भारत का इतिहास गवाह है कि प्राचीन काल से ही मंदिर केवल आध्यात्मिक चेतना के केंद्र नहीं रहे, बल्कि राजनीतिक सत्ता और अकूत संपत्ति के सबसे बड़े स्रोत रहे हैं। सत्ताधारियों और पुरोहित वर्ग की सांठगांठ ने मिलकर जनमानस के श्रम और श्रद्धा की गाढ़ी कमाई को इन भव्य संरचनाओं के तहखानों में कैद करने का काम किया। नतीजा यह हुआ कि जब भी कोई बाहरी या आंतरिक संकट आया, ये मंदिर संपत्ति के संकेंद्रण के कारण आक्रमणकारियों के निशाने पर आ गए। इतिहास की पोथियां इस बात से भरी पड़ी हैं कि मंदिरों पर होने वाले हमलों के पीछे जितने धार्मिक कारण नहीं थे, उससे कहीं ज्यादा वहां छिपाकर रखा गया सोना, चांदी और हीरे-जवाहरात लूटने की आर्थिक लिप्सा थी। मूर्तियों के नीचे और गर्भगृहों के अंधेरे कोनों में दबाकर रखा गया धन ही लुटेरों को आमंत्रित करता था।
अक्सर यह भ्रम फैलाया जाता है कि मंदिरों में डकैती केवल गैर हिंदू या विदेशी आक्रांताओं ने ही की थी, जबकि ऐतिहासिक तथ्य इसके उलट हैं। धन की भूख किसी मजहब को नहीं देखती। एक ही धर्म को मानने वाले राजाओं और साम्राज्यों ने भी सत्ता और संपत्ति के विस्तार के लिए मंदिरों को बेरहमी से लूटा। मराठा साम्राज्य के विस्तार के दौरान हुए युद्धों में इसके दस्तावेजी प्रमाण दर्ज हैं। यदि कोई आज भी राजस्थान के चित्तौड़गढ़ किले में प्रवेश करे तो उसे वहां एक खंडित मंदिर दिखाई देगा, जिसे किसी विदेशी आक्रांता ने नहीं, बल्कि मराठाओं ने तोड़ा था। इस हमले का मकसद किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना कतई नहीं था बल्कि वहां स्थापित सत्ता को उखाड़ना और मंदिर के भीतर छिपी अकूत दौलत पर कब्जा करना था। जब धर्म सत्ता और पूंजी का औजार बन जाता है, तब उसके अपने ही संरक्षक उसके सबसे बड़े भक्षक बन जाते हैं।
इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की रोशनी में हमें समकालीन अयोध्या के पूरे परिदृश्य को समझना होगा। राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद का पूरा मामला मूल रूप से एक भूमि और संपत्ति का विवाद था। लेकिन इस देश के दक्षिणपंथी द्विजतंत्र ने अपनी राजनीतिक वैतरणी पार करने के लिए इसे एक अत्यंत संवेदनशील और हिंसक धार्मिक उन्माद में तब्दील कर दिया। दशकों तक चले इस खूनी आंदोलन को अंततः भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद ने अपनी सफलता का सबसे बड़ा माध्यम बनाया। जब यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत में पहुंचा, तो न्याय की जो कसौटी होनी चाहिए थी, वह कहीं पीछे छूट गई।
वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया, वह न्यायिक इतिहास में एक अजीब नजीर की तरह देखा जाएगा। कानूनविदों का मानना है कि वह निर्णय न्यायिक नैतिकता और संवैधानिक सिद्धांतों पर आधारित होने के बजाय जनभावनाओं के दबाव और बहुसंख्यक तुष्टीकरण की नीति पर था। यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा किया गया एक ऐसा फैसला था जो विशुद्ध रूप से किसी दीवानी अदालत के संपत्ति बंटवारे जैसा नजर आता था, जिसमें