पश्चिमीकरण : विकास या पतन?

विडम्बना यह है कि हिन्दुत्व की रणनीति सफल होगी या उसके रणनीतिकारों को ही ले डूबेगी, यह तय करेंगे भारत के 10 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता। अगर वे मुलायम सिंह यादव और ‘तीसरे मोर्चे’ की राह पर चलते हैं तब भाजपा-विरोधी मतों का विभाजन, मोदी को अगला प्रधानमंत्री बना सकता है

पश्चिमीकरण भारत को उन्नति की राह पर ले जायेगा या पतन की? हिन्दुत्व नेतृत्व इस दुधारी प्रश्न को सन् 2014 के आम चुनाव की मुख्य विषय-वस्तु बनाना चाहता है। मोदी को अपने नेता और गुजरात को अपने शोपीस के रूप में प्रस्तुत कर, हिन्दुत्व नेतृत्व एक तरह से कह रहा है कि जहाँ कांग्रेस का अर्थ है भ्रष्टाचार वहीं हिन्दुत्व, विकास का पर्यायवाची है।

मीडिया संस्थानों को साधकर छपवाई गई रपटों के अनुसार, गुरूवार 18 जुलाई 2013 को अपनी अमेरिकी यात्रा की पूर्वसंध्या पर, भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने नई दिल्ली में एक सम्बोधन के दौरान कहा कि “अंग्रेजी भाषा ने भारत को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। हम अपने धर्म और संस्कृति को भुला बैठे हैं। देश में अब केवल 14,000 संस्कृत बोलने वाले बचे हैं।” उन्होंने आगे कहा कि, “हमारे देश के युवाओं का अंग्रेजीकरण खतरनाक है।” इसी बहस को आगे बढ़ाते हुए, 22 जुलाई को, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने पटना में कहा कि पश्चिमीकरण की ओर “अंधी दौड़, व्यक्तिगत और राष्ट्रीय क्षय के लिए जिम्मेदार है।”

हिन्दू मंदिर समृद्ध हो रहे हैं और हिन्दू त्योहार पहले से कहीं अधिक जोर-शोर से मनाए जाते हैं। टीवी गुरू और बाबा, चार्टर्ड जेटों में दुनिया का भ्रमण करते रहते हैं। हिन्दुत्व कई प्रदेशों में शासन में है। वह केन्द्र में भी सत्ता में रह चुका है। मोदी के नेतृत्व में अब वह एक बहुत मंहगे व अत्यधिक हाईटेक चुनाव अभियान चलाने की तैयारी कर रहा है, ऐसा चुनाव अभियान जैसा कि कभी किसी पश्चिमी देश में भी नहीं देखा गया हो…और तब भी भागवत को यह गम है कि बतौर राष्ट्र ‘हमने अपनी परंपराओं को त्याग दिया और आंखे मूंदकर पश्चिमी संस्कृति और जीवनशैली के पीछे दौड़ऩे लगे। इससे हमारी नैतिकता और हमारी आचारपूर्ण जीवनशैली का हृास हुआ और व्यक्ति व राष्ट्र के तौर पर हमारा क्षय शुरू हो गया।’

विडम्बना यह है कि हिन्दुत्व की रणनीति सफल होगी या उसके रणनीतिकारों को ही ले डूबेगी, यह तय करेंगे भारत के 10 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता। अगर वे मुलायम सिंह यादव और ‘तीसरे मोर्चे’ की राह पर चलते हैं तब भाजपा-विरोधी मतों का विभाजन, मोदी को अगला प्रधानमंत्री बना सकता है। दूसरी ओर, अगर मुस्लिम नेता, बिना शोर-शराबा किए, मायावती और नीतीश कुमार पर कांग्रेस का समर्थन करने का दबाव बना सके तो मोदी ही राहुल गांधी को अगला प्रधानमंत्री बनने में मदद करेंगे। आडवाणी की चिंता यही है।

अंग्रेजीकरण-पश्चिमीकरण कई मायनों में दुधारी तलवार है। आडवाणी की सोच यह है कि अंग्रेजी हमारे लिए उपयोगी है या नहीं, इस विषय पर राष्ट्रव्यापी बहस के लिए 12 महीने की अवधि बहुत कम है। अत:, हिन्दुत्व को पहले सत्ता पर काबिज होना चाहिए और फिर, सैद्धान्तिक मुद्दों पर विचार करना चाहिए। पश्चिमीकरण पर समय से पहले विचार और बहस का दौर शुरू करने से कांग्रेस-विरोधी मत विभाजित ही होगा। वर्तमान में तो आडवाणी की बात मानने से हिन्दुत्ववादियों ने इंकार कर दिया है। हिंदुत्व आंदोलन के संचालकों का मानना है कि सिद्धांतों से समझौता करने के कारण ही उन्हें पिछले दो चुनावों में हार का सामना करना पड़ा। अगर वे अपनी मूल विचारधारा पर डटे रहेंगे तो उनके समर्थकों और अनुयायियों को भी बल मिलेगा। अगर ये समर्थक उन्हें जमकर वोट देगें तो दूसरे दल उनके साथ गठबंधन करने के लिए स्वमेव आतुर हो उठेंगे।

