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दलित : हिंदू नहीं, अल्पसंख्यक समुदाय

डॉ. आंबेडकर ने इस पुस्तक में पूना पैक्ट के प्रति असंतोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि पूना पैक्ट में जो भरोसा दिया गया था, वह पूरा नहीं हुआ। पूना पैक्ट का उद्देश्य ऐसी विधि बनाना था जिससे अनुसूचित जाति के लोग अपने पसंद के प्रतिनिधि विधानमंडल में भेज सकें। पढ़ें, डॉ. जयप्रकाश कर्दम द्वारा डॉ. आंबेडकर की किताब ‘राज्य और अल्पसंख्यक’ का पुनर्पाठ

बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की किताब ‘राज्य और अल्पसंख्यक’ (स्टेट्स एंड मायनरिटीज) आकार की दृष्टि से बहुत बड़ी नहीं, छोटी-सी किताब है, लेकिन आज के समय में अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनकी कुछ किताबों पर काफ़ी चर्चा हुई है और होती रहती है। उनकी तुलना में इस किताब की अपेक्षित रूप से बहुत कम चर्चा हुई।

दरअसल, यह किताब एक ज्ञापन था। स्वाधीनता से पहले जब यह तय हो रहा था कि भारत स्वाधीन हो जाएगा तो उसके बाद उसका अपना एक संविधान होना चाहिए, संविधान सभा का गठन होना चाहिए, और संविधान में शामिल करने के लिए लोग अपने अपने तरफ से प्रस्ताव, मांगें दे रहे थे, उसी दौरान डॉ. आंबेडकर ने अखिल भारतीय अनुसूचित जाति संघ की ओर से एक ज्ञापन संविधान सभा को दिया था। यह ज्ञापन अनुसूचित जाति संघ की ओर से था इसलिए उसमें उन्होंने अनुसूचित जाति के हितों के संरक्षण को ही मुख्य रखा। उसमें कुछ और मुद्दे भी थे और उसका प्रारूप कुछ इस प्रकार का था जैसे संविधान का प्रारूप होता है। उसमें उन्होंने जिन महत्वपूर्ण चीज़ों को रखा था, उनमें से एक था मौलिक अधिकार, जो केवल अनुसूचित जातियों के लिए ही नहीं, बल्कि राष्ट्र के समस्त नागरिकों के लिए मौलिक अधिकारों की बात की, क्योंकि उस समय अधिकारों से सबसे ज़्यादा वंचित अनुसूचित जाति के लोग थे। इसलिए जरूरी था कि मौलिक अधिकारों के रूप में उनके अधिकारों का संरक्षण हो। और जब संविधान बना तो वही मौलिक अधिकारों को रखा गया, जो सभी के लिए है। 

संविधान के शुरुआत में ही जहां राज्य या संघ की, नागरिकता की परिभाषा है, उसके बाद सीधे मौलिक अधिकार ही दिए गए हैं। इस प्रकार हमें समझ आता है कि मौलिक अधिकार कितना महत्वपूर्ण है, जिसकी पृष्ठभूमि डॉ. आंबेडकर की इसी किताब – राज्य और अल्पसंख्यक – से आई है।

अनुसूचित जातियां सही मायने में अल्पसंख्यक

उन्होंने मौलिक अधिकारों के साथ-साथ अल्पसंख्यकों को परिभाषित करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि जो अल्पसंख्यक समुदाय हमारे यहां माने गए हैं– मुस्लिम समुदाय, सिख समुदाय और ईसाई समुदाय – वो तो है ही। लेकिन डॉ. आंबेडकर ने अपनी इस किताब के जरिए यह बताने की कोशिश की और सिद्ध करने का प्रयास किया कि अनुसूचित जातियां सही मायने में अल्पसंख्यक वर्ग है, आबादी के आधार पर अल्पसंख्यक होने के अलावा इसकी स्थिति धार्मिक अल्पसंख्यक से भी गंभीर है क्योंकि वे सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक रूप से अलग-थलग हैं। वे अनेक तरह के दमन और शोषण के शिकार हैं, इसलिए अल्पसंख्यक वर्ग को जो संरक्षण मिलता है, अनुसूचित जातियों को उनसे भी ज़्यादा संरक्षण दिए जाने की जरूरत है।

