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आजाद मुल्क में हाशिए की मुक्ति संग्राम का उद्घोष करतीं कविताएं

कवि राजेश पाल उम्मीद के रचनाकार हैं। उनका आक्रोश विध्वंसक नहीं है, सृंजनशील है। वे हर तरह की असमानता, अन्याय और भेदभाव का ख़ात्मा चाहते हैं। उनकी समस्त काव्य रचनाएं इसी स्वप्न को लेकर सृजित होती हैं। बता रहे हैं प्रो. नामदेव

समकालीन हाशिए की कविता ज़्यादा मुखर और तर्कशील है। इसमें कोरी कल्पना और कोरी भावुकता के लिए कोई स्थान नहीं है। साथ ही, यह भी प्रमाणित है कि दलित, स्त्री, आदिवासी जैसे वंचित समूहों की रचनाएं सत्ता, वर्ण, जाति, धर्म के वर्चस्व पर सवाल उठाती रही हैं तथा अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। बीसवीं सदी की यह लेखकीय संस्कृति आज इक्कीसवीं सदी में परिपक्व हो कर सामाजिक परिवर्तन की दिशा तय कर रही है। राजेश पाल का काव्य संग्रह ‘आजादी में आजादी’ इसी परिवर्तन का परिचायक है।

उनकी कविताएं कल्पना और भावुकता की अपेक्षा तर्क और यथार्थ की आग्रही हैं। कवि के रूप में राजेश पाल अपनी कविताओं में संविधान प्रदत्त नागरिक अधिकारों की वकालत करते हुए सत्ता और संस्कृति की जन उपेक्षावादी प्रवृत्तियों और जड़ताओं की भी ख़बर लेते हैं।

मसलन, ‘संस्कृति’ शीर्षक कविता में वह ठीक ही कहते हैं कि “यह सामंती संस्कृति है / जिसमें कुछ लोग सभ्य होने का दिखावा करते हैं।” वास्तव में आज संस्कृति के नाम पर अपसंस्कृति का बोलबाला है, जिसमें आडंबर, झूठ-फ़रेब, शोषण इत्यादि का वर्चस्व दिखाई देता है। इस सांस्कृतिक हिंसा का दुष्परिणाम आम जन भुगत रहे हैं। ये देश के वे नागरिक हैं जो देश और समाज के तरक़्क़ी, सम्मान और सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनकी दृष्टि में सामाजिक सौहार्द सर्वोपरि है, क्योंकि इसी दशा में राष्ट्र का विकास और भविष्य सुरक्षित है।

लेकिन एक वास्तविक स्थिति यह भी है कि इन प्रबुद्ध नागरिकों को अर्बन नक्सल की संज्ञा दे दी जाती है। हद तो यह है कि उनकी आवाज़ को दबाने के लिए उन पर देशद्रोह के झूठे आरोप लगा कर जेल में डाल दिया जाता है। सत्ता की यह निरंकुशता लोकतंत्र के लिए घातक है। सत्ता पाने और कब्जा जमाए रखने की इस घटिया राजनीति से किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का आहत होना स्वाभाविक है। कवि राजेश पाल भी इन स्थितियों के कारण आहत हैं। ‘अच्छे दिनों के बुरे दिन’ शीर्षक कविता में वे बेबाक़ ख़ुलासा करते हैं– “इस क्रूर वक़्त में / विचार की ताक़त से डरकर / विचारशील लोगों की पहचान कर ली है / उन्हें घोषित कर दिया अर्बन नक्सल / बंद कर दिया काल कोठरी में / ताकि सोचने वाले / डर कर, बंद कर दें सोचना।”

राजेश पाल की कविताएं समकालीनता की सतही पड़ताल नहीं करती हैं बल्कि उनकी तह में जाकर अद्यतन हलचलों को दर्ज करती हैं। इस तरह से ये कविताएं समय से मुख़ातिब होते हुए समय के गंभीर सवालों से टकराती हैं। वैसे भी समय और रचना के इस द्वंद्व से जो कविता प्रवाहित होती है वह देशकाल का दर्पण बन जाती है। इस संदर्भ में उनकी ‘देश शोर में डूबा हुआ है’ शीर्षक कविता को देखा जा सकता है– “कब से मंदिर-मस्जिद सुलग रहे हैं / सो-सो कर हिंदू-मुस्लिम जग रहे हैं / गाय-गोबर को संस्कृति से जोड़ रहे हैं / अंध भक्ति में अनपढ़ों को मोड़ रहे हैं / देश भक्ति और राष्ट्रवाद का छद्म सम्मोहन है / धर्म और संस्कृति के नाम पर भावनाओं का दोहन है / असल समस्याओं का पिटारा दबा हुआ है / देश शोर में डूबा हुआ है।”

