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‘दलित मुस्लिम रहनुमा’: पसमांदा संघर्ष और योगदान की अनकही दास्तान

डॉ. अयूब राईन की यह पुस्तक पसमांदा इतिहास, सामाजिक प्रतिनिधित्व और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की व्यापक समझ के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण कोशिश है। इसकी अहमियत केवल भूले हुए नामों को याद करने में नहीं, बल्कि यह पूछने में भी है कि इतिहास किसकी नज़र से लिखा गया, किसके संघर्षों को केंद्रीय स्थान मिला और किनके अनुभव किनारे कर दिए गए। पढ़ें, अब्दुल्लाह मंसूर की यह समीक्षा

भारतीय मुस्लिम समाज का इतिहास अब तक चुनिंदा शासकों, धार्मिक विद्वानों, राजनीतिक नेताओं और प्रभावशाली तबकों के योगदान से समझा जाता रहा है। जिन मेहनतकश और वंचित समुदायों ने अपने श्रम, सामाजिक काम और राजनीतिक भागीदारी से समाज और देश को बनाया, यानी बुनकर, किसान, दस्तकार और छोटे कारोबारी, उनकी कुर्बानियां और संघर्ष इतिहास के हाशिए पर रहे। डॉ. अयूब राईन की पुस्तक ‘दलित मुस्लिम रहनुमा’ इसी कमी को दूर करने की एक अहम कोशिश है। यह पसमांदा समाज के उन व्यक्तित्वों को सामने लाती है, जिन्हें कभी पहचान नहीं मिली।

इस पुस्तक का महत्व सिर्फ़ भूले-बिसरे नामों में नहीं, उस नज़रिए में भी है जो मेहनतकश समुदायों के अनुभवों को जगह देता है। मुस्लिम समाज की सांस्कृतिक पहचान भी चंद खास तबकों की भाषा, रहन-सहन और परंपराओं से गढ़ी गई। इस प्रक्रिया में बक्खो के गीत, पमरिया का नाच, कलंदर के करतब, जुलाहों के करघे, मीरशिकारों के किस्से, राईनों की खेती, मंसूरियों का रुई धुनना और इदरीसियों की सिलाई पीछे छूट गए, जबकि यही पसमांदा समाज की श्रम और जीवन-परंपराओं के प्रतीक हैं।

डॉ. अयूब राईन अपनी किताब में बताते हैं कि किस तरह पसमांदा रहनुमाओं ने आज़ादी की लड़ाई में भी भारी कीमत चुकाई, पर उनका योगदान स्थानीय इतिहास में दबकर रह गया। सन् 1857 में शेख भिखारी ने टिकैत उमराव सिंह के साथ चुट्टूपालू घाटी में अंग्रेजों का मुकाबला किया और 8 जनवरी, 1858 को फांसी चढ़े। पटना के पीर अली ख़ान, जो कागज़ी समुदाय से थे और किताब की दुकान चलाते थे, जो क्रांतिकारियों का अड्डा थी, को 21 साथियों के साथ फांसी दी गई।

चंपारण सत्याग्रह में बत्तख मियां अंसारी का प्रसंग खास है। 1917 में एक अंग्रेज अधिकारी ने बावर्ची बत्तख मियां को लालच और धमकी देकर गांधीजी के दूध में ज़हर मिलाने को कहा। बत्तख मियां ने देशभक्ति और साहस दिखाते हुए दूध का गिलास जानबूझकर गिरा दिया और गांधीजी की जान बच गई। बदले में अंग्रेजों ने उन्हें नौकरी से निकाला, संपत्ति जब्त की और कड़ी प्रताड़ना दी। इस घटना का खुलासा डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 1950 की एक जनसभा में किया। इतने साहसिक काम के बावजूद आज बत्तख मियां को कितने लोग जानते हैं? इसी दौर में पीर मोहम्मद मुनीस ने पत्रकारिता के ज़रिए चंपारण के किसानों के सवाल सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनाया।

डॉ. राईन उल्लेख करते हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन के दूसरे चरणों में भी पसमांदा रहनुमा सक्रिय रहे। ‘तूती-ए-बिहार’ क़ारी मोहम्मद उस्मान अंसारी ने चिकित्सा का काम छोड़कर आंदोलन में हिस्सा लिया और जेल गए। मंसूरी समुदाय के मौलाना अतीकुर्रहमान आरवी ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया और पाकिस्तान प्रस्ताव तथा दो-राष्ट्र सिद्धांत का विरोध किया। बाबा ख़लील दास शाह स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ सूफ़ी, कवि और लेखक थे। मौलवी सगीर अहमद अंसारी ने मुल्तान जेल की सज़ा झेली और गांधी, नेहरू और डॉ. राजेंद्र प्रसाद से उनके संबंध रहे। मौलाना अब्दुल सामी नदवी ने 1942 में पद से इस्तीफा देकर जेल की राह चुनी और बाद में जिला कांग्रेस के महासचिव बने।

