गत 9 अगस्त, 2026 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में दलित इंटेलेक्चुएल फोरम के तत्वावधान में एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसके केंद्र में वंचित तबकों (एससी, एसटी और ओबीसी) के लिए आरक्षण नीति की ऐतिहासिक विकास यात्रा, उसकी वर्तमान स्थिति एवं स्वरूप और भविष्य की कार्यदिशा रही।
दलित-बहुजन समुदाय समता, स्वतंत्रता और लोकतंत्र को राष्ट्र, समाज और व्यक्ति के बुनियादी जीवन-मूल्यों के रूप में देखता है। यह संगोष्ठी अपने स्वरूप और संवाद की पूरी प्रक्रिया में इन जीवन-मूल्यों की जीवंत प्रतीक बन गई। हालांकि संगोष्ठी के आयोजकों ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के संवाद की प्रक्रिया के रूप में ही डिजाइन किया था और यही हुआ भी। संगोष्ठी पारंपरिक स्वरूप से इतर वहां उपस्थित सभी लोगों के बीच एक जीवंत संवाद का मूर्त रूप बन गई, जो अक्सर नहीं हो पाता है। मंचासीन लोगों और मंच के सामने बैठे लोगों के बीच का अंतर कब गायब हो गया, किसी को पता ही नहीं चला। माहौल ऐसा बना कि लगा, जैसे सभी श्रोता हैं और सभी वक्ता भी। विचारों के लेन-देन की प्रक्रिया में सभी एक समान थे। श्रेणीगत क्रम, उम्र, पद, डिग्री, स्त्री-पुरुष आदि विभेद भी संगोष्ठी के दौरान गायब ही हो गए थे। यह संगोष्ठी की सबसे पहली, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सफलता दिखी। यदि समता, स्वतंत्रता, बंधुता और लोकतंत्र जीवन-मूल्य नहीं बनते और व्यवहार में चरितार्थ नहीं होते तो वे सिर्फ पाखंडपूर्ण उपदेश बनकर रह जाते हैं। संगोष्ठी में यह व्यवहार के स्तर पर घटित हुआ।
इस संगोष्ठी में गजलकार बी.आर. विप्लवी, बीएसएनएल के महाप्रबंधक विद्यानंद, अधीक्षण अभियंता एन.के. गौतम, प्रोफेसर के. सुनीता, फोरम के संयोजक डॉ. अलख निरंजन और डॉ. सिद्धार्थ रामू (इस रिपोर्ट के लेखक) ने मुख्य रूप से अपनी बातें रखीं। संगोष्ठी में सवाल और जवाब का दौर भी चला। मंच का संचालन फोरम के उप संयोजक उमेश भास्कर ने किया और फोरम के महासचिव सूरज भारती ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। संगोष्ठी में सौ से ऊपर लोग जुटे थे और संवाद का दौर करीब दोपहर 12 बजे से लेकर शाम पांच बजे तक यानी पांच घंटे तक चला। करीब 30-35 लोगों ने अपने विचार इस दौरान साझा किये।
बिना किसी औपचारिकता के आरंभ हुई गोष्ठी
संगोष्ठी की शुरुआत बिना किसी औपचारिकता के हुई। आरंभ फोरम के मुख्य संयोजक डॉ. अलख निरंजन ने किया और यह बताया कि इस फोरम के गठन की जरूरत क्यों पड़ी? उन्होंने यह भी बताया कि फोरम के सामने मुख्य कार्यभार और इसकी सामूहिक सोच क्या है?