ऐतिहासिक तथ्यों और पुरातात्विक साक्ष्यों से ज्यादा तरजीह आस्था को दे दी गई। बहुसंख्यक जनता की धार्मिक भावनाओं की आड़ लेकर पूरी विवादित जमीन हिंदू पक्ष को सौंप दी गई और यहीं से शुरू हुआ उस ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास’ का खेल, जिसने धर्म के नाम पर कॉर्पोरेट लूट का एक नया ढांचा खड़ा कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद गठित हुए इस ट्रस्ट ने देश और दुनिया भर के हिंदुओं से हजारों करोड़ रुपए का दान बटोरा। लेकिन इस अकूत धन के आते ही कथित संतों, प्रचारकों और जमीन के दलालों का असली चरित्र सामने आने लगा। अयोध्या को रातों-रात एक आध्यात्मिक नगरी बनाने के नाम पर वहां देश के सबसे बड़े भूमाफियाओं का जमावड़ा हो गया। ट्रस्ट के जिम्मेदार पदाधिकारियों ने इन भूमाफियाओं के साथ मिलकर जमीनों की खरीद-फरोख्त में ऐसे-ऐसे खेल किए कि आंखें फटी की फटी रह जाएं। जो जमीन कुछ मिनट पहले किसी दलित-पिछड़े गरीब से कौड़ियों के भाव खरीदी गई, उसे चंद मिनटों बाद ही ट्रस्ट को करोड़ों रुपए में बेच दिया गया। इन जमीन घोटालों पर देश की चुनिंदा स्वतंत्र मीडिया रपटों ने पुख्ता दस्तावेजों के साथ खुलासे किए, लेकिन सत्ता के संरक्षण के कारण सब पर पर्दा डाल दिया गया।
फिर घोटाले केवल जमीन तक सीमित नहीं रहे। मंदिर निर्माण के लिए पत्थरों को राजस्थान के बंसी पहाड़पुर और अन्य इलाकों से लाने, उन्हें खरीदने और तराशने तक के काम में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगे। राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने खुद इन प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए और पत्थरों के अवैध खनन व परिवहन में शामिल सिंडिकेट की भूमिका को रेखांकित किया था – जो पत्थर सदियों तक टिकने वाले मंदिर की नींव बनने जा रहे थे, वे दरअसल संघ परिवार के कुछ चुनिंदा चहेते ठेकेदारों की तिजोरियां भरने का जरिया बन चुके थे। शिलाओं के नाम पर चंदा इकट्ठा करने का जो सिलसिला 1980 के दशक में शुरू हुआ था, वह मंदिर निर्माण के पत्थरों की खरीद तक आते-आते एक संगठित लूट तंत्र में बदल गया।

तथाकथित प्राण-प्रतिष्ठा के बाद दावा किया गया कि अब तक 25 करोड़ से अधिक श्रद्धालु अयोध्या आ चुके हैं। देश के कोने-कोने से आने वाले इन आम और खास दोनों तरह के श्रद्धालुओं ने गर्भगृह में बिठाए गए रामलला के चरणों में अपनी गाढ़ी कमाई का नकद चढ़ावा अर्पित किया। किसी ने क्विंटलों सोना-चांदी चढ़ाया, किसी ने हीरे-जवाहरात भेंट किए, तो किसी ने पूरी रामचरितमानस ही सोने के पन्नों पर मढ़वाकर ट्रस्ट को सौंप दी। लेकिन आज वे श्रद्धालु खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। सैकड़ों ऐसे भक्तों के बयान सामने आ रहे हैं, जिन्होंने लाखों का गुप्त और प्रत्यक्ष दान दिया, लेकिन उन्हें ट्रस्ट की तरफ से किसी भी प्रकार की आधिकारिक रसीद या हिसाब नहीं दिया गया।
