सत्ता हो या विपक्ष, पिछड़े-दलित समाज के अधिकांश नेता बिहार के तीसरे पूर्व उपमुख्यमंत्री रहे शहीद जगदेव प्रसाद का नाम लेकर अपनी राजनीति चमका रहे हैं। उनके नारे लगाकर समाज को यह दिखाने में लगे हैं कि जगदेव बाबू के असली अनुयायी वे ही हैं। लेकिन विचारणीय सवाल यह है कि यदि वे ही असली वारिस हैं तो जिन मांगों को लेकर 5 सितंबर, 1974 को अरवल जिले के कुर्था प्रखंड कार्यालय के समक्ष शोषित समाज दल के बैनर तले किए जा रहे सत्याग्रह के क्रम में पुलिस की गोली से जगदेव बाबू की हत्या की गई, वे मांगें आज तक अधूरी क्यों हैं? और उनकी हत्या की जांच मुकम्मिल तौर पर आज तक क्यों नहीं हो सकी?
जगदेव बाबू हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषा अच्छी तरह जानते और समझते थे। स्नातकोत्तर में उनका विषय अर्थशास्त्र था। वे पटना से प्रकाशित पत्रिका ‘जनता’ और ‘शोषित साप्ताहिक’ के संपादक थे। उसके पहले वे हैदराबाद से प्रकाशित पत्रिका ‘सिटीजन’ के भी संपादक थे। वे 5 बार चुनाव लड़े और तीन बार मंत्री बने। उन्हें शोषितों का मसीहा कहा जाता है। उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से बिहार का मुख्यमंत्री बनने का ऑफर भी मिला था, लेकिन उन्होंने अपने सम्मान, स्वाभिमान और सिद्धांत के खातिर ठुकरा दिया था। उससे पहले वे समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया के साथ सोशलिस्ट पार्टी के बैनर तले राजनीति कर रहे थे। लेकिन वहां भी उन्हें धोखा मिला और उन्होंने 25 अगस्त, 1967 को पटना में एक अलग शोषित दल की स्थापना कर दी।
शहीद जगदेव प्रसाद की राजनीतिक विरासत शोषित समाज दल और सामाजिक विरासत अर्जक संघ है। राजनीति के लिए समाजवाद और सामाजिक सांस्कृतिक क्षेत्र में मानववाद स्थापित करना उनका मुख्य उद्देश्य था।
आजादी के बाद बिहार में पिछड़े, दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों में राजनीतिक और सामाजिक चेतना और स्वाभिमान जगाने के लिए जगदेव बाबू को जाना जाता है। इसीलिए उन्हें बिहार का लेनिन कहा जाता है। बिहार में पहली बार पिछड़े वर्ग की सरकार बनाने का श्रेय भी जगदेव प्रसाद को जाता है। शोषित दल की सरकार 2 फरवरी, 1968 को बनी थी जिसमें पहले सतीश प्रसाद सिंह और तीन दिन बाद बी.पी. मंडल मुख्यमंत्री बने थे। बी.पी. मंडल की सरकार में उन्हें बिजली, नदी घाटी सिंचाई विभाग उनके जिम्मे था।
बाद के दिनों में जब रामस्वरूप वर्मा और जगदेव प्रसाद ने मिलकर शोषित समाज दल का गठन किया तब वर्मा जी राष्ट्रीय अध्यक्ष और जगदेव बाबू संस्थापक महामंत्री बनाए गए थे।

असल में 1960-70 के दशक में महंगाई, भ्रष्टाचार, बेकारी, अत्याचार, शोषण, जाति-पाति, छुआछूत चरम पर था। लोग त्राहिमाम कर रहे थे। उससे विक्षुब्ध होकर बिहार में कांग्रेस के खिलाफ दो तरह का आंदोलन चल रहा था। पहला आंदोलन ‘संपूर्ण क्रांति’ था, जिसका नेतृत्व जयप्रकाश नारायण कर रहे थे। दूसरा आंदोलन शोषित समाज दल का ‘शोषित क्रांति’ था, जिसका नेतृत्व रामस्वरूप वर्मा और जगदेव प्रसाद कर रहे थे। शोषित आंदोलन के तहत बिहार के सभी प्रखंडों पर अपनी मांगों को लेकर शोषित समाज