परिमल नाथवानी (रिलायंस इंडस्ट्रीज के डायरेक्टरों में एक) तीसरी बार राज्यसभा में जाने के लिए मैदान में उतरे हैं। वे दो बार पूर्व में झारखंड से राज्यसभा में जा चुके हैं। पिछली बार आंध्र प्रदेश से राज्यसभा में गए थे और अब एक बार फिर झारखंड को राज्यसभा में जाने के लिए सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करने वाले हैं। विडंबना देखिये कि अपेक्षित विधायकों की संख्या कम होने की वजह से भाजपा खुद अपना प्रत्याशी नहीं खड़ा कर रही है। लेकिन उसने नाथवानी का समर्थन करने का ऐलान किया है। एनडीए के विधायकों की संख्या 24 है विधानसभा में, और राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए चाहिए 28 का आंकड़ा। तो जिस भाजपा को खुद यकीन नहीं कि वह चार विधायकों को जुटा सकेगी, उसने नाथवानी नामक रेस के घोड़े पर दांव लगा दिया है, क्योंकि उसे यकीन है कि नाथवानी कुछ विधायकों की ‘अंतरआत्मा की आवाज’ को जगा कर समर्थन जुटा लेंगे। बस, उन्हें हवन करना होगा और हवन में ‘घी’ डालनी होगी। वैसे भी धन्ना सेठों के पास असली-नकली ‘घी’ की कमी नहीं रहती कभी।
सवाल यह है कि क्या महागठबंधन के घटक दल नाथवानी की चुनौती का मुकाबला कर सकेंगे? राज्यसभा की दो सीटें झारखंड में खाली हुई है। एक तो गुरुजी के निधन की वजह से, दूसरे भाजपा के दीपक प्रकाश का कार्यकाल पूरा होने की वजह से। जीत के लिए चाहिए 56 विधायक और 56 विधायकों के प्रचंड समर्थन से ही झामुमो के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार चल रही है। 34 झामुमो के, 16 कांग्रेस के, 4 राजद के और 2 माले के। इसलिए उपरी तौर पर तो महागठबंधन के दोनों प्रत्याशियों – झामुमो के बैजनाथ राम और कांग्रेस के प्रणव झा – के जीतने में कोई दिक्कत नजर नहीं आती। लेकिन लोकतंत्र पर पैसे का जोड़ चलता रहा है। मतदान के वक्त ‘अंतरात्मा’ की आवाज जागने की बात कह कर कोई भी इधर-उधर जा सकता है। और अंतरात्मा की महत्ता हमारे भारतीय समाज में हमेशा रही है। बस उसकी एक कीमत होती है, वरना वह सुसुप्तावस्था में पड़ी रहती है।
मान कर चला जा रहा है कि झामुमो के विधायक एकजुट रहेंगे। इसलिए बैजनाथ राम के जीतने में कोई संदेह नहीं। लेकिन कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा का क्या होगा, यह कहा नहीं जा सकता। ग्रैंड ओल्ड पार्टी की काया जर्जर हो चुकी है। उसके दर्जनों दिग्गज भाजपा में स्थानांतरित हो कर अपना कायाकल्प कर चुके हैं। इसलिए सबसे अधिक आशंका तो इसी बात की है कि कांग्रेस के विधायक ही टूट कर उधर जा सकते हैं। और वहां टूट का एक ठोस बहाना भी है। कांग्रेस दलित, अल्पसंख्यक और आदिवासी समूहों के नाम पर राजनीति करती है। सवर्ण तो अब पाला बदल कर भाजपा के साथ जा चुके हैं। इसलिए कांग्रेस जहां भी जीतती है तो दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक वोटों की ही मदद से ही। लेकिन उसने यहां राज्यसभा का टिकट एक सवर्ण को दिया है। जाहिर तौर पर उनके अधिकांश विधायकों में बेचैनी है। इसके अलावा राजद के चार और माले के दो विधायक हैं। अब माले के दोनों विधायक तो नहीं बिकेंगे, या कहिए, उनके बिकने की संभावना नहीं, लेकिन अन्य के टूटने की आशंका बनी हुई है।

हमारे देश में एक दल-बदल विरोधी कानून भी है। हालांकि उसके होने न होने का कोई मतलब नहीं रह गया है। बुद्धि तो यह कहती है कि जनता विधायक किसी को दलीय आधार पर चुनती है। इसलिए कायदे से यदि ‘अंतरात्मा’ की आवाज जगे तो पहले विधायकी से इस्तीफा दीजिए और तभी दूसरे दल में जाइए, लेकिन कानून यह है कि दो-तिहाई संख्या में टूट कर दल-बदल हो तो क्षम्य है। इसके अलावा विधानसभा अध्यक्षों की ऐतिहासिक भूमिकाएं रही हैं। वे ही अपनी दिव्य दृष्टि से देखेंगे कि टूट दो-तिहाई नंबरों के साथ हुई है या नहीं।
अब झारखंड वाले मामले में कांग्रेस में टुटन होगी तो 12 विधायकों को टूटना होगा। राजद में आसानी है। चार में तीन टूट सकते हैं। इसके अलावा इक्के-दुक्के अन्य विधायक भी हैं।
सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि क्या महागठबंधन अपना खेमा बचा पाएगी? धन्नासेठ को मुंहतोड़ जवाब दे पाएगी? महागठबंधन या कहिए इंडिया गठबंधन में वह नैतिक बल है कि वह अपने विधायकों को बिकने से रोक सके? इसका जवाब तो राहुल गांधी और तेजस्वी ही दे सकते हैं।
उम्मीद की किरण हेमंत सोरेन ही हैं। पिछली विधानसभा चुनाव में यदि महागठबंधन में शामिल कांग्रेस और राजद के प्रत्याशी बड़ी संख्या में जीत कर विधानसभा में पहुंचे हैं तो यह उनके और उनकी पत्नी कल्पना सोरेन के धुंआधार प्रचार की ही बदौलत। अभी तक सरकार चल रही है मजबूती के साथ तो उनके कुशल नेतृत्व की ही बदौलत। और वे ही अभी भी विधायकों को एकजुट रह कर धन्नासेठ की चुनौती का करारा जवाब देने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। इधर चर्चा यह भी चल रही है कि विधायकों को किसी प्रलोभन या दबाव से बचाने के लिए कही दूसरे राज्य में या किसी रिसार्ट आदि में ले जा कर रखा जाए। लेकिन यहां भी प्रशासन इस बात पर नजर रख रही है कि कोई कदाचार या दबाव न होने पाए।
वैसे, एक बात गौरतलब है कि यदि कांग्रेस टूटती है तो इसका असर इस सरकार के वजूद पर भी पड़ेगा। नाथवानी को भाजपा के समर्थन के बाद चार विधायकों की ही जरूरत होगी। लेकिन कांग्रेस में टूट के लिए 12 विधायकों को निकलना पड़ेगा। यदि ऐसा हुआ तो सरकार के समर्थक विधायकों की संख्या घट कर 56 से 44 हो जाएगी। आवश्यक बहुमत से महज दो अधिक। इसलिए इस राज्यसभा चुनाव के बहाने भाजपा राज्य में सत्ता परिवर्तन का एक बड़ा खेल का भी मंसूबा पाल रही हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।
हालांकि यह सब महज संभावनाएं हैं। लेकिन राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं और हमारे लोकतंत्र में जितना क्षरण हो चुका है, उसमें कुछ भी हो सकता है। संविधान की शपथ लेकर सभी विधायक और मंत्री बनते हैं। भाजपा जानती है कि उसके पास जीत की संख्या नहीं, लेकिन नाथवानी का समर्थन कर वह कदाचार को खेलने का पूरा अवसर दे रही है। इसलिए महागठबंधन को इसका मुंहतोड़ जवाब देना चाहिए। हेमंत सोरेन और राहुल गांधी को इसे एक बड़ी चुनौती के रूप में लेना चाहिए।
(संपादन : नवल/अनिल)
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