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शूद्र विद्रोह : हिंदू राष्ट्रवाद का प्रतिविमर्श

स्वीकार करना होगा कि कांचा आइलैय्या शेपर्ड की पुस्तक ‘शूद्र विद्रोह : ताकि बन सके आत्मनिर्भर भारत’ बहुजन समाज के एक ऑर्गैनिक बौद्धिक का श्रमशील समाज के दृष्टिकोण से प्रस्तुत एक मौलिक चिंतन है। इसे ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के प्रतिविमर्श के रूप में भी विमर्शकारी बनाने की जरूरत है। पढ़ें, दिवंगत समालोचक वीरेंद्र यादव की यह समीक्षा

विगत कुछ वर्षों में कांचा आइलैय्या शेपर्ड ने भारतीय सामाजिक व्यवस्था की गहन पड़ताल करते हुए जिस तरह हिंदुत्ववाद के वर्चस्व को सबाल्टर्न दृष्टि से प्रश्नांकित किया है, वह कथित ‘सांस्कृतिक राष्ट्र्वाद’ का सशक्त प्रतिविमर्श है। अपनी पहली पुस्तक ‘व्हाई आइ एम नॉट हिंदू’ से जिस विचारोत्तेजक विमर्श की शुरुआत उन्होंने की थी, ‘पोस्ट हिंदू इंडिया’ के बाद अब ‘शूद्र विद्रोह’ के रूप में वह पूर्णता प्राप्त कर चुकी है। ‘शूद्र विद्रोह’ भारत के श्रमशील समाज के पक्ष में निम्नवर्गीय (सबाल्टर्न) दृष्टि से प्रस्तुत एक घोषणापत्र सरीखा है। कांचा आइलैय्या का अभिमत है कि भारतीय संविधान जिस समता, स्वतंत्रता व भ्रातृत्व के आदर्श का आकांक्षी है, उसे मूर्त करने के लिए भारत के कृषक व खेतिहर समाज की श्रमिक संस्कृति व श्रम के मूल्यों की केंद्रीयता जरूरी है।

‘मनुस्मृति’ बनाम भारतीय संविधान के विमर्श की पड़ताल करते हुए ‘शूद्र विद्रोह’ बाबा साहेब आंबेडकर की उस चिंता को संबोधित है जिसे दृष्टिगत रखते हुए उन्होंने कहा था कि “इस संविधान के माध्यम से हम राजनीतिक जनतंत्र में प्रवेश करेंगें यानी ‘एक व्यक्ति एक मत का सिद्धांत’ स्वीकार करेंगे, लेकिन यदि यह राजनीतिक जनतंत्र, आर्थिक और सामाजिक जनतंत्र में नहीं बदलेगा तो यह राजनीतिक जनतंत्र भी खतरे में पड़ जाएगा।” आज जब आंबेडकर की यह चेतावनी सच होती दिख रही है तो यह ठहरकर सोचने की जरूरत है कि आखिर क्यों आजादी के बाद का भारत ‘समता, स्वतंत्रता व भातृत्व’ के मूल्यों से विपथित होकर हिंदुत्व के बहुसंख्यकवाद की अंधगली में शरणागत होने के मुहाने पर है। कांचा आइलैय्या अपनी पुस्तक में इसे भारतीय समाज की उस वर्णाश्रमी संरचना में तलाश करते हैं जो श्रमशील वर्गों को ‘शूद्र’ की निम्न कोटि में डालकर ब्राह्मणवादी संरचना को राज्यव्यवस्था का आधार बनाती है।

पुस्तक की भूमिका में उनका कहना है कि “भारत के स्वाधीन होने के बाद वामपंथी/उदारवादी द्विज बुद्धिजीवियों ने जिस हिंदुत्व विरोधी विमर्श का वरण किया वह जाति को पूरी तरह से नजरअंदाज करता था और साथ ही ब्राह्मणवाद के इतिहास को भी। उन्होंने बहुसंख्यकवाद का एक मिथ्या सिद्धांत गढ़ा, जिसमें सभी शूद्र, दलित और आदिवासी लोगों को एक हिंदू धर्म का हिस्सा बताया गया। यही आरएसएस की भी सोच है। बहुसंख्यकवाद की इस धारणा की समालोचनात्मक पड़ताल जरूरी है।”

कांचा आइलैय्या इस पड़ताल को समग्रता प्रदान करते हुए शूद्र व दलित अध्येताओं द्वारा उत्पादक समुदायों का नया इतिहास लिखने का आह्वान करते हैं। उनका बेबाक कथन है कि “जिस साहित्य में उत्पादक सभ्यता के बारे में कुछ भी नहीं है वह राष्ट्रवादी कैसे हो सकता है? शूद्र कृषि उत्पादकों के विद्रोह के संदर्भ में भारतीय इतिहास और सभ्यता के बारे में जानकारी नए सिरे से निर्मित करने की जरूरत है।”

कुल ग्यारह अध्यायों में विभक्त यह पुस्तक ‘हिंदुत्व में शूद्र’, ‘ईश्वर की शूद्र, ब्राह्मणवादी और यहूदी अवधारणा’, ‘शूद्र कृषिवाद व भारतीय सभ्यता’, व ’हिंदू राष्ट्र में शूद्रों के लिए खतरे’ सरीखे विषयों को प्रमुखत: संबोधित है। विगत वर्षों में हिदुत्ववादी राजनीति के उभार और धर्मनिरपेक्षता के नेहरूवादी ढांचे के प्रश्नांकन के साथ विकल्प की राजनीति के लिए जिस सामाजिक-राजनीतिक सैद्धांतिकी की जरूरत महसूस की जा रही है, यह पुस्तक उसकी एक ठोस वैचारिकी निर्मित करती है। भारतीय शासन व्यवस्था व सामाजिक तंत्र में श्रमशील वर्गों की वंचना की पड़ताल के लिए जाति-जनगणना की जरूरत व पीडीए (पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक) के नारों से आगे जाकर यह पुस्तक भारतीय समाज में श्रम की गरिमा पर केंद्रित आमूलचूल परिवर्तन को प्रस्तावित करती है। प्राचीन भारत की उत्पादन प्रक्रिया की वैदिक ग्रंथों में अनदेखी को चिह्नित करते हुए कांचा आइलैय्या ब्राह्मणवादियों के ज्ञान को प्रश्नांकित करते हैं। उनका कहना है कि “अगर हमारे देश में आध्यात्मिक लोकतंत्र होता तो हम न केवल अधिक उत्पादन कर पाते वरन् प्राचीनकाल से ही हम शूद्र ,दलित और आदिवासियों की प्रतिभा का लाभ उठा पाते। हो सकता है कि हमारी युद्ध तकनीकी और सैन्य ताकत इतनी मज़बूत और उन्नत होती कि बाहर से आकर कोई भारत पर विजय हासिल नहीं कर पाता। अगर हमारा देश जाति और वर्ण से मुक्त होता तो यह एकदम दूसरा देश होता।”

‘शूद्र विद्रोह : ताकि बन से आत्मनिर्भर भारत’ का मुख पृष्ठ

कांचा आइलैय्या भारतीय संविधान की संकल्पना के आधुनिक भारत के निर्माण की सबसे बड़ी बाधा उस वर्चस्वशाली ब्राह्मणवाद को मानते हैं जो मनु संहिता और कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ पर आधारित है। मनुस्मृति जहां वर्णाश्रमी सामाजिक व्यवस्था का ताना-बाना निर्मित करती है, वहीं ‘अर्थशास्त्र’ राज्य व्यवस्था के नियम निर्धारित करता है। उनके अनुसार, “कौटिल्य ने ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में ब्राह्मणों की दैवीय शक्तियों को राज्य का हिस्सा बना दिया था। उन्होंने राज्य की संस्थाओं के संचालन में जातियों की भूमिका में किसी तरह के परिवर्तन की संभावना को समाप्त कर दिया। यहां तक कि जहां कहीं अपवाद स्वरुप शूद्र राजा थे, उन्हें मजबूर किया गया कि वे अपने उन बंधुओं का दमन करें जो उत्पादक गतिविधियों में संलग्न थे। शिवाजी एक शक्तिशाली राजा थे, जिन्होंने मुगलों को हराया था। मगर उन्हें भी ब्राह्मणों की आध्यात्मिक और बौद्धिक सत्ता के आगे आत्मसमर्पण करना पड़ा।”

