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केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में नब्बे फीसदी का हक खा रहे दस फीसदी वाले

पहली हकमारी पदों के सृजन के समय ही कर दी गई है। यदि हम वर्तमान में भरे हुए पदों को इसमें शामिल कर दें तो आरक्षण की हकमारी और स्पष्ट रूप से सामने आती है। भरे हुए पदों के मामले में भी एक तरफ सामान्य वर्ग का प्रतिशत बढ़ जाता है तो दूसरी ओर आरक्षित समुदायों की अधिक सीटें खाली रह जाती हैं। बता रहे हैं कुंदन कुमार

भारत के 45 केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में कुल 2553 पद प्रोफेसर के लिए, 5110 पद एसोसिएट प्रोफेसर के लिए और 11,293 पद असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए सृजित किये गए हैं। सर्वविदित है कि अनुसूचित जाति (एससी) को 15 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति (एसटी) को 7.5 प्रतिशत और पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 27 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त है। जाहिर तौर पर इसी अनुपात में इन पदों पर उनका प्रतिनिधित्व भी होना चाहिए। लेकिन कुल पदों के आलोक में जब हम आरक्षित पद और उनकी नियुक्ति देखते है तो हम पाते हैं कि आरक्षण दरकिनार किया जा रहा है।

ये जानकारियां सूचना के अधिकार के तहत यूजीसी द्वारा 25 अगस्त, 2023 को उपलब्ध कराई गई हैं। ध्यातव्य है कि एससी और एसटी वर्ग को सरकारी नौकरियों, उच्च शिक्षण संस्थानों एवं विधायिका में आरक्षण संविधान लागू किए जाने के साथ ही प्रदान किया गया। वहीं ओबीसी को सरकारी नौकरियों में आरक्षण मंडल आयोग की अनुशंसा के अनुरूप वर्ष 1990 में मिला, जबकि उच्च शिक्षण संस्थानों में वर्ष 2009 से मिलना प्रारंभ हुआ। हालांकि इसकी उद्घोषणा 2006 में कर दी गई थी। लेखक को सूचना के अधिकार के तहत यूजीसी द्वारा दी गई ये जानकारियां 1 मार्च, 2023 की स्थिति बयां करती हैं, और आरक्षण के अनुपालन में व्याप्त अनियमितताओं को सामने लाती हैं। 

मसलन, प्रोफेसर के लिए कुल 2553 सृजित पदों में मात्र 307 (12.03 प्रतिशत) एससी के लिए, 142 (5.56 प्रतिशत) एसटी के लिए और 374 (14.65 प्रतिशत) ओबीसी के लिए आरक्षित की गई हैं। इन समुदायों के लिए कुल 49.5 प्रतिशत पद आरक्षित होने का प्रावधान है, लेकिन मात्र 32.24 प्रतिशत ही आरक्षित की गई हैं। यही तस्वीर लगभग एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए आरक्षित सीटों पर भी देखने को मिलती है। 

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली

हम देखते हैं कि पहली हकमारी पदों के सृजन के समय ही कर दी गई है। यदि हम वर्तमान में भरे हुए पदों को इसमें शामिल कर दें तो आरक्षण की हकमारी और स्पष्ट रूप से सामने आती है। भरे हुए पदों के मामले में भी एक तरफ सामान्य वर्ग का प्रतिशत बढ़ जाता है तो दूसरी ओर आरक्षित समुदायों की अधिक सीटें खाली रह जाती हैं।

मसलन, प्रोफेसर के लिए कुल 2553 सृजित पदों में 1015 पद भरे हुए हैं। इन भरे पदों में मात्र 75 (7.39 प्रतिशत) एससी, 18 (1.77 प्रतिशत) एसटी और 63 (6.20 प्रतिशत) ओबीसी प्रोफेसर हैं। जबकि 836 (82.36 प्रतिशत) सामान्य श्रेणी के प्रोफेसर भरे पड़े हैं। जिन समुदायों के लिए 49.5 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है, उनको भरे हुए पदों में मात्र 15.4 प्रतिशत ही दिया गया है। यही हक़मारी वाली स्थिति एसोसिएट प्रोफेसर और  असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए भरे हुए सीटों पर भी देखने को मिलती है। एसोसिएट प्रोफेसर के भरे हुए पदों में मात्र 17.3 प्रतिशत (8.01 प्रतिशत एससी, 2.61 प्रतिशत एसटी और 6.71 प्रतिशत ओबीसी) और असिस्टेंट प्रोफेसर के 36.7 प्रतिशत पदों पर एससी (12.1 प्रतिशत), एसटी (5.92 प्रतिशत) और ओबीसी (18.66 प्रतिशत) की नियुक्ति हुई है। इन हकमारियों को हम दूसरे तरफ से भी देखें। प्रोफेसर पद पर एससी समुदायों के लिए आरक्षित सीटों में  75.57 प्रतिशत (307 पद में से 232 पद) खाली हैं। वहीं एसटी के लिए कुल आरक्षित सीटों में  87.3 प्रतिशत (142 में से 124) और ओबीसी के कुल आरक्षित सीटों में  83.16 प्रतिशत (374 में से 311) पद खाली हैं। जबकि दूसरी तरफ कुल अनारक्षित सीटों में 45.89 प्रतिशत (1545 में से 709) ही खाली है। 

यही तस्वीर एसोसिएट प्रोफेसर की भी है। हालांकि असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए स्थिति थोड़ी-सी  बेहतर दिखाई पड़ती है, लेकिन वहां भी आरक्षित सीटों में 18.01 प्रतिशत, 22.5 प्रतिशत और 26.78 प्रतिशत क्रमश एससी, एसटी और ओबीसी के खाली हैं, जबकि अनारक्षित मात्र 11.58 प्रतिशत पद ही खाली हैं। अब सवाल यह है कि जब केंद्रीय शिक्षण संस्थानों की यह स्थिति है तो अन्य संस्थानों की स्थिति कैसी होगी? 

अभी हाल ही में रोहिणी आयोग ने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को समर्पित कर दिया है। इस आयोग का गठन 2017 में ओबीसी उपवर्गीकरण के बारे में विचार करने के लिए किया गया था। कहा यह गया कि ओबीसी की कोटे का लाभ कुछ ही जातियां उठा रही हैं। यह एक मुनासिब बात है। लेकिन पहली शर्त तो यही होनी चाहिए कि निर्धारित आरक्षण को ठीक से लागू किया जाए। 

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

कुंदन कुमार

लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में पीएचडी शोधार्थी हैं

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