महान दलित परम्परा का पुनरुद्धार

दलित समाज में लोकनाट्य, कला तथा लोकगीतों की परंपरा रची-बसी रही। सबका इतिहास है, सबकी संस्कृति। सवर्णों के त्योहारों के बहाने उनमें हिंदू परंपराओं का प्रवेश कराया गया। उनके नायकों को खलनायक बना दिया गया। दक्षिण में दलित महिलाओं को देवदासी और उत्तरप्रदेश तथा मध्यप्रदेश में बेडऩी नाम से उन्हें वेश्या बना दिया गया

पुरूष सूक्त द्वारा प्रतिपादित सामाजिक व्यवस्था पर भगवान बुद्ध के अतिरिक्त किसी और ने सवाल तक नहीं उठाया – उस व्यवस्था पर जिसने मनुष्य के माथे पर उसकी जाति लिख दी। हमने परंपरागत रूप से कुछ चीजों को उत्कृष्ट और पवित्र घोषित कर रखा है – जैसे ज्ञान के संस्थान, गुरू, पुस्तकें (गीता, मनुस्मृति, रामचरितमानस आदि), स्थान (देवस्थान)और कुछ परंपराएं जैसे मूर्ति पूजा की खास पद्धतियां व सामुदायिक संहिताएं, जिन्हें स्त्रियों और दलितों पर थोपा जाता रहा है।

Maharashtra-Lavani-danceहाशिए पर रहे श्रमण संस्कृति के लोगों और भोक्ता-परजीवी समाज के बीच आरंभ से ही सत्ता पर कब्जे के लिए संघर्ष रहा। धर्मग्रंथों के पुनर्पाठ की परंपरा आरंभ हुई। बकौल दिलीप मंडल, प्रश्न उठता है कि इन ग्रंथों से क्या किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचती है? (महिषासुर, सं. प्रमोद रंजन, दुसाध प्रकाशन)। जवाब में कहा जा सकता है कि धार्मिक ग्रंथ एक दूसरे की परंपराओं/मूल्यों की सीमाओं का उल्लंघन करते हैं। इसीलिए प्रमोद रंजन लिखते हैं कि हिंदू धर्म द्वारा दमित अन्य सामाजिक समूह भी धर्मग्रंथों के पाठों का विखंडन आरंभ करेंगे और अपने पाठ निर्मित करेंगे। (सम्पादकीय; किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन? 2013) । इन नए पाठों की आवाजें जितनी मुखर होंगी, बहुजनों की सांस्कृतिक गुलामी की जंजीरे उतनी ही तेजी से टूटेंगी।

बाइबल में वर्णित ‘आदम और ईव’ की कहानी में कहा गया है कि कल्पना शक्ति और बुद्धि, मनुष्य को प्रकृति से अलग करती है। अपने विकास-क्रम में मनुष्य प्राणी-सृष्टि को पार करके आगे गया यह सही है परंतु प्रकृति में स्थित अपने मूल घर से वह बहुत दूर भटक गया। पर जब हम दलित की बाते करते हैं तो वह लंबे समय तक प्रकृति से जुड़ा रहा और कहना चाहिए कि आज भी उसका एक बड़ा प्रतिशत प्रकृति से ही जुड़ा है। नदियों के नजदीक उसकी बसावट रही। यहां तक कि जोहड़ उनके घरों/गांवों के नजदीक रहे। विशेषरूप से घर के आंगन में नीम के वृक्ष से लगाव रहा। वृक्षों का उपयोग किया जाता था। घरेलू रीति-रिवाजों में तथा रोगों के उपचार के लिए वृक्षों की टहनियां तथा छाल इस्तेमाल होते थे। नीम के अलावा पीपल, आम, महुआ और बबूल का प्रयोग भी होता था।

आप दलितों के किसी गांव/खेड़े/बस्ती में जाएं, वहां श्रमगीतों के साथ जल, अग्नि, मौसम आदि के गीतों की गूंज महसूस होगी। बरसात होने पर उनके गीत रहे और बरसात को बुलाने के लिए दलित गीत गाते थे –

”मेघा भैया पानी दे, पानी दे गुडपानी दे,

तेरे घर में वर्षा होगी, घर-बाहर में वर्षा होगी,

धान बुआए जाएंगे,

बूढ़े मांड पियेंगे, जवान चावल खाएंगे’’

धार्मिक दृष्टि से देखें तो देश में अलग-अलग राज्यों/क्षेत्रों/ तथा द्वीपों में रहने वाले दलितों के बीच अलग-अलग तरह की ही मान्यताएं थीं। हालांकि अब उनमें विश्वास कम होता जा रहा है। ‘गोगा’ या जाहरपीर की पौराणिक कथा सांप को नियंत्रण में रखने तथा सांप के काटने से बचने से संबंधित है। घर तथा खेत में काम आने वाली वस्तुएं जैसे खुरपी, सिल-बट्टा, हल, रापी व हाड़ा (चमड़ा काटने के लिए काम में आने वाले हथियार), कैंची, फला (लकड़ी से बना) इन सब की विशेष अवसरों पर पूजा करने की परंपरा रही है।

मनुष्य के जन्म से कलाओं के विकास की नैसर्गिक प्रक्रिया परंपराओं/संस्कारों में रही, जो समय-समय पर रूपांतरित होती रही है। प्रकृति के काल प्रवाह में मानव में जब-जब भी इतिहास बोध जागृत होता है, तब-तब उसके सामने नए तरह का संसार उभरता है। आखिर दलितों को भी तो दुख और तकलीफों से इतर सुख के वे पल चाहिए, जिनमें वे अपने लोकगीतों संगीत और परंपराओं को याद करें। उदाहरण के लिए, पश्चिम बंगाल में दलितों में ‘बाउल गायन’ की परंपरा रची बसी रही। छत्तीसगढ़ में पंथीगीत रहे।

उत्तरप्रदेश और बिहार में नौटंकी परपंरा रही। महाराष्ट्र में तमाशा और लावनी परंपरा रही। दलित समाज में लोकनाट्य, कला तथा लोकगीतों की परंपरा रची-बसी रही। सबका इतिहास है, सबकी संस्कृति। सवर्णों के त्योहारों के बहाने उनमें हिंदू परंपराओं का प्रवेश कराया गया। उनके नायकों को खलनायक बना दिया गया। दक्षिण में दलित महिलाओं को देवदासी और उत्तरप्रदेश तथा मध्यप्रदेश में बेडऩी नाम से उन्हें वेश्या बना दिया गया। इस बारे में दलितों को सोचना चाहिए कि कैसे शास्त्रीय संगीत और कला के नाम पर सवर्णों ने दलितों को भ्रमित कर रखा है। ब्लैक साहित्य में ‘द रूट्स’ नाम से एक पुस्तक है, जिसमें ब्लैक समुदाