हिन्दुओं ने इतिहास क्यों नहीं लिखा?

एक महान राष्ट्र बनने के लिए जरूरी है अपने इतिहास की चेतना और अपनी कमियों, गलतियों और अपने गुणों की जानकारी। भारत को आर्य, इस्लामिक और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों का उपनिवेश इसलिए बनना पड़ा, क्योंकि इतिहासलेखन कभी भी स्वदेशी संस्कृति का हिस्सा नहीं रहा।

वामपंथियों और हिंदुत्ववादी बुद्धिजीवियों के बीच इतिहास की पाठ्यपुस्तकों और पाठ्यक्रमों को लेकर अनवरत विवाद क्यों चलता रहता है, क्योंकि वे इस उक्ति के महत्व को समझते हैं कि जो तुम्हारे इतिहास को नियंत्रित करता है वही तुम्हारे भविष्य का नियंता है। कांशीराम ने डा. आम्बेडकर की ‘वॉट कांग्रेस एण्ड गांधी हैव डन टू द अनटचेबिल्स’ (कांग्रेस और गांधी ने अछूतों के लिए क्या किया) जैसी इतिहास-संबंधी पुस्तकों का इस्तेमाल, भारतीय राजनीति की दिशा को बदलने के लिए कर, इस युक्ति को सही सिद्ध किया।

एक महान राष्ट्र बनने के लिए जरूरी है अपने इतिहास की चेतना और अपनी कमियों, गलतियों और अपने गुणों की जानकारी। भारत को आर्य, इस्लामिक और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों का उपनिवेश इसलिए बनना पड़ा, क्योंकि इतिहासलेखन कभी भी स्वदेशी संस्कृति का हिस्सा नहीं रहा।

सामान्यत: जो इतिहास के ‘तथ्य’ कहे जाते हैं, वे दरअसल, व्याख्याएं होती हैं, जिनके पीछे अदृश्य या अचेतन एजेंडे होते हैं। आम्बेडकर और कांशीराम ने इतिहास का इस्तेमाल अपने स्पष्ट और ईमानदार एजेंडे को लागू करने के लिए किया। कांग्रेस को उत्तर भारत से इसलिए हाथ धोना पड़ा, क्योंकि उसने न तो कांशीराम और आम्बेडकर द्वारा प्रस्तुत बहुजन इतिहास को चुनौती दी और ना ही महात्मा गांधी की गलतियों के लिए निष्ठापूर्वक क्षमायाचना की।

हिन्दुओं ने यदि इतिहास नहीं लिखा तो इसका एक कारण यह है कि हमारे ऋषि यह मानते थे कि मानव न तो अपनी किस्मत को बदल सकता है और ना ही अपने भाग्य का निर्माता हो सकता है। हमें तो यह बताया गया कि संसार एक कालचक्र है, जिस पर काल नाम के एक भयावह देवता का नियंत्रण है-वे मृत्यु और विध्वंस के काले देव हैं-काली मां के मर्दाना संस्करण। स्कंध पुराण में महाकाल के बारे में पार्वती को बताते हुए भगवान शिव कहते हैं कि वह ‘मृत्यु का महान देव है…महान स्याह देव’। हिन्दू ब्रह्माण्ड विज्ञान ने मानवीय और ऐतिहासिक हस्तक्षेप को अर्थहीन बना दिया।

इतिहास के विकल्प

हर संस्कृति अपने तरीके से गुजरे हुए वक्त को याद रखती है। उदाहरणार्थ, केन्या के एम्बू कबीले में किसी बच्चे का नाम, उसके जन्म के समय घटी किसी महत्वपूर्ण घटना के नाम पर रखा जाता है। अत:, तूफानी बारिश के बीच जन्मी लड़की का नाम वर्षा हो सकता है। अकाल के दौरान पैदा हुए किसी लड़के का नाम सूखा या भूखा हो सकता है। एम्बू कबीले के ज्ञानियों ने लोगों और घटनाओं को याद रखने में समाज की मदद करने के लिए कहानियां गढ़ीं। अक्सर इन कहानियों के पात्र जानवर हुआ करते थे। बाहुबली किस्म का कोई व्यक्ति, जो कबीले के सामूहिक भोज में किसी अन्य व्यक्ति की परवाह किए बगैर सुअर की तरह खाता है, वह अगली कहानी में जानवरों के भोज में लकड़बग्गा बन जाता है। इस कहानी से बाहुबली की दादागिरी पर कोई फर्क नहीं पड़ता परंतु इससे लोगों को उस चरित्र और घटना को याद रखने में मदद मिलती है। कहानियों के जरिए, सामाजिक दृष्टि से अस्वीकार्य व्यवहार को हतोत्साहित किया जाता है और अच्छे सामाजिक गुणों को बढ़ावा दिया जाता है। समाज, व्यक्तियों पर नियंत्रण रखने के लिए कहानियों का निर्माण करता है।

ब्राह्मणवाद ने सार्वजनिक घटनाओं को भी देवताओं, देवतुल्यों और दानवों की कहानियों में बदल दिया। देवता, मानव की कमियों और उसके ज्ञान के आवर्धित स्वरूप थे। पौराणिक उपदेशकों ने पुरानी कहानियों का इस्तेमाल समाज को ‘सभ्य बनाने के’ अपने एजेण्डे को लागू करने के लिए किया अर्थात् उन लोगों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए, जो कि इतने कमजोर थे कि वे सामाजिक दबाव का मुकाबला नहीं कर सकते थे। सभी को यह पता था कि देवता काल्पनिक हैं परन्तु देवकथाओं के पीछे सांस्कृतिक श्रेष्ठि वर्ग की ताकत थी और इस कारण देवताओं की कथाएं, पवित्र बन गईं। उनके आसपास सामाजिक-धार्मिक प्रभाव का इस्तेमाल कर ‘सच’ का ताना-बाना बुन दिया गया। मिथकों के कारण ही अछूत प्रथा, कन्या शिशु हत्या, सती प्रथा, मूर्ति पूजा, देवदासी प्रथा इत्यादि को प्रोत्साहन और समर्थन मिला। चूंकि ये मिथक लोगों को मानसिक रूप से गुलाम बनाते थे इसलिए भारत में उन्नीसवीं सदी के समाजसुधारकों ने देवताओं और उनकी कथाओं के खिलाफ विद्रोह किया और वे इतिहास के छिपे सच को सामने लाने में सफल रहे।

हिन्दू दार्शनिकों ने यदि वस्तुनिष्ठ और तर्कसंगत इतिहास नहीं लिखा तो उसके पीछे एक महत्वपूर्ण कारण था। यह वही सोच थी, जिसके कारण यूनानियों ने इतिहास लेखन करना बंद कर दिया था और जिस कारण पर आधुनिकतावादी इतिहास लेखन का उपहास करते हैं।

तार्किक इतिहास-‘एक मूर्ख द्वारा सुनाया गया किस्सा’?

कोई व्यक्ति इतिहास को वस्तुनिष्ठ रपट बनाने की जितनी अधिक कोशिश करेगा वह इतिहास उतना ही अर्थहीन होता जाएगा। जब कोई इतिहासविद् किसी घटना या विषय में कोई अर्थ ढूंढता है या उसके महत्व को समझने की कोशिश करता है, तब उसकी रपट ‘आत्मनिष्ठ’ बन जाती है-वह उसके दृष्टिकोण को प्रतिबिम्बित करती है, भविष्य को बदलने के उसके प्रयास को, समाज को उस दिशा में ले जाने की उसकी कोशिश को, जिस दिशा को वह प्राथमिकता देता है।

