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अमित शाह के हत्थे चढ़ गए उपेंद्र कुशवाहा

सम्राट चौधरी के रहते अब भाजपा को दूसरे कोईरी नेता की जरूरत नहीं रही। हालांकि उपेंद्र कुशवाहा के बेटे को सम्राट चौधरी के मंत्रिपरिषद में जगह मिल गई, लेकिन बिहार विधान परिषद चुनाव में पार्टी विलय के सवाल पर मामला फंस गया और भाजपा ने उपेंद्र कुशवाहा के बेटे को उम्मीदवार नहीं बनाया। बता रहे हैं किरणेश

बिहार में अब कोईरी जाति (ओबीसी) के सम्राट चौधरी का राज शुरू हुआ है। हालांकि सम्राट चौधरी कब तक बिहार की सत्ता पर रहेंगे, वह भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व पर निर्भर करता है। उपेंद्र कुशवाहा भी कोईरी जाति से आते हैं। जब तक सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री नहीं बने थे तब तक कोईरी के बड़े नेता उपेंद्र कुशवाहा ही माने जाते थे और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) बार-बार उपेंद्र कुशवाहा के शर्तों के साथ समझौता करने के लिए मजबूर होती थी। लेकिन नीतीश कुमार के सत्ता से हटते और सम्राट चौधरी के सत्ता पर काबिज होते ही भाजपा ने उपेंद्र कुशवाहा को किनारा लगाना शुरू कर दिया है। यही कारण है कि भाजपा ने बिहार विधान परिषद चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा के बेटे पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को उम्मीदवार नहीं बनाया है और उनके मंत्री पद पर संकट आ गया है।

हमेशा उपेंद्र कुशवाहा की शर्त मानने वाली भाजपा इस बार अपने शर्तों पर दीपक प्रकाश को एमएलसी का टिकट देना चाहती थी, लेकिन बताया जा रहा है कि उपेंद्र कुशवाहा ने शर्तों को मंजूर नहीं किया। बिहार के सियासी गलियारे में खबर है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कुशवाहा को राष्ट्रीय लोक मोर्चा का विलय भाजपा में करने को कहा। इसी शर्त पर अमित शाह ने दीपक प्रकाश को भाजपा के टिकट पर एमएलसी बनने की शर्त रखी। लेकिन यह शर्त उपेंद्र कुशवाहा को मंजूर नहीं हुआ। इसके बाद भाजपा ने भी टेढ़ी चाल चली और दीपक प्रकाश को उम्मीदवार नहीं बनाया।

उपेंद्र कुशवाहा ने कल एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अपने कार्यकर्ताओं से कहा कि मैं एक सीट के लिए अपनी पार्टी की कुर्बानी नहीं दे सकता हूं। अगर जदयू के साथ कुछ होता है तो बिहार की सामाजिक बनावट ऐसी है कि शत प्रतिशत लोग न ही भाजपा में और न ही राजद में जाएंगे। ऐसी स्थिति में लोग राष्ट्रीय लोक मोर्चा के साथ आएंगे।

ध्यातव्य है कि बिहार की राजनीति में पिछले 13 वर्षों से उपेंद्र कुशवाहा की थोड़ी ही सही लेकिन भूमिका रही है। वे कभी सत्ता पक्ष के साथ तो कभी विपक्ष में रहे हैं। इस दौरान उन्होंने दो-दो पार्टियां बनाईं। वर्ष 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की थी, लेकिन उपेंद्र कुशवाहा अपनी सीट भी हार गए। जदयू में उपेक्षित चल रहे उपेंद्र कुशवाहा ने जनवरी, 2013 में जदयू को अलविदा कह दिया और अपनी एक नई राष्ट्रीय लोक समता पार्टी बना ली। इसी दौरान राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी का उदय हुआ। इसके साथ ही बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भाजपा से नाता तोड़ लिया और भाजपा कोटे के मंत्रियों को बर्खास्त कर दिया। इसका लाभ उपेंद्र कुशवाहा को मिल गया। उन्होंने लपक कर 2014 के लोकसभा चुनाव में तीन सीटों पर भाजपा से समझौता कर ली। तीनों सीटों पर जीत मिल गई और केंद्र में राज्य मंत्री बन गए। फिर 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी को दो सीटों पर कामयाबी मिली। दोनों विधायकों ने कुशवाहा का साथ छोड़कर नीतीश कुमार का दामन थाम लिया और बिहार विधानसभा में पार्टी का विलय जदयू में हो गया।

सासाराम से विधायक पत्नी स्नेहलता, बिहार सरकार में मंत्री पुत्र दीपक प्रकाश के साथ उपेंद्र कुशवाहा

