भारत : सफलता के बीच त्रासदी – फाइलिन चक्रवात और रतनगढ़ भगदड़

विज्ञान-जिसने तूफान के पथ की सटीक भविष्यवाणी की और प्रजातंत्र-जिसने हजारों लोगों की जानें बचाईं, इन दोनों का लक्ष्य सत्य को जानना और ज्ञान प्राप्त करना है। परन्तु दुर्भाग्यवश, हमारी इस शानदार सफलता को, हमारी धार्मिक संस्कृति के कारण ग्रहण लग गया-उस धार्मिक संस्कृति के कारण, जो मिथकों और कपट को बढ़ावा देती है

‘अत्यंत शक्तिशाली’ चक्रवाती तूफान फाइलिन, जो 12 अक्टूबर 2013 को ओडिशा के तटवर्ती इलाके से टकराया, पर सबसे पहले जापानी वैज्ञानिकों की नजर पड़ी थी। अक्टूबर की 4 तारीख को वह थाईलैण्ड की खाड़ी में कम दबाव का क्षेत्रमात्र था। भारत में आईआईटी, बॉम्बे के प्रोफेसर कपिल गुप्ता का ध्यान 7 अक्टूबर को इस पर गया और उन्होंने इसकी सूचना राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिकरण को दी। अधिकरण ने तुरंत प्रभावी निरोधक उपाय किए और फाइलिन से संभावित हानि को काफी कम करने में सफलता प्राप्त की। थाई भाषा में फाइलिन का अर्थ होता है नीलम-एक कीमती रत्न।

 

मध्यप्रदेश में रतनगढ़ अर्थात रत्नों के गढ़ में 13 अक्टूबर को 115 श्रद्धालु कपट और अपने साथी तीर्थयात्रियों के कदमों तले कुचलकर मारे गए। इस धार्मिक त्रासदी ने विज्ञान और प्रजातंत्र की उस बड़ी सफलता को मानो ढंक लिया-एक ऐसी सफलता को, जिसने हजारों लोगों की जानों की रक्षा की। जो लोग चक्रवाती तूफानों का प्रबंधन कर सकते हैं वे भीड़ का भी प्रबंधन कर सकते हैं। परंतु कब-जब पापमय मानव, आत्मा-विहीन प्रकृति से कहीं अधिक विनाशक सिद्ध हो सकता है।

चक्रवाती तूफान फाइलिन

11 अक्टूबर आते-आते फाइलिन, बंगाल की खाड़ी में श्रेणी 5 का झंझावाती तूफान बन चुका था। उसकी अधिकतम गति 260 किमी प्रति घंटा थी, जिसे वह एक मिनट तक बनाए रख सकता था। इसका अर्थ यह था कि वह उतना ही विध्वंसकारी हो सकता था, जितना कि कैटरीना, जिसने सन् 2005 में अमेरिका में 1833 लोगों की जान ले ली थी और 81 बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य की सम्पत्ति को नष्ट कर दिया था। सन् 1999 में ओडिशा में 9,800 लोग सुपर साईक्लोन की चपेट में आकर मारे गए थे।

फाइलिन के हमले की सूचना ने हमारी सरकार को मुस्तैद कर दिया क्योंकि प्रजातंत्र, शासकों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाता है। वैज्ञानिकों और अधिकारियों ने राष्ट्रहित को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उन्होंने दशहरे पर छुट्टी जाने का विचार त्याग दिया। आंध्रप्रदेश में हड़ताल कर रहे श्रमिक संघों ने अपनी हड़ताल वापस ले ली। ओडिशा के जाजपुर जिले के 51 वर्षीय कलेक्टर अनिल कुमार सामल छुट्टी पर थे क्योंकि उनकी मां का देहांत हो गया था। परंतु वे अपने काम पर वापस आ गए और अन्य कई लोगों की तरह, उन्होंने भी हमारे देशवासियों को इस विकट प्राकृतिक आपदा से बचाने के लिए दिन-रात काम किया। तूफान की गति और उसकी दिशा पर सूक्ष्म नजर रखी गई और नतीजे में वह कहां और किस समय भारत के तट पर पहुंचेगा, इसकी हमारे वैज्ञानिकों ने एकदम सटीक भविष्यवाणी की। अधिकारियों ने 600 ऐसे भवनों की निशानदेही की जिनका इस्तेमाल आश्रयस्थलों के रूप में किया जा सकता था। लगभग 5,50,000 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया। हमारी थलसेना, नौसेना और वायुसेना के जवान, हवाई जहाजों, हैलिकाप्टरों, नावों, खाने के पैकिटों और दवाईयों के साथ तैयार थे।