इससे भी ज्यादा चौंकाने वाला और शर्मनाक खुलासा मंदिर के भीतर चढ़ावे की गिनती को लेकर हुआ है। जो लोग दान की गिनती करने के काम में तैनात थे, वे कोई पेशेवर एकाउंटेंट या बैंक कर्मी नहीं थे, बल्कि वे आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और ट्रस्ट के रसूखदार ट्रस्टियों के बेहद करीबी और खास लोग थे। इन लोगों ने मिलकर करोड़ों रुपए के नकद चढ़ावे पर सीधे डाका डाल दिया। यह कोई यकायक की गई डकैती नहीं है, बल्कि यह एक लंबे समय से चल रही सुसंगठित साजिश है। इस डकैती को छिपाने के लिए जो तरीका अपनाया गया, वह किसी पेशेवर आपराधिक गिरोह जैसा है। जांच में सामने आया है कि चढ़ावा गिनती स्थल के सीसीटीवी कैमरे करीब 45 दिनों तक जानबूझकर खराब या बंद रखे गए थे, ताकि कैमरे के अंधेरे में श्रद्धालुओं के चढ़ावे की इस लूट को अंजाम दिया जा सके और अपराधियों के चेहरे कभी सामने न आएं।
आरएसएस हमेशा खुद को एक चरित्र-निर्माण करने वाला सांस्कृतिक संगठन बताता रहा है, लेकिन अयोध्या के इस चढ़ावा चोरी कांड ने संघ के इस तथाकथित नैतिक आभामंडल को पूरी तरह तार-तार कर दिया है। संघ के शताब्दी वर्ष में राम मंदिर का यह महाघोटाला उसकी क्रेडिबिलिटी पर ऐसा बदनुमा दाग है जिसे वह कभी धो नहीं पाएगा। इस आंदोलन से जुड़े रहे अंदरूनी लोगों ने ही अब संघ के शीर्ष प्रचारकों के चरित्र पर सीधे और तीखे प्रहार शुरू कर दिए हैं।
इस पूरे प्रकरण ने संघ परिवार के भीतर छिपे गहरे जातिगत अंतर्विरोधों और द्विजतंत्र की आपसी गुटबाजी को भी चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। एक तरफ बनिया और ब्राह्मण लॉबी है, जो चंपत राय जैसे लोगों को तपस्वी, निस्वार्थ संत और त्यागी बताकर उनका बचाव कर रही है; तो दूसरी तरफ संगठन के ही अन्य धड़े उन्हें चोरों का सरगना कह रहे हैं। चंपत राय और अनिल मिश्रा जैसे चेहरों के इस्तीफे स्वीकार हो जाने के बाद अब यह बहस एक भयानक जातिगत शीतयुद्ध में तब्दील हो चुकी है। अब यह लड़ाई ‘बनिया-ब्राह्मण’ बनाम ‘राजपूत’ के वर्चस्व की जंग बन चुकी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा गठित विशेष जांच टीम को लेकर संघ के क्षत्रिय पृष्ठभूमि के प्रचारकों और नेताओं में जबरदस्त सुगबुगाहट है। दक्षिणपंथ के भीतर का यह जातिवादी ढांचा अब खुल कर सामने आ गया है, जहां शीर्ष के लोगों को बचाने के लिए छोटे कर्मचारियों और काउंटिंग सहायकों को बलि का बकरा बनाने की स्क्रिप्ट लिखी जा रही है।
संघ और भाजपा के आईटी सेल ने यह नॅरेटिव चलाने की पूरी कोशिश की कि “दान तो गोपनीय होता है, वह श्रद्धा का विषय है, उसका हिसाब कैसा?”, “यह हिंदुओं की आस्था पर हमला है” या “विपक्ष को इस पर बोलने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है, क्योंकि वे मंदिर के विरोधी थे।”, लेकिन सच यही है कि आम जनमानस के भीतर गहरे शंकाओं और आक्रोश के बादल छा चुके हैं।
