गरिमा के साथ घर लौट जाते हैं। ऐसी एक-दो नहीं, कई सारी घटनाएं अधिकारी के रूप में लेखक के सामने आईं।

इस संस्मरणात्मक कथाओं में बुद्ध शरण हंस ने उस दौर में घट रही कई विपरीत-सी दिखती परिघटनाओं को पकड़ा है। एक तरफ ब्राह्मण आधुनिक जीवन के तौर-तरीकों को अपना रहे हैं, खुद को नए युग की जरूरतों के हिसाब से ढाल रहे हैं। नई-नई चीजों को आत्मसात कर रहे हैं और आगे बढ़ रहे हैं। दूसरी तरफ वंचित समुदाय ब्राह्मणों के पुराने ढोंग-पाखंड और कर्मकांडों को अपनाने की ओर बढ़ रहा है, इसमें ही अपना मान-सम्मान ढूंढ रहा है। ब्राह्मण जिन चीजों को छोड़ रहे हैं, उन्हें ही अपनाकर पिछड़ा-दलित समाज खुद उनके जैसा बनाना चाह रहा है। वे भविष्य की ओर देख रहे हैं, जबकि वंचित समुदायों का एक बड़ा हिस्सा उनके जूठन को अपनाकर सम्मानजनक दिखने की कोशिश कर रहा है। ऐसी एक संस्मरणात्मक कथा ‘ब्राह्मण के अंडा, मेहतर के घर पंडा’ है। यह घटना 2005 की है। एक तिवारी ब्राह्मण लेखक (अधिकारी) को अपने घर पर आमंत्रित करता है। वहां लेखक को टोस्ट-आमलेट और चाय परोसी जाती है। लेखक प्रश्नवाचक दृष्टि से तिवारी की ओर देखता है और कहता है, “सर मेडिकल साइंस और सोशल साइंस अब ब्राह्मण को ब्राह्मण रहने ही नहीं देगा।”[20] लेखक तिवारी से इसका मतलब पूछता है। तिवारी विस्तार से बताता है कि आज तमाम बीमारियों का इलाज अंडे और मांसाहार में है। दूसरा समाज बदल रहा है, जो बदलते समाज के साथ नहीं चलेगा, वह पीछे छूट जाएगा। नई चीजों को अपनानकर ही आगे बढ़ा जा सकता है। इन तथ्यों को ब्राह्मण तिवारी इन शब्दों में व्यक्त करता है, “हम प्राचीन ब्राह्मण, धर्म में आधुनिक संशोधन करके सुखी और सम्मानित हो गए हैं। अब पुरातन पंथ को पकड़कर जीना मूर्खता और बैकवर्डनेस की पहचान है। हम ब्राह्मण होकर बैकवर्ड क्यों बने?”[21]

इसी संस्मरण में इसके उलट एक मेहतर के घर की कहानी है। जहां सत्यनारायण कथा हो रही है। जो मेहतर इन ब्राह्मणों की रचित इन कथाओं-कहानियों के आधार समाज का सबसे अपमानित समुदाय ठहरा दिया गया है, वह अपने को थोड़ा श्रेष्ठ बनाने के लिए और सम्मानित महसूस करने के लिए सत्यनारायण कथा का आयोजन कर रहा है। सैकड़ों वर्षों तक उसे दुत्कारने वाला ब्राह्मण दान-दक्षिणा के लालच में और अपना वर्चस्व कायम करने के लिए उसके यहां कथा कहने को तैयार हो गया है। ब्राह्मण शराब के नशे में धुत है। वह सत्यनारायण कथा का वाचन करते हुए भी उस मेहतर को अछूत ही समझ रहा है। इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए लेखक लिखता है, “जो ब्राह्मण को शास्त्र की नजर से देख रहे हैं, वे भूल कर रहे हैं। ब्राह्मण शास्त्र की बात करते जरूर हैं, मगर वे शास्त्र में जीते नहीं हैं। आज ही नहीं पहले भी ब्राह्मणों से शास्त्र का निर्माण हिंदुओं के लिए किया, अपने लिए कभी नहीं।”[22]

