वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद विपक्षी समूहों में डॉ. भीमराव आंबेडकर सत्ता के विरुद्ध एक वैचारिक प्रतीक के बतौर उभरे हैं। बाबरी मस्जिद विध्वंस के दौर में सांप्रदायिक फासीवाद के विरुद्ध अभियानों में डॉ. आंबेडकर केंद्रीय चेहरा नहीं थे। तब गांधी के देश में सांप्रदायिकता को ग़लत बताकर उसका विरोध किया जाता था।
कुछ लोगों का यह भी कहना है कि अगर 20वीं सदी गांधी की थी तो 21वीं सदी आंबेडकर की है। यह कोई अतिशयोक्ति भी नहीं है क्योंकि पहले जहां हर शहर में विरोध प्रदर्शनों का स्थल मुख्यतः गांधी प्रतिमाएं होती थीं, वहीं अब आंबेडकर की प्रतिमाएं विरोध प्रदर्शनों के केंद्र में आ गई हैं। यानी अब अवचेतन में भाजपा विरोध के प्रतीक आंबेडकर ही हैं।
लेकिन इसके विपरीत एक विडंबना भरा सच यह भी है कि 2014 के बाद से आरएसएस के वैचारिक दृष्टिकोण को लागू करने वाली मोदी सरकार के नीतिगत फैसलों की आलोचना में आंबेडकरवादी दृष्टिकोण बहुत कम दिखता है। जो दिखता भी है वह ज़्यादातर आरक्षण के सवाल पर दिखता है, जिससे भाजपा को वैचारिक चुनौती नहीं मिलती। वजह यह कि जैसे वह चाहती है कि गांधी सिर्फ़ स्वच्छता तक सिमट जाएं वैसे ही वह यह भी चाहती है कि आंबेडकरवाद सिर्फ़ आरक्षण तक ही सीमित रहे।
विपक्षी समूहों की यह वैचारिक विफलता भाजपा की वैचारिक वर्चस्व की एक बड़ी वजह है। इसे हम मोदी सरकार के दस हिंदुत्ववादी नीतिगत मामलों के संदर्भ में देख सकते हैं–
1. मौलिक अधिकारों के हनन का सवाल
मणिपुर हिंसा पीड़ितों और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के भड़काऊ बयानों के ख़िलाफ़ कुछ लोग संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट गए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें पहले निचली अदालत जाने का निर्देश दे दिया। जबकि अनुच्छेद 32 जिसे डॉ. आंबेडकर ने संविधान की आत्मा बताया था, नागरिकों को यह अधिकार देता है कि यदि उनके मौलिक अधिकारों का हनन होता है, तो वे न्याय के लिए सीधे सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटा सकते हैं और सुप्रीम कोर्ट को उन्हें सुनना ही पड़ेगा। यहां सुप्रीम कोर्ट का रवैया डॉ. आंबेडकर की अवधारणा पर हमला था, लेकिन विपक्षी समूह इसे तकनीकी अदालती मामले की तरह ही देख पाया। इसे आंबेडकर के विचार की हत्या के बतौर एड्रेस नहीं कर पाया।
2. यूसीसी के मुद्दे पर विपक्षी समूह की लाचारी
2022 में मोदी सरकार यूनिफार्म सिविल कोड (यूसीसी) के मुद्दे को लेकर आई। भाजपा शासित उत्तराखंड इसे लागू करने वाला पहला राज्य भी बना। अब दूसरे राज्यों की भाजपा सरकारें भी इसे ला रही हैं। लेकिन यूसीसी के विपक्षी समूह इसे डॉ. आंबेडकर के विचारों पर हमले के बतौर दर्ज नहीं कर पाए।
जबकि संविधान सभा में डॉ. आंबेडकर ने कई बार इस मुद्दे पर संवैधानिक स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा था कि यह एक अच्छी लेकिन अव्यावहारिक व्यवस्था है, इसलिए इसे नीति-निदेशक तत्वों की सूची में रखा जाए। उन्होंने विधायिका को इसका अधिकार नहीं दिया कि वह संख्याबल के आधार पर इसे लागू करे। 23 नवंबर, 1948 को उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य की कोई सरकार अगर इसे लागू करना भी चाहे तो उसे पहले उन्हीं लोगों पर लागू करना चाहिए जो ख़ुद इसकी मांग करते हों। ज़ाहिर है मुसलमान या ईसाई, वे यूसीसी लागू करने की मांग कर नहीं रहे हैं। अगर हिंदू कर रहे हों तो भाजपा को पहले उनपर ही इसे लागू करना चाहिए। लेकिन भाजपा इसे डॉ. आंबेडकर के विचारों के ख़िलाफ़ जाकर मुसलमानों पर थोप रही है। इस मुद्दे पर भी आंबेडकरवादी आलोचना सामने नहीं आई। ज़ाहिर है इससे भाजपा को खुला मैदान मिल गया।