आर्थिक सवालों पर बाबासाहेब की राय

डॉ. आंबेडकर का अगला मुद्दा उद्योगों को लेकर है। इस बारे में उनका स्पष्ट मत है कि उद्योगों का सरकारीकरण या राष्ट्रीयकरण होना चाहिए। जो बड़े उद्योग हैं, वह सरकार लगाए और सभी उद्योगों पर भी सरकार का नियंत्रण हो, सरकार द्वारा वे पोषित हों। इस तरह डॉ. आंबेडकर उद्योगों में निजीकरण किए जाने की दूर-दूर तक कोई संभावना भी नहीं छोड़ते। क्योंकि यदि उद्योगों का निजीकरण होगा तो जातिगत या सांप्रदायिक सोच या वर्चस्व की भावना है वह पनपने लगेगी, और समाज में आर्थिक दूरियां बढ़ेंगी।

डॉ. आंबेडकर ने कृषि को भी एक उद्योग का नाम दिया। हमारी अर्थव्यवस्था कृषि आधारित है और कृषि उद्योग को किस तरह से विकसित किया जाय उसपर उन्होंने विचार इस किताब में किया है। भूमि सुधार के क्षेत्र में भी हम डॉ. आंबेडकर के प्रयासों और उनकी दृष्टि को देख सकते है। उन्होंने कहा कि हमारे पास जितने खेत है, उन्हें सिर्फ बड़े-बड़े जमींदारों के नियंत्रण में न रखा जाए, बल्कि उस देश के नागरिकों को बिना धर्म-जाति-वर्ण के भेदभाव के पट्टे पर दी जाए। और जो खेती हो वह सहकारिता आधारित कृषि से हो, जिसमें सभी मिल-जुलकर खेती करें, फसल उत्पादन करें, और लागत के बाद जितना लाभ आ रहा है, वह रुपए सभी में बराबर-बराबर बंट जाए। इसके पीछे उनका उद्देश्य यह है कि जो राज्य की सामाजवादी संकल्पना उनके दिमाग में थी, उसको उन्होंने यहां उतारने की कोशिश की। यदि निजी उद्योग होंगे तो वह साम्राज्यवाद को बढ़ावा देंगे। और यदि खेतों में सहकारी खेती हो, उस पर सरकारी नियंत्रण हो तो उससे साम्राज्यवाद की संभावनाएं खत्म होगी और जो राज्य समाजवाद की संभावनाएं हैं, वह मजबूत होंगी। इस तरह न कोई जमींदार होगा और न कोई भूमिहीन मजदूर। सब एक तरह से बराबर होंगे। सभी अपने खेतों के मालिक होंगे, सभी श्रमिक होंगे, सभी खेतों में हल चलाएंगे, खेती करेंगे, सभी कटे हुए फसलों में हिस्सा लेंगे, जिससे समाज में सभी का जीवन सुखमय होगा और जो आर्थिक दूरियां हैं, वे मिटेंगी तथा समाज में वर्चस्ववाद ख़त्म हो जाएगा।

सवाल पूना पैक्ट का

डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा को सुझाव दिया कि जब संविधान बने, तो उस संविधान में ऐसा प्रावधान हो और उससे भी पहले कहा था कि अनुसूचित जातियों और सारे अल्पसंख्यक वर्गों को उनके संख्या के अनुपात में उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। और वह प्रतिनिधित्व उन्हें राजनीति, शिक्षा, कार्यपालिका हर जगह मिलना चाहिए। राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बारे में वे कहते हैं कि यदि सामान्य मत प्रणाली से अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधि आएंगे, और चूंकि वे दूसरे समुदायों के वोट से चुनकर आएंगे, तो वे सही मायने में अनुसूचित जातियों का प्रतिनिधित्व नहीं करेंगे। इसके पहले से ही अल्पसंख्यकों को जैसे पृथक निर्वाचन मंडल मिला हुआ था, जो मुस्लिमों, सिखों, ईसाइयों को मिला हुआ था, डॉ. आंबेडकर ने कहा कि हम भी अल्पसंख्यक समुदाय हैं, इसलिए हमें भी उसी तरह का पृथक निर्वाचन मंडल मिलना चाहिए, ताकि हम भी अपने वोटों से अपने प्रतिनिधि भेज सकें। अर्थात पूना फैक्ट रद्द किया जाए। जब ऐसा होगा तब सही मायने में वे हमारा प्रतिनिधित्व कर पाएंगे और हमारे हितों का संरक्षण हो सकेगा। लेकिन यदि वे दूसरे समुदायों के वोट से चुनकर जाते हैं तो हमारे प्रतिनिधि होने के बावजूद वे उनके नियंत्रण में होने के कारण हमारे हितों का संरक्षण नहीं कर पाएंगे। इस प्रकार यह प्रावधान संविधान में लाने के लिए उन्होंने इस किताब में कहा।