डॉ. निरंजन ने कहा कि हम सभी जानते हैं कि कोई भी ऐतिहासिक कार्यभार – दर्शन-सिद्धांत-विचार और जमीनी संघर्ष – इन दोनों रूपों में एक साथ ही पूरा होता है। भारत में वर्ण-जाति आधारित वर्चस्व एवं अधीनता कायम करने वालों ने पहले इसका विचार गढ़ा और फिर व्यवहार में लागू किया। इसी तरह वर्चस्व और अधीनता के इस रिश्ते को तोड़ने के लिए दलित-बहुजन समाज के नायकों ने उनके दर्शन, सिद्धांत और विचारों को चुनौती दी और उसके साथ-साथ जमीनी संघर्षों में भी उसे चुनौती दी। प्राचीन काल में बुद्ध, मध्य काल में रैदास, कबीर, नानक और आधुनिक काल में फुले, पेरियार तथा डॉ. आंबेडकर आदि ने यही किया। दलित इंटेलेक्चुएल फोरम उस विरासत को आगे बढ़ाना चाहता है।
एजेंडों को तैयार करना फोरम का अहम कार्यभार
डॉ. निरंजन ने कहा कि यह फोरम आज के समय में दलितों के दर्शन, सिद्धांत, विचारों पर आधारित एजेंडों को तैयार करने, एक राष्ट्रव्यापी मंच के निर्माण की प्रक्रिया की महज एक शुरुआत है। निस्संदेह हमारे नायकों ने हमें दर्शन, सिद्धांत, विचारों और उस पर आधारित सशक्त एजेंडों की एक विरासत सौंपी है। ऐसी स्थिति में हमारे सामने दो कार्यभार हैं। पहला, यह कि उस विरासत पर विभिन्न कारणों से पड़ी धूल-धक्कड़ को साफ किया जाए, उसके ऊपर उग आए घास-फूस को उखाड़ा जाए, उनके मूल को तरोताजा रूप में प्रस्तुत किया जाए। दूसरा, जैसा कि बुद्ध-आंबेडकर आदि ने हमें सिखाया है कि चीजें हमेशा बदलती रहती हैं। इतिहास की गति रुकती नहीं है। ऐसी स्थिति में हमारे महान नायकों के बाद हमारे देश की स्थिति-परिस्थिति में कई सारे बदलाव आए हैं। इन बदलावों में कई सारे नकारात्मक और अतीतोन्मुखी हैं। कई सारे बहुत ही सकारात्मक हैं और समाज को आगे ले जाने वाले हैं। फोरम का काम इतिहास की विरासत को संभालते हुए, स्वीकार करते हुए पिछले कुछ दशकों में आए नकारात्मक-सकारात्मक बदलावों की पहचान करना और उसके आधार पर वर्तमान समय में उपस्थित कार्यभारों को चिह्नित करने में मददगार बनना है।
आगे उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जबकि वर्ण-जाति आधारित वर्चस्व-अधीनता के रिश्ते को दार्शनिक-वैचारिक और व्यवहारिक स्तर पर जायज ठहराने वाली शक्तियों ने देश की राजसत्ता के साथ समाज पर कब्जा जमा लिया है, दलित-वंचित तबकों के सामने उपस्थित कार्यभारों को चिह्नित करना और ज्यादा जरूरी हो गया है। ऐसी शक्तियों के निशाने पर वंचित तबकों को राजनीतिक, शैक्षिक और सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने वाली आरक्षण की व्यवस्था सबसे अधिक निशाने पर है। इसलिए फोरम ने अपनी पहली संगोष्ठी का विषय ‘आरक्षण नीति, इतिहास, वर्तमान और भावी दिशा’ रखा है।
आरक्षण विरोधियों और समर्थकों की सोच में बदलाव जरूरी