आज़ादी की लड़ाई केवल बड़े शहरों और चर्चित नेताओं तक सीमित नहीं थी। 1942 में छोटे कस्बों में भी आम लोगों ने अंग्रेजी राज का विरोध किया और इसकी कीमत चुकाई। भदई कबाड़ी राईन और उनके भाई ने 25 अगस्त, 1942 को पुपरी रेलवे स्टेशन पर प्रदर्शन में हिस्सा लिया। बिलट दर्ज़ी अंग्रेजों की गोली से शहीद हुए। उनके नाम पर शहीद चौक और प्रतिमा का उल्लेख मिलता है, लेकिन उनके परिवार को न सरकारी सहायता मिली, न पेंशन।

इन सेनानियों के साथ पुस्तक पसमांदा समाज के उस राजनीतिक संघर्ष को भी सामने लाती है, जो मेहनतकश समुदायों को अपनी स्वतंत्र नुमाइंदगी और सामाजिक बराबरी दिलाने के लिए था। उस समय मुस्लिम लीग पूरे मुस्लिम समाज का प्रतिनिधित्व करने का दावा कर रही थी, लेकिन पसमांदा रहनुमाओं का सवाल था कि जब समाज के भीतर आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक असमानताएं मौजूद हैं, तो एक संगठन सबकी आवाज़ कैसे हो सकता है। आसिम बिहारी ने 1921 में जमीअतुल मोमेनीन और अंजुमने अंसार बनाकर संगठन की शुरुआत की। सन् 1928 में ऑल इंडिया मोमिन कॉन्फ्रेंस बनी, और उन्होंने जमीअतुल कुरैश, जमीअतुर्राईन और जमीअतुल मन्सूरीन जैसे संगठनों को भी बराबरी और राजनीतिक अधिकारों के साझा सवाल पर जोड़ने की कोशिश की।

समीक्षित पुस्तक ‘दलित मुस्लिम रहनुमा’ का मुख पृष्ठ

अब्दुल क़य्यूम अंसारी ने 1937 में जमीअतुल मोमिन से जुड़कर मुस्लिम लीग और जिन्ना के दो-राष्ट्र सिद्धांत का विरोध किया। 1946 के बिहार विधानसभा चुनाव में, जब लीग की सांप्रदायिकता चरम पर थी और वयस्क मताधिकार नहीं था, तब भी गरीब मज़दूरों ने उसकी विचारधारा को हरा दिया और मोमिन कॉन्फ्रेंस ने छह सीटें जीतीं। इसके बाद संगठन के प्रतिनिधि विधानसभा और मंत्रिमंडल तक पहुंचे। इससे पहले, 27 से 29 दिसंबर, 1939 के गोरखपुर अधिवेशन में मुहम्मद नूर ने वयस्क मताधिकार की मांग उठाई थी। संपत्ति, कर और शिक्षा की शर्तों के कारण पसमांदा समाज की बड़ी आबादी वोट से बाहर थी, इसलिए यह मांग केवल चुनावी सुधार का नहीं, आम लोगों की राजनीतिक भागीदारी का सवाल थी।

इसी दौर में नियामतुल्लाह अंसारी ने जुलाहों पर लगे रज़ालत टैक्स को चुनौती दी। डॉ. राईन बताते हैं कि मुस्लिम समाज में जुलाहा जाति को राज़ील यानी नीच/घटिया माना जाता था और जाति की वजह से उस पर यह टैक्स लगाया जाता था। नियामतुल्लाह अंसारी ने इस भेदभावपूर्ण टैक्स को अदालत में चुनौती दी और 22 मई, 1939 को अदालत ने इसे समाप्त कर दिया।

इसी तरह अब्दुल अहद मुहम्मद नूर अंसारी समुदाय से थे और बिहार विधान परिषद तथा विधानसभा के तीन-तीन बार सदस्य रहे। मंत्री रहते हुए भी वह सामाजिक और राजनीतिक सवालों पर काम करते रहे। उनके और अब्दुल क़य्यूम अंसारी के प्रयासों से 500 बैकवर्ड मुस्लिम वेलफेयर समितियों, 1,200 बुनकर सहयोग समितियों, कॉलेज फीस माफी और मेडिकल कॉलेजों में मोमिनों के लिए अलग सीट कोटे जैसी पहलों का उल्लेख मिलता है। इससे पता चलता है कि पसमांदा राजनीति केवल प्रतिनिधित्व तक नहीं, शिक्षा, रोज़गार और आर्थिक अवसरों तक विस्तृत थी।