डॉ. आंबेडकर प्रतिष्ठान, भारत सरकार द्वारा प्रकाशित ‘बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर : संपूर्ण वांग्मय’ में संकलित ‘राज्य और अल्पसंख्यक’ का प्रारंभिक पृष्ठ व मुख्य आवरण

डॉ. आंबेडकर ने अपनी इस किताब में स्वराज्य पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि मैं स्वराज्य के कल्पना से सहमत नहीं हो पा रहा हूं, क्योंकि स्वराज्य भी हमें एक तरह से साम्राज्यवाद की ओर लेकर जाएगा। हम ब्रिटिशों के अंदर शाषित नहीं रहेंगे, लेकिन यहां के लोग जनता का शोषण करेंगे। उन्होंने कहा– “भारतीय लोकतंत्र में बहुमत एक बहुसंख्यक समुदाय का बहुमत है। वह सभी समुदायों के वोटों का बहुमत नहीं बन रहा है। जैसे यहां हिंदू बहुसंख्यक हैं तो यहां हिंदुओं का ही बहुमत रहता है। इसलिए दूसरे समुदाय के लोगों के सत्ता में आने की संभावनाएं बहुत कम रहती हैं। और यदि वह आता है तो उसी बहुमत के साथ जुड़कर आता है, अपना अलग बहुमत नहीं बना पाता है। इसलिए राजनीति में ये सारी चीज़ें टूटनी चाहिए, क्योंकि जब यह टूटेगा तभी एक सफल लोकतंत्र की स्थापना हो पाएगी। यदि अनुसूचित वर्ग को इस तरह के संरक्षण मिल जाते हैं, आगे बढ़ने के मौके मिल जाते हैं, राजनीति में भी उनको अपना सही तरीके का प्रतिनिधित्व मिल जाता है, तो यह अल्पसंख्यक समुदाय भी आपस में मिलकर बहुमत बना सकते हैं। लेकिन जबतक ऐसा नहीं होता, और वे उन्हीं बहुसंख्यक समुदाय के वोट से चुनकर आते हैं तब तक वे अपना बहुमत बनाने की स्थिति में नहीं होंगे और उसी बहुमत से वे संचालित रहेंगे।”

इसे यदि आज के संदर्भ से जोड़कर देखते हैं तो हम पाते हैं कि आज जो दलित राजनीति की अवधारणा आई है, वहीं से आयी है। इसमें दलितों ने यह बताया कि सत्ता में हम होने चाहिए, कानून निर्माण में, शक्ति नियंत्रण में हम होने चाहिए। केवल इसी स्थिति में उनके हितों का संरक्षण संभव है।

इसलिए धर्मनिरपेक्ष संविधान आवश्यक

धर्मनिरपेक्षता पर भी डॉ. आंबेडकर ने इस पुस्तक में चर्चा की है। उन्होंने कहा है कि राज्य का स्वरूप धर्मनिरपेक्ष हो, जहां किसी धर्म को विशेष महत्व ना मिले। सभी धर्म को अपनी गतिविधियां चलाने का, समान अवसर का लाभ मिले। किसी एक धर्म का बहुत ज़्यादा और किसी का बहुत कम महत्व नहीं होना चाहिए। किसी धर्म को राजधर्म के रूप में मान्यता नहीं देनी चाहिए। डॉ. आंबेडकर हिंदू राष्ट्र जैसी किसी भी संकल्पना को स्वीकार नहीं करते थे। वे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की संकल्पना को पूरा करने के पक्ष में थे।