वंचित तबकों के लिए आरक्षण की नीति पर आज के समय में विचार-विमर्श की जरूरत क्यों है, इसे रेखांकित करते हुए डॉ. अलख निरंजन ने कहा कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व, शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश और सरकारी नौकरियों के मामले में आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों के बारे में न केवल आरक्षण विरोधियों की समझ गलत है, बल्कि आरक्षण के बहुत सारे समर्थकों की समझ में भी कुछ बुनियादी दिक्कते हैं। एक ओर आरक्षण विरोधी अपने आग्रहों-पूर्वाग्रहों और मनगढ़ंत आधारों पर आरक्षण का विरोध करते रहे हैं और दूसरी ओर आरक्षण के समर्थक आरक्षण की ऐतिहासिक विकास यात्रा, इस संदर्भ में हुई ऐतिहासिक बहसों-प्रावधानों, संविधान सभा में इस संदर्भ में हुई बहसों एवं दिए गए तर्क-वितर्कों और संविधान सभा द्वारा सर्वसम्मत तौर पर स्वीकृत सामाजिक-शैक्षणिक आधार पर दिए गए आरक्षण और उसके संदर्भ में किए संवैधानिक प्रावधानों की मुकम्मल जानकारी के बिना आरक्षण का समर्थन करते रहते हैं। इस स्थिति को बदलने के लिए आरक्षण के मुद्दे पर एक देशव्यापी विचार-विमर्श और लोकतांत्रिक संवाद की जरूरत है। यह संगोष्ठी इस दिशा में उठाया गया एक छोटा-सा कदम है।
उन्होंने कहा कि निश्चित तौर पर पहले स्तर पर यह संवाद वंचित तबकों के उन लोगों के बीच ही हो रहा है, जो सामाजिक-शैक्षणिक आधार पर दिए गए आरक्षण के दायरे में आते हैं और इस आरक्षण के समर्थक भी हैं। लेकिन भविष्य में फोरम की यह कोशिश रहेगी कि यह संवाद एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया और माहौल में आरक्षण विरोधियों और आरक्षण समर्थकों के बीच भी हो। यह एक सहिष्णुता के माहौल में हो, क्योंकि आरक्षण लोकतांत्रिक राष्ट्र-समाज निर्माण की प्रक्रिया का एक संवैधानिक उपकरण है। आरक्षण विरोधी भी इस राष्ट्र-समाज के उसी तरह हिस्से हैं, जैसे आरक्षण समर्थक।

कुछ यूं हुई गोष्ठी में सामूहिक बातचीत
संगोष्ठी में आरक्षण की ऐतिहासिक विकास-यात्रा और उसके विभिन्न मंजिलों पर विस्तार से बात हुई। पहली बात यह कि आरक्षण का प्रश्न प्रतिनिधित्व के प्रश्न से जुड़ा हुआ है। भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ कांग्रेस और उसके पहले भारत की उच्च जातियों के नेतृत्व में चल रहे संघर्ष की सबसे बुनियादी मांग यह थी कि अंग्रेज भारतीयों के हितों का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं, क्योंकि दोनों के हित अलग-अलग हैं। इसलिए भारतीय राज्य और समाज के संचालन में भारतीयों को प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए, क्योंकि भारतीय प्रतिनिधि ही भारतीयों के हितों, जरूरतों, दुखों-सुखों, समस्याओं और उनके समाधान के उपायों को अच्छी तरह समझ सकते हैं। उसका सही समाधान प्रस्तुत कर सकते हैं। विदेशी अंग्रेज यह काम नहीं कर सकते हैं। इसकी पहली वजह यह बताई गई कि ब्रिटिश लोग ब्रिटिश साम्राज्य के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं, वे भारतीयों के हितों का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं।
ब्राह्मण व अन्य उच्च जातियां नहीं समझ सकती हैं दलित-बहुजनों के हित