यह जुआ भाजपा के लिए अगले चुनाव में हार का सबब बन सकता है। परन्तु जो प्रश्न उन्होंने उठाया है, उस पर गंभीरतापूर्वक विचार किए जाने की जरूरत है। मैं इस तर्क से सहमत हूँ कि जहां पहले पश्चिमीकरण के रास्ते भारत में विकास आया, वहीं, अगर पश्चिमीकरण का यह सिलसिला हमने अब भी जारी रखा तो वह हमारे लिए एक बड़ी आपदा बन जाएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि उत्तराधुनिक पश्चिम ने अपनी नैतिक और बौद्धिक धार खो दी है। वह एक अत्यालंकृत विशाल टाइटेनिक बन चुका है, जिसका आज नहीं तो कल, चूर-चूर हो जाना सुनिश्चित है। भारत को यदि महान राष्ट्र बनना है तो संस्कृत या ब्राह्मणवाद की ओर लौटना इसका उपाय नहीं है। भारत को वह नैतिक और बौद्धिक संपदा हासिल करनी होगी, जिसे पश्चिम ने भी खो दिया है।

अंग्रेजी से क्यों हारी संस्कृत?

सन् 1820 के दशक में, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने यह तय किया कि वह अपने शैक्षणिक कोष के एक हिस्से का इस्तेमाल कलकत्ता में एक नए संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना में करेगी, जिसमें हिन्दू पंडितों को अध्यापक नियुक्त किया जाएगा। इस निर्णय का विरोध प्रतिष्ठित संस्कृत विद्वान राजा राजमोहन राय (1772-1833) ने किया। उन्होंने 11 दिसम्बर 1823 को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विलियम पिट को एक कड़ा पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने विस्तार से यह बताया कि “शिक्षा की संस्कृत प्रणाली क्यों देश को हमेशा के लिए अंधकार में ढकेल देगी।”

राय ने कहा कि वे संस्कृत का विरोध इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वह एक ऐसी भाषा है जो ज्ञान के विस्तार में बाधक बनेगी। आगे राय लिखते हैं “परन्तु चूँकि स्थानीय जनता की बेहतरी, सरकार का उद्देश्य है इसलिए उसे उदार व प्रबुद्ध शिक्षा प्रणाली को प्रोत्साहन देना चाहिए, जिसमें गणित, प्राकृतिक दर्शन (विज्ञान), रसायन विज्ञान व शरीर विज्ञान और अन्य उपयोगी विज्ञानों-जितना कि प्रस्तावित धनराशि में किया जा सके, के शिक्षण की व्यवस्था हो और इसके लिए यूरोप में शिक्षा प्राप्त, ज्ञानवान व कुशल सज्जनों को नौकरी पर रखा जाए और कॉलेज में आवश्यक पुस्तकें, उपकरण व अन्य चीजें हों।” राय जैसे प्रतिष्ठित भारतीय और ऐसे अंग्रेजों, जिनकी एक महान भारत के निर्माण के प्रति असंदिग्ध प्रतिबद्धता थी, दरअसल चार्ल्स ग्रान्ट (1746-1823) द्वारा प्रतिपादित विचारों का समर्थन कर रहे थे। ग्रान्ट इस तरह के विचार व्यक्त करने वाले पहले व्यक्ति थे। सन् 1792 में ग्रान्ट ने जहां तक संभव हो, अंग्रेजी में पश्चिमी शिक्षा दिये जाने की वकालत की थी। परन्तु इसका कारण यह था कि उस समय ब्रिटिश भारत में स्थानीय भाषाओं में साहित्य उपलब्ध नहीं था और ना ही भारतीय भाषाओं की प्रिटिंग प्रेसें थीं। ग्रान्ट ने अंग्रेजी को शिक्षा के माध्यम के रूप में अपनाने के पक्ष में जो तर्क दिए, उन्हीं का उपयोग आगे चलकर अंग्रेजी के विद्वानों, राय व लॉर्ड मेकाले ने किया। इनमें से एक तर्क यह था कि अगर शिक्षा का उद्देश्य कम्पनी के लिए क्लर्क तैयार करने से कुछ अधिक है, उसका उद्देश्य राष्ट्र निर्माण है, तब छात्रों को इतना योग्य बनाना होगा कि वे स्वतंत्र रूप से सत्य की खोज कर सकें। इसके लिए अंग्रेजी भाषा ही सबसे मुफीद होती क्योंकि उसमें बौद्धिक संसाधनों की प्रचुरता थी। यदि छात्र अंग्रेजी भाषा की पुस्तकों को समझने में सक्षम होंगे तो उनके अध्यापकों ने उन्हें जो कुछ सिखाया या बताया है, उसके आगे की चीजें भी जान-समझ सकेंगे।