कांचा आइलैय्या की निष्पत्ति है कि हिंदुत्व की ताकतें आज 21वीं सदी में भी कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ पर आधारित राज्य और मनु की ‘मनुस्मृति’ पर आधारित नागरिक समाज को पुनर्स्थापित करना चाहते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए उन्होंने शूद्र, दलित और आदिवासी तबकों को हिंदू घोषित कर दिया, मगर उन्हें मूलभूत आध्यात्मिक अधिकार नहीं दिए। शूद्र शासक और आमजन दोनों को यह अहसास नहीं हुआ कि शूद्रों की अपनी आध्यात्मिक परंपरा है, जो ब्राह्मणों की परंपरा से अलग और स्वतंत्र है। मैसूर और बड़ोदरा के शूद्र महाराजा अपने छोटे-छोटे राज्यों पर लंबे समय तक शासन करते रहे। मगर आध्यात्मिक और बौद्धिक दृष्टि से वे ब्राह्मणों के नियंत्रण में रहे। ब्राह्मणों के संपूर्ण प्रभुत्व वाले इसी क्षेत्र में महात्मा जोतीराव फुले उभरे। मगर उत्तर-औपनिवेशिक बुद्धिजीवियों, जिनमें केवल ब्राह्मण, बनिये, कायस्थ और पुरोहित शामिल थे, ने भारतीय पुनर्जागरण के इतिहास से उन्हें गायब कर दिया। कांचा आइलैय्या के अनुसार, “उत्तर औपनिवेशिक बुद्धिजीवियों की भूमिका औपनिवेशिक बुद्धिजीवियों से भी ज्यादा नकारात्मक थी…बाद के दौर में बाबा साहेब आंबेडकर को संविधान रचना का श्रेय देते हुए इसे हिंदुत्ववाद के विरुद्ध विमर्शकारी तो बनाया गया, लेकिन ब्राह्मणवादी श्रेष्ठता और वर्णाश्रमी जातिगत सोपान के विरुद्ध कोई प्रभावी योजना या कार्यक्रम नहीं लागू किया गया… कांग्रेस पार्टी के लंबे शासनकाल में सत्ता मुख्यतः उन्हीं द्विजों के हाथों में बनी रही जो सिद्धांत के स्तर पर तो धर्मनिरपेक्ष थे मगर धार्मिक असमानता और अछूत प्रथा को नज़रअंदाज़ करते थे। वे धर्मनिरपेक्षता और मार्क्सवादी द्विजों द्वारा पोषित अस्पष्ट समाजवादी विचारों के पीछे छिपे रहे। मनुवादी द्विज और मार्क्सवादी द्विज दोनों जाति और अछूत प्रथा के मामले में चुप्पी साधे रहते हैं।” परिणामत: आंबेडकर की ‘जाति उन्मूलन’ की प्रतिज्ञा कालांतर में ‘जाति सशक्तिकरण’ में बदल गई।

पुस्तक में कांचा आइलैय्या की दृढ़ स्थापना है कि “जातिवाद के उन्मूलन की पहली शर्त है ब्राह्मणवाद का खात्मा। इस दिशा में पहला कदम होगा कि शूद्र, दलित, और आदिवासी आध्यात्मिक दर्शन के क्षेत्र में प्रवेश करें। वे पुरोहित बनें और हिंदू आध्यात्मिक ग्रंथों की स्वयं व्याख्या करें। द्विजों और विशेषकर ब्राह्मणों को यह स्वीकार करना होगा कि श्रम-आधारित जीवन अध्यात्म का एक सकारात्मक पहलू है। भारत के नागरिक और आध्यत्मिक समाज को नया रूप देने के लिए ब्राह्मणवाद का उन्मूलन आवश्यक है।” इसके लिए कांचा चार बिंदु प्रस्तावित करते हैं– (1) हिंदू सहित भारत के सभी धर्मों की आध्यात्मिक प्रणालियों का लोकतंत्रीकरण, (2) सभी समुदायों द्वारा श्रम को जीवन के हिस्से के रूप में स्वीकार किया जाना, (3) भारत की खानपान की संस्कृति का पूर्ण लोकतंत्रीकरण जिसके अंतर्गत न तो ब्राह्मणवादी शुद्ध शाकाहार और न ही इस्लामिक निषेध स्वीकार होंगे, (4) महिलाओं और पुरुषों को बिना किसी शर्त के समान दर्जा देना क्योंकि यह सोच कि ईश्वर ने महिलाओं को पुरुषों की सेवा करने के लिए बनाया है, पूर्णत: मिथ्या है।