दल द्वारा शांतिपूर्ण धरना और प्रदर्शन चलाया जा रहा था। इसी क्रम में 5 सितंबर 1974 को तब के गया जिला अंतर्गत कुर्था प्रखंड (अब अरवल जिला) कार्यालय के समक्ष जगदेव बाबू के नेतृत्व में प्रदर्शन किया जा रहा था। प्रदर्शन स्थल पर हजारों किसानों, मजदूरों और शिल्पकारों के साथ जगदेव प्रसाद स्वयं मौजूद थे। तब पुलिस के द्वारा गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई। उस समय कुर्था के एक दलित छात्र लक्ष्मण चौधरी भी उनके साथ ही शहीद हो गए थे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार पुलिस ने जिस निर्ममता से जगदेव बाबू की हत्या की थी, वह दिल को दहला देने वाली क्रूरतम कार्रवाई थी। उनका मानना था कि राजनीतिक षड्यंत्र के तहत उनकी हत्या की गई थी। हालांकि कई लोगों ने जगदेव बाबू को आगाह किया था कि आप इस प्रदर्शन में नहीं जाएं क्योंकि आपके खिलाफ षड्यंत्र किया जा रहा है। लेकिन वे नहीं माने और अंततः पुलिस की गोली का शिकार हो गए। तब के जीवित लोग आज भी उनकी हत्या की गवाही देने को तैयार हैं, लेकिन आज तक मुकम्मिल जांच नहीं हुई।
खैर, जिन मांगों को लेकर जगदेव प्रसाद कुर्था के प्रखंड कार्यालय के समक्ष प्रदर्शन कर रहे थे, वे मांगें थीं–
- डॉ. आंबेडकर का सारा साहित्य प्रदेश के दलित छात्रावासों, सरकारी पुस्तकालयों व सरकारी अनुदान प्राप्त पुस्तकालयों में अनिवार्य रूप से रखा जाए।
- प्रदेश के सभी सिंचित योग्य भूमि के लिए 5 साल में सिंचाई की व्यवस्था की जाए तथा साथ में पुनपुन परियोजना लागू किया जाए।
- 3-6 वर्ष से लेकर 14 वर्ष तक के सभी लड़के और लड़कियों के लिए 8वीं तक की मुफ्त शिक्षा अनिवार्य की जाए और सारी शिक्षा मानववादी, राष्ट्रीयकृत व समान शिक्षा लागू हो।
- प्रदेश के भूमिहीनों या एक एकड़ से कम भूमि वाले दलित, पिछड़े व अन्य प्रजाजनों को 5 साल के अंदर सरकारी वन भूमियों में ‘इंसानी बस्ती’ बसाकर, रोजगार की गारंटी देकर स्वावलंबी व स्वाभिमानी बनाया जाए।
- सामाजिक व शैक्षणिक आधार पर पिछड़े वर्ग को जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण दिया जाए तथा अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति का बैकलॉग सुरक्षित रखकर साल के साल भरा जाए।
- भ्रष्टाचार, बेकारी, महंगाई को दूर करो तथा मतदाताओं को फोटोवाला परिचय पत्र देकर मतदान अनिवार्य करो।
- खेत मजदूरी अधिनियम व बटाईदारी बिल लागू करो।
आज जगदेव प्रसाद के आंदोलन, जिसके लिए उनकी हत्या कर दी गई, उसके 54 वर्ष बीत गए, पर आज तक उनकी वे सात मांगें अधूरी हैं। रही बात उनके अनुयायी होने या वारिस होने की तो जिनकी कलाई में लाल-पीला धागा (कलावा) बांधा रहता है, जिनके ललाट पर टीका और माथे पर टीक रहता है, जिनके घरों में ब्राह्मण द्वारा शादी व श्राद्ध आदि संस्कार कराए जाते हैं, ब्राह्मणवादी त्यौहार मनाए जाते हैं, वे सही मायने में जगदेववादी नहीं हो सकते। जगदेव बाबू कहते थे कि शोषित और शोषक के बीच लड़ाई है। लड़ाई उनसे सटकर नहीं हटकर होगी तभी हम जीत सकते हैं और हमारी उन्नति होगी।
(संपादन : नवल/अनिल)
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