दूसरी वजह यह है कि ब्रिटिश साम्राज्य के प्रतिनिधि भारतीयों के हितों को जानते-समझते नहीं हैं। इस तर्क की जमीन पर ही यह सवाल सामने आया कि क्या वर्ण-जाति व्यवस्था में द्विज ब्राह्मण व अन्य उच्च जातियां बहुसंख्यक पिछड़े वर्गों (एससी-एसटी और ओबीसी-शूद्र-अतिशूद्र) के हितों का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं? क्या ब्राह्मणों व अन्य उच्च जातियों के हितों और पिछड़े वर्गों के हितों के बीच शत्रुता वाला रिश्ता नहीं है? क्या जैसे अंग्रेजों के हित और भारतीयों के हित अलग-अलग हैं, उसी तरह ब्राह्मणों व अन्य उच्च जातियों और पिछड़े वर्गों के हित अलग-अलग नहीं है? जैसे अंग्रेज भारतीय का हित किसमें है, यह नहीं जानते-समझते हैं और न ही वे जान-समझ सकते हैं, ठीक उसी तरह ब्राह्मण और अन्य उच्च जातियाें के लोग भी यह नहीं जानते हैं या नही जानना चाहते हैं कि पिछड़े वर्गों का हित किन चीजों में है। ब्राह्मण व अन्य उच्च जातियों और पिछड़े वर्गों के हितों के बीच टकराहट अंग्रेजों और भारतीयों के हितों के बीच की टकराहट से बहुत ज्यादा पुरानी है।
इस समझ और तर्क पद्धति के आधार पर जोतीराव फुले ने पहली बार शूद्र और अतिशूद्र समुदायों के लिए अलग प्रतिनिधित्व की मांग की। शाहूजी महाराज ने इस तर्क को तथ्यों के आधार पर मुकम्मल शक्ल दिया और कोल्हापुर राज्य में गैर-ब्राह्मणों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की। डॉ. आंबेडकर ने इस समझ को एक व्यापक आधार दिया। संविधान सभा ने पिछड़ेपन की पहचान के लिए सामाजिक-शैक्षिक आधार को स्वीकार किया। संविधान में एससी-एसटी को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण प्राप्त हुआ। संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत अन्य पिछड़े वर्गों के लिए सामाजिक-शैक्षणिक आधार पर आरक्षण का दरवाजा भी 1992 से खोल दिया गया और सीमित स्तर पर ही सही ओबीसी को सरकारी नौकरियों/सेवाओं और शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश के मामले में 27 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने की शुरुआत हुई।

यह भले ही कटु यथार्थ हो, लेकिन स्थिति यही है कि आज भी ब्राह्मण और अन्य उच्च जातियों और पिछड़े वर्गों के हितों के बीच बुनियादी मामलों में बिलकुल ही विपरीत हितों-स्वार्थों की टकराहट मौजूद है, क्योंकि वर्ण-जाति व्यवस्था का बुनियादी ढांचा टूटा नहीं है। जब तक यह ढांचा बरकरार है, ब्राह्मण-द्विज पिछड़े वर्गों के हितों का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं और उनके हितों का प्रतिनिधित्व उन्हीं वर्गों के लोग ही कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में आरक्षण बरकरार है और बरकरार रहेगा, जब तक यह ढांचा टूट नहीं जाता।
जहां सबसे ज्यादा आरक्षण, वहीं हुई है उन्नति