ब्राह्मणवाद के विरुद्ध जोतीराव फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले द्वारा स्थापित सत्यशोधक समाज का दार्शनिक विमर्श कांचा आइलैय्या की दृष्टि में कृषिवादी था तथा इसका उद्येश्य शूद्रों और अतिशूद्रों को लंबे समय से चली आ रही गुलामी से मुक्ति दिलाना था। फुले की दोनों पुस्तकों – ‘गुलामगिरी’ और ‘किसान का कोड़ा’ – के केंद्र में उत्पादन का कृषि द्दर्शन था। गांधी के दर्शन को राष्ट्रवादी करार देते हुए कांचा का कहना है कि जननेता होने के बावजूद वे अपनी बनिया पृष्ठभूमि के चलते कृषिवादी दर्शन से दूर ही बने रहे। डॉ. आंबेडकर के बारे में उनका मत है कि उन्होंने ब्राह्मणवाद की समालोचना तो की, मगर कृषिवाद के दृष्टिकोण से नहीं। उन्होंने गांधी सहित अपने द्विज राष्ट्रवादियों की आलोचना धार्मिक नैतिकता और जातिगत व सांस्कृतिक लेंस से की। कहने की आवश्यकता नहीं कि आंबेडकर ने भारतीय सभ्यता के नए पक्ष से हमें परिचित कराया लेकिन वे भी पश्चिमी कार्यपद्धति में प्रशिक्षित थे और इस कार्यपद्धति से कोई कृषि-आधारित ठोस दर्शन विकसित नहीं हुआ।

‘शूद्र विद्रोह’ पुस्तक का विशेष महत्व यह है कि ‘भारत एक कृषिप्रधान देश है’, इस उक्ति को डिकोड करते हुए कांचा आइलैय्या कृषि जीवन व उत्पादन से जुड़े बहुजन समाज की संस्कृति को वैकल्पिक दार्शनिक परिप्रेक्ष्य की प्रस्तावना रचते हैं। उनका कहना है कि “शूद्र आध्यात्मिकता में विज्ञान और ईश्वर दोनों के लिए जगह थी। ब्राह्मणों ने इस वैज्ञानिक आध्यात्मिकता को नकारा और मिथकीय आध्यात्मिकता को बढ़ावा दिया। उन्होंने जीवन के बारे में तार्किक ढंग से सोचने की क्षमता को नष्ट कर दिया। शूद्रवाद के ब्राह्मणवादी चंगुल में फंसने के बाद से भारत में कृषि और शिल्प विज्ञानों की प्रगति रुक गई। उनमें एक ठहराव आ गया।” सवर्ण पलटवार के इस हिंदू समय में वे मनु और कौटिल्य की स्थापनाओं को हिंदू राष्ट्र की संकल्पना के आधार के रूप में चिह्नित करते हैं। उनका कहना है कि ‘गांधी के समानांतर सावरकर, हेडगेवार, गोलवलकर व कई अन्यों ने एक शुद्ध सनातन हिंदू विचारधारा पर आधारित दर्शन को आकार दिया, जिसमें मुसलमानों और ईसाईयों को हिंदुओं का दुश्मन बताया गया था। इस दर्शन ने शूद्रों का ‘ब्रेनवाश’ कर दिया। आरएसएस ने इस नैरेटिव को इस कदर मज़बूत बना दिया है कि शूद्र, दलित और आदिवासी नागरिकों का ध्यान ब्राह्मणों और द्विजों के वर्चस्व से हटकर अल्पसंख्यकों पर केंद्रित हो गया है।”

