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आखिर क्यों नहीं दिए जा रहे श्रम पुरस्कार?

संसद में मजदूरों से संबंध बनाने के लिए भाषा नहीं दिखती है। केवल कामगारों, श्रमिकों, मजदूरों के लिए चार लेबर कोड बनाए गए। कोड मतलब संगठन और अधिकार की भाषा पर तालाबंदी। पुरस्कार श्रमिकों के बीच चेतना की संस्कृति को बढ़ावा देने में मदद करते हैं, जबकि लेबर कोड चेतना में असुरक्षा की भावना को तेज करते हैं। बता रहे हैं अनिल चमड़िया

पुरस्कार एक राजनीति होती है। सरकार द्वारा पुरस्कारों की घोषणा इस नजरिए से की जाती है कि सरकार चलाने वाली राजनीतिक पार्टी किस तरह की राजनीति में यकीन करती है और किन वर्गों, समुदायों व जातियों के बीच अपना आधार बनाना चाहती है। पुरस्कारों की राजनीति इसे समझने में मदद करते हैं। एक नजरिया देते हैं।

विदित है कि केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की ओर से कुछ पुरस्कार स्थापित किए गए। वे देश में श्रमिकों यानी कामगारों के लिए थे। देश में भविष्य के लिए बुनियाद तैयार करने वाले लोग कामगार कहे जाते हैं। जैसे हाल में सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में यह टिप्पणी की कि घरों को चलाने वाली महिलाएं राष्ट्र निर्माता है। दरअसल श्रम को राष्ट्रीय निर्माण के मूल्य के रूप में देखा जाना चाहिए। हर तरह के श्रमिक राष्ट्र निर्माता हैं।

जब पूरी दुनिया में श्रमिकों के आंदोलन और श्रम के प्रति एक सामाजिक सम्मान बढ़ाने की राजनीति उभार पर थी तब भारत में पुरस्कारों में श्रमिकों के लिए पुरस्कार स्थापित किए गए। उनके नाम हैं– श्रम पुरस्कार, विश्वकर्मा राष्ट्रीय पुरस्कार, राष्ट्रीय सुरक्षा पुरस्कार।

एक समय देशभर में श्रमिक गणतंत्र दिवस यानी 26 जनवरी या स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त की पूर्व संध्या पर रेडियो के आसपास खड़े हो जाते थे जब श्रम पुरस्कारों के लिए नामों का ऐलान किया जाता था। लेकिन पिछले कम-से-कम सात वर्षों से अखबारों में, रेडियों में, टेलीविजन में यह खबर आनी बंद हो गई। क्या कभी हमने आपने सुना कि संसद में इस पर कोई सवाल उठे हों? साफ है कि संसद में मजदूरों का कोई नुमांइदा नहीं हैं।

प्रधानमंत्री श्रम पुरस्कार की स्थापना उन श्रमिकों के लिए की गई थी जिन्हें औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत श्रमिक माना जाता है। पुरस्कार इसीलिए कि श्रमिक कुछ खास करते हैं। उत्पादन के क्षेत्र में और सुरक्षा के क्षेत्र में भी। इस तरह के ढेरों काम है। मजदूर कुछ मौलिक काम करने की सलाहियत यानी योग्यता रखते हैं। अविष्कार के बीज उनमें होते हैं। कई बार वे साहस का परिचय देते हैं या अपने काम में बलिदानी भावना दिखाते हैं, लेकिन उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है।

नोएडा (दिल्ली एनसीआर) में मजदूरी बढ़ाने की मांग करते मजदूर

पहले यह पुरस्कार सरकारी कल-कारखानों के लिए था। वर्ष 2004 में प्रधानमंत्री श्रम पुरस्कार के लिए निजी कंपनियों, प्राइवेट कंपनियों को भी शामिल किया गया। लेकिन इसके लिए यह शर्त थी कि उन कंपनियों या फैक्ट्रियों के श्रमिकों के लिए होगा जिनमें पांच सौ या उससे ज्यादा कामगार उत्पादन में लगे हो। तब पुरस्कारों की संख्या भी 17 से बढ़ाकर 33 कर दी गई। इन पुरस्कारों में ‘श्रम रत्न’, ‘श्रम भूषण’, ‘श्रम वीर’ या ‘श्रम वीरांगना’, ‘श्रम श्री’ अथवा ‘श्रम देवी’ आदि शामिल हैं। ठीक वैसे ही जैसे बड़े-बड़े लोगों के लिए अभिजात्य वर्ग के लोगों के लिए पद्म पुरस्कार होते हैं। श्रम पुरस्कारों के तहत श्रमिकों के काम की प्रशंसा करने वाला एक पत्र और एक पुरस्कार में दो लाख रुपए, चार पुरस्कारों के लिए एक-एक लाख रुपए, बारह पुरस्कारों के लिए 60 हजार रुपए और 16 पुरस्कारों के लिए 40 हजार रुपए देने की व्यवस्था की गई। पुरस्कार पाने वालों को रेल यात्रा में भी 75 प्रतिशत की छूट दी जाती थी।

अब ये सवाल भी नहीं पूछे जा रहे हैं कि श्रम पुरस्कार क्यों नहीं दिए जा रहे हैं। जबकि इस दौर में सबसे ज्यादा मार पड़ी है कामगारों पर। यह मार कारोना की महामारी के बाद तो और ज्यादा देखी है। संसद में यह शोर सुनाई देता है कि हमारा देश दुनिया में आर्थिक महाशक्ति बनने जा रहा है, लेकिन मजदूर चाहे वे पुरुष हों, महिलाएं हों, अपनी बढ़ती लाचारी की स्थिति में फंसे हुए हैं।

हद तो इस बात की भी है कि श्रम मंत्रालय की 2023-2024 की वार्षिक रपट बताती है कि प्रधानमंत्री श्रम पुरस्कार वर्ष 2018 के लिए दिया जाना है। साफ है कि 2018 के बाद तो ये पुरस्कार नहीं दिए गए हैं। वर्ष 2018 के बारे में बताया गया है कि श्रम पुरस्कार तो 33 हैं, लेकिन उसे 69 कामगारों में बांटा गया। 2016 में 32 प्रधानमंत्री श्रम पुरस्कार 50 लोगों के बीच बांटे गए और ‘श्रम रत्न’ का पुरस्कार किसी को नहीं दिया गया। इसके बाद श्रम पुरस्कारों को लेकर एक घोर चुप्पी कायम है।

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की वार्षिक रपटों में इसका उल्लेख नदारद है। वार्षिक रपटों में किसी भी मंत्रालय एवं विभाग के कामकाज का पूरा ब्यौरा दिया जाता है। वार्षिक रपटों की हालत पर ध्यान दिलाने से विषयांतर हो सकता है। इन रपटों के बारे में यह कहा जा सकता है कि यदि सरकार के कामकाज को ठीक तरीके से समझना हो तो ये रपटें महत्वपूर्ण और जरूरी दस्तावेज होते हैं। लेकिन रपटों में सरकार के कामकाज को बताने से ज्यादा छुपाने की प्रवृति बढ़ रही है।

यह भी उल्लेखनीय है कि विश्वकर्मा राष्ट्रीय पुरस्कार और राष्ट्रीय सुरक्षा पुरस्कार 1965 से दिए जा रहे थे। विश्वकर्मा राष्ट्रीय पुरस्कार और राष्ट्रीय सुरक्षा पुरस्कारों के लिए 1971 और उसके बाद 1978 और 2007 में कुछ बदलाव भी किए गए। ये आंकड़े हैं कि 2012 से 2018 तक 28-28 लोगों को विश्वकर्मा राष्ट्रीय पुरस्कार दिए गए। लेकिन ये सारे आंकड़े 2018 के बाद रूक गए। श्रम मंत्रालय की 2024-2025 की वार्षिक रपट में भी इस पर चुप्पी है। सरकार ने चुप्पी का रास्ता चुना है। इसे समझना मुश्किल नहीं है। संसद में श्रमिक सदस्य होने का दावा कोई प्रतिनिधि नहीं करता है। संसद में मजदूरों से संबंध बनाने के लिए भाषा नहीं दिखती है। इसी कड़ी में श्रम पुरस्कार नहीं है और न ही इंडियन लेबर कांफ्रेंस। केवल कामगारों, श्रमिकों, मजदूरों के लिए चार लेबर कोड बनाए गए। कोड मतलब संगठन और अधिकार की भाषा पर तालाबंदी। पुरस्कार श्रमिकों के बीच चेतना की संस्कृति को बढ़ावा देने में मदद करते हैं, जबकि लेबर कोड चेतना में असुरक्षा की भावना को तेज करते हैं।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अनिल चमड़िया

वरिष्‍ठ हिंदी पत्रकार अनिल चमडिया मीडिया के क्षेत्र में शोधरत हैं। संप्रति वे 'मास मीडिया' और 'जन मीडिया' नामक अंग्रेजी और हिंदी पत्रिकाओं के संपादक हैं

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