प्लेटो (429-347 ई.पूर्व) जो कि महानतम यूनानी दार्शनिकों में से एक थे, ने समस्या की जड़ को पकड़ा था। किसी वस्तु या घटना का तब तक कोई अर्थ या महत्व नहीं होता जब तक कि उसे किसी सार्वभौम या सर्वव्यापी वस्तु से नहीं जोड़ा जाता। उदाहराणार्थ, कोई यह नहीं समझ सकता कि पाईरॉक्स क्या या कौन है, जब तक कि आप उसे अधिक सर्वव्यापी ‘लड़का’ से न जोड़ सकें। परन्तु कोई यूनानी यह नहीं समझेगा कि ‘लड़का’ क्या है, जब तक कि आप उसे एक कम उम्र का नर ‘मनुष्य’ न बताएं। चूंकि ‘मनुष्य’ भी सर्वव्यापी नहीं है इसलिए मनुष्य कौन या क्या है, इसे समझने के लिए भी एक अधिक सर्वव्यापी संदर्भ की आवश्यकता पड़ेगी। आप मनुष्य को ‘पशु’ या ‘र्ईश्वर की छवि’ के रूप में परिभाषित कर सकते हैं।

जिस तरह, किसी विशेष ‘वस्तु’ को अर्थवान बनाने के लिए उसे एक अधिक बड़े सार्वभौम से जोड़ा जाना आवश्यक है, उसी तरह कोई घटना विशेष लंबे समय तक सभी की रुचि का विषय तभी बनी रह सकती है, जब उसे एक बड़े परिदृश्य के हिस्से के रूप में प्रस्तुत किया जाए। कोई घटना तभी महत्वपूर्ण कहला सकती है जब वह सम्पूर्ण वैश्विक कैनवास का हिस्सा हो।

प्लेटो की तुलना में अरस्तु की विशिष्टताओं में अधिक रुचि थी परन्तु फिर भी उसे इतिहास अर्थहीन लगता था, क्योंकि वह ‘एलकीबीआड के साथ क्या हुआ या उसने क्या किया, से अधिक कुछ नहीं बताता’। जब तक हम किसी घटना या व्यक्ति को बड़े परिप्रेक्ष्य में नहीं देखेंगे तब तक वह, जिसे शेक्सपियर ने ‘मूर्ख द्वारा सुनाया गया एक किस्सा, जिसमें शोर-शराबा और आवेग तो बहुत होता है परन्तु जिसका कोई महत्व या अर्थ नहीं होता’, बनकर रह जाएगा। हिन्दू दार्शनिकों को इस तथ्य का ज्ञान था और इसलिए वे जिस ज्ञान को पाने के इच्छुक थे वह ब्रह्म था, कोई विशिष्ट ऐतिहासिक जानकारी नहीं।

इतिहास के संबंध में यूरोप की सोच

मुगल बादशाहों ने अपने संस्मरण लिखे हैं और चीन के बादशाहों के दरबार में इतिहास लेखक हुआ करते थे, जिनका काम घटनाओं का अभिलेख रखना था। परन्तु घटनाओं का अभिलेख, इतिहास नहीं होता। न तो मुगल और ना ही चीनी बादशाहों ने किसी इतिहासविद् को यह इजाजत दी कि वह उनके या उनके पूज्यनीय पूर्वजों के कार्य का आकलन कर सके। उनके संस्मरण और अभिलेख इतिहास तभी बने, जब यूरोपीय विद्वान उनका उपयोग अपने लेखन में कच्चे माल की तरह करने लगे।

लोरेन्जोवाला (1407-1457) पहले आधुनिक इतिहासविद् हैं जिन्होंने भाषा विज्ञान पर आधारित अपने सूक्ष्म परीक्षण के जरिए, इस तथ्य का पर्दाफाश किया कि पोप की लौकिक और सामाजिक-आर्थिक शक्तियां, एक जाली दस्तावेज, ‘द डोनेशन ऑफ कान्सटेन्टीन’ (कान्सटेन्टीन का दान) पर आधारित हैं। मुगल या चीनी बादशाह ऐसे विद्वान का सर तुरंत कलम कर देते। इस श्रद्धालु ईसाई की विद्वता से चर्च को बहुत नुकसान हुआ। चर्च के कई लोग उससे नाराज हो गए और उसके इस पर्दाफाश को प्रतिबंधित पुस्तक करार दे दिया गया। परन्तु चूंकि उसकी बात सही थी और उसने चर्च द्वारा गढ़े गए एक मिथक का पुरजोर खण्डन किया था, इसलिए नए पोप निकोलस पंचम ने उसे रोम में एक धार्मिक पद दिया। अगले पोप कैलिक्सटस तृतीय ने भी उसे सम्मान देना जारी रखा।

चर्च ने एक ऐसे अनुसंधानकर्ता का सम्मान क्यों किया, जिसने एक ऐसे रहस्य को उजागर किया था जिससे चर्च को भारी नुकसान हुआ? ऐसा इसलिए क्योंकि बाइबल का संबंध सत्य से है मिथकों से नहीं। बाइबल एक इतिहास की पुस्तक है जिसे ईश्वर के दृष्टिकोण से लिखा गया है। उसका उद्देश्य है व्यक्तिगत, सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक बुराइयों को सामने लाना ताकि हम पश्चाताप कर सकें और ईश्वर के प्रति और एक दूसरे से सही एवं उचित व्यवहार कर सकें। बाइबल, यहूदी धार्मिक-राजनीतिक इतिहास के काले और भयावह पक्ष का वर्णन करती है। सामाजिक बुराइयों को देखकर बाइबल के लेखकों को आश्चर्य नहीं होता था क्योंकि वे जानते थे कि हर मनुष्य पापी है, क्योंकि हर मनुष्य और उसके नेता पाप के भागी हैं। बाइबल, इतिहास के स्याह पक्ष को इसलिए उजागर करती है ताकि हम धोखाधड़ी जैसी अपनी गलतियों और पापों को छुपाएं न और उन्हें स्वीकार करें।

बाइबल के सत्यानुराग और मिथकों के प्रति उसकी उदासीनता ने ही आधुनिक ऐतिहासिक चेतना का विकास किया, जिसके चलते पश्चिमी देश सामाजिक बुराइयों पर विजय प्राप्त कर शक्तिशाली बन सके। विलियम केरी जैसे मिशनरियों की सहायता से बाइबल की एक अनूठी संस्था, ‘पैगम्बर’, भारत पहुंची। आधुनिक दुनिया में इस संस्था ने इतिहासविदें और पत्रकारों का स्वरूप ग्रहण कर लिया है, जिनकी बोलने और लिखने की अकादमिक और पत्रकारिता संबंधी स्वतंत्रता सर्वस्वीकार्य बन गई है। पश्चिमी देशों में शासक की गतिविधियों की समीक्षा करने के पैगम्बर के अधिकार ने राजाओं को जवाबदेह बनाया। जब समाज और देश के नेता जवाबदेह बन जाते हैं तब नागरिकों के लिए उन पर विश्वास करना, उनका सम्मान करना और उनके दिखाए रास्ते पर चलना आसान हो जाता है। आज भारत यदि डूब रहा है तो इसका कारण यह है कि हमारे देश के पत्रकार सत्य की बजाए धन के पीछे दौड़ रहे हैं। वे बड़े व्यवसायियों और राजनेताओं से रिश्वत लेते हैं। उसी तरह, इतिहासविद् असुविधाजनक सत्य को दबाते और छुपाते हैं, क्योंकि उन्हें शासकों से अनुदान की दरकार होती है।

भारत तभी एक महान राष्ट्र बन सकेगा, जब हम इतिहास के सच को हमारे मिथकों और हमारे आदर्शों का सूक्ष्मता से परिक्षण करने देंगे, जब हम सच को गले लगाएंगे, जब हम पूरे मन से यह स्वीकार करेंगे कि हमारे पड़ोसी ‘अछूत’ या प्रदूषण फैलाने वाले नहीं हैं बल्कि वे भी ईश्वर की कृति हैं और हमारे प्रेम, सम्मान और सेवा के हकदार हैं।

(फारवर्ड प्रेस के जुलाई 2013 अंक में प्रकाशित)

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