क्या भारत नरेंद्र दाभोलकर की हत्या से सबक लेगा?

हमारे देश ने विज्ञान के क्षेत्र में जबर्दस्त प्रगति की है परंतु यह दुख की बात है कि जहां हम उन उपकरणों का इस्तेमाल कर रहें हैं जो विज्ञान की देन हैं, वहीं हमारी मानसिकता में विज्ञान को स्थान नहीं मिल सका है

डॉक्टर नरेन्द्र दाभोलकर की पुणे में हत्या (20 अगस्त, 2013) अंधश्रद्धा व अंधविश्वास के खिलाफ सामाजिक आंदोलन के लिए एक बड़ा आघात है। महाराष्ट्र में अनेक आंदोलन से प्रेरित हो ‘अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति’ का गठन किया गया था, जिसने डाक्टर नरेन्द्र दाभोलकर के नेतृत्व में जनजागरण का प्रभावी अभियान चलाया। कुछ लोग अंधश्रद्धा व अंधविश्वासों के खिलाफ उनके आंदोलन से परेशानी का अनुभव कर रहे थे और इसलिए उन्हें कई बार जान से मारने की धमकियां मिलीं, जिनमें से कम से कम एक में कहा गया था कि उनका अंत वैसा ही होगा, जैसा कि गांधी का हुआ था। उनकी मृत्यु के बाद, ‘सनातन प्रभात’ नामक एक हिन्दुत्ववादी अखबार ने लिखा कि ‘हर एक को वही मिलता है जिसके वह लायक होता है।’ यह अखबार पहले भी डॉ. दाभोलकर के संबंध में विषवमन करता रहा है।

अंधश्रद्धा के पैरोकार स्वयं भी यह जानते थे कि उनके दावे खोखले हैं। उन्हें पता था कि उनका काला जादू तर्कवादी आंदोलन के प्रणेता को नहीं मार सकेगा और इसलिए उन्होंने इस काम के लिए भाड़े के हत्यारों की सेवाएं लीं। दाभोलकर को हिन्दुत्व संगठन ‘हिन्दू जनजागरण समिति’ से नियमित रूप से धमकियां मिलती रहती थीं। समिति ने अपनी वेबसाइट पर यह दावा भी किया था कि उसने हिन्दुओं के खिलाफ षड्यंत्र का पर्दाफाश कर दिया है। अपने प्रकाशनों में यह संस्था खुलेआम दाभोलकर के बारे में अशिष्ट व अत्यंत कटु भाषा का प्रयोग करती थी।

दाभोलकर अंधभक्ति और अंधविश्वासों के विरोधी थे, जिन्हें बाबागण और उनके जैसे अन्य लोग प्रोत्साहन देते हैं। इनमें ‘करनी’ और ‘भानामती’ नामक कर्मकांड शामिल हैं, जिसमें पारलौकिक शक्तियों के नाम पर जादू किया जाता है। इसी तरह, कुछ साधु-संत और मुल्ला-मौलवी भस्म देते हैं, ताबीज पहनाते हैं, जादुई अंगूठियां देते हैं और लोगों के शरीर और मन पर कब्जा कर चुके भूत को भगाने का दावा भी करते हैं। दाभोलकर जिस अंधविश्वास-निरोधक कानून को बनाने की मांग बरसों से कर रहे थे और जिसे उनकी हत्या के बाद महाराष्ट्र सरकार ने बनाया, उसमें इस तरह की गतिविधियों को अपराध घोषित किया गया है। यहां यह बताना मौजूं होगा कि जब यह विधेयक पहली बार चर्चा के लिए विधानसभा में प्रस्तुत किया गया था तब भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने इसका कड़ा विरोध किया था। हिन्दू धर्म की राजनीति करने वाले इन संगठनों के अतिरिक्त, अन्य पुरातनपंथी लोग भी उनके संगठन की गतिविधियों के खिलाफ थे।