राजेश पाल के काव्य संग्रह ‘आजादी में आजादी’ का मुख पृष्ठ

यहां कवि राजेश पाल की पैनी दृष्टि ने देश में पनप रही गोबर संस्कृति के शोर और अराजकता को उजागर करते हुए कट्टरपंथी गतिविधियों के प्रति सचेत करने का प्रयास किया है।

पारंपरिक दृष्टिकोण से कविता को मनोरंजन का एक माध्यम माना जाता रहा है, परंतु अस्मितामूलक व सामाजिक न्याय की अवधारणा से लैस कविताएं सामाजिक परिवर्तन तथा सामाजिक चेतना का सशक्त आधार होती हैं। राजेश पाल की कविताएं सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक न्याय की इसी प्रतिबद्धता को लेकर निर्मित होती हैं, जिनमें रुदन और लाचारी की जगह प्रतिरोध है, समाज परिवर्तन की भावना है, बंधुत्व और प्रेम की अभिव्यक्ति है, करुणा और कल्याण की चेतना है। और ये सभी तत्व आज की ज़रूरत हैं।

ज़ाहिर सी बात है कि राजेश पाल की कविताओं का सौंदर्य भाषा-शिल्प के आग्रह से मुक्त है, जिसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने समाज के ज्वलंत मुद्दों से मुठभेड़ है। सामाजिक-मानसिक संघर्ष की यही स्थिति इनकी कविताओं का सौंदर्यबोध है। लेखकीय ईमानदारी की इसी कड़ी सच्चाई की राह पर एक निडर और भययुक्त लेखक या कवि ही चल सकता है। उसकी काव्य रचना प्रक्रिया निष्पक्ष होगी। लिखने के बाद भी वह किसी के सामने कुछ पाने के लिए चिरौरी नहीं करेगा। इस परिप्रेक्ष्य में कहा जा सकता है कि कवि राजेश पाल की काव्य रचना निष्पक्ष और बेख़ौफ़ है। तभी उनकी दृष्टि वहां भी जाती है, जहां आमतौर पर लोग बात करने से कतराते हैं।

बतौर उदाहरण यह कि भारतीय समाज की तरह भारतीय शिक्षा संस्थानों में भी जातिवाद का बोलबाला कायम है। भारत की राजधानी दिल्ली के दिल्ली विश्वविद्यालय में घटित थप्पड़ कांड इस परिदृश्य का ज्वलंत उदाहरण है। अगस्त, 2021 में दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतर्गत लक्ष्मीबाई कॉलेज में प्रो. नीलम को उनकी एक सवर्ण जाति की वरिष्ठ सहकर्मी शिक्षिका ने विभागीय मिटिंग में इस लिए थप्पड़ जड़ दिया था। वजह यह थी कि प्रो. नीलम ने मिनट्स पर हस्ताक्षर करने से पहले मिनट्स पढ़ने के लिए समय मांगा था। उक्त शिक्षिका अपने उच्च जातीय अभिमान के नशे में चूर थी, उसकी दृष्टि में अब दलितों का पढ़ कर हस्ताक्षर की बात करना, दलितों का अपना औक़ात भूलना है। थप्पड़ मार कर वह दलितों को उनकी औक़ात दिखाती है। यह थप्पड़ कांड तत्कालीन सोशल मिडिया एवं अख़बारों में छा गया था, जिसने शिक्षा संस्थानों में मौजूद ब्राह्मणवादी चेहरे को बेनक़ाब किया था।

संवेदनशील कवि राजेश पाल इस थप्पड़ कांड पर भी बहुत संजीदगी से कलम चलाते हैं। वे ‘थप्पड़’ शीर्षक कविता में लिखते हैं– “सुनो! अभिमानी / डॉ. नीलम तो एक प्रतीक भर है / तुम्हारे थप्पड़ की गूंज वेद और पुराणों से लौट-लौट कर आ रही है / और जनतंत्र के प्रतीक गोलघर से टकरा रही है।” कवि इस थप्पड़ कांड पर आधारित कविता के जरिए हज़ारों साल से मौजूद ब्राह्मणवादी जातिवादी मानसिकता को कटघरे में खड़ा कर वर्तमान लोकतंत्र को भी अपनी जद में लेता है। लेकिन अब यहां न रुदन है न दया याचना का भाव। अब यहां इन जातिवादी विषधरों के प्रति प्रतिरोध और नकार है। मानवता के शत्रुओं को चुनौती देना इस कविता का केंद्रीय भाव है। यथा– “सुनो ! सामंती / ध्यान से सुनो !! / तमाम सत्ता और कलम की चुप्पी के बावजूद / तुम्हें प्रतिरोध की आहटें सुनाई दे रही हैं / तुम्हारी खामोशी में कांप रहा है तुम्हारा डर / याद रखो– वक़्त बदल रहा है / इस थप्पड़ की अनुगूंज एक दिन लौटकर आएगी तुम्हारे पास।”

