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छत्तीसगढ़ : आदिवासियों के दबाव पर सरकार ने माना ‘घोटुल’ को ‘गोटूल’

गोटूल आदिवासियों के सांस्कृतिक-सामाजिक-नैतिक शिक्षा केंद्र को कहा जाता है। राज्य सरकार द्वारा इसे घोटुल बताए जाने के बाद से आदिवासियों ने राज्यपाल और मुख्यमंत्री को कई बार पत्र लिखा था। बता रहे हैं तामेश्वर सिन्हा

सूबे के तमाम आदिवासी राज्य सरकार से नराज चल रहे थे। उनकी नाराजगी की वजह उनकी संस्कृति और मान्यता से जुड़े एक शब्द को लेकर थी। वर्ष 2006 में तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा एक योजना की शुरूआत की गई थी, जिसका नाम था– अनुसूचित जनजातियों के श्रद्धा / पूजा स्थल (देवगुड़ी) / ठाकुरदेव एवं सांस्कृतिक केन्द्र (घोटुल) का परिरक्षण एवं विकास योजना। आदिवासी इस बात से नाराज थे कि इस योजना में घोटुल शब्द का उपयोग किया गया था। वे इस शब्द को ‘गोटूल’ शब्द से बदलने की मांग कर रहे थे। आदिवासियों की यह मांग इस बात का परिचायक है कि वे अपनी संस्कृति और परंपराओं के प्रति कितने सजग हैं।

ध्यातव्य है कि गोटूल आदिवासियों के सांस्कृतिक-सामाजिक-नैतिक शिक्षा केंद्र को कहा जाता है। राज्य सरकार द्वारा इसे घोटुल बताए जाने के बाद से आदिवासियों ने राज्यपाल और मुख्यमंत्री को कई बार पत्र लिखा था। इसी क्रम में गत 3 अप्रैल, 2023 को राज्य सरकार ने एक अधिसूचना जारी की, जिसमें अनुसूचित जनजातियों के श्रद्धा / पूजा स्थल (देवगुड़ी) / ठाकुरदेव एवं सांस्कृतिक केन्द्र (घोटुल) का परिरक्षण एवं विकास योजना के सभी संदर्भों में पूर्व से प्रयुक्त शब्द ‘घोटुल’ के बदले ‘गोटूल’ का उपयोग करने का निर्देश दिया गया है।

बस्तर में एक गोटूल (तस्वीर : तामेश्वर सिन्हा)

राज्य सरकार के इस फैसले पर आदिवासी समाज युवा प्रभाग के प्रदेश उपाध्यक्ष ललित नरेटी ने बताया कि समाज का पहचान उसकी संस्कृति, परंपरा, भाषा है। यदि उनके किसी भी पहलू को गलत ढंग से प्रसारित किया जाता है तो यह उचित नहीं है। उन्होंने बताया कि आदिवासी समाज में गोटूल का महत्वपूर्ण स्थान है जो प्राचीन समय से ही आदिवासी समाज के ग्राम व्यवस्था में संस्कृति, परंपरा, गीत, नृत्य का शिक्षण केंद्र है। इसके माध्यम से आदिम समुदाय अपने रुढ़िगत परंपरा, पारंपरिक ज्ञान, रहन-सहन, नैतिकता व अन्य कलाओं को अपनी आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित करता है। इस प्रकार आदिवासी संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग होने के कारण गोटूल की एक अलग पहचान है।

नरेटी आरोप लगाते हैं कि अल्प ज्ञानी या अति उत्साही लेखकों द्वारा तथा विभिन्न समाचार माध्यमों, पाठ्य-पुस्तकों व समय-समय पर प्रसारित होने वाले शासकीय पत्रों में गोटूल के स्थान पर घोटुल शब्द का उपयोग किया जाता है। यदि किसी संस्कृति से संबंधित कोई महत्वपूर्ण पहलू का इस तरह गलत उच्चारण प्रकाशित किया जा रहा है तो निश्चित रूप से यह हम आदिवासियों के ऊपर सांस्कृतिक हमला है। 

वहीं उत्तर बस्तर कांकेर जिले के युवा आदिवासी योगेश नरेटी कहते हैं कि आदिवासियों की संस्कृति को अक्सर तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता रहा है। बस्तर में एक बाहरी लेखक (नाम नहीं लेने की बात कही) आए और गोटूल को घोटुल लिखकर पूरे देश-दुनिया को बता दिया। फिर वहीं से सारे शोधार्थी और प्रशासनिक अधिकारी घोटुल लिखने लगा। लेकिन हम जानते हैं कि गोटूल ही सही शब्द है। इसलिए हम लगातार मांग कर रहे थे कि सही उच्चारण किया जाय। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के द्वारा अधिसूचना जारी किया जाना हमारी जीत है। 

(संपादन : राजन/नवल)


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लेखक के बारे में

तामेश्वर सिन्हा

तामेश्वर सिन्हा छत्तीसगढ़ के स्वतंत्र पत्रकार हैं। इन्होंने आदिवासियों के संघर्ष को अपनी पत्रकारिता का केंद्र बनाया है और वे विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रिपोर्टिंग करते हैं

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