अंधश्रद्धा और तर्कवाद के बीच का संघर्ष लंबे समय से जारी है। तर्कवाद का अर्थ है, हर विश्वास पर प्रश्न उठाना, उसे सत्य की कसौटी पर कसना और अपने ज्ञान की परिधि में लगातार बढोतरी करते रहना। आस्था, विशेषकर ‘धार्मिक संस्थाओं’ के आसपास बुनी गई आस्था, की शुरुआत होती है नियमों, विश्वासों और प्रथाओं को आंख मूंदकर स्वीकार करने से। इतिहास गवाह है कि जिन लोगों ने तार्किक बातें कीं, उन्हें या तो अपनी जान गंवानी पड़ी या घोर कष्ट भुगतने पड़े। भारत में चार्वाक ने वेदों की पारलौकिकता को चुनौती दी। उसे घोर निंदा का सामना करना पड़ा और उसकी लिखी पुस्तकों को जला दिया गया। यूरोप में कापरनिकस और गैलिलियो का पुरोहित वर्ग ने क्या हाल बनाया, यह हम सब को ज्ञात है। बु्रनो और सरवाटस नामक वैज्ञानिकों ने यह कहा कि रोग, दुनियावी कारणों से होते हैं न कि ईश्वरीय प्रकोप के कारण। यह कहने पर, पुरोहित वर्ग के इशारे पर, उन्हें जिंदा जला दिया गया।

दाभोलकर कई दशकों से अंधश्रद्धा निवारण कानून बनवाने के लिए संघर्षरत थे। परन्तु महाराष्ट्र सरकार ने उनके जीवन की बलि के बाद ही यह कानून बनाया। उन्होंने ऐसे आंकड़े इकट्ठे किए थे जिनसे यह जाहिर होता था कि काला जादू करने वालों की सबसे बड़ी शिकार महिलाएं होती हैं। वे हीरा, मोती, मूंगा आदि जैसे रत्नों और उनके तथाकथित जादुई प्रभाव के विरोध में अभियान शुरू करने वाले थे। इससे बड़ी संख्या में लोगों के व्यापारिक हित प्रभावित होते। यह दुख की बात है कि अब ऐसा नहीं हो सकेगा। क्या अन्य राज्य सरकारें भी इसी तर्ज पर ऐसे कानून बनाएंगी जिनसे अंधश्रद्धा, काला जादू, रत्नों आदि का समृद्ध व्यापार बंद हो सके या कम से कम उसके आकार में कमी आए? क्या प्रगतिशील सामाजिक आंदोलन उन लोगों की सुध लेंगे जो इन घिनौनी प्रथाओं का शिकार बन रहे हैं और समाज को तार्किक विचार, तार्किक संस्कृति और तार्किक राजनीति की ओर ले जाएंगे? हमारे देश ने विज्ञान के क्षेत्र में जबर्दस्त प्रगति की है परंतु यह दुख की बात है कि जहां हम उन उपकरणों का इस्तेमाल कर रहें हैं जो विज्ञान की देन हैं, वहीं हमारी मानसिकता में विज्ञान को स्थान नहीं मिल सका है। हम कम्प्यूटर का तो इस्तेमाल करते हैं परंतु दशहरे पर उसकी पूजा भी करते हैं और उस पर फूल भी चढ़ाते हैं। क्या दाभोलकर का बलिदान, हमारे नीति-निर्माताओं को इस बात का एहसास करा सकेगा कि लाखों इंजीनियर और हजारों वैज्ञानिक व डाक्टर पैदा करने वाला हमारा देश आज भी अंधविश्वासों व अंधभक्ति की चक्की में पिस रहा है। हमें विज्ञान और तकनीकी से लाभ उठाने में कोई संकोच नहीं है, परंतु हम वैज्ञानिक सोच को अपनाना नहीं चाहते।

(फारवर्ड प्रेस के अक्टूबर 2013 अंक में प्रकाशित)


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