आज़ादी मिली, पर पसमांदा समाज की लड़ाई ख़त्म नहीं हुई। पसमांदा रहनुमाओं ने बुनकरों, राईनों, मंसूरियों और दूसरे मेहनतकश समुदायों की बदहाली का सवाल उठाया। उनका कहना था कि कमज़ोर आर्थिक हालत, सीमित शिक्षा और कम प्रतिनिधित्व को स्वीकार किए बिना इन समुदायों का उत्थान संभव नहीं। मौलवी समी नदवी (अंसारी) 1952 में जाले (दरभंगा, बिहार) से विधायक, 1968 में विधान परिषद सदस्य और 1980 में दरभंगा शहर से फिर विधायक बने, और 1980 से 1983 तक बिहार सरकार के मंत्री रहे। उन्होंने अपनी बिरादरी की आर्थिक स्थिति सुधारने और उसे संगठित करने का प्रयास किया। शेरशाहाबादी समुदाय के पहले विधायक मो. शकुर (1942 – 2022) बरारी और प्राणपुर (कटिहार, बिहार) से तीन बार जीते। शिक्षक से राजनीति में आए शकुर ने सीमांचल के पिछड़े तबकों में शिक्षा और जागरूकता बढ़ाई और ‘ऑल बिहार शेरशाहाबादी एसोसिएशन’ के संस्थापक सदस्य रहे। इसी एसोसिएशन से जुड़े पूर्व विधायक मुबारक हुसैन ने समुदाय को अत्यंत पिछड़ा वर्ग आरक्षण दिलाने के प्रयास किए और कटिहार मेडिकल कॉलेज के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाई।

शिक्षा और राजनीति के मोर्चे पर ऐसे और भी नाम हैं। कुल्हैया समुदाय के मो. तसलीमुद्दीन ने अल शम्स कॉलेज और मदरसा इस्लामिया जैसे संस्थान खड़े किए। मौलाना असरारूल हक कासमी (1942 – 2018), दो बार सांसद, ने ‘ऑल इंडिया तालीमी व मिल्ली फाउंडेशन’ बनाकर दर्जनों मदरसे और स्कूल शुरू किए और किशनगंज (बिहार) में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की शाखा उनके प्रयासों से स्थापित हुई। खालिद अनवर अंसारी (1938 – 2024), मोमिन कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष, राज्यमंत्री रहे और बुनकरों के लिए काम किया। मो. अजीमुद्दीन शेखरा (1935 – 2013) पलासी (बिहार) से पांच बार विधायक और तीन बार मंत्री रहे। मो. शरीफ कुरैशी (1946 – 2023) जमीअतुल कुरैश (बिहार) के अध्यक्ष और पंद्रह सूत्री कार्यक्रम समिति के कैबिनेट-स्तरीय अध्यक्ष रहे।

गुलाम सरवर राईन (1926 – 2004) ने साप्ताहिक ‘संगम’ से उर्दू पत्रकारिता को नई दिशा दी और शोषितों-मजदूरों के सवाल उठाने पर छह बार जेल गए। शिक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने बिहार राज्य मदरसा बोर्ड की स्थापना में भूमिका निभाई, उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा दिलाने के लिए संघर्ष किया और बिहार राज्य अंजुमन तरक्की उर्दू तथा ऑल इंडिया एडिटर्स कॉन्फ्रेंस की स्थापना से जुड़े रहे। फिर 1990 के दशक में वे बिहार विधानसभा के अध्यक्ष भी बने जब लालू प्रसाद मुख्यमंत्री बने थे। पमरिया समुदाय के मो. कासिम आज़ाद (1943 – 2000) ने तीन स्कूल खोले और एक विद्यालय का सरकारीकरण कराया। पूर्व विधान परिषद सदस्य मो. इसराईल राईन ने शैक्षणिक और सामाजिक संस्थाएं बनाईं और यतीमों की सेवा की।

प्रो. शमसुल हक (1943 – 2023) ने ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग की स्थापना में योगदान दिया और ‘बैकवर्ड मुस्लिम्स इन बिहार’ (1976) लिखी, जो पिछड़ी जातियों के दस्तावेजीकरण के लिए अहम है। राईनों को ईबीसी में शामिल कराने के लिए उन्होंने 1994 में पटना में भूख हड़ताल का नेतृत्व किया, और पंचायतों, निःशुल्क कोचिंग तथा मीरशिकार जैसी जातियों के सम्मेलनों से जागरूकता फैलाई। इसी आंदोलन में अयूब जफर (1934 – 1996) ने मजदूरों पर अत्याचार से प्रभावित होकर शिक्षक की नौकरी छोड़ी, कई स्कूल-मदरसे बनाए और 1994 की भूख हड़ताल में हिस्सा लिया।