कांचा आइलैय्या का निष्कर्षात्मक अभिमत है कि “अगर शूद्रों का इतिहास, मार्क्सवादी पद्धति के अनुकूल लिखा जाता तो इससे भारतीय मार्क्सवादियों को इस देश में सार्थक परिवर्तन लाने में मदद मिलती। रचनात्मक भारतीय साम्यवादी विचारधारा, जिसकी जड़ें देश के उत्पादक रिश्तों में होती तो वह हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद को परवान चढ़ने से रोक सकती थी। दैनिक जीवन में शूद्र और ब्राह्मणवादी राष्ट्रवाद परस्पर विरोधी हैं। भारत दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यता का घर रहा है। ऐसे में उत्पादन से जुड़े ज्ञान का दस्तावेजीकरण और लेखन नहीं किया जाना एक बहुत बड़ी असफलता है। शूद्र चिंतकों को इस अलिखित इतिहास को एक नए रचनात्मक ढंग से लिखना चाहिए।”

स्वीकार करना होगा कि कांचा आइलैय्या शेपर्ड की पुस्तक ‘शूद्र विद्रोह : ताकि बन सके आत्मनिर्भर भारत’ बहुजन समाज के एक ऑर्गैनिक बौद्धिक का श्रमशील समाज के दृष्टिकोण से प्रस्तुत एक मौलिक चिंतन है। इसे ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के प्रतिविमर्श के रूप में भी विमर्शकारी बनाने की जरूरत है। पुस्तक में यत्र-तत्र तथ्यात्मक और विश्लेषण संबंधी कुछ सरलीकरण भी हैं, जिन पर ध्यान दिया जाना अपेक्षित है। 1857 के विप्लव को शूद्रों के विद्रोह का नतीजा कहना ऐसा ही सरलीकरण है। हेडगेवार की चर्चा करते हुए यह कहना कि उनके मन में ‘आंबेडकर के संविधान के प्रति ज़रा-सा भी सम्मान का भाव नहीं था’ भी एक तथ्यात्मक चूक ही है क्योंकि हेडगेवार तो भारतीय संविधान बनने के दस वर्ष पूर्व ही दिवंगत हो गए थे। मूलतः अंग्रेजी में लिखित व प्रकाशित पुस्तक ‘दि शूद्रा रिबेलियन’ (2024) का अमरीश हरदेनिया कृत अनुवाद सहज और बोधगम्य है। नि:संदेह हिंदी के परिवर्तनकामी व बहुजन बौद्धिकों के लिए यह एक जरूरी पुस्तक है, जिसे व्यापक पाठकवर्ग तक भी उपलब्द्ध कराना चाहिए।

समीक्षित पुस्तक : ‘शूद्र विद्रोह : ताकि बन सके आत्मनिर्भर भारत’
लेखक : कांचा आइलैय्या शेपर्ड
हिंदी अनुवादक : अमरीश हरदेनिया
प्रकाशक : फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली
प्रकाशन वर्ष : 2025
मूल्य : 350 रुपए 

(यह आलेख हिंदी पत्रिका ‘समयांतर’ के फरवरी, 2026 के अंक में पूर्व में प्रकाशित है। यहां ‘समयांतर’ के संपादक की सहमति से प्रकाशित।)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

वीरेंद्र यादव

वीरेंद्र यादव (5 मार्च, 1950 – 16 जनवरी, 2026) हिंदी साहित्य के प्रगतिशील धारा के प्रतिष्ठित समालोचक रहे। उनकी प्रकाशित कृतियों में ‘उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता’, ‘उपन्यास और देस’, ‘प्रगतिशीलता के पक्ष में’, ‘विवाद नहीं हस्तक्षेप’ और ‘विमर्श और व्यक्तित्व’ शामिल हैं। 1990 के दशक में उन्होंने लखनऊ से ‘प्रयोजन’ पत्रिका का संपादन किया। इसके अलावा उन्होंने जॉन हर्सी की चर्चित पुस्तक ‘हिरोशिमा’ का हिंदी अनुवाद भी किया।

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