पुनश्च

लेखक ने अपने एक वरिष्ठ अधिकारी के रूप में कार्यकाल का एक हिस्सा झारखंड में बिताया है। आदिवासियों और उनके जल-जंगल जमीन के साथ क्या हो रहा है, उनके अस्तित्व को कैसे मिटाया जा रहा है, उनकी संस्कृति-सभ्यता को कैसे खत्म किया जा रहा है, इसका वर्णन इन शब्दों में किया है, “झारखंड के हर पहाड़ में बारूद लगा हुआ है। झारखंड के हर जंगल के हर पेड़ पर कुल्हाड़ी लगी हुई है। झारखंड के हर नदियों पर डैम, चेकडैम लगे हुए हैं और झारखंड के हर आदिवासियों के पीछे दिक्कुओं की गलत विचारधारा लगी हुई है। बारूद झारखंड के पहाड़ों को विलीन कर देगा। कुल्हाड़ी झारखंड के पहाड़ों को विलीन कर देगी। डैम, चेक डैम नदी-नालों को सोख लेगा, रोक लेगा। दिक्कु मानसिकता आदिवासियों को ऐसा बदल देगी कि एक आदिवासी दूसरे आदिवासी को समीप से भी पहचान नहीं पाएगा। खंड-खंड झारखंड का यही रूप होगा।”[23] ‘खंड-खंड झारखंड’ शीर्षक यह संस्मरण कथा 2011 में लिखी गई है। लेखक का लिखा आज और तेजी से बढ़ती हकीकत बन चुकी है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां और राजसत्ता, शासन-प्रशासन, ठेकदारों-दलालों और अन्य वर्चस्वादी ताकतों से उनका गठजोड़ झारखंड को तबाह-बर्बाद कर रहा है। प्राकृतिक संसाधनों की लूट कर रहा है। आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन को विकास के नाम पर उनसे छीना जा रहा है। दिकु आरएसएस और उनके आनुषांगिक संगठनों के नाम पर आदिवासियों को उनकी पहचान और अस्मिता से वंचित करके उन्हें एक निचले दर्जे का हिंदू बनाने में लगे हैं।

इतिहास अक्सर विजयी और वर्चस्वशाली लोगों को दृष्टि और उन्हीं के केंद्र में रखकर लिखा जाता है। भारत में यह इतिहास वैदिक काल से शुरू किया जाता है और कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो यह ब्राह्मणों और उनकी इतिहास दृष्टि से लिखा गया है। चाहे उस धारा को राष्ट्रवादी कहें, चाहे वामपंथी या कोई और। आजादी के बाद दलितों की यातना, दुख-दर्द, शोषण-उत्पीड़़न और उनके प्रतिवाद, प्रतिरोध और हार-जीत का इतिहास उनकी आत्मकथाओं में आता है। यदि कोई हिंदी पट्टी का इतिहास सबसे बड़े मेहनतकश हिस्से दलित को केंद्र में रखकर देखना-पढ़ना-लिखना चाहे तो दलित आत्मकथाएं इसका सबसे बड़ा स्रोत हैं। ऐसी ही एक आत्मकथा बुद्ध शरण हंस की आत्मकता ‘टुकडे-टुकडे आईना’ है, जिसे एक प्रामाणिक दस्तावेज के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।

संदर्भ :

[1] बुद्ध शरण हंस, दो शब्द, टुकड़े-टुकड़े आईना, तीसरा संस्करण, 2014, प्रकाशन, आंबेडकर मिशन, पटना, पृष्ठ 4

[2] वही, पृष्ठ 3

[3] वही, पृष्ठ 7

[4] वही, पृष्ठ 9

[5] वही, पृष्ठ 12

[6] वही

[7] वही, पृष्ठ 13

[8] वही, पृष्ठ 20

[9] वही, पृष्ठ 20-21

[10] वही, पृष्ठ 23

[11] वही

[12] वही, पृष्ठ 26

[13] वही, पृष्ठ 40

[14] वही, पृष्ठ 42

[15] वही, पृष्ठ 43

[16] वही, पृष्ठ 63

[17] वही, पृष्ठ 81

[18] वही, पृष्ठ 94-95

[19] वही, पृष्ठ 103

[20] वही, पृष्ठ 49

[21] वही, पृष्ठ 150

[22] वही, पृष्ठ 152

[23] वही, पृष्ठ 176

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

डॉ. सिद्धार्थ रामू

डॉ. सिद्धार्थ रामू लेखक, पत्रकार और अनुवादक हैं। “सामाजिक क्रांति की योद्धा सावित्रीबाई फुले : जीवन के विविध आयाम” एवं “बहुजन नवजागरण और प्रतिरोध के विविध स्वर : बहुजन नायक और नायिकाएं” इनकी प्रकाशित पुस्तकें है। इन्होंने बद्रीनारायण की किताब “कांशीराम : लीडर ऑफ दलित्स” का हिंदी अनुवाद 'बहुजन नायक कांशीराम' नाम से किया है, जो राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है। साथ ही इन्होंने डॉ. आंबेडकर की किताब “जाति का विनाश” (अनुवादक : राजकिशोर) का एनोटेटेड संस्करण तैयार किया है, जो फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित है।

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