फारवर्ड विचार  

फुले के कुतुबनुमा और आंबेडकर के नक़्शे के बगैर हम किसी राजनैतिक संघर्ष की कल्पना तक नहीं कर सकते. मुक्तिदायक सांस्कृतिक क्रांति तो दूर की बात है

अप्रैल फारवर्ड प्रेस के लिए बहुत महत्वपूर्ण महीना है. अगर हम इसके जन्म का महीना चुन सकते तो वह अप्रैल २००९ ही होता, जब आमचुनाव नज़दीक होते और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह कि हम उस पवित्र माह में इस पत्रिका को शुरू करते, जिसमें बहुजन भारत की दो महानतम आधुनिक विभूतियों, फुले और आम्बेडकर की जयंतियां मनाई जातीं है. परन्तु सरकार की इच्छा कुछ और ही थी. इसके बावजूद, हम एफपी की वर्षगांठ अप्रैल में ही मनाते हैं और वह भी देश के पहले आधुनिक महात्मा और डाक्टर साहेब की जन्मदिवस के आसपास. इस साल हम एफपी की छठवीं वर्षगाठ मनाने जा रहे हैं.

मैंने अपने मार्च २०१३ के संपादकीय में जो लिखा था, वह आज, जबकि मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को उसके बहुजन एनडीए सहयोगियों के साथ पूर्ण बहुमत प्राप्त है, और सही मालूम देती है. “फुले ने बहुजनों को वह कुतुबनुमा उपलब्ध करवाई, जो उन्हें ब्राह्मणवादी गुलामी से मुक्ति की राह दिखलाती थी और आंबेडकर ने उसका इस्तेमाल कर, दलिबहुजनों को दमन से मुक्ति दिलाने के रास्ते का खाका खींचा”.

1-cover__Layout 1हमारी चुनाव-पश्चात (जुलाई २०१४) आवरणकथा में प्रेमकुमार मणि ने लिखा था, “आंबेडकर और फुले की विचारधारा, बहुजनों की स्वाभाविक विचारधारा है…अगर वह (भाजपा), सावरकर-हेडगेवार की विचारधारा से ऊपर उठकर, फुले-आंबेडकर की सोच से जुड़ेगी तो इससे न सिर्फ वह स्वयं वरन राष्ट्र भी लाभान्वित होगा”. एक छोटी-सी चिड़िया ने हमारे कान में फुसफुसा कर बताया है कि मोदी ने बड़ी दिलचस्पी से वह पूरा आलेख पढ़ा, यद्यपि वे उसके निष्कर्ष से सहमत नहीं थे! स्पष्टतः, फुले-आंबेडकर विचारधारा से या तो बात पूरी तरह बनेगी या पूरी तरह बिगड़ेगी. और यही होना भी चाहिए.

इस माह की आवरणकथा के साथ हम एफपी के मूल योगदानकर्ताओं में से एक और दो अभिनव पुस्तकों “डीह्यूमनाएजिंग हिस्ट्री” (२००५, २०१५) व “नालेज एंड पॉवर: ए डिस्कोर्स फॉर ट्रांसफॉर्मेशन” (२०१४) के लेखक ब्रजरंजन मणि का पुनः स्वागत कर रहे हैं. उनके एक व्याख्यान, जो रद्द हो गया था, के अंशों में वे लिखते हैं, “दलितबहुजनों का सशक्तिकरण तब तक नहो सकता जब तक की वे फुले और आम्बेडकर की मुक्तिदायिनी विचारधारा का पुनर्निर्माण नहीं करते…आंबेडकर और फुले ने जिस सांस्कृतिक क्रांति की नींव रखी थी, वह न केवल अधूरी रह गयी वरन उसे मुख्य विमर्श में नज़रअंदाज़ किया गया या तोडा-मरोड़ा गया”.

फुले-आंबेडकर के कुतुबनुमा व नक़्शे द्वारा दिखाई गयी राह पर चलते हुए और बिरसा मुंडा से प्रेरित, दलित व आदिवासी, वर्तमान सरकार की नीतियों का विरोध कर रहे हैं, विशेषकर शिक्षा से सम्बंधित अनुसूचित जाति-जनजाति उप-योजना, जिसका घोर दुरुपयोग होता रहा है, और संशोधित भूमि अधिग्रहण विधेयक के बाबत. इस बार के हमारे फोटो फीचर व संक्षिप्त समाचार, बजट व जन-विरोधी विधेयक से ठगाए गए महसूस कर रहे बहुजनों के विरोध पर केन्द्रित है, जिसकी अपेक्षित चर्चा मीडिया में नहीं हुई.

इसके विपरीत, ओबीसी को शायद होश ही नहीं है की न्यायपालिका उनके आरक्षण के अधिकार में कटौती करती जा रही है. जहाँ हम सुप्रीम कोर्ट द्वारा जाटों को यूपीए द्वारा अंतिम क्षणों में दिए गए आरक्षण को रद्द करने के निर्णय से असहमत नहीं है परन्तु  शीर्ष न्यायालय की टिप्पणियां चिंतित करने वालीं हैं. उनका लक्ष्य ओबीसी को दिए गए जाति-आधारित आरक्षण को समाप्त करना प्रतीत होता है. पहले, मनमाने ढंग से आरक्षण पर ५० प्रतिशत की सीमा तय कर दी गयी (१९६३, १९९२). इसके बाद उच्चतम न्यायालय ने ‘क्रीमी लेयर’ को आरक्षण से वंचित कर दिया (१९९२). तत्पश्चात, ‘तीसरे लिंग’ को भी ओबीसी के सूची में शामिल कर लिया गया (२०१४). और अब न्यायालय कह रहा है कि यद्यपि जाति, किसी सामाजिक समूह के पिछड़ेपन के निर्धारण का प्रमुख व विशिष्ठ कारक हो सकती है, तथापि सुप्रीम कोर्ट केवल जाति के आधार पर पिछड़ेपन के निर्धारण को समय-समय पर हतोत्साहित करता रहा है.

कुल मिलाकार, धीरे-धीरे ओबीसी के अधिकार कम किये जा रहे है. सवाल यह है की कौनसी पार्टी या पार्टियाँ, अप्रतिनिधिक व अगम्य उच्चतम न्यायालय के गले में घंटी बांधेंगी? क्या इसके लिए मंडल ३.० की ज़रुरत होगी? क्या अगला आमचुनाव इसी मुद्दे पर लड़ा जायेगा?

फुले के कुतुबनुमा और आंबेडकर के नक़्शे के बगैर हम किसी राजनैतिक संघर्ष की कल्पना तक नहीं कर सकते. मुक्तिदायक सांस्कृतिक क्रांति तो दूर की बात है.

 

अगले माह तक…सत्य में आपका

आयवन कोस्का

 

फारवर्ड प्रेस के अप्रैल, 2015 अंक में प्रकाशित

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