नेटफ्लिक्स द्वारा निर्मित फिल्म ‘मां-बहन’ (2026) एक डार्क क्राइम कॉमेडी (जिसमें अपराध को हास्य और व्यंग्य के रूप में दिखाया जाता है) की शक्ल में, पितृसत्तात्मकता, सामाजिक चौकीदारी और इज्जत के नाम पर की जाने वाली राजनीति पर तीखा हमला है। फिल्म की कहानी ‘आदर्श कालोनी’ में घटती है। मोहल्ले का यह नाम अपने आप में एक व्यंग्य और एक विडंबना है। फिल्म के निदेशक सुरेश त्रिवेणी एवं पटकथा लेखिका पूजा तोलानी ने फिल्म का नॅरेटिव एक ऐसे स्थान में बुना है जिसका नाम ही उसकी चाहत को प्रतिबिंबित करता है – अपने आदर्शों को किसी भी तरह से सुरक्षित और संरक्षित रखना, उन आदर्शों की राह से भटकने वालों पर नज़र रखना और उनसे किनारा करना। फिल्म बताती है कि किस तरह हमारा समाज अफवाहों और गप्पबाजी के ज़रिए और पुरानी घिसी-पिटी छवियों को आदर्श बताकर महिलाओं के जीवन को नियंत्रित करना चाहता है। समाज द्वारा निर्धारित राह से हटने वालों को अनैतिक करार दिया जाता है और किसी अपराध के होने से पहले ही उन्हें उसके लिए ज़िम्मेदार बता दिया जाता है। इस फिल्म के नॅरेटिव के केंद्र में है एक मुर्दा। यह मुर्दा भले ही कहानी को आगे बढ़ाने में मददगार है लेकिन फिल्म का असली कथानक उस सामाजिक व्यवस्था की बखिया उधेड़ता दिखता है जो हर क्षण महिलाओं को कसौटी पर कस रही होती है।
फिल्म का शीर्षक ही उसके तेवर साफ कर देता है। ‘मां-बहन’ – यह शब्दयुग्म उत्तर भारत में रोज़मर्रा की बातचीत का हिस्सा है। एक ओर यह सबसे पवित्र रिश्तों में से एक है तो दूसरी ओर यह सबसे आम और अश्लील गालियों का हिस्सा भी है। ध्यान देने की बात यह है कि इसी गाली को फिल्म का शीर्षक बनाकर, फिल्म को ऐसी महिला किरदारों से भर दिया गया है, जिन्हें बेइज्ज़त या शर्मिंदा कर, झुकाया नहीं जा सकता।
फिल्म के मुख्य किरदार हैं सिंगल मदर रेखा (माधुरी दीक्षित) और उनकी दो लड़कियां जया (तृप्ति डिमरी) व सुषमा (धरना दुर्गा)। दोनों लड़कियां एक-दूसरे से एकदम अलग हैं, मगर दोनों ही अपने दकियानूसी मोहल्ले में विवादों और चर्चा का विषय बनी रहती हैं। वहां महिलाओं पर लगातार नज़र रखी जाती है। वे जो भी कहती और करती हैं उसके मतलब निकाले जाते हैं। महिलाओं के बारे में धारणाएं बनाई जाती हैं – ऐसे धारणाएं जो उनके बारे में कम होती हैं और समाज की बेचैनी और चिंताओं के बारे में ज्यादा।
हम सब जानते हैं चरित्र गुप्ता को
