देश में विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा से जुड़े यूजीसी रेगुलेशंस पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक के बाद विभिन्न राज्यों में विरोध-प्रदर्शन तेज हो गए हैं। पटना और लखनऊ से लेकर छोटे जिलों और कस्बों तक छात्र-युवा और सामाजिक संगठनों द्वारा लगातार आंदोलन आयोजित किए जा रहे हैं। इस पूरे आंदोलन का प्रमुख केंद्र फिलहाल बिहार बनता दिख रहा है। लोग 19 मार्च को होने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर तो रहे हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर बहुजनों को भरोसा नहीं है। न्यायालय के प्रति बहुजनों का असंतोष अनायास नहीं है। यह न्यायपालिका में बहुजनों की बहुत कम हिस्सेदारी एवं यूजीसी गाइडलाइंस पर रोक लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट के टिप्पणी से पनपा है।
बिहार के विभिन्न जिलों पटना, पूर्णिया, बेगूसराय, बक्सर, सिवान, सहरसा, जहानाबाद, अरवल, समस्तीपुर, दरभंगा और भोजपुर में छात्र-युवा संगठनों और सामाजिक न्याय से जुड़े संगठनों द्वारा लगातार विरोध कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। मसलन, गत 13 मार्च को पटना में पटना कॉलेज से कारगिल चौक तक छात्रों ने मशाल जुलूस निकाला। इसी तरह पूर्णिया जिले के श्रीनगर प्रखंड में श्रीनगर ब्लॉक से श्रीनगर हाई स्कूल तक मशाल जुलूस निकाला गया। गत 15 मार्च को ही सिवान में आंबेडकर पार्क से मशाल जुलूस निकाला गया। इसी तरह 17 मार्च को पटना कॉलेज में छात्रों का महापंचायत आयोजित किया गया।
आंदोलन का केंद्रीय कार्यक्रम 18 मार्च को पटना में प्रस्तावित ‘समता महाजुटान’ और राजभवन मार्च है। यह कार्यक्रम ऑल इंडिया फोरम फॉर इक्विटी के बैनर तले आयोजित किया जा रहा है। इस कार्यक्रम की घोषणा गत 9 मार्च, 2026 को पटना स्थित आंबेडकर सेवा शोध संस्थान में आयोजित एक प्रेस वार्ता में की गई थी। प्रेस वार्ता में दर्जन भर से अधिक छात्र-युवा संगठनों और एससी, एसटी तथा ओबीसी से जुड़े सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था।

‘समता महाजुटान’ को लेकर पूरे बिहार में व्यापक स्तर पर तैयारियां चल रही हैं। तैयारियों में छात्र और सामाजिक संगठन जोर-शोर से जुटे हुए हैं। ओबीसी और दलित छात्रावासों में भी इस कार्यक्रम की तैयारी जोर-शोर से चल रही है। जगह-जगह पोस्टर लगाए जा रहे हैं और बड़े पैमाने पर पर्चे बांटे जा रहे हैं। इसके अलावा गांव-कस्बों में भी बैठकों और जनसंपर्क कार्यक्रमों के जरिए लोगों को आंदोलन से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
असल में बिहार में यह आंदोलन केवल यूजीसी गाइडलाइंस लागू करने की मांग तक सीमित नहीं है। आंदोलन से जुड़े संगठनों का कहना है कि इसे सामाजिक न्याय के व्यापक सवालों से जोड़कर आगे बढ़ाया जा रहा है। आंदोलन के दौरान प्रमुख रूप से जाति आधारित भेदभाव के खिलाफ यूजीसी गाइडलाइंस 2026 को लागू करने, बिहार में 65 प्रतिशत आरक्षण लागू करने, देश में जाति जनगणना करवाने, निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने, नई शिक्षा नीति को वापस लेने की मांग उठ रहे हैं।
ध्यातव्य है कि यूजीसी रेगुलेशन के आंदोलन को सिर्फ यूजीसी एवं विश्वविद्यालय के सवालों के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय पर हमले एवं सामाजिक न्याय की दिशा में बदलाव के प्रयासों को सवर्ण वर्चस्व द्वारा पीछे धकेलने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
बिहार में दलित-बहुजन छात्रों का महाजुटान इस मायने में भी खास है कि मुख्यधारा की मीडिया ने इस पूरे आंदोलन को महत्व नहीं दिया है। यूजीसी रेगुलेशंस के समर्थन में होने वाले कार्यक्रमों/आंदोलनों की खबरों को या तो मीडिया जगह नहीं दे रहा है या फिर किसी कोने में थोड़ी-सी जगह में निपटा दे रहा है। जबकि यूजीसी रेगुलेशन के विरोध में सवर्ण समुदाय के मुट्ठी भर लोगों के प्रदर्शन को मीडिया आगे बढ़कर प्रसारित कर रहा था।
बहरहाल, आंदोलन से जुड़े संगठनों का कहना है कि शिक्षा और रोजगार से जुड़े इन मुद्दों का संबंध सीधे तौर पर सामाजिक न्याय और समान अवसर से है। इसलिए छात्र-युवा और सामाजिक संगठनों द्वारा संयुक्त रूप से इन मांगों को लेकर आंदोलन को आगे बढ़ाया जा रहा है। 18 मार्च को पटना में प्रस्तावित ‘समता महाजुटान’ को इस आंदोलन का सबसे बड़ा कार्यक्रम माना जा रहा है। इस कड़ी में ऑल इंडिया फोरम फॉर इक्विटी ने बिहार के विपक्षी पार्टियों राष्ट्रीय जनता दल, भाकपा माले, कांग्रेस सहित अनेक राजनीतिक दलों से भी इस महाजुटान को समर्थन देने की अपील की है।
‘समता महाजुटान’ की तैयारियों में ऑल इंडिया फोरम फॉर इक्विटी में शामिल संगठन सामाजिक न्याय आंदोलन, बिहार के संयोजक रिंकु यादव कहते हैं कि 18 मार्च, 1974 के आंदोलन का ऐतिहासिक दिन है। यह और ऐतिहासिक होगा। बिहार में चुनी हुई नई सरकार बिहार को 1990 के पीछे ले जाना चाह रही है। पटना जिले के मनेर के रहने वाले विकास बताते हैं कि ग्रामीण इलाकों में भी यूजीसी रेगुलेशंस पर रोक के खिलाफ आक्रोश है। स्वतः स्फूर्त तरीके से लोग बैठकें आयोजित कर रहे हैं।
(संपादन : नवल/अनिल)
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