3. आंबेडकर के विरूद्ध रामनाथ कोविंद
मोदी सरकार ‘एक देश एक चुनाव’ के षड्यंत्र से देश पर स्थायी क़ब्ज़े की नीयत से दलित समाज से आने वाले पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नेतृत्व में आगे बढ़ रही है। कोविंद का चुनाव उसने बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर के समानांतर ‘अपना’ दलित चेहरा खड़ा करने के लिए किया है। कोविंद ने तीन साल पहले रायबरेली में प्रेस कांफ्रेंस में यह भी कह दिया था कि इससे केंद्र की सत्ताधारी पार्टी को फ़ायदा होगा। यानी यह बहुदलीय व्यवस्था के ही विरुद्ध है, जिसपर हमारा लोकतंत्र आधारित है।
इस योजना के पीछे केंद्र सरकार का तर्क देश और प्रदेशों में ‘स्थिर’ सरकार देना है। आरएसएस प्रारंभ से ही ‘स्थिरता’ के नाम पर अमरीकी शासन व्यवस्था को लागू करने की वक़ालत करता रहा है, क्योंकि वेस्ट मिनिस्टर व्यवस्था, जिसपर हमारी संसदीय व्यवस्था आधारित है, को आरएसएस ज़्यादा जवाबदेह होने के कारण नापसंद करता रहा है। यहां हमें 4 नवंबर, 1948 को संविधान सभा में डॉ. आंबेडकर द्वारा इस मुद्दे पर दिए गए भाषण को देखना चाहिए। अपने भाषण में डॉ. आंबेडकर ने ‘स्थिरता’ बनाम ‘उत्तरदायित्व’ की बहस को समाप्त करते हुए कहा था कि भारत को ज़्यादा जवाबदेही वाली सरकार की ज़रूरत है क्योंकि इस व्यवस्था में हम सरकार की समीक्षा दैनिक स्तर पर प्रश्न पूछ कर, प्रस्ताव लाकर, अविश्वास प्रस्ताव लाकर, काम रोको प्रस्ताव तथा अध्यक्षीय भाषणों पर बहस करके कर सकते हैं। जबकि ‘स्थिर’ मॉडल में यह संभव नहीं है।
यह हैरानी वाली बात है कि विपक्षी दलों के नॅरेटिव में डॉ. आंबेडकर के इस भाषण का ज़िक्र नहीं था।

4. अनुच्छेद 370 के समर्थक थे आंबेडकर
संवैधानिक तौर पर जम्मू और कश्मीर को भारत से जोड़ने वाले अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के बाद भाजपा ने एक प्रोपेगेंडा वीडियो जारी किया था, जिसमें दिखाया गया था कि आंबेडकर अनुच्छेद 370 के ड्राफ्ट पर हस्ताक्षर करने से इनकार करते हुए कहते हैं कि वह देश के साथ गद्दारी नहीं करेंगे। वीडियो में मोदी सरकार द्वारा 370 को खत्म करने को डॉ. आंबेडकर को समर्पित बताया गया था। जबकि ऐतिहासिक तथ्य यह है कि आंबेडकर नेहरू और पटेल की तरह ही 370 के समर्थन में थे। 1950 में संसद में डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि “हम कह सकते हैं कि कश्मीर भारत का अंग एक बहुत नाज़ुक तरीक़े से बना है। कश्मीर संबंधी अनुच्छेद कहता है कि सिर्फ़ अनुच्छेद 1 ही कश्मीर पर लागू होता है यानी कश्मीर भारत के क्षेत्रफल का हिस्सा है। संविधान के बाक़ी प्रावधानों का लागू होना राष्ट्रपति पर निर्भर होगा जो कश्मीर की सरकार से विचार-विमर्श करके उसे लागू करेंगे।”
डॉ. आंबेडकर के इस भाषण से स्पष्ट है कि 370 का ख़त्म किया जाना उनके विचारों के ख़िलाफ़ था। लेकिन मोदी सरकार के इस क़दम की आंबेडकर के नज़रिए से आलोचना नहीं हुई। सबसे शर्मनाक तो बसपा का स्टैंड था, जिसने इसका स्वागत किया।
5. अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों का सवाल
