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विषमताओं पर विजय पाने वाली इस दलित-बहुजन दंपत्ति से मिलिए

रौदास गौतम अपनी आंखों से नहीं देख पाते, लेकिन यह उनके काम में बाधक नहीं है। पूछने पर बताते हैं कि मान्यवर कांशीराम की प्रेरणा से वे 1984 से मिशन के काम में जुटे और तब से लेकर आज तक दलित-बहुजनों के बीच चेतना फैलाने के लिए समर्पित हैं। पढ़ें, यह संक्षिप्त साक्षात्कार

इनका नाम शिवानी गौतम और रौदास गौतम है। दोनों पति-पत्नी हैं और सन् 1984 से आंबेडकरवादी चेतना के प्रचार के कार्य में संलग्न हैं। विभिन्न प्रकाशनों द्वारा प्रकाशित दलित-बहुजन पुस्तकों को लेकर ये दोनों अब तक देश के अलग-अलग हिस्सों में जा चुके हैं। इसके अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली तक के आयोजनों में यह दंपत्ति अनायास ही नजर आ जाती है। इनसे पुस्तकें खरीदने के लिए इनके मोबाइल नंबर 9675131029 पर संपर्क किया जा सकता है।

रौदास गौतम अपनी आंखों से नहीं देख पाते, लेकिन यह उनके काम में बाधक नहीं है। पूछने पर बताते हैं कि मान्यवर कांशीराम की प्रेरणा से वे 1984 से मिशन के काम में जुटे और तब से लेकर आज तक दलित-बहुजनों के बीच चेतना फैलाने के लिए समर्पित हैं। उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के अतरौली तहसील के औरेनी दलपतपुर गांव के निवासी रौदास गौतम की सहयात्री शिवानी गौतम बताती हैं कि उन्होंने केवल हाईस्कूल तक पढ़ाई की है। लेकिन रौदास गौतम की सहयात्री के रूप में उन्होंने डॉ. आंबेडकर और अन्य दलित-बहुजन नायकों की किताबों को पढ़ा है और यह जाना है कि दलित-बहुजनों की मुक्ति का मार्ग क्या है।

घूम-घूमकर किताबें बेचने से क्या आपका भरण-पोषण हो जाता है, पूछने पर शिवानी मुस्कुराते हुए कहती हैं कि फिलहाल तो यही हमारे लिए काफी है। गांव में दस-बारह बीघा जमीन है, जिसे बटाई पर दे रखा है। इससे हर साल खाने को अनाज मिल जाता है। इससे भी हमारे काम में हमें सुविधा मिलती है।

रौदास और शिवानी गौतम की चार संतानें हैं। चारों बेटियां। शिवानी बताती हैं कि आंबेडकरवादी मिशन की किताबें बेचते हुए उन्होंने अपनी बेटियों को पढ़ाया। सबसे बड़ी बेटी की शादी इंटर पास करने के बाद जरूर कर दी, लेकिन बाकी बेटियों को खूब पढ़ने का अवसर दिया है। दूसरी बेटी की शादी ग्रेजुएशन करने के बाद की और तीसरी बेटी ग्रेजुएशन कर चुकी है। वहीं चौथी बेटी नवोदय विद्यालय की छात्रा है। अगले साल वह बोर्ड की परीक्षा देगी।

रौदास गौतम और शिवानी गौतम

जब आपने यह काम प्रारंभ किया था तब आपके गांव-समाज के लोगों की क्या प्रतिक्रिया थी? सवाल सुनते ही रौदास गौतम कह उठते हैं– “गांव में तो सब अब भी वैसे ही हैं। नशे में डूबे हुए। उन्हें लगता था कि यह हम क्या कर रहे हैं। उन्होंने हमारे काम को कोई महत्व नहीं दिया।”

शिवानी भी कहती हैं कि “अब हमें लोग देश के अलग-अलग हिस्सों में बुलाते हैं और आंबेडकर आदि के बारे में जनजागरण करने को कहते हैं। हम लोगों को एक बार राजस्थान के सुदूर इलाके में बुलाया गया था। वहां हम दोनों गए थे और लोगों के बीच बाबासाहेब के विचारों को रखा था। हमें दुख इस बात का है कि अभी तक हमारे गांव के लोग जागरूक नहीं हो पाए हैं। लेकिन हम निराश नहीं हैं।”

बहरहाल, रौदास और शिवानी गौतम इस बात के प्रमाण हैं कि आंबेडकरवादी आंदोलनों ने समाज को गहराई से प्रभावित किया है। इतना कि तमाम विषमताओं के बावजूद यह दंपत्ति पूरे आत्मविश्वास के साथ समाज के सामने समता, स्वतंत्रता और बंधुता के विचारों को प्रस्तुत करती है।

(संपादन : अनिल)


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लेखक के बारे में

नवल किशोर कुमार

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस के संपादक (हिन्दी) हैं।

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