दिल्ली के जंतर-मंतर पर ही नहीं, बल्कि देशभर में जिस तरह की भाषा में सत्ताधारियों के प्रति नाराजगी, गुस्सा या एक हद तक घृणा जाहिर की जा रही है, उसे समाज में गाली माना जाता है। उन्हें भद्दा कहा जाता है। अश्लील कहा जाता है।
देश में पिछले दसेक वर्षों में कई तरह के बड़े आंदोलन देखने को मिले हैं। नागरिकता के सवाल पर यानी सीएए के विरुद्ध पूरे देश में शाहीन बाग का आंदोलन देखा गया। किसानों का लगभग एक वर्ष तक चलने वाला आंदोलन चारों दिशाओं में दिल्ली की सीमाओं पर देखा गया। उन आंदोलनों की भाषा परंपरागत थी। लेकिन जंतर-मंतर आंदोलन में भाग लेने वाली नई पीढ़ी ने अपनी नाराजगी और गुस्से को जाहिर करने के लिए ऐसी भाषा चुनी जिसे परंपरागत समाज में गालियां, भद्दी, असभ्य और असंसदीय माना जाता है।
मैं जिस पीढ़ी में जन्मा, पला-बढ़ा, वह आजादी के एक दशक बाद वाली पीढ़ी थी। उसे आंदोलनों के लिए, आलोचना के लिए, आंदोलनकारी साथियों के बीच ऊर्जा बरकरार रखने के लिए, जोश बनाए रखने के लिए एक परंपरागत भाषा मिली थी। लेकिन हमारी पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के लोगों के बीच एक फर्क महसूस किया गया। पुरानी पीढ़ी के सदस्य़ शायद अपने साथियों के बीच या अकेले में भी सत्ताधारियों के विरुद्ध गालियों का इस्तेमाल करने से संकोच करते थे। एक-दूसरे को टोक देते थे। जबकि हमारे साथ के लोग भले ही नारों में, मंचों पर, पोस्टरों में, दिवालों पर गालियों का इस्तेमाल नहीं करते थे, लेकिन मंचों से उतर कर या भाषणों को सुनकर अपना गुस्सा उन शब्दों में ही जाहिर करते थे जिन्हें सुनकर लोगों को क्षोभ होती है और उन्हें गालियां कही जाती हैं।
आज भी मैं उन शब्दों को दोहरा नहीं सकता। न लिख सकता हूं और न बोल सकता हूं। हमारे भीतर उसे बोलने, लिखने या दोहराने में संकोच के भाव गहरे स्तर पर बैठे हुए हैं।
सोशल मीडिया के कुछ पोस्ट देखे जा सकते हैं। इनमें लड़के और लड़कियां और तीसरे जेंडर के सदस्य भी हैं, उनके पोस्ट व पोस्टर से हालात के मद्देनजर नई पीढ़ी की भाषा का अध्ययन किया जा सकता है। सरल शब्दों में कहें तो हिंदी में जो गालियां मानी जाती हैं, उसे अंग्रेजी की रोमन लिपि में व्यक्त की गई है। यह भी कहा जा सकता है और यह स्थापित व्याख्याएं हैं कि भारतीय समाज में गालियों के लिए प्रमुख रूप से स्त्रियों को हथियार बनाया गया है। उन कमजोर समझे जानी वाली जातियों और उनके पेशे को बनाया गया है, जिसे नीच, छोटा, असभ्य, गंवार, संस्कारहीन करार दिया गया है। उन लोगों की पहचान गालियों के लिए चुनी गई है, जो थर्ड जेंडर हैं। इस तरह से देखें तो गालियां किसे कहते हैं और समाज की गतिविधियों में किसे किस श्रेणी में रखा गया है, यह कोई सामाजिक विकास के स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि एक व्यवस्थागत निर्धारण है। समाज के विकास की प्रक्रिया के उस चरण व काल को संस्कृतिकरण कहते हैं।
इस पूरे विषय को समझने की दृष्टि से यह एक उदाहरण के रूप में ऱख रहा हूं कि महिलाओं के शरीर की एक स्वाभाविक मासिक प्रक्रिया के प्रति कैसे एक तरह की व्यवस्था के लिए किस-किस तरह की दृष्टि बनाई गई। शुद्धता और अशुद्धता के खांचे तैयार किए गए और धार्मिकता से जोड़ा गया। वह कैसे महिलाओं के उत्पीड़न के औजार के रूप में निर्धारित किया गया। हमने अपनी पीढ़ी में देखा कि मासिक प्रक्रिया को धर्म कहा जाता था। उस पर बात करना संकोचों से दबा हुआ था। लेकिन नई पीढ़ी ने वह सारी दीवारें तोड़ दी हैं। नई पीढ़ी के लड़के-लड़कियां इस स्वाभाविक स्त्री प्रक्रिया को लेकर बातचीत करते हैं। सरकार के सामने स्कूलों में सैनिटरी पैड के लिए कार्यक्रम बनाने के लिए आवाज उठती है। मासिक प्रक्रिया के दौरान छुट्टियों के अधिकार की बहस होती है। संसद में भी करनी पड़ती है और अदालतों में भी।
यहां समाज शास्त्र और राजनीतिक शास्त्र को समझा जा सकता है। संस्कारवान होने के और संस्कृतिकरण के अर्थ यहां स्पष्ट होते हैं।