विज्ञान-जिसने तूफान के पथ की सटीक भविष्यवाणी की और प्रजातंत्र-जिसने हजारों लोगों की जानें बचाईं, इन दोनों का लक्ष्य सत्य को जानना और ज्ञान प्राप्त करना है। परन्तु दुर्भाग्यवश, हमारी इस शानदार सफलता को, हमारी धार्मिक संस्कृति के कारण ग्रहण लग गया-उस धार्मिक संस्कृति के कारण, जो मिथकों और कपट को बढ़ावा देती है।

भगदड़

अखबारों में छपी खबरों, जिनकी पुष्टि अधिकारियों ने भी की, के अनुसार, रतनगढ़ में भगदड़ की शुरुआत एक जानबूझकर फैलाए गए झूठ से हुई : यह कि तेज गति से बह रही सिंध नदी के ऊपर बना संकीर्ण पुल टूटने वाला है। ‘पवित्र’ नदी में कितनी लाशें बह गईं, यह किसी को पता नहीं है। पुल पर 30 बच्चों सहित 115 तीर्थयात्री मारे गए। इनके अतिरिक्त, 100 से अधिक घायलों को अस्पतालों में भर्ती किया गया।

दुर्भाग्यवश, पुल के टूटने की अफवाह फैलने के कुछ ही समय पहले, पुलिस ने आपस में विवाद कर रहे तीर्थयात्रियों के दो समूहों को अलग करने के लिए हल्का लाठीचार्ज किया था। इससे माहौल तनावग्रस्त हो गया था। अफवाह ने इस तनाव को भगदड़ में बदल दिया। लगभग 500 मीटर लंबे पुल पर उस समय 1,00,000 से अधिक लोग थे। इतनी बड़ी भीड़ को नियंत्रित करने के लिए वहां मात्र 9 पुलिसकर्मी थे। उन्होंने पुल पर वाहनों को आने की इजाजत भी दे दी थी। खराब सड़कों और 10 किमी लंबे ट्रैफिक जाम के कारण, ग्वालियर से रवाना हुए राहत और बचाव दलों को घटनास्थल पर पहुंचने में देरी हुई और इससे बहुत से लोग इलाज के अभाव में मौत के मुंह में समा गए। देवी दुर्गा की आराधना के लिए इकट्ठा हुए श्रद्धालु, आखिर क्यों इतना खतरनाक झूठ बोलेंगे? मुख्यमंत्री द्वारा आदेशित न्यायिक जांच, घटना के मूल कारण तक पहुंचने की कोशिश भी नहीं करेगी।

सफलता और त्रासदी : दो संस्कृतियों का टकराव

एक रपट के अनुसार, अफवाह इसलिए फैलाई गई ताकि लोग पुल को खाली कर दें और अफवाह फैलाने वाले आसानी से मंदिर तक पहुंचकर देवी की पूजा कर सकें। परंतु श्रद्धालु तीर्थयात्री, जो देवी के दर्शनों के लिए आतुर हैं, आखिर झूठ का सहारा क्यों लेंगे?

इसका एक कारण तो यह है कि हमारे पुजारी ही हमें गलत राह दिखाते हैं। वे हमें उन मूर्तियों की पूजा करने को कहते हैं, जो भगवान नहीं हैं। वे मिथकों का आविष्कार करते हैं और उनका प्रचार भी और इसी से उनका जीवनयापन होता है। राजा राममोहन राय से लेकर महात्मा जोतिबा फुले और उनसे लेकर स्वामी दयानंद सरस्वती तक, सभी इस मामले में एकमत थे कि प्रकृति, मूर्तियों या मनुष्यों को ईश्वर मानकर उनकी पूजा करना, झूठ के आगे सिर झुकाना है। सत्य हमेशा मुक्तिदायक होता है। परंतु हमारी धार्मिकता हमें झूठे भगवानों की आराधना करना सिखाकर, दास बना रही है। इसके कारण हम धूर्त गुरुओं और बाबाओं के चंगुल में फंस रहे हैं। अगर धर्म स्वयं ही पुरोहित वर्ग द्वारा आविष्कृत मिथकों का पुलिंदा है तो फिर भला क्यों तथाकथित पवित्र आत्माएं, ऐसी कहानियां न गढ़ें जिनसे उन्हें लाभ प्राप्त होता हो।

राजा राममोहन राय इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि भारत की बुराईयों की जड़ मूर्तिपूजा में है। मांडुक्य उपनिषद् के अपने अनुवाद की भूमिका में वे लिखते हैं कि मूर्तिपूजा ‘पूर्वाग्रहों और अंधविश्वासों का स्रोत है, उसके कारण नैतिक सिद्धांत पूर्णत: नष्ट हो गए हैं और आत्महत्या, महिलाओं की हत्या और मानव बलि जैसी बुराईयों ने हमारे समाज में घर कर लिया है।’

आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद ने भी यही कहा था। जब उनसे पूछा गया कि मूर्तिपूजा के बारे में उनका क्या विचार है, तो उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के कहा ‘यह गलत है। लोगों को मूर्तियों की पूजा कतई नहीं करनी चाहिए। मूर्तिपूजा के कारण ही देश में बौद्धिक अंधकार छाया हुआ है।’ अपनी पुस्तक ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में उन्होंने विस्तार से यह बताया है कि किस तरह, मूर्तिपूजा ने हमारे पुजारियों और उनके नकली भगवानों को कुटिल भिखारियों में बदल दिया है। उनका निष्कर्ष है कि ‘इसमें कोई संदेह नहीं कि मूर्तिपूजा के कारण भारत हर दिन भारी नुकसान उठा रहा है। मूर्तिपूजकों की हार इसलिए हो रही है क्योंकि वे यह गलत काम कर रहे हैं। पाप हमेशा कष्ट ही देता है। लोगों की मूर्तिपूजा में आस्था के कारण देश को भारी हानि उठानी पड़ रही है।’

मूर्तिपूजा से ब्राह्मण पुरोहितों का हित साधन होता है और इससे सबसे ज्यादा हानि होती है शूद्रों की। अपने उत्कृष्ट नाटक ‘तृतीय रत्न’ में महात्मा जोतिबा फुले ने बताया है कि किस तरह मूर्तिपूजा और अंधविश्वासों को बढावा देकर, कुटिल पंडित, गरीब किसानों को उनकी बहुत अल्प आय से वंचित कर रहे हैं। अन्यत्र फुले ने टिप्पणी की है कि बहुजन तभी स्वतंत्र हो सकते हैं जब वे मूर्तियों को एक सिरे से नकार दें।

जब राजा राममोहन राय, महात्मा जोतिबा फुले और दयानंद सरस्वती जैसे 19वीं सदी के समाज सुधारक, मूर्तिपूजा की भर्त्सना कर रहे थे और उसे हमारी संस्कृति के पतन का कारण बता रहे थे, तब वे चार्ल्स ग्रान्ट (1746-1823) के विचारों को मानो स्वर दे रहे थे। ग्रान्ट, भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम करते थे। वे बाद में उसके संचालक और उसके बाद इंग्लैण्ड की संसद के सदस्य भी बने। हमारे सुधारकों के भारत की एक ‘राष्ट्र’ के रूप में कल्पना करने के दशकों पूर्व, सन् 1792 में, ग्रान्ट ने यही बात अपनी पुस्तक ‘आब्जरवेशन्स ऑन द स्टेट ऑफ मॉरल एण्ड फिजिकल अफेयर्स ऑफ द एशियाटिक सब्जेक्ट्स ऑफ ग्रेट ब्रिटेन एण्ड हाउ टू इम्प्रूव देम’ (ब्रिटेन की एशियाई प्रजा की नैतिक व भौतिक स्थिति पर टिप्पणी और उनकी बेहतरी के उपाय) में कही थी। इसके कुछ ही समय बाद ग्रान्ट, विलियम बिल्बरफोर्स व जेकरी मैकाले (लॉर्ड – मैकाले के पिता) के साथ श्रद्धालु ईसाईयों की संस्था ‘क्लेपेम सर्किल’ के सदस्य बन गए। उन्होंने हेनरी मार्टिन व क्लाडियस ब्यूकानन जैसे विश्वविद्यालयीन स्नातकों को भारत भेजना शुरू किया-भारत का शोषण करने के लिए नहीं बल्कि उसे मिथकों से दूर और धार्मिक व वैज्ञानिक सत्य की ओर ले जाने के लिए। उनके पुत्र चार्ल्स ग्रान्ट जूनियर भी ईस्ट इंडिया कपनी के संचालक थे और उन्होंने अपने मित्र लॉर्ड मेकाले के साथ मिलकर, भारत में विश्वविद्यालयीन आंदोलन की नींव डाली, जिसका उद्देश्य सक्षम और समर्पित भारतीय नौकरशाह तैयार करना था, जो भारत की शासन व्यवस्था संभालकर उसकी सेवा कर सकें।