इस सामाजिक व्यवस्था की धुरी हैं चरित्र कुमार गुप्ता (रवि किशन), जो हम सबको बहुत जाने-पहचाने से लगते हैं। हम सब हमारे आसपास, हमारे मोहल्ले या हमारे अपार्टमेंट ब्लॉक में रहने वाले गुप्ता जी को जानते हैं। वे नैतिकता, संस्कृति व परंपरा के स्वनियुक्त पहरेदार और ठेकेदार होते हैं। वे इस बात पर नज़र रखते हैं कि आपके घर कौन-कौन आता-जाता है और आप कैसे कपड़े पहनते हैं। वे लगातार दूसरों पर टीका-टिप्पणियां करते रहते हैं और आपको बताते रहते हैं कि आपकी जाति वालों के लिए शाकाहारी होना कितना जरूरी है। मोहल्ले में लोग एक-दूसरे को जानते-पहचानते हैं – बस यही उनके लिए नियंत्रण का लैंगिक औजार बन जाता है। वे ‘नॉर्मलाइजिंग गेज़’ (फ्रांसीसी दार्शनिक मिशेल फूको द्वारा समुदाय द्वारा लोगों पर नज़र रखने के बारे में प्रतिपादित एक सिद्धांत) का मूर्त स्वरूप हैं। आदर्श कॉलोनी, दरअसल, एक जेल है जहां महिलाएं हमेशा कड़ी निगरानी में होती हैं, उनका लगातार आकलन किया जाता है और उन पर चर्चा होती रहती है। गुप्ता जी की पितृसत्तात्मकता को आर.डब्ल्यू. कोनेल के ‘हेजिमोनिक मेस्क्यूलिनिटी’ के सिद्धांत से समझा जा सकता है। यह सिद्धांत एक ऐसी संस्कृति के बारे में है जिसमें रोजमर्रा के जीवन में महिलाओं को शर्मिंदा कर, धमका कर, उनके बारे में बेसिर-पैर की बातें कर, और उनके ऊपर नज़र रख, पुरुषों का वर्चस्व बनाए रखा जाता है। गुप्ता जी को किसी कानूनी प्राधिकार की जरूरत नहीं है। पूरा मोहल्ला उनका कार्यक्षेत्र है।
विधवा, जो गुमनामी के अंधकार में खोने को तैयार नहीं है
रेखा, जिनके किरदार में माधुरी दीक्षित एकदम सहज नज़र आती हैं, एक दमदार औरत और एक नई तरह की मां हैं। वे हिंदी सिनेमा की वह मां नहीं है जो त्याग और नेकी की प्रतिमूर्ति होती है। रेखा की अपनी कमजोरियां हैं और अपने सरोकार और चिंताएं भी। और वह अपनी हर इच्छा के लिए शर्मसार होने को तैयार नहीं है। वह मातृभाव से परिपूर्ण देवी-नुमा मां नहीं है। वह जटिल परिस्थितियों से मुकाबला कर रही एक महिला है। वह अगर बिना बांह का ब्लाउज पहन लेती है या अपने बालों में गेंदे या गुलाब के फूल लगा लेती है तो इसे मोहल्ले के लोग उसके लिए निर्धारित सीमाओं का अतिक्रमण मानते हैं। हालांकि वह ऐसा केवल खुद की खातिर कर रही है। वह केवल विधवा होने के कारण दुनिया से गायब होने के लिए तैयार नहीं है। भारतीय समाज विधवाओं के लिए एक आचार संहिता प्रतिपादित करता है। सफेद या हल्के रंगों के कपड़े और आभूषणों और इच्छाओं से दूरी। विधवा महिला को न तो आदर के काबिल माना जाता है और न ही अच्छे संबंध स्थापित करने लायक। फिल्म के एक दृश्य में रेखा शिकायत करती है कि उसे मोहल्ले में होने वाले किसी कार्यक्रम में आमंत्रित नहीं किया जाता और उसका कोई दोस्त नहीं है। एक विधवा के रूप में वह अपशकुनी है और उसे शादियों व अन्य सामाजिक उत्सवों से दूर रखा जाता है। मगर वह अदृश्य होने के लिए तैयार नहीं है। वह अपनी मर्जी की ज़िंदगी जीती है और उसके अपने शौक व रुचियां हैं। और इसलिए उसे मोहल्ले के विवाहित दंपत्तियों के लिए एक खतरे के रूप में देखा जाता है।