डॉ. आंबेडकर कहते थे कि जो उत्पीड़न या शोषण होता है, उसके विरुद्ध संविधान में भी गारंटी होनी चाहिए, प्रावधान होने चाहिए। देश को स्वतंत्रता मिलने के समय में अनुसूचित जातियों पर अत्याचार के मामले लगातार सामने आ रहे थे। उनमें से कुछ का वर्णन तो डॉ. आंबेडकर ने इस पुस्तक में किया है। उन्होंने संविधान में बेगारी और दासता के विरुद्ध संरक्षण की गारंटी की मांग भी की।

इस प्रकार जब संविधान बन जाता है तो हम देखते हैं कि इन अधिकांश मामलों में संविधान द्वारा संरक्षण दिया गया है। इस प्रकार यह किताब संविधान में एक आधारभूत कार्य करती है। एक और संदर्भ में मैं चर्चा करना चाहूंगा कि अगस्त, 2019 में जब जम्मू-कश्मीर में लागू अनुच्छेद 370 चर्चा में था तब डॉ. आंबेडकर की बातों को उद्धृत करके कहा गया कि “राज्य का कोई भी नागरिक किसी भी राज्य में जाकर रह सकता है।” यह निश्चित रूप से इसी पुस्तक से लिया गया था। लेकिन साथ में उन्होंने यह भी कहा था कि “कोई राज्य किसी नागरिक को अपने राज्य का नागरिक बनाने से मना भी कर सकता है। और दो कारणों से वह मना कर सकता है। पहला, यदि कोई नागरिक उस राज्य के सांप्रदायिक संतुलन को बिगाड़ना चाहता हो। या व्यक्ति का आचरण अपराधी प्रवृत्ति का हो।”

साफ है कि कश्मीर के मुद्दे में डॉ. आंबेडकर की बातों का गलत ढंग से उपयोग किया जा रहा था। असल में जम्मू में अधिकांश लोग हिंदू हैं और कश्मीर में मुसलमान हैं। और 370 के जरिए कश्मीर के मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी में अन्य राज्यों के हिंदुओं को भरा जाने लगा, ताकि वहां का सांप्रदायिक संतुलन बिगड़ जाए। मतलब यह कि आज वहां यदि मुस्लिम बहुसंख्यक हैं तो उन्हें अल्पसंख्यक में लाया जाए, और हिंदुओं को बहुसंख्यक बनाया जाए। इस तरह से यदि हम किसी राज्य में जाकर करते हैं तो वह राज्य की सत्ता के लिए और राज्य के सामाजिक संतुलन के लिए ठीक नहीं है। इसलिए राज्य का नागरिक कहीं भी जाकर रहे, लेकिन इन सब चीज़ों पर ध्यान रखना चाहिए।