कवि राजेश पाल की सामाजिक सरोकार की यह दृष्टि निरंतर विकसित होती चलती है। अर्थपूर्ण कविता की इसी सहयात्रा में वे ‘अपना देवत्व अपने पास रखो’ जैसी कविता लिखते हैं जो उत्तराखंड के कैम्पटी क्षेत्र में दलित युवक को कुर्सी पर बैठकर भोजन करने पर उसके साथ हुए दुर्व्यवहार पर केंद्रित है। इस कविता की कुछ पंक्तियां देखें जो जातीय हिंसा की कलई खोल कर रख देती हैं– “तुम कहते हो यह देवभूमि है / ऊंचे पहाड़ों पर देवता रमते हैं / मैं कहता हूं / अपना देवत्व अपने पास रखो / यहां मनुष्यता बचाकर रखो / तुम्हें सहन नहीं होता / तुम्हारी सोच में / छोटी जात का आदमी / तुम्हारे सामने कुर्सी पर बैठकर / शादी तक में खाना खा सके / तुम धोखे से मारते हो लात / कि आदमी कुर्सी सहित जा गिरे खाई में / छिटक कर जूठा भोजन लग जाए तुम्हें / तो तुम पीटते हो आदमी को मरने तक।”

स्पष्ट है कि कवि का आग्रह यहां समता और न्याय से है जो कि धार्मिक जड़ताओं की वजह से ओझल है। वस्तुतः उपरोक्त कविताओं के माध्यम से कवि यही कहना चाहता है कि स्वंतत्रता, समता और बंधुत्व के साथ मनुष्य को मनुष्य की तरह जीने दिया जाए। कवि राजेश पाल की काव्य रचना में लोक मंगल भावना ही सर्वत्र व्याप्त है। आज के घटाटोप में कवि की यह सकारात्मक दृष्टि बेहतर दुनिया के प्रति आश्वस्त करती है। और क्यों न हो भला? क्योंकि हर संघर्ष और आंदोलन के पीछे सकारात्मक परिणाम की उम्मीद रहती है। कवि राजेश पाल उम्मीद के रचनाकार हैं। उनका आक्रोश विध्वंसक नहीं है, सृंजनशील है। वे हर तरह की असमानता, अन्याय और भेदभाव का ख़ात्मा चाहते हैं। उनकी समस्त काव्य रचनाएं इसी स्वप्न को लेकर सृजित होती हैं।

‘वैचारिक दरिद्र’ शीर्षक कविता में कवि बताते हैं कि अति भौतिकवादी, आत्मकेंद्रित और विरोधाभासों के दौर में व्यक्ति अपनी जड़ों से कटने लगा है। शहरी परिवेश में यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। हर कोई दुनिया के चकाचौंध में डूबा हुआ है। क्या बच्चे क्या बड़े सभी के सभी अपनी वास्तविकता से अनजान होने लगे हैं। यह नितांत दुखद स्थिति है। कवि लिखता है कि– “जो अपना इतिहास नहीं जानता है / वह अपनी पीढ़ियों को नहीं जानता है / पीढ़ियों पर अन्याय को नहीं जानता है / अन्याय और शोषण के कारण नहीं पहचानता है / वह वैचारिक दरिद्र होता है।” यहां कवि की दृष्टि में मानसिक गुलामी से बचने के लिए अपना इतिहास जानना जरूरी है। भारतीय समाज में जातीय श्रेष्ठता एक गंभीर बीमारी का रूप धारण कर चुकी है। लगभग ऊंची जातियों के अधिकतर लोग इस मनोविकार से ग्रस्त हैं। दबंगों का यह मनोविकार तब और घृणित हो जाता है जब वे हिंसा करने और अस्मत लूटने पर उतारू हो जाते हैं। ‘तुम्हारे सवाल छद्म हैं’ कविता में वे कह उठते हैं– “अपने श्रेष्ठता दंभ के लिए / तुमने जला दी हमारी ख़ुशियां / परखच्चे उड़ाए हमारी अस्मिता के / अपनी खुशी के लिए जलाए हमारे घर / बहन बेटियों की इज़्ज़त लूट कर / जला दिया ज़िंदा उन्हें।”