वह अपनी बेटियों को पालने और अपने दिवंगत पति द्वारा लिए गए कर्ज को चुकाने के लिए छोटा-मोटा व्यवसाय करती है। लेकिन मोहल्ले के लोगों की दृष्टि में यह अशोभनीय आचरण है, जो यह बताता है कि वह पैसे की लालची है। उसके पड़ोसी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि व्यवसाय केवल जिंदा बने रहने के लिए की जाने वाली विशुद्ध आर्थिक गतिविधि है। अर्थशास्त्री बीना अग्रवाल ने इस तरह के दृष्टिकोण पर व्यापक लेखन किया है। दक्षिण एशिया में अगर महिलाएं अपने बलबूते पर कोई आर्थिक गतिविधि करना चाहें तो उसे एक विकृति माना जाता है। यह कहा जाता है कि वह महिला अतिमहत्त्वाकांक्षी और उतावली है। कभी यह स्वीकार नहीं किया जाता कि यह परिवार की बेहतरी के लिए की जाने वाली एक उचित गतिविधि है। रेखा अपने आपको एक असहाय महिला के रूप में प्रस्तुत करने को तैयार नहीं है। उसका किरदार बताता है कि हमारी व्यवस्था में स्वतंत्र महिलाओं को किस तरह अपनी स्वतंत्रता की सामाजिक कीमत चुकानी पड़ती है।
अच्छी बिटिया
जया का चरित्र फिल्म का एक अन्य महत्वपूर्ण आयाम है। वह अपनी मां और सुषमा की छवि से दूरी बनाने के लिए हरसंभव प्रयास करती है। वह एक भली महिला, एक अच्छी बेटी कहलाने के लिए पितृसत्तात्मक द्वारा निर्धारित अपेक्षाओं को पूरा करती है। वह विवाह कर एक ‘अच्छी’ बहू बनती है जो बिना शिकायत किए घर-गृहस्थी के सारे काम निबटाती रहती है। वह पूरी बांह का कुर्ता पहनती है और अपनी मां पर चस्पा लेबल से बचने के लिए अपने घटिया-से पति और ससुराल वालों की दिन-रात सेवा में जुटी रहती है। जया का मानना है कि स्थापित मानकों का पालन करने से ही उसे स्वीकार्यता और सुरक्षा मिल सकती है। इसे स्त्रीवादी अध्येता ‘रिस्पेक्टेबिलिटी पॉलिटिक्स’ कहते हैं। ‘रिस्पेक्टेबिलिटी पॉलिटिक्स’ से आशय है– समाज में स्वीकार्यता और सम्मान पाने के लिए स्थापित सामाजिक मानदंडों और मूल्यों को अपनाना। लेकिन फिल्म इस मान्यता को गलत सिद्ध करती है। फिल्म के क्लाइमेक्स से थोड़े पहले जया का एक लंबा एकालाप है, जिसमें उसकी सालों की कुंठाएं फूट पड़ती हैं। फिल्म बताती है कि पितृसत्तात्मकता एक शोषक व्यवस्था है। आज्ञाकारिता से आपको कुछ समय के लिए फायदा हासिल हो सकता है। मगर इसका असली उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षा देना नहीं बल्कि उन्हें नियंत्रित करना है।
फॉलोअर्स की तलाश में हाथ लगी मुसीबतें
वहीं सुषमा सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर है और यह फिल्म को एकदम समकालीन बनाती है। जहां रेखा और जया पर लेबल चस्पा करने के लिए मुख्यतः मोहल्ले में उनकी गतिविधियों को आधार बनाया जाता है वहीं सुषमा का सामना उतनी ही दमघोटू एक दूसरी दुनिया से है। अपनी ऑनलाइन उपस्थिति के ज़रिए धन कमाने की दुनिया से। पांच साल पहले सुषमा का चुंबन लेते हुए एक वीडियो वायरल हुआ था और वह उसका नतीजा आज तक भोग रही है। वह वीडियो