लेकिन 2017 में बिहार की राजनीति ने फिर करवट बदली। नीतीश कुमार महागठबंधन से अलग होकर भाजपा के साथ चले और नरेंद्र मोदी से दोस्ती कर ली। नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार की दोस्ती से उपेंद्र कुशवाहा एनडीए में फिर उपेक्षित महसूस करने लगे और 2019 का लोकसभा चुनाव राजद के साथ मिलकर लड़ा और शून्य पर आउट हो गए। फिर 2020 का बिहार विधानसभा चुनाव बसपा और एआईएमआईएम के साथ मिलकर लड़ा, लेकिन कुछ खास नहीं कर पाए। फिर उनकी 2021 में नीतीश कुमार से नजदीकियां बढ़ी और 14 मार्च, 2021 को अपनी पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी का विलय जदयू में कर लिया। बदले में नीतीश कुमार ने उपेंद्र कुशवाहा को बिहार विधान परिषद का सदस्य बना दिया। उपेंद्र कुशवाहा मंत्री बनना चाहते थे, लेकिन नीतीश कुमार ने ज्यादा भाव नहीं दिया। इसी दौरान 2022 में नीतीश कुमार एक बार फिर महागठबंधन में चले गए। जदयू का महागठबंधन में आते ही उपेंद्र कुशवाहा ने अलग राह पकड़ ली और 2023 में जदयू और बिहार विधान परिषद से इस्तीफा दे दिया तथा अपनी नई पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा बना ली।

इसके बाद कुशवाहा की नजदीकी भाजपा से बढ़ने लगी। 2024 में एक बार फिर नीतीश कुमार महागठबंधन छोड़कर भाजपा के साथ आ गए और उपेंद्र कुशवाहा की मुश्किलें बढ़ गईं। बावजूद इसके 2024 के लोकसभा चुनाव में एक सीट पर चुनाव लड़कर राजग में ही रहे। यह सीट थी काराकाट लोकसभा सीट की, जहां से स्वयं उपेंद्र कुशवाहा चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन उनकी करारी हार हो गई। लोकसभा चुनाव हारने के बाद भी भाजपा ने उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भेजा, क्योंकि 2025 में बिहार विधानसभा का चुनाव होना था। बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय लोकमोर्चा के हिस्से 6 सीटें आईं, जिनमें से चार सीटों पर कामयाबी मिली। चुनाव में प्रचंड बहुमत के साथ एनडीए ने सत्ता में वापसी की और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। नीतीश कुमार के मंत्रिपरिषद में बिना किसी सदन का सदस्य रहे उपेंद्र कुशवाहा के बेटे को मंत्री पद की शपथ दिलाई गई और महत्वपूर्ण पंचायती राज विभाग दिया गया।

जब यह हुआ उसी वक्त सभी को लग रहा था उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश बिहार विधान परिषद भेजे जाएंगे। लेकिन इसी दौरान राज्यसभा के चुनाव में बारगेनिंग कर उपेंद्र कुशवाहा खुद राज्यसभा चले गए और बिहार में सत्ता का परिवर्तन हो गया। भाजपा को बिहार में सत्ता मिल गई और कोईरी जाति से आने वाले सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बन गए। सम्राट चौधरी के रहते अब भाजपा को दूसरे कोईरी नेता की जरूरत नहीं रही। हालांकि उपेंद्र कुशवाहा के बेटे को सम्राट चौधरी के मंत्रिपरिषद में जगह मिल गई, लेकिन बिहार विधान परिषद चुनाव में पार्टी विलय के सवाल पर मामला फंस गया और भाजपा ने उपेंद्र कुशवाहा के बेटे को उम्मीदवार नहीं बनाया।

अब उपेंद्र कुशवाहा फंस गए हैं। उनके पास एक ही रास्ता बचा हुआ है बेटा मंत्री पद से इस्तीफा दे या बेटे का मंत्री पद बरकरार रखना चाहते हैं तो अपनी पत्नी स्नेहलता सासाराम विधानसभा सीट से इस्तीफा दिलाकर बेटे को पांच महीने के अंदर उपचुनाव जीता लें। लेकिन यह होता हुआ नहीं दिख रहा है। दीपक प्रकाश के मंत्री पद की कुर्सी मझधार में फंस गई है। उन्हें अब इस्तीफा ही देना होगा। दीपक प्रकाश को मंत्री बनाए जाने के मामले में एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई है।

वैसे इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि भाजपा ने दीपक प्रकाश को बिहार विधान परिषद का उम्मीदवार नहीं बनाकर उन्हें भी नेता बना दिया है, क्योंकि बिहार में अधिकांश कोईरी की राजनीति भाजपा के खिलाफ रही है। खासकर शाहाबाद की, जहां से उपेंद्र कुशवाहा लोकसभा का चुनाव लड़ते रहे हैं।

(संंपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

किरणेश

लेखक करीब डेढ़ दशक से पटना से प्रकाशित हिंदी दैनिक ‘राष्ट्रीय सहारा’ से संबद्ध वरिष्ठ पत्रकार रहे। संप्रति स्वतंत्र पत्रकारिता।

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