प्रतिभाओं का हनन और योग्यता-क्षमता के साथ समझौता – आरक्षण के विरोध में दिए जाने वाले सबसे ज्यादा दुहराए जाने वाले तर्क हैं। सबसे अधिक विचार-विमर्श और बहस इसी तर्क के इर्द-गिर्द होती है। वक्ताओं ने कहा कि शाहूजी द्वारा 1902 में पिछड़े वर्गों के आरक्षण की शुरुआत हुए करीब 124 वर्ष हो चुके हैं। उसके बाद 1918 में मैसूर (वर्तमान में कर्नाटक) और 1921 में मद्रास प्रेसीडेंसी (वर्तमान में तमिलनाडु) में आरक्षण लागू हुए करीब 100 वर्ष हो चुके हैं। यहां तक कि ब्रिटिश काल में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण (1937) के लागू हुए करीब 90 वर्ष हो चुके हैं। संविधान द्वारा एससी-एसटी के आरक्षण के लागू हुए करीब 75 वर्ष हो चुके हैं। ओबसी के लिए आरक्षण के लागू हुए भी करीब 34 वर्ष हो चुके हैं। अब सवाल है कि वंचित तबकों के आरक्षण से देश, समाज और इन वर्गों को क्या फायदा हुआ या क्या नुकसान हुआ, इसका आकलन सैद्धांतिक बातों और तर्क-कुतर्क की जगह जमीनी सच्चाइयों के आधार पर किया जा सकता है।
इस संदर्भ में सबसे ठोस उदाहरण दक्षिण भारत के राज्य हैं, जहां पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण सबसे पहले लागू हुआ। तमिलनाडु में तो यह 69 प्रतिशत है। इन राज्यों में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण हमेशा ही करीब 50 प्रतिशत या इससे अधिक रहा है। फिर भी ये राज्य आर्थिक और मानवीय उन्नति के पैमाने पर हिंदी पट्टी के उन राज्यों से उन्नति-प्रगति के मामले में कई गुणा आगे निकल चुके हैं, जहां आरक्षण बहुत बाद में और सीमित स्तर पर लागू हुआ। हालिया सारे आंकड़ें यह बता रहे हैं कि दक्षिण के राज्य आर्थिक-मानवीय उन्नति-प्रगति के मामले में चीन की बराबरी कर रहे हैं। मानवीय उन्नति-प्रगति के कुछ पैमानों पर चीन से आगे भी निकल चुके हैं और अमेरिका-यूरोप की बराबरी कर रहे हैं। दक्षिण के ये वे राज्य हैं, जहां न केवल राजनीतिक, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन में ब्राह्मण-द्विज वर्चस्व को काफी हद तक तोड़ दिया गया है। यह कहीं थोड़ा ज्यादा कहीं थोड़ा कम भले हुआ है। जबकि दूसरी तरफ हिंदी पट्टी के यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्य हैं, जहां अभी भी जीवन के सभी क्षेत्रों में ब्राह्मण-द्विज वर्चस्व करीब-करीब पूरी तरह कायम हैं। नतीजा यह है कि ये राज्य मानवीय विकास के पैमानों पर अफ्रीका के सबसे पिछड़े देशों (सोमालिया आदि) के बराबर खड़े हैं। यदि ब्राह्मण-द्विज इतने ही प्रतिभाशाली हैं, योग्य एवं सक्षम हैं। तब तो होना यह चाहिए था कि वे राज्य सबसे अधिक आर्थिक एवं मानवीय उन्नति करते, जहां इनका वर्चस्व है।
