भारत एक बहुसांस्कृतिक देश है। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी आदि विभिन्न धर्मों के रंगों से इस देश की समावेशी संस्कृति का ताना-बाना बुना गया है। लेकिन बीते एक दशक से देश में बढ़ती धार्मिक संकीर्णता ने इस ताने-बाने पर कुठाराघात किया है। संस्कृति और परंपरा के नाम पर बढ़ती इस असहिष्णुता ने न सिर्फ अल्पसंख्यकों, बल्कि दलितों और आदिवासी समुदायों के प्रति घृणा की प्रवृत्ति को जन्म दिया है। इसने अभिव्यक्ति की आजादी, निजता का अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, बंधुत्व जैसे संवैधानिक अधिकार और मूल्यों को भी ठेस पहुंचाई है।
बीते 25 दिसंबर को ईसाइयों का पवित्र त्योहार क्रिसमस था। इस अवसर पर देशभर में तैयारियां चल रही थीं। विभिन्न शहरों में चर्चों, सार्वजनिक स्थलों और भव्य शॉपिंग मॉल्स को सुंदर ढंग से सजाया गया था। लेकिन कई जगहों पर कुछ ऐसा हुआ, जिसने क्रिसमस का सारा उत्साह ठंडा कर दिया और लोगों के दिलों में दहशत पैदा कर दिया। एक तथाकथित धार्मिक संगठन ने जिस तरह धार्मिक-संकीर्णता और असहिष्णुता दिखाते हुए कई जगहों पर उत्पात मचाया। कहीं शॉपिंग मॉल्स में की गई सजावट को तोड़ा गया तो कहीं चर्च के सामने उन्मादियों द्वारा धर्म विशेष से संबंधित नारे लगाए गए। कहीं किसी गरीब दुकानदार को क्रिसमस का सामान बेचने पर धमकाया गया तो कहीं सांता क्लॉज की टोपियां पहने महिलाओं से अभद्रता की गई। कई जगहों पर चर्चों को निशाना बनाया गया।
इस दौरान कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए। यह हैरान करने वाला मंजर था कि हाथ में लाठी-डंडा थामे मुट्ठीभर उपद्रवियों ने दिनदहाड़े दुकानों और भवनों पर हमले किए और वहां मौजूद लोगों ने कोई प्रतिरोध तक नहीं किया। सवाल यह भी उठता है कि आखिर क्यों इस भीड़ को अब प्रशासन का भी डर नहीं रहा?

ऐसा नहीं था कि उन्मादियों द्वारा की गई यह हिंसा किसी घटना की तात्कालिक प्रतिक्रिया थी। विदेशी धर्म और संस्कृति के नाम पर काफी समय से ईसाई धर्म को कटघरे में खड़ा किया जाता रहा है। यह भी आरोप लगाया जाता है कि ईसाई मिशनरियों ने यहां आकर लोगों का धर्मांतरण किया। ऐसी दलीलें देते समय कुछ तथ्य बहुत सावधानीपूर्वक छिपा लिए जाते हैं, जिसमें यह प्रश्न भी शामिल है कि आखिर भारत में जिन लोगों ने ईसाई धर्म को अपनाया वे कौन थे और उन्होंने क्यों धर्मांतरण किया? हालांकि यह एक अलग मुद्दा है और इस पर विस्तार से बात हो सकती है कि भारत में प्रचलित वर्णाश्रम व्यवस्था ने सदियों तक किस प्रकार शिक्षा, संपत्ति और मानवीय जीवन जीने से दलित समुदाय को वंचित रखा। जब ईसाई मिशनरी यहां आए तो उन्होंने इन दलित बस्तियों में शिक्षा का प्रचार-प्रसार का कार्य किया, उन्हें चिकित्सा-सुविधा उपलब्ध कराई और मानवीय जीवन जीने में योगदान दिया। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि दलितों ने ईसाई धर्म में धर्मांतरण किया। लेकिन इसपर प्रश्न उठाने वाले, धर्म और संस्कृति का राग-अलापने वालों को यह भी खुद से और अपनी शोषणकारी जाति-व्यवस्था से पूछना चाहिए कि ऐसा क्यों हुआ? इनकी यही दलित-ईसाई विरोधी मानसिकता क्रिसमस पर दिखाई दी।
गौरतलब है कि ये उन्मादी उसी विचारधारा के लोग हैं जो अमेरिका, ब्रिटेन में होली-दीवाली सेलिब्रेशन पर गर्व से फूल उठते हैं। इसे अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता का प्रमाण-पत्र समझते हैं और ‘विश्वगुरु’ बनने की स्वघोषणाएं करने लगते हैं। वहीं दूसरी तरफ अपने देश में क्रिसमस मनाने से इनकी धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं पर ‘खतरा’ मंडराने लगता है। इन्हें उन अमीर ईसाइयों से कोई दिक्कत नहीं है जो यहां की कंपनियों में निवेश करते हैं। इन्हें उन तथाकथित उच्च जाति के लोगों से भी कोई दिक्कत नहीं है जो विदेशों में जाकर या आलीशान बंगलों में बैठकर क्रिसमस मनाते हैं। उन्हें दिक्कत है तो उस गरीब दलित आदमी से जो दो वक्त की रोटी के लिए सड़क किनारे क्रिसमस का सामान बेचने के लिए बैठा है। दिक्कत है तो उन साधारण लोगों से जो साल में एक बार खुशी से अपना त्योहार मनाना चाहते हैं।
यह प्रश्न उठता है कि आखिर एक सभ्य समाज के रूप में हम किस दिशा में जा रहे हैं? यह दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक विरोधी मानसिकता कब खत्म होगी इस देश से? आज बड़े-बड़े राजनीतिक और धार्मिक मंचों से ‘वसुधैव-कुटुंकम्’ के लगते नारे बहुत खोखले साबित हो गए हैं। क्या संवैधानिक मूल्यों और अधिकारों की अनदेखी करने वाले और शांति-व्यवस्था भंग करने वाले ऐसे उन्मादियों को कानून सजा देगा?
(संपादन : नवल/अनिल)
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