बहुजनों की खबरों का सवर्ण मीडिया मजाक उड़ाता है

पटना में आरक्षण के मुद्दे पर अगड़े जूनियर डॉक्टरों और पिछड़े जूनियर डॉक्टरों का आंदोलन हुआ। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने अगड़े जूनियर डॉक्टरों की खबरों को खूब प्रसारित किया, जबकि पिछड़े जूनियर डॉक्टरों के आंदोलन की खबरें गायब रहीं।

अभी हाल ही में जनसत्ता से सेवानिवृत्त हुए दलित पत्रकार गंगा प्रसाद का अनुभव है कि सन् 1990 के बाद से जात-पात का जितना विरोध हुआ, बाद में अंदर ही अंदर उतना ही जात-पात के पक्षधरों का प्रभाव फैला है। बड़े मीडिया घरानों के पत्रकार इस कदर जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त होते हैं कि वे आदिवासियों, दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों पर हुए जुल्मों की खबरों का मजाक उड़ाते हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया पर तो सबसे ज्यादा सवर्णों का दबदबा है। और इन समस्याओं के समाधान के वास्ते वे मीडिया में भी आरक्षण की जरूरत से इनकार नहीं करते। पेश है गंगा प्रसाद से प्रणय प्रियंवद की बातचीत…

मीडिया हाउसों में सामाजिक न्याय की स्थिति कैसी है?

मीडिया हाउस, कारपोरेट हाउसों में तब्दील हो रहे हैं। नतीजतन, आम लोगों का जो नजरिया मीडिया के प्रति था, वो अब नहीं है। पहले संपादक व पत्रकार, साहित्य और समाज से जुड़े होते थे। वे संवेदनशील होते थे। बिहार आंदोलन समाप्त होने के बाद सामाजिक-आर्थिक विषमताओं से मार खाए लोग मीडिया में आए। समाज के वंचित पढ़े-लिखों को भी मीडिया में नौकरी मिली। लेकिन 90 के बाद हुआ यह कि सामाजिक रूप से संपन्न और ताकतवरों का ही वर्चस्व बढ़ा। जात-पात का जितना विरोध हुआ था, बाद में अंदर-ही-अंदर उतना ही जात-पात के पक्षधरों का प्रभाव फैला।

पत्रकारिता करते हुए क्या आपको कभी यह महसूस हुआ कि आप भी वंचित समाज के हैं?

मेरा सौभाग्य है कि रघुवीर सहाय जैसे लोगों का आशीर्वाद मिला। बाद में अशोक सेकसरिया, रमेश चंद्र सिंह, राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी, सुरेन्द्र प्रताप सिंह आदि की वजह से मुझे पत्रकारिता में बढ़ावा मिला। फ्रीलांसिंग करते हुए जाति का एहसास नहीं हुआ लेकिन जैसे ही नौकरी में आया तो यह एहसास होने लगा। बड़े अखबारों में काम करते वक्त परोक्ष रूप से जाति-पाति के आधार पर उठा-पटक, गुटबाजी, काम लेना-देना देखा। काम के दरम्यान पाया कि किस तरह दलितों, पिछड़ों, अति पिछड़ों या मुसलमानों पर हुए जुल्मों की खबरों का मजाक उड़ाया जाता है। पत्रकार भी जातिवादी मानसिकता से उबरे हुए नहीं दिखे।

राजनीति में परिवर्तन से क्या तस्वीर बदली?

अखबारों में तो सवर्णों का दबदबा पहले से है। बाद में जब टीवी आया तो उनका दबाव और बढ़ गया। बिहार में राजनीतिक परिवर्तन हुआ। सत्ता परिवर्तन हुआ। लेकिन मीडिया में सामाजिक परिवर्तन नहीं हुआ। लालू प्रसाद यादवों के, नीतीश कुमार कुर्मियों के, रामविलास पासवान दुसाधों के नेता माने जाते रहे। इसी तरह सत्येन्द्र नारायण सिंह, दिग्विजय सिंह राजपूतों के नेता माने गए और श्रीकृष्ण सिंह भूमिहारों के नेता माने गए। मीडिया पर सब का वर्चस्व होना चाहिए था, पर ऐसा नहीं है। नवभारत टाइम्स, जनसत्ता और आर्यावर्त जैसे अखबारों में भी सवर्णों का वर्चस्व रहा।

कोई यादगार घटना जो आपको याद हो?

पटना में आरक्षण के मुद्दे पर अगड़े जूनियर डॉक्टरों और पिछड़े जूनियर डॉक्टरों का आंदोलन हुआ। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने अगड़े जूनियर डॉक्टरों की खबरों को खूब प्रसारित किया, जबकि पिछड़े जूनियर डॉक्टरों के आंदोलन की खबरें गायब रहीं। इस पर पिछड़े जूनियर डॉक्टरों ने मीडिया का विरोध किया और मांग की कि उनकी खबरें भी प्रसारित हों। पुलिस के साथ मिलकर मीडिया के कुछ लोगों ने पिछड़े जूनियर डॉक्टरों के जुलूस पर हमला किया। इससे जात-पात का अंदाजा लगाया जा सकता है।

मंडल आंदोलन का असर क्या पत्रकारिता पर हुआ?

कुछ भी नहीं। मीडिया में लोकतंत्र नहीं है। क्या मीडिया में आरक्षण है? नहीं, जबकि होना चाहिए।

मीडिया हाउसों की सामाजिक स्थिति कैसे सुधरेगी?

बड़ी पूंजी है तो कैसे सुधरेगी? जो लोग पूंजीवादी व्यवस्था के पोषक हैं उनकी ही संख्या यहां बढ़ेगी।

आप लोहियावादी हैं। लोहियावाद का क्या हुआ? क्या वह आज भी प्रासंगिक है?

लोहिया के जीते जी लोहियावाद का कत्ल हुआ। उनकी विचारधारा वाली पार्टी कई बार टूटी। समाजवादियों की पार्टी जितनी टूटी उतनी किसी की नहीं। एक बात यह भी है कि लोहियावाद में जितना लोकतंत्र है, उतना किसी और विचारधारा मैं नहीं।

(फारवर्ड प्रेस के नवंबर 2013 अंक में प्रकाशित)


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