राय की जोरदार अपील के कुछ ही महीनों बाद, कलकत्ता के अतिसम्मानित बिशप रेजीनाल्ड हीबर (1783-1826) उत्तर भारत की यात्रा पर निकले। उनके यात्रा विवरण से यह स्पष्ट हो गया कि राय का शिक्षा के माध्यम के रूप में संस्कृत का विरोध पूरी तरह जायज था। बनारस संस्कृत कालेज की अपनी यात्रा का हीबर इन शब्दों में वर्णन करते हैं–

(ब्रिटेन की) ईसाई जनता के दबाव में, संसद द्वारा दिए गए अनुदान से संचालित व एक ईसाई सरकार के प्रशासनिक नियंत्रण में काम कर रहे कालेज में, प्रोफेसर, दुनिया के बारे में बताते हुए कहते हैं कि मेरू पर्वत उत्तरी ध्रुव है और दक्षिणी ध्रुव, हिन्दू धर्मशास्त्र में वर्णित कछुए की पीठ पर टिका हुआ है। ग्लोब के केन्द्र की तरफ  इशारा करते हुए वे समझाते हैं कि किस प्रकार सूर्य हर दिन धरती के आसपास चक्कर लगाता है और विभिन्न राशियों से गुजरता है!

हिन्दुत्व, अंग्रेजी से घृणा कर सकता है परन्तु वह इस तथ्य से इंकार नहीं कर सकता कि अंग्रेजी शिक्षा ने ही भारत को उस रास्ते पर आगे बढ़ाया है, जिस पर चलकर वह इतिहास का महानतम देश बन सकता है। परन्तु ऐसा नहीं है कि भाजपा-आरएसएस नेतृत्व द्वारा व्यक्त की जा रही चिंतायें पूरी तरह निर्मूल हों। पश्चिम का अंधानुकरण, पश्चिम से भी तेज गति से हमारा विनाश करेगा। उदाहरणार्थ, पश्चिम में कोई राजकीय विश्वविद्यालय यह शिक्षा नहीं दे सकता कि सभी मनुष्य, चाहे वे किसी भी जाति या नस्ल के हों, समान गरिमा और अधिकारों के हकदार हैं। जैसे हिटलर के दौर में जर्मन विश्वविद्यालय यह सिखाते थे कि आर्य सबसे उन्नत नस्ल हैं, उसी तरह पश्चिमी विश्वविद्यालय अब यह सिखाते हैं कि चूंकि हम सब क्रमागत विकास से गुजर रहे हैं इसलिए हम सब मूलत: गैर बराबर हैं…समानता का विचार सत्य नहीं है बल्कि यह समाज द्वारा प्रतिपादित एक ऐसी मान्यता है जो अब पुरानी पड़ चुकी है। कोई पश्चिमी विश्वविद्यालय अब यह नहीं सिखाता कि विवाहेत्तर संबंध रखना पाप है क्योंकि ऐसा करके हम अपने जीवनसाथी की गरिमा को चोट पहुँचाते हैं और जो वायदे हमनें उससे किए हैं, उन्हें तोड़ते हैं। अब तो विश्वविद्यालय यह सिखाते हैं कि चूँकि हम सब बंदर हैं इसलिए हम वह सब कुछ कर सकते हैं जो बंदर करते हैं। स्पष्टत:, राजनाथ-भागवत की चिंताएं उचित हैं परन्तु उनके द्वारा प्रस्तावित इलाज, रोग से बदतर है। बाइबल-आधारित पुरानी शिक्षा ने भारत को इसलिए बंधनमुक्त किया, क्योंकि वह मानती थी कि मानव सत्य को जान सकता है और उसे सत्य को जानना चाहिए। शिक्षा केवल नौकरी पाने का माध्यम नहीं थी बल्कि जीवन को बदलने वाले सत्य की खोज और उसे पाने का रास्ता थी। अंधपश्चिमीकरण, पिछड़ों-बहुजनों को मुक्ति की ओर नहीं ले जाएगा क्योंकि पश्चिम स्वयं भी सत्य और नैतिकता को भुला बैठा है। हम केवल एक उम्मीद कर सकते हैं कि हमें वह रास्ता दिख जावे, जिस पर भारत के परिवर्तन के अग्रदूत चले थे।

(फारवर्ड प्रेस के अगस्त 2013 अंक में प्रकाशित)

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