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समाज और संस्कृति

लाला हरदयाल का दृष्टि दोष (संदर्भ : भगत सिंह के दस्तावेज)
ऐसा क्या कारण था कि भारतीय समाज-व्यवस्था को जितनी गहराई से पेरियार रामासामी नायकर और डॉ. आंबेडकर जैसे दलित-बहुजन विचारकों ने समझा, उतनी गहराई से न तिलक, न गांधी, न भगत सिंह और न उनके...
दुखद है सैकड़ों का जीवन सुखमय बनानेवाले कबीरपंथी सर्वोत्तम स्वरूप साहेब की उपेक्षा
सर्वोत्तम स्वरूप साहेब ने शिक्षा और समाजसेवा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देते हुए सद्गुरु कबीर साहेब के आदर्शों को साकार करने का एक और प्रयास किया। उन्होंने सद्गुरु पारख संस्थान छात्रावास पंडरी के नाम...
हिजाब और अशराफ़िया पितृसत्ता
पूरी अशराफ़िया राजनीति ज़ज़्बाती मुद्दों की राजनीति रही है। सैकड़ों सालों से यह अपनी संस्कृति, अपनी भाषा, अपने पहनावे को पूरे मुस्लिम समाज की पहचान के रूप में प्रस्तुत करते आए हैं। भारत के धर्मनिरपेक्ष...
राजनीति की बिसात पर धर्म और महिलाएं
पिछले सौ सालों में समाज और परिवेश धीरे-धीरे बदला है। स्त्रियां घर से बाहर निकलकर आत्मनिर्भर हुई हैं, पर आज भी पढ़ी-लिखी स्त्रियों का एक बड़ा वर्ग उन्हीं पुरानी मान्यताओं और रूढ़ियों में बंधा जी...
भगत सिंह की दृष्टि में सांप्रदायिक दंगों का इलाज
भगत सिंह का यह तर्क कि भूख इंसान से कुछ भी करा सकती है, स्वीकार करने योग्य नहीं...
भगत सिंह की दृष्टि में ‘अछूत’ और उसकी पृष्ठभूमि
वास्तव में भगत सिंह की प्रशंसा होनी चाहिए कि उन्होंने एक बड़ी आबादी को अछूत बनाकर रखने के...
मोदी दशक में ब्राह्मणवादियों के निशाने पर रहा हिंदी सिनेमा
सनद रहे कि यह केवल एक-दो या तीन फिल्मों का मसला भर नहीं है। हकीकत तो यह है...
कड़वा सच : ब्राह्मण वर्ग की सांस्कृतिक गुलामी में डूबता जा रहा बहुजन समाज
सरल शब्दों में कहें तो सत्ताधारी ब्राह्मण वर्ग कहता है कि हमें कोट-पैंट छोड़कर धोती-कुर्ता पहनना चाहिए। वह...
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