इसी तरह जिस समाज में दलितों-पिछड़ों का न सम्मान हो, न सुरक्षा हो, न विकास के अवसर हों, वहां उन बहुजनों में 1947 की आज़ादी झूठी लगनी स्वाभाविक है। वो भी तब जब भारतीय संविधान ने प्रत्येक तरह के शोषण और असमानता को निषेध करते हुए सभी को समानता और सुरक्षा की गारंटी दे रखी है। लेकिन उच्च जाति की भावना से ग्रसित सवर्ण समाज अपना एकाधिकार और वर्चस्व बनाए रखने के लिए वंचितों पर आए दिन शिकंजे कसता रहा है। ऐसे में पचहत्तर साल की आज़ादी का जश्न भी उनके लिए ऐसा ही एक छलावा जान पड़ता है। ‘गर्म राख को ठंडा होने में वक्त लगता है’ शीर्षक कविता में कवि राजेश पाल लिखते हैं– “ये आग जो हज़ारों साल से जल रही है / हमारे भीतर / अब तुम भी अपनी आत्म तृप्ति के लिए चाहते हो / पिचहतर साल की झूठी आज़ादी में / चंद छींटों से / बुझ जाए ये आग यकायक / ताकि तुम्हारी पीढ़ियों तक इसकी आंच तक न पहुंचे।”

वंचित तबकों को बहुत संघर्ष के बाद शिक्षा का अधिकार मिल सका था। इसके पीछे उनका सदियों का संघर्ष था। लेकिन वर्तमान हालात ये है कि उनको बहुत चतुराई से आधुनिक शिक्षा से वंचित करके धर्मपरायण बनाया जा रहा है। ज्ञान मीमांसा की परंपरा के नाम पर उन्हें संकीर्णताओं की ओर धकेला जा रहा है। जबकि वास्तविकता यह है कि आधुनिक शिक्षा की वजह से ही वंचितों की स्थिति थोड़ी बहुत सुधरी है। कवि राजेश पाल देश में इस नकारात्मक बदलाव पर बहुत सूक्ष्म नज़र रखते हैं। यह नकारात्मक बदलाव यथार्थ कविता का रूप ले लेता है। यथा ‘वे चाहते हैं’ शीर्षक कविता में वे लिखते हैं– “वे चाहते हैं / दुनिया उनकी नज़र से देखे / उतनी ही रोशनी हो दुनिया में / जितना चाहते हैं वे दिखाना / विज्ञान के आधुनिक सब सुख उन्हें मिले / पढ़ें केवल उनके वंशज आधुनिक सिद्धांत / वे चाहते हैं / और लोग भी अब पढ़ें / और सिर्फ़ पढ़ें वैदिक धर्म-दर्शन और आध्यात्म / ज्ञान और तर्क की कुंडली / वेद पुराणों का करती रहे महिमामंडन। इस तरह सुदृढ़ रहे उनका रामराज।”

वस्तुतः राजेश पाल की अधिकांश रचनाएं कोई न कोई सच को उजागर करती ही हैं। इनकी कविताई की खासियत यह है कि इनमें जटिल से जटिल सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, बौद्धिक द्वंद्वों की अभिव्यक्ति सहजता से हो जाती है, जिसके कारण इन कविताओं की प्रभावोत्पादकता बढ़ जाती है। यही वह स्तर है जहां राजेश पाल प्रबुद्ध कवि के रूप में स्थापित हो जाते हैं। एक तरह से कहा जाए तो राजेश पाल का काव्य संग्रह ‘आज़ादी में आज़ादी’ हाशिए की गाथा तो है ही, यह उनकी मुक्ति संग्राम का उद्घोष भी है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

नामदेव

वरिष्ठ दलित साहित्यकार, समालोचक व आंबेडकरवादी विचारक नामदेव, किरोड़ीमल काॅलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली में हिंदी विभाग में प्रोफेसर हैं। उनकी प्रकाशित कृतियों में ‘भारतीय मुसलमान : हिन्दी उपन्यासों के आईने में’, ‘दलित चेतना और स्त्री विमर्श’, ‘जोतिबा फुले : सामाजिक क्रांति के अग्रदूत’, ‘पर्यावरण प्रदूषण : समाज, साहित्य और संस्कृति’, ‘आलोचना की तीसरी परंपरा और डाॅ. जयप्रकाश कर्दम’, ‘स्त्री स्वर : अतीत और वर्तमान’, ‘छप्पर की दुनिया : मूल्यांकन और अवदान’, ‘साझेदारी के पक्ष में हिंदी कथा साहित्य’ और ‘न समझे जाने का दर्द’ (कविता संग्रह) शामिल हैं।

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