गांवों की त्रासदी

एक बहुत महत्वपूर्ण बिंदू जो बाबासाहेब ने इस पुस्तक के ज़रिए मांग की और बहुत सारे उदाहरण देकर मांग की कि अनुसूचित जातियों के लोग जहां-जहां गांवों में रहते हैं, उनकी बस्तियां अलग होती हैं। उनकी बस्तियां बहुत गंदी हैं। और उनसे गंदे, घृणित काम करवाए जाते हैं, जिससे उनकी अलग तरह की पहचान बनती है। हमारे वर्ण-व्यवस्था में उनके लिए जो काम निर्धारित किए गए हैं, वही काम उनसे गांवों में कराए जाते है। यानी यदि कोई चर्मकार है तो यह चमड़े का काम करेगा गांव में। कोई भंगी है तो उससे हाथ से मैला सफाई करवाया जाता है। धोबी से कपड़े धुलवाए जाएंगे, कुम्हार से बर्तन बनवाए जाएंगे, लोहार से हल, फावड़े बनवाए जाएंगे। इस प्रकार वर्ण-व्यवस्था में जो उनके निर्धारित कर्म हैं, वही उन्हें करने पड़ते हैं। उससे हटकर कोई दूसरा काम यदि कोई अनुसूचित जाति का व्यक्ति करे तो वह चल नहीं पाता। जैसे कोई चमार जाति का व्यक्ति चाय की दुकान खोल दी तो वह दुकान चल नहीं पाती। जहां सभी जातियों के ग्राहक आ सकें, ऐसा कोई दुकान यदि कोई अनुसूचित जाति का आदमी खोल दे तो वह नहीं चल सकती। इसलिए डॉ. आंबेडकर का यह विचार था कि दलितों की गांव, बस्तियां अलग बसाई जानी चाहिए। उससे यह होगा कि अनुसूचित जातियों का गांव यदि अलग बस जाएगा तो उस गांव में जो भी काम, चाहे वह खेती का काम, श्रम का काम, सभी काम वे खुद करेंगे, जिससे उनके बीच कोई हीनता या उच्चता का बोध नहीं रहेगा, और जिस कारण वह हीनताबोध और उत्पीड़न का शिकार हो रहे हैं, वे उनसे मुक्त हो जाएंगे। वे अलग होकर स्वतंत्रता के साथ अपना जीवन जी सकेंगे, क्योंकि गांव की व्यवस्था में उनको किसी प्रकार की स्वतंत्रता का अनुभव नहीं हो पाता है। वे हमेशा दबे रहते हैं और आज भी गांवों में ऐसी ही स्थिति है।

आए दिन हम ऐसी खबरों से रू-ब-रू होते हैं कि कोई दलित दूल्हा घोड़ी पर चढ़कर बारात नहीं निकाल पाता है, दलित लोगों को मंदिरों में जाने पर मार-पीट दिया जाता है, उनसे जबरदस्ती खेतों में काम करवाया जाता है, उनके अधिक मजदूरी मांगने पर उनपर कोड़े बरसाए जाते, कइयों की तो हत्या कर दी जाती है, घर जला दिया जाता है, उनकी स्त्रियों के साथ बलात्कार किया जाता है, उनके बाहर जाने के रास्ते बंद कर दिए जाते हैं। यह सब आज भी सामान्य है। बहुत सारे दलित समाज के लोगों को आज भी सवर्णों के गांव में चप्पल, जूते पहनकर नहीं, हाथ में लेकर जाना होता है। कपड़े घुटने के नीचे नहीं पहनते, उन्हें ऊपर उठाकर सवर्णों के गांवों, रास्तों से जाते हैं। कई जगह तो नए कपड़े पहनने की भी इजाज़त नहीं है। जब शादी या किसी समारोह में जाना होता है तो गांव के बाहर जाकर नए कपड़े पहनते हैं।

जब आज 21वीं सदी में भी यह सब चीज़ें हों तो उस समय कितनी ज़्यादा होगी, यह आंकलन करना मुश्किल नहीं है। ऐसे में दलित कैसे स्वतंत्रता का अनुभव करेंगे? कैसे इस सब से निकलेंगे? कैसे समाज में समानता आएगी? इसलिए डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि दलितों की अलग बस्तियां बसनी चाहिए। कई बार लोग कहते भी हैं कि जिस प्रकार मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान का अलग गठन किया, क्योंकि वे हिंदुओं के साथ मिलकर नहीं रह सकते थे। इसी तरह दलितों के गांव अलग बसाना कोई अतिवादी मांग नहीं है। एक वास्तविक चीज़ है जो समझे जाने की जरूरत है। जिन भारतीय गांवों पर हम गर्व करते हैं कि गांव कितना अद्भुत है, सुंदर है, हरियाली है और गांवों की लोक-संस्कृति कितनी प्यारी है। बहुत सारे लोगों ने भारतीय गांवों पर साहित्य लिखा, कविता लिखी। जिस भारतीय गांव को केंद्र मानकर डॉ. रामकुमार वर्मा ने ‘हे ग्राम देवता नमस्कार’ जैसी कविता लिखी, उसी गांव में दलितों की इस तरह की स्थिति है, तो वे कैसे उस पर गर्व करें? कैसे उस गांव को अपना गांव कहे? कैसे उस उत्पीड़न से बचें? इस प्रकार यह एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा था।