अब स्थिति उलटी दिख रही हैं, जहां वर्ण-जाति आधारित ब्राह्मणों-द्विजों का वर्चस्व टूटा है, जितना अधिक टूटा है, वहां आर्थिक प्रगति और मानवीय उन्नति उतनी ही अधिक हुई। इसके उलट जहां द्विज-सवर्णों का वर्चस्व अधिक से अधिक है, वहां आर्थिक-उन्नति और मानवीय प्रगति उतना ही बाधित है। यह बात पंजाब-हरियाणा जैसे राज्यों के संदर्भ भी काफी हद लागू होती है। इन राज्यों में ब्राह्मणों-द्विजों की जगह पिछड़ी कहे जाने वाले वर्ग सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक जीवन में निर्णायक स्थिति में हैं। इन तुलनाओं से कोई भी देश और व्यक्ति समझ सकता है कि जहां वंचित तबके आरक्षण और अन्य कारणों से जीवन के बुनियादी क्षेत्रों में निर्णायक स्थिति में हैं, वहां आर्थिक उन्नति-प्रगति और मानवीय विकास गुणात्मक तौर पर बेहतर हुआ है। ये तथ्य यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि पिछड़े वर्गों में ब्राह्मण-द्विजों से प्रतिभा, सक्षमता, योग्यता में कम कौन कहे, ज्यादा बेहतर हैं।

आरक्षण प्रतिनिधित्व बढ़ाने का उपकरण, न कि गरीबी दूर करने का
संगोष्ठी में एक स्वर से यह सहमति थी कि आरक्षण किसी भी वर्ग या समुदाय की गरीबी को सीधे तौर दूर नहीं कर सकता है और न ही इससे कोई दूसरा समुदाय गरीब होता है। यह हर स्तर पर प्रतिनिधित्व का एक उपकरण है। वह प्रतिनिधित्व जिससे वर्ण-जाति व्यवस्था ने पिछड़े वर्गों को वंचित कर दिया था। हां, यह जरूर है कि यह आरक्षण नीतियों, कार्यक्रमों और क्रियान्वयन को वह दिशा और व्यवहारिक रूप जरूर देता है, जिसके बहुसंख्यक पिछड़े वर्गों को हर स्तर पर राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल किया जा सके। इसमें गरीबी दूर करने के कार्यक्रम भी शामिल हैं। उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक उन्नति के साथ उनके आर्थिक उन्नति का एजेंडा और कार्यक्रम बनाया जा सके। आरक्षण पिछड़े वर्गों के लोगों की सर्वांगीण उन्नति-प्रगति में एक अहम भूमिका निभाई है, इन तथ्यों से साबित हो चुका है।
संगोष्ठी में भागीदार लोगों ने आरक्षण को भारत को एक लोकतांत्रिक राष्ट्र एवं समाज के निर्माण की अपरिहार्य एवं अनिवार्य जरूरत के रूप में प्रस्तुत किया। वक्ताओं ने डॉ. आंबेडकर के उस कथन की याद दिलाई कि भारत अभी एक राष्ट्र एवं समाज नहीं बना है, बल्कि बनने की प्रक्रिया में हैं। भारत के एक राष्ट्र एवं समाज बनने की अनिवार्य शर्त यह है कि भारतीयों के बीच समता एवं स्वतंत्रता पर आधारित बंधुता (अपनेपन) का रिश्ता कायम हो और वर्ण-जाति के प्रति प्रतिबद्धता के चलते पैदा हुआ शत्रुता का भाव खत्म हो। यह तभी हो सकता है जब वर्ण-जाति आधारित असमानता, वर्चस्व एवं अधीनता की स्थिति टूटे। आरक्षण इसी असमानता एवं वर्चस्व एवं अधीनता आधारित रिश्ते को तोड़ने का एक उपाय है। यह कोई समग्र उपाय नहीं। समग्र उपाय तो यह है कि असमानता और वर्चस्व एवं अधीनता के सभी भौतिक और वैचारिक आधारों को तोड़ दिया जाए। एक वाक्य में कहें तो पिछड़े वर्गों का आरक्षण वर्ण-जाति आधारित अत्यंत कठोर आरक्षण की वैदिक व्यवस्था को तोड़ने के एक उपाय है, जिस कठोर वैदिक आरक्षण की व्यवस्था का उल्लंघन करने पर शंबूक का गला काट दिया गया और एकलव्य को अपना अंगूठा कटवाना पड़ा। संगोष्ठी में आरक्षण के अन्य विविध पहलुओं पर विस्तार से चर्चा और संवाद हुआ।
दलित प्रतिनिधि क्यों नहीं उठाते दलितों के लिए आवाज?