ग्रान्ट का विश्वदर्शन, बाईबल की दस आज्ञाओं पर आधारित था। इनमें से पहली दो आज्ञाएं कहती हैं कि यहूदियों को सत्यान्वेषण करना चाहिए और कल्पित भगवानों के स्थान पर सच्चे ईश्वर की आराधना करनी चाहिए। दस आज्ञाएं प्रकृति और कल्पित देवताओं की आराधना को प्रतिबंधित करती हैं क्योंकि मानव का जन्म, प्रकृति पर शासन करने के लिए हुआ है, उसकी आराधना करने के लिए नहीं। ईश्वर की छवियों का निर्माण करने पर इसलिए प्रतिबंध लगाया गया क्योंकि ईश्वर ने अपनी छवि का निर्माण स्वयं ही कर दिया है-हमारे पड़ोसी के रूप में। ईश्वर से प्रेम करने और उसकी सेवा करने के लिए हमें हमारे पड़ोसियों से प्रेम करना होगा और उनकी सेवा करनी होगी। अगर हम उन्हें नीची जाति का व अछूत मानकर उनका तिरस्कार करेंगे तो हम ईश्वर के प्रिय नहीं बन सकते।

अपनी पुस्तक में ग्रान्ट ने वर्णित किया है कि भारतीय धार्मिकता ने किस प्रकार हमें बौद्धिक, नैतिक, सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से गुलाम बना दिया है। विकास के लिए आवश्यक है कि हम प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करें, जिससे हमारे साथ-साथ प्रकृति को भी लाभ हो। परंतु जो लोग प्रकृति की पूजा करते हैं वे प्रकृति पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर उसके जिम्मेदार संरक्षक नहीं बन सकते। ग्रान्ट को विश्वास था कि धार्मिक, वैज्ञानिक व अन्य सभी क्षेत्रों में सत्यान्वेषण, हमें एक महान राष्ट्र बना सकता है। इसलिए उन्होंने भारत को मिथकों को प्रोत्साहन देने वाली धार्मिक संस्कृति से दूर ले जाने के उपक्रम की बौद्धिक नींव रखी-उस संस्कृति से दूर, जो रतनगढ़ जैसी त्रासदियों को जन्म देती है और उस वैज्ञानिक-मानवतावादी संस्कृति की ओर, जो हमें फाइलिन चक्रवाती तूफान पर विजय प्राप्त करने की क्षमता देती है।

ग्रान्ट ने सन् 1792 में यह प्रतिपादित किया था कि भारत की आर्थिक प्रगति, उसकी नैतिक प्रगति पर निर्भर करती है। उनके इस तर्क का इतना गहरा असर पड़ा कि उनकी मृत्यु के लंबे समय बाद, सन् 1858 में जब भारत एक राष्ट्र बना और उसका शासन ब्रिटेन के सम्राट के हाथों में चला गया तब भारत में प्रशासन चलाने वाले अंग्रेज अधिकारियों के लिए ‘भारत की नैतिक व भौतिक प्रगति’ पर वार्षिक रपट दाखिल करना अनिवार्य किया गया। ये रपटें सैकड़ों पेज लंबी हुआ करती थीं। ‘नैतिक प्रगति’ में शिक्षा, संसदीय व्यवस्था, प्रेस की स्वतंत्रता, नागरिक अधिकार, संचार साधनों (पोस्ट व टेलीग्राफ) व यातायात के साधनों (सड़कें, पुल व रेलवे) जैसे मुद्दों का जिक्र होता था।

ग्रान्ट-जिनकी सोच ने श्रद्धालु ब्रिटिश व भारतीय सुधारकों को भारत को एक महान राष्ट्र बनाने का प्रयास करने की प्रेरणा दी-उनके लेखन से एक उद्धरण हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं- क्या हम अपनी शक्ति का प्रयोग उनके बीच के जातिगत भेदभाव को मिटाने के लिए करें? उनकी मूर्तियों को तोडऩे के लिए करें? कदापि नहीं। अगर हम बल प्रयोग करेंगे तो वे अपनी गलती को स्वीकार करने की बजाए अपने विचारों पर और दृढ हो जाएंगे। और अगर हम यह मान भी लें कि बल प्रयोग के नतीजे अच्छे होंगे तब भी ऐसा करना अन्यायपूर्ण होगा।’

परंतु उनकी कमियों और त्रुटियों को उजागर करने के लिए विवेकपूर्ण तर्कों के इस्तेमाल पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती। बल्कि यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम उनकी कमियों को उनके सामने रखें, ताकि वे जिस दख-दर्द को भोगते आ रहे हैं उससे उन्हें मुक्ति मिल सके। शासक के तौर पर हम उनके कष्टों को तटस्थता से देखते नहीं रह सकते। हमें उन्हें उनके दुखों से मुक्ति दिलाने के लिए हरसंभव उचित प्रयास करना चाहिए। अंधेरे को दूर करने का एक ही उपाय है प्रकाश फैलाना। हिन्दू इसलिए गलती कर रहे हैं क्योंकि वे अज्ञानी हैं और उनकी गलतियों को कभी उनके सामने नहीं रखा गया।

(फारवर्ड प्रेस के नवंबर 2013 अंक में प्रकाशित)


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