पुनश्च

डॉ. आंबेडकर ने इस पुस्तक में पूना पैक्ट के प्रति असंतोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि पूना पैक्ट में जो भरोसा दिया गया था, वह पूरा नहीं हुआ। पूना पैक्ट का उद्देश्य ऐसी विधि बनाना था जिससे अनुसूचित जाति के लोग अपने पसंद के प्रतिनिधि विधानमंडल में भेज सकें। यह उद्देश्य असफल हो गया क्योंकि वह माना नहीं गया। पूना पैक्ट ने अनुसूचित जातियों के मताधिकार को पूरी तरह से ख़त्म कर दिया है क्योंकि जो उम्मीदवार प्राथमिक निर्वाचनों में अनुसूचित जातियों के इच्छा के सही सूचक थे, वे असफल हुए और सवर्ण के वोट सेवी अंतिम निर्वाचन में जीत गए, जिसे हम पृथक निर्वाचन मंडल कहते है। सब चीज़ें जब असफल हो गईं तब डॉ. आंबेडकर को कहना पड़ा कि पूना समझौता शरारतपूर्ण है, इसे श्री गांधी के अनशन के दबाव में आकर तथा इस शर्त पर स्वीकार किया गया था कि सवर्ण हिंदू अनुसूचित जातियों के पृथक निर्वाचन में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। लेकिन बाद में गांधी और सारे सवर्ण हिंदू अपने वादे से मुकर गए और अगले निर्वाचन में ही सभी सवर्णों ने हस्तक्षेप किया। इससे हुआ यह कि अनुसूचित जातियों के अपने उचित प्रतिनिधि जीतकर नहीं आ पाए और जो जीतकर गए वे सिर्फ सवर्ण हिंदुओं के वोट से और उन्हीं के ही प्रतिनिधि बनकर विधानसभा में चले गए।

बहरहाल, इस छोटी-सी किताब में डॉ. आंबेडकर ने कई मुद्दों को शामिल किया, जो सिर्फ अनुसूचित जातियों को समर्थवान बनाने के लिए ही नहीं बल्कि एक समतामूलक समाज बनाने के लिए, एक उन्नतशील राष्ट्र बनाने के लिए आवश्यक थे और हैं। इस सबका मतलब यह है कि उनके दिमाग में संविधान का एक खाका था कि संविधान में किस प्रकार के प्रावधान होने चाहिए। ये सब बातें उन्होंने संविधान सभा में जाने से पहले, संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष बनने से पहले ही इस किताब में लिख दी थीं। और हम देखते हैं कि इनमें से अधिकांश मुद्दों को संविधान में ज्यों की त्यों लागू करवाने में वह सफल रहे। यह सब तब ही संभव हो पाता है जब किसी व्यक्ति के भीतर अच्छा विचार होता है, वह ईमानदार होता है और अपने विचारों के प्रति दृढ़ रहता है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

जयप्रकाश कर्दम

केंद्रीय हिंदी प्रशिक्षण संस्थान, नई दिल्ली के निदेशक पद से सेवानिवृत्त डॉ. जयप्रकाश कर्दम (जन्म 5 जुलाई, 1958) हिंदी साहित्य में दलित विमर्श के प्रमुख प्रतिनिधि हैं। इन्होंने बतौर कथाकार, कवि और समालोचक के रूप में दलित विमर्श और बौद्ध धम्म के विशिष्ट अध्ययन विश्लेषण के साथ डॉ. आंबेडकर के जीवन और दर्शन तथा सामाजिक परिवर्तन की दिशा में उनके मूलभूत योगदानों को रेखांकित किया है। इनकी प्रकाशित कृतियों में ‘समाज, संस्कृति और दलित’, ‘बौद्ध धर्म के आधार स्तंभ’, ‘जाति एक विमर्श’, ‘कविता में आदमी’ (प्रतिनिधि कविताएं), ‘चमार’ (जी.डब्ल्यू. ब्रिग्स की किताब का अनुवाद) आदि शामिल हैं। इसके अलावा इनके संपादन में ‘दलित साहित्य (वार्षिकी)’ (सन् 1999 से प्रकाशित) दलित साहित्य के दस्तावेज के रूप में चर्चित रही है।

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