क्या जंतर-मंतर पर आंदोलन के जरिए नई पीढ़ी संस्कृतिकरण यानी संस्कृटाइजेशन से बाहर निकल रही है? वह उससे मुक्ति के रास्ते निकाल रही है? क्या यह आंदोलन तमाम स्तरों पर आजादी के नारों से आगे निकलने का संकेत दे रहा है? व्यवस्था के लिए एक सामाजिक आधार को तैयार करना एक ऊपरी ढांचा होता है। उसकी तह में उसकी वैचारिक प्रक्रिया होती है जो व्यवस्था के सामाजिक आधार को बनाए रखने, बरकरार रखने में नींव का काम करती है। संस्कृतिकरण वर्ण व जाति आधारित मर्दवादी व्यवस्था का मूल आधार है।
नई पीढ़ी आखिर किन स्थितियों, किन हालातों में पली बढ़ी है, यह उनकी भाषा के समाजशास्त्रीय अध्ययन के लिए जरूरी प्रश्न है।
जैसा कि मैंने कहा कि हमें आंदोलनों के लिए एक परंपरागत भाषा मिली। यद्यपि वह भाषा हमारी नाराजगी व गुस्से को जाहिर करने के लिए पर्याप्त नहीं थी। उपमाएं कमजोर थीं। हम न जाने कब से तानाशाही, फांसीवाद के लिए हिटलर के नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं। हमने हिटलर को नहीं देखा है। उसके बारे में सुना और पढ़ा है। लेकिन हम जो तानाशाही, फासीवाद आज महसूस करते हैं, उसके मद्देनजर हमारे सपनों को रौंदने की कोशिश के खिलाफ भावनाओं को जाहिर करने के लिए परंपरागत भाषा वाला हिटलर पर्याप्त नहीं है। तो हमारे सामने सवाल आता है कि कहां से भाषा लाएं।
नई पीढ़ी की पृष्ठभूमि में कोई आंदोलन नहीं है। वह आंदोलन जो कि नई पीढ़ी की आकांक्षाओं को संबोधित हो। वह केवल नौकरियों के लिए प्रतिस्पर्धा करने के लिए बनाया गया, यही उसके सामने एक बड़ी चुनौती रही है। वह अपने सपनों को इसी के इर्द-गिर्द बुनती है।
नई पीढ़ी तेज गति से चलने वाली नई तकनीकों, मनोरंजन के लिए कई तरह की फिल्में, गाने और कार्यक्रम, वैश्वीकरण द्वारा बनाई जाने वाली भाषा के बीच पली-बढ़ी है। वह किसी परंपरागत संकोच के भाव से मुक्त है। मुक्ति को महसूस करना ही उसकी गतिशीलता का आधार है। आखिर फिल्मों में और गानों में जो भाषा इस्तेमाल की जाती है, वह पुरानी पीढ़ी के संकोच के दायरे को लांघ जाती है। लेकिन नई पीढ़ी उससे असहज नहीं होती। कुणाल कामरा के शो को देखें। वे ऐसी भाषा की गति के साथ ही अभिव्यक्त होते हैं, जिन्हें गालियां कहा जाता है।
संसद में बरती जाने वाली भाषा क्या परंपरागत बची है? जिस तरह की भाषा संसद में, राजनीतिक मंचों पर बोली जाती है, वह भाषा समाज के भीतर पहुंचती है और वैसी ही भाषा में प्रतिक्रिया का भाव तैयार होता है। आखिर नई पीढ़ी को अपने को अभिव्यक्त करने का रास्ता कहां छोड़ा गया है?
एक तो इस नई पीढ़ी के सामने आंदोलन के लिए भाषा बनाने की चुनौती से जुड़ा पहलू है। दूसरा कि वह संवेदनशील है। कम-से-कम जातियों के नाम से बनाई गई गालियों को वह गाली समझ रही है। कई गालियां ऐसी हो सकती हैं, जो जेंडर के नजरिए से चोट पहुंचाती है और समाज के उस हिस्से को ज्यादा जिसके ऊपर गालियों के रूप में थोपा गया है। जैसे हिजड़ा, छक्का आदि। भडुआ शब्द का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया गया है। यह उन मर्दों के लिए इस्तेमाल संस्कृतनिष्ठ समाज में किया जाता रहा है जो वेश्यालयों यानी सेक्स वर्कर के साथ रहते हैं। सेक्स वर्कर का वह सौदा करते हैं। मर्दों के लिए इस किस्म की भाषा को गालियां मानी जाती है। नई पीढ़ी के लड़के-लड़कियों ने ‘चू’ या ‘सी’ का कोड बना लिया है। गालियों के लिए कोड व दूसरे सांकेतिक चिह्नों से वे भाषा बना रहे हैं। गुस्से और नाराजगी के लिए वह गालियों के इस्तेमाल में संकोच के परंपरागत भाव को वे भी समाज में महसूस करते हैं।
दूसरा पक्ष यह है कि आंदोलनों में नारों का व्यक्तिकरण दिख रहा है। गुस्से को भी जाहिर करने के लिए और प्रेरणा व ऊर्जा के लिए भी। प्रेरणा व ऊर्जा का स्रोत व्यक्ति का रूपक होता है। भगत सिंह सबसे बड़ा रूपक है। गुस्सा भी व्यक्ति केंद्रित हुआ है, क्योंकि राजनीति व राजनीतिक दल का पर्याय व्यक्ति केंद्रित हुआ है। जंतर-मंतर पर सत्ताधारियों के लिए भाषा गलत-सही, उचित-अनुचित के बजाय एक समाजशास्त्रीय अध्ययन की मांग करती है।
(संपादन : नवल/अनिल)
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