दरभंगा के मीरशिकार टोला के डॉ. मो. इदरीश (1925 – 1984), चिकित्सक और कम्युनिस्ट नेता, ने सामाजिक विरोध के बावजूद महिला शिक्षा के लिए काम किया और 1984 के पहले राज्य-स्तरीय सम्मेलन में मीरशिकार समाज के पहले अध्यक्ष चुने गए। महजबीं सरवर कुरैशी ने तीन तलाक जैसी कुप्रथाओं और महिलाओं पर अत्याचार का विरोध किया और सामाजिक बहिष्कार के बावजूद दलित-वंचित मुसलमानों के हक के लिए डटी रहीं। प्रो. अबुल कलाम कासमी कुरैशी को 2009 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला और संपादन के ज़रिए उन्होंने उर्दू आलोचना और पत्रकारिता को समृद्ध किया।

इन जीवनियों से साफ़ है कि पसमांदा रहनुमाओं का काम केवल चुनावी राजनीति या बिरादरी के संगठन तक सीमित नहीं था। आज़ादी की लड़ाई से लेकर आज़ादी के बाद शिक्षा, सामाजिक सुधार, आरक्षण, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, पत्रकारिता, साहित्य और महिला अधिकारों तक उनका योगदान फैला था। डॉ. अयूब राईन के अनुसार, ‘दलित मुस्लिम रहनुमा’ में 22 जातीय समुदायों से जुड़े 77 दिवंगत रहनुमाओं की जीवनियां शामिल हैं। इनमें अंसारी समुदाय के 29, कुरैशी समुदाय के 13 और राईन समुदाय के 9 व्यक्ति हैं। गद्दी और शेरशाहाबादी समुदायों से तीन-तीन, जबकि शाह, मल्लाह और सुरजापुरी समुदायों से दो-दो व्यक्तियों का परिचय दिया गया है। 

लेखक के मुताबिक, इन 77 लोगों में 48 बिहार, 13 उत्तर प्रदेश और 9 झारखंड से हैं; शेष सात लोग दूसरे राज्यों से हैं। यह ब्योरा पुस्तक के दायरे को समझने में मदद करता है। 

पुस्तक की बड़ी ताकत इसकी मौलिक सामग्री है। इसमें ऐसे कई व्यक्तित्व और प्रसंग हैं जिनकी जानकारी आसानी से नहीं मिलती और जिनका योगदान परिवारों, समुदायों और बिखरे विवरणों तक सिमटा रहा। उन्हें एक जगह जुटाना मेहनत और खोज का काम है, और यह पुस्तक केवल जीवनियों का संग्रह नहीं, पसमांदा इतिहास को व्यवस्थित रूप से दर्ज करने की एक अहम शुरुआत है। किसी भी ऐतिहासिक पुस्तक की तरह इसमें आगे शोध की गुंजाइश है। जन्म-मृत्यु की तारीख़ों, गिरफ्तारी के दस्तावेज़ों और मुकदमों के ब्योरे को व्यवस्थित किया जा सकता है, और हर प्रसंग का स्रोत स्पष्ट किया जा सकता है। लेकिन जिन्हें इतिहास ने जगह नहीं दी, उनकी सामग्री जुटाकर दर्ज करना अपने आप में ज़रूरी पहला काम है।

कुल मिलाकर, डॉ. अयूब राईन की यह पुस्तक पसमांदा इतिहास, सामाजिक प्रतिनिधित्व और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की व्यापक समझ के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण कोशिश है। इसकी अहमियत केवल भूले हुए नामों को याद करने में नहीं, बल्कि यह पूछने में भी है कि इतिहास किसकी नज़र से लिखा गया, किसके संघर्षों को केंद्रीय स्थान मिला और किनके अनुभव किनारे कर दिए गए। पसमांदा इतिहास लेखन की असली ताकत इसी में है कि वह भूले हुए लोगों को सम्मान देने के साथ-साथ उनके विचारों, सांस्कृतिक अनुभवों और बराबरी के संघर्ष को भी इतिहास का हिस्सा बनाए। 

समीक्षित पुस्तक : दलित मुस्लिम रहनुमा
लेखक : डॉ. अयूब राईन
प्रकाशक : दरभंगा टाइम्स पब्लिकेशंस
मूल्य : 400/- रुपए

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

अब्दुल्लाह मंसूर

लेखक पेशे से शिक्षक हैं और ‘पसमांदा डेमोक्रेसी’ नामक यूट्यूब चैनल के संचालक हैं

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