लोग अब खुली जुबान से कहने लगे हैं कि ये कथित रामभक्त तो इतिहास के बाबर और गजनी से भी गए-बीते निकले। वे तो विदेशी थे, हमलावर थे, उनका धर्म अलग था; इसलिए उन्होंने तोड़ा और लूटा, लेकिन ये तो स्वधर्मी हैं, स्वदेशी हैं, दिन-रात राष्ट्रवाद का चोला ओढ़कर घूमने वाले लोग हैं, जिन्होंने अपने ही आराध्य के घर में डकैती डाल दी। राम के नाम पर ऐसी संस्थागत लूट इस देश ने पहले कभी नहीं देखी। पहले मंदिर आंदोलन के नाम पर ईंट और चंदा, फिर राम शिलाओं के नाम पर घर-घर से उगाही, फिर दो-दो बार कारसेवा के नाम पर करोड़ों का फंड, फिर अदालती लड़ाई के नाम पर धन संग्रह, फिर कारसेवकपुरम् में शिलाएं तराशने के नाम पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वसूली और जब मंदिर बन गया, तो पहले जमीनों में दलाली, फिर पत्थरों में घोटाला, फिर प्राण प्रतिष्ठा के आयोजनों के नाम पर सरकारी खजाने की लूट और अंत में आस्थावान आम जनता के चढ़ावे के पैसों पर भी हाथ साफ। इन लोगों ने राम को केवल इसलिए स्थापित किया ताकि उनके नाम का इस्तेमाल एक शाश्वत एटीएम मशीन की तरह किया जा सके।
यह घोटाला केवल कुछ करोड़ रुपयों की हेराफेरी का मामला नहीं है, बल्कि यह इस देश की बहुसंख्यक जनता के साथ किया गया सबसे बड़ा विश्वासघात है। यह साबित करता है कि हिंदुत्व का पूरा ढांचा धर्म की आड़ में कुछ खास जातियों और पूंजीपतियों के आर्थिक हितों को साधने का एक कॉरपोरेट प्रॉडक्ट है। राम मंदिर ट्रस्ट का यह घोटाला दरअसल जनता के उस पावन विश्वास की क्रूर हत्या है जिसे उन्होंने अपने खून पसीने की कमाई सौंपकर व्यक्त किया था। उत्तर प्रदेश की वर्तमान भाजपा सरकार द्वारा गठित की गई एसआईटी जांच पर इस देश को रत्ती भर भी भरोसा नहीं है, क्योंकि वे खुद इस सत्ता तंत्र का हिस्सा हैं जो अपराधियों को संरक्षण दे रहा है।
अब आम हिंदुओं में यह चर्चा बहुत आम है कि वर्तमान ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास’ को तत्काल प्रभाव से भंग किया जाना चाहिए, क्योंकि इसके शीर्ष पदाधिकारी वित्तीय और नैतिक रूप से पूरी तरह भ्रष्ट और संदेहास्पद साबित हो चुके हैं। साथ ही सुप्रीम कोर्ट को स्वतः संज्ञान लेते हुए अपनी प्रत्यक्ष निगरानी में इस पूरे वित्तीय महाघोटाले, भूमि सौदों और चढ़ावा चोरी प्रकरण की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय न्यायिक जांच कमेटी गठित करनी चाहिए।
इस सारे प्रकरण ने फिर से साबित कर दिया है कि आज भी मंदिर सत्ता, संपत्ति और धर्म का एक नेक्सस ही निर्मित करते हैं और इसका फायदा आम दलित, पिछड़े, आदिवासी किसानों-मजदूरों को नहीं मिलता बल्कि इस देश की द्विज जातियां ही इसका फायदा उठाती है। जब तक उनके बीच लूट के माल का बंटवारा ठीक चलता रहता है, तब तक सब कुछ सही माना जाता है, लेकिन जैसे ही बंटवारे में कोई परेशानी या सहभागिता का प्रश्न उठ खड़ा होता है, लूट का पूरा तंत्र बेनकाब हो जाता है और कोशिश होती है कि वे अपने अपराधों की सजा किसी दलित-पिछड़े छोटे कर्मचारी पर डाल कर खुद को पाक साफ घोषित कर दें। राम मंदिर चढ़ावा चोरी प्रकरण में भी हो सकता है कि आने वाले दिनों में सब कुछ पाक साफ घोषित कर दिया जाए, लेकिन इसने संघ के चरित्र निर्माण की पोल खोल दी है और द्विज जातियों के मध्य लूटतंत्र में सहभाग को लेकर मची मारकाट को उजागर कर दिया है।
(संपादन : नवल/अनिल)
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