चूंकि यह दलित इंटेलेक्चुएल फोरम की पहली संगोष्ठी थी तो स्वाभाविक ही था कि आरक्षण से इतर दलितों के जीवन की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्थितियों पर संगोष्ठी में शामिल लोगों की ओर से सवाल उठते ही। कुछ तीखे सवाल उठे भी। चूंकि दलितों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में भी आरक्षण प्राप्त है, इसलिए यह सवाल पुरजोर तरीके से उठा कि क्या दलित के लिए आरक्षित सीटों से चुने गए सांसद-विधायक दलितों के हितों के लिए आवाज उठाते हैं, संघर्ष करते हैं। इस सवाल का जवाब ‘ना’ ही था। इसके ऐतिहासिक कारणों और इस स्थिति को कैसे बदला जाए, इस पर भी व्यापक चर्चा हुई। राज्यसभा और विधान परिषदों में कोई आरक्षण नहीं है, जबकि नीति निर्माण में इनकी भी निर्णायक भूमिका है। यह तथ्य भी रेखांकित किया गया।
दलितों का बहुत बड़ा हिस्सा विशेषकर हिंदी पट्टी में आज भी गरीबी में जी रहा है। आरक्षण सीधे तौर इस समस्या का कोई समाधान नहीं है। इन बहुसंख्यक दलितों की आर्थिक जीवन-स्थिति कैसे बदले यह सवाल सबसे पुरजोर तरीके से उठा। इस संदर्भ में यह भी सवाल उठा कि दलित चिंतकों-विचारकों, विशेषकर डॉ. आंबेडकर ने इस संदर्भ में क्या कहा था, क्या उपाय प्रस्तुत किए थे? क्या दिशा दिखाई थी? इन सवालों का जवाब खोजा जाना चाहिए, इस पर विचार-विमर्श होना चाहिए, इसके लिए एजेंडा तैयार किया जाना चाहिए। इस पर सबकी सहमति थी। दलितों के बीच विद्यमान व्यापक भूमिहीनता और उससे पैदा हुई बहु आयामी वंचना और इसके समाधान के उपायों पर गर्मागरम बहस हुई। दलित फोरम के संयोजकों ने कहा कि ऐसे और अन्य सवालों पर यह फोरम जल्द ही विचार-विमर्श का आयोजन करेगा।
संविधान ही हर नागरिक का प्रस्थान बिंदु
वक्ताओं और संवाद में शामिल अन्य लोगों ने साफ कहा कि संविधान ही भारत के हर नागरिक का प्रस्थान बिंदु होना चाहिए। संविधान सभा के सभी 284 सदस्यों में हर वर्ग, समुदाय, क्षेत्र, भाषा-भाषी समूह के लोगों के प्रतिनिधि उपस्थित थे। सबने करीब 3 वर्षों तक विचार-विमर्श के बाद इस संविधान को एक स्वर से स्वीकार किया था। किसी ने किसी पर संविधान और उसके प्रावधानों को थोपा नहीं था।
संगोष्ठी में यह निष्कर्ष सामने आया कि संविधान की प्रस्तावना और सभी अनुच्छेद एक ऐसे भारत की संकल्पना प्रस्तुत करते हैं, जिसमें सबको हर स्तर पर न्याय मिले, हर तरह के अन्याय का खात्मा हो। जीवन की सभी क्षेत्रों में वर्चस्व और अधीनता की स्थिति खत्म हो और स्वतंत्रता कायम हो। यह समता और स्वतंत्रता वह आधार पैदा करेंगी, जिससे भारतीयों के बीच की हर तरह की शत्रुता या वैमनस्य का खात्मा होगा और बंधुता कायम होगी। बंधुता के बिना भारत न तो एक राष्ट्र बन सकता न सच्चे अर्थों में समाज बन सकता है। ऐतिहासिक रूप से दलित वैचारिकी और उसके शीर्ष नायक डॉ. आंबेडकर भारत को एक राष्ट्र और सच्चे अर्थों में समाज के रूप में देखना चाहते थे। ऐसा भारत जहां भारतीयों की मुख्य पहचान भारतीय की हो, न कि जाति, धर्म और नस्ल की। दलित इंटेलेक्चुएल फोरम भी संविधान और उसकी प्रस्तावना को अपना प्रस्थान बिंदु मानते हुए डॉ. आंबेडकर के राष्ट्र एवं समाज निर्माण के स्वप्न को साकार रूप देना चाहता है। फोरम का कहना था कि पहली संगोष्ठी इस दिशा में उठाया गया, पहला छोटा-सा कदम है।
(संपादन : नवल/अनिल)
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