उसकी सामाजिक पहचान का हिस्सा बन गया है। वह तय करता है कि दूसरे उसे किस रूप में देखें। यह हमें याद दिलाता कि किस तरह डिजिटल मीडिया ने महिलाओं के बारे में राय बनाने का एक स्थायी संग्रह उपलब्ध करवा दिया है, जो पुरानी से पुरानी घटनाओं को भी भुलाने नहीं देता। वह अपने जीजा के अनुचित प्रेम प्रस्तावों और ऑनलाइन ट्रोलिंग को सहने के लिए मजबूर है क्योंकि वह उस अर्थव्यवस्था का हिस्सा है जिसमें वायरल होना, चर्चा में रहना सबसे ज़रूरी है – चाहे सकारात्मक कारणों से या नकारात्मक कारणों से। मगर डिजिटल दुनिया में मौजूदगी उसे कुछ हद तक आर्थिक स्वतंत्रता भी देती है।
सनसनीखेज सुर्ख़ियों के पीछे का मनुष्य
फिल्म एक काल्पनिक क्राइम शो ‘खलबली’ (जो कि एक खबरिया टेलीविज़न चैनल के ‘सनसनी’ शीर्षक शो से प्रेरित है) के ज़रिए इन तीनों महिलाओं के जीवन की कहानी कहती है। यह टीवी शो उनकी कथा तो सुनाता ही है, उन पर टिप्पणियां भी करता है और ये टिप्पणियां तथ्यों पर आधारित नहीं होतीं, बल्कि समाज के पूर्वाग्रहों और फंतासी से उपजती हैं। इन महिलाओं को कुटिल और यौन संबंधों के लिए निर्धारित मानकों के उल्लंघनकर्ता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। हमें बताया जाता है कि ये महिलाएं सीधे-साधे पुरुषों को अपने जाल में फंसाने की जुगत में लगी रहती हैं। उनके अतीत की उपेक्षा कर, सनसनी फैलाने वाला मीडिया अपनी नाटकीय टिप्पणियों के ज़रिये उन्हें भौंडे स्वरूप में प्रस्तुत करता है, उन्हें सही राह से हटने वाली महिलाओं के रूप में चित्रित करता है। ‘मां-बहन’ फिल्म बताती हैं कि मीडिया का नॅरेटिव महिलाओं के जीवन में ताक-झांक करने की आदत और पितृसत्तात्मकता के घिसी-पिटी मान्यताओं को मजबूती देता है। फिल्म यह बताती है कि मीडिया और मोहल्ले के चरित्र में कोई ख़ास फर्क नहीं है। दोनों अफवाहों और कल्पनाओं को सच का बाना पहनाते हैं और महिलाओं की निजी ज़िंदगी को मनोरंजन का जरिया बनाते हैं।
यह फ़िल्म बहुत बेहतर तरीके से आम लोगों के जीवन का चित्रण करती है, लेकिन उसमें कुछ खामियां भी हैं। फिल्म के कथानक की गति बहुत धीमी जान पड़ती है और शराब की दुकान का उप-कथानक और एक लोकप्रिय कलाकार का स्पेशल अपीयरेंस कमज़ोर दिखाई देता है। कथानक के इस हिस्से को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता था। कुछ किरदारों के चरित्र को और विस्तार दिया जा सकता था और कुछ भावुक दृश्य जाने-पहचाने से लगते हैं। अरुणोदय सिंह द्वारा निभाया गया किरदार महेश्वरी – जो फिल्म के एकमात्र ऐसे किरदार हैं जो महिलाओं के प्रति संवेदनशील हैं – को और अधिक स्थान दिया जा सकता था। जया के पति के रूप में शार्दूल भारद्वाज ने बेहतरीन काम किया है। वे एक छोटे शहर के बहुत बड़े अहं वाले परजीवी और ऐय्याश इंसान हैं, जो दर्शकों के लिए असहनीय हैं।
बहनापा
तीनों महिलाओं का परस्पर रिश्ता फिल्म का मूलाधार है। प्रारंभ में वे एक-दूसरे के खिलाफत में खड़ी दिखती हैं। वे एक-दूसरे पर अविश्वास करती हैं और एक-दूसरे की विरोधी प्रतीत होती हैं। लेकिन फिर एक संकट उन्हें एक-दूसरे का सहयोग करने पर मजबूर कर देता है। वे अपनी-अपनी आशंकाओं, दुखों और असुरक्षा के भाव का सामना करती हैं। यह महत्वपूर्ण है कि फिल्म महिलाओं के बीच एका को स्वाभाविक और सहज नहीं बताती। उनकी एकता, उनकी मतविभिन्नताओं से रास्ते उपजते हैं। उन्हें यह समझ आता है कि वे सब खतरे में हैं। फिल्म का सबसे विद्रोही दृश्य वह है जिसमें तीनों महिलाएं गुप्ताजी की परवाह किए बगैर चिकन-करी का आनंद ले रही होती हैं। हमें बताया जाता है कि जातिगत शुद्धता के हामी गुप्ता जी ने उनसे कहा था कि उनके लिए घर में चिकन-करी पकाना निषिद्ध है। उनका चिकन-करी खाना, उस सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह का प्रतीक है जो यह तय करना चाहती है कि उनके रसोईघर और उनकी शरीर में कौन-सी चीज़ प्रवेश कर सकती है और कौन-सी नहीं। यह दृश्य हमें बताता है कि किस तरह जाति व्यवस्था को रोजाना की जीवन पर निगरानी के ज़रिए जिंदा रखा जाता है और किस तरह बहुत साधारण तरीकों से उस पर जीत हासिल की जा सकती है। फ्लैशबैक में फिल्म हमें बताती है कि किस तरह जब दोनों लड़कियां बच्ची थीं तब वे एक-दूसरे का साथ देती थीं, एक साथ नाचती थीं, एक साथ घूमती-फिरती थीं और एक साथ उन घटिया टिप्पणियों को मिटाती थीं जो उनके घर की बाहरी दीवार पर पुरुषों द्वारा लिख दी जाती थीं। उन्हें यह समझ में आता है कि वे एक-दूसरे से प्रेम करती थीं, एक-दूसरे का साथ देना चाहती थीं, लेकिन समाज ने उनके बीच कुछ समय के लिए खाई खोद दी।
कौन हो शर्मिंदा?
फिल्म के अंत में तीनों महिलाएं उस पुरुष पर हंसती हैं जिसका एकमात्र हथियार है उन्हें शर्मसार करना। यह दृश्य अत्यंत प्रभावी और भावपूर्ण है। अपनी इज्ज़त बचाने की ज़िम्मेदारी अब महिलाओं की नहीं, बल्कि पुरुष की है। जिन्हें सम्मान देने से इनकार कर दिया गया है, उन्हें उस सम्मान की चाहत ही नहीं है।
संदर्भ :
- मिशेल फूको, ‘संदर्भ: डिसिप्लिन एंड पनिश: द बर्थ ऑफ़ द प्रिजन’, 1975
- आर.डब्ल्यू. कोनेल एवं जेम्स डब्ल्यू. मेशार्समिट, ‘हेजिमोनिक मेस्क्यूलिनिटी: रीथिंकिंग द कांसेप्ट’, 2005
- बीना अग्रवाल, ‘जेंडर एंड कमांड ओवर प्रॉपर्टी: ए क्रिटिकल गैप इन इकोनोमिक एनालिसिस’, 1994
(मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)
फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्त बहुजन मुद्दों की पुस्तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्य, संस्कृति व सामाजिक-राजनीति की व्यापक समस्याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in