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) और अन्य अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों का संवैधानिक संरक्षण अनुच्छेद 30 से मिलता है, जिसे बनाने में ख़ुद संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष के बतौर डॉ. आंबेडकर ने गहरी दिलचस्पी ली थी क्योंकि वे शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे सशक्त माध्यम मानते थे। भाजपा शुरू से ही मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों को मिले इस अधिकार को छीनने की कोशिश करती रही है, जिसके लिए उसने न्यायपालिका का भी इस्तेमाल करने का प्रयास किया है। लेकिन सबसे आश्चर्य की बात है कि इसके लिए भाजपा दलितों और पिछड़ों के बीच यह नॅरेटिव लेकर जाती है कि इन संस्थाओं के अल्पसंख्यक चरित्र के कारण इनमें आरक्षण लागू नहीं होता और इसलिए इनके अल्पसंख्यक चरित्र को छीन लिया जाना चाहिए। चूंकि, सामाजिक न्याय और आंबेडकरवाद का अर्थ लोकप्रिय राजनीति में सिर्फ़ आरक्षण ही रह गया है इसलिए इस मुद्दे पर भी विपक्षी दलों की आलोचना आंबेडकरवादी नजरिए से नहीं हो पाती। इसे पीड़ित मुस्लिमों के साथ अन्याय के बतौर ही सेक्युलर पार्टियां प्रचारित कर पाती हैं।
6. आंबेडकर को ज्ञानेश कुमार जैसों का अंदेशा था
एसआईआर के नाम पर भाजपा सरकार उन तबकों को मताधिकार से वंचित करना चाहती है जो या तो हिंदू नहीं हैं या हिंदू वर्ण-व्यवस्था के निचले पायदान पर आने वाले ग़रीब हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी जब भविष्य के भारत में सभी को मतदान का अधिकार देने की बात आती थी तब तिलक जैसे रूढ़िवादी नेताओं की जमात आज के पिछड़ी और दलित जातियों को मताधिकार देने के ख़िलाफ़ थी। लेकिन डॉ. आंबेडकर ने 1919 में ही साउथबरो कमेटी के सामने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की मांग कर दी थी। वहीं स्वतंत्र चुनाव आयोग के गठन के मुद्दे पर बोलते हुए उन्होंने 15 जून, 1949 को संसद में कहा था कि “मताधिकार लोकतंत्र का सबसे बुनियादी अधिकार है और किसी भी पात्र व्यक्ति को स्थानीय सरकार के पूर्वाग्रह या किसी अधिकारी की सनक के कारण मताधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।”
यानी उन्हें अंदाज़ा था कि कोई ज्ञानेश कुमार आ जाएगा तो चुनावी लोकतंत्र मज़ाक़ बना देगा। लेकिन एसआईआर और चुनाव आयोग की भूमिका की आलोचना में आंबेडकर का दृष्टिकोण नदारद दिखता है।
7. धर्मांतरण अपराध नहीं
भाजपा शासित राज्यों में धर्मांतरण विरोधी मौजूदा क़ानूनों की सबसे बड़ी विसंगति यह है कि कोई भी तीसरा पक्ष यह शिक़ायत कर सकता है कि किसी ने लालच के कारण धर्मांतरण किया या करवाया है। यानी इसमें धर्मांतरण करने या कराने वाले से ज़्यादा तीसरे पक्ष की शिक़ायत को क़ानूनी कार्रवाई का आधार बनाया गया है। वैसे भी ‘लालच’ एक अस्पष्ट शब्द है, क्योंकि ज़रूरी नहीं कि लालच सिर्फ़ रुपए-पैसे का ही हो। वह सम्मान और समता पाने का लालच भी हो सकता है। इसीलिए डॉ. आंबेडकर के लिए धर्म परिवर्तन आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक मुक्ति और मानवीय गरिमा हासिल करने का साधन था। ऐसे में अगर कोई समानता और सम्मान के ‘लालच’ में धर्मांतरण करता है तो उसे अपराधी कैसे कहा जा सकता है? मौजूदा क़ानून के हिसाब से तो 1956 में आंबेडकर और लाखों लोगों द्वारा समता और सम्मान के लिए किया गया धर्मांतरण अवैध होता और डॉ. आंबेडकर को उम्रक़ैद की सज़ा हो जाती।
लेकिन हम देखते हैं कि धर्मांतरण के मुद्दे पर विपक्षी समूहों के विरोध में यह आंबेडकरवादी नज़रिया कहीं नहीं दिखता। आलोचना के स्वर सिर्फ़ इसे धर्म चुनने के निजी अधिकार जैसे तकनीकी पक्ष तक ही सीमित रहते हैं।
8. राज्य नियंत्रित समाजवाद के पक्षधर थे आंबेडकर
इंदिरा गांधी सरकार ने 1976 में इमरजेंसी के दौरान 42वें संशोधन के तहत संविधान की प्रस्तावना में ‘पंथनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्द जोड़ा था। संविधान की मूल प्रस्तावना में यह दोनों शब्द नहीं थे। इंदिरा सरकार ने इन शब्दों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा 1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के मुकदमे के आदेश के बाद जोड़ा था जिसके तहत मौलिक ढांचे का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया। इसमें ‘पंथनिरपेक्षता’ और कल्याणकारी राज्य के कारण ‘समाजवादी’ ढांचे समेत अन्य पहलुओं को मौलिक ढांचा कहा गया, जिसे संसद भी नहीं बदल सकती। इसीलिए 42वें संविधान संशोधन के तहत संविधान की प्रस्तावना में ‘पंथनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्दों के जोड़े जाने के बावजूद प्रस्तावना के अंत में दर्ज तारीख़ में कोई बदलाव नहीं किया गया और वह 26 नवंबर 1949 ही रहा।
लेकिन भाजपा और आरएसएस के लोग यह अफ़वाह फैलाते रहे हैं कि इंदिरा गांधी ने डॉ. आंबेडकर के संविधान को इन दोनों शब्दों को जोड़कर बदल दिया। राज्यसभा में भाजपा के तीन सांसदों – राकेश सिन्हा, के.जे. अल्फ़ोंस और भीम सिंह – ने तो इन दोनों शब्दों को हटाने के लिए प्राइवेट मेंबर बिल भी लेकर आए। लेकिन संसद और उसके बाहर भी इसकी आलोचना डॉ. आंबेडकर के दृष्टिकोण से सुनाई नहीं देती, जबकि वे सेक्युलर तो थे ही, दो क़दम आगे बढ़कर राज्य नियंत्रित समाजवाद के पक्षधर भी थे।
9. नागरिकता निर्धारण के मानदंड
मोदी सरकार ने किसी-न-किसी बहाने राष्ट्रीयता और नागरिकता को सार्वजनिक बहस का मुद्दा बना रखा है, जिसके निशाने पर मुसलमान और ग़रीब हैं। दरअसल, यह पूरी क़वायद हेडगेवार के विचारों के अनुरूप राष्ट्रीयता और नागरिकता को हिंदू धर्म आधारित करना है, यानी जिनकी पुण्यभूमि यहां है वही नागरिक होंगे। काबा और यरुशलम में जिनकी पुण्यभूमि है यानी मुसलमान और ईसाई, नागरिक नहीं होंगे। उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक बनना होगा जिन्हें मताधिकार का अधिकार नहीं होगा और जिन्हें राज्य से कोई भी अधिकार नहीं मिलेगा। राष्ट्रीयता की यह अवधारणा डॉ. आंबेडकर की राष्ट्रीयता की अवधारणा के ख़िलाफ़ है, जो नागरिकता को धर्म, अध्यात्म, जाति या लिंग के भेदभाव के विपरीत समानता और बराबरी आधारित मानते थे। लेकिन सरकार के आलोचकों के स्वर में आंबेडकरवादी नज़रिया गायब है और वह राष्ट्रीयता और नागरिकता को तकनीकी सवाल बनाते दिखते हैं।
10. सनातनी व्यवस्था बनाम समतामूलक व्यवस्था
पिछले एक दशक से आरएसएस अपने विस्तार के लिए हिंदुत्व के बजाए सनातन शब्द पर फोकस कर रहा है। लेकिन हम सार्वजनिक-राजनीतिक बहस में सनातन पर आंबेडकर के विचारों को उद्धृत होते नहीं सुनते जो मानते थे कि सनातन धर्म का मूल आधार असमानता है और यह व्यवस्था लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है, जो दलितों व वंचितों के अधिकारों का हनन करती है। वहीं आंबेडकर से बहस के दौरान गांधी ने भी कहा था कि “यदि सभी अछूत एकजुट हो जाएं तो मैं डायनामाइट से सनातनियों के किले को जमींदोज कर दूंगा। मैं चाहता हूं कि पूरा अछूत समुदाय एकजुट होकर सनातनियों के खिलाफ विद्रोह करे।” (महादेव भाई देसाई डायरी खंड 2, पृष्ठ 69-72; संपूर्ण गांधी वांग्मय में उद्धृत, खंड 57, पृष्ठ 439-41; राजा शेखर वुंड्रू की ‘आंबेडकर, गांधी एंड पटेल – द मेकिंग ऑफ़ इंडियाज़ इलेक्टोरल सिस्टम’ , पृष्ठ 50)
यानी आंबेडकर की तस्वीर तो विपक्षी समूहों के पास है, लेकिन समुचित दृष्टिकोण का अभाव है। बिना इसके विपक्षी समूह आरएसएस और भाजपा के द्वारा चलाए जा रहे प्रोपेगेंडा को समुचित चुनौती नहीं दे सकेंगे।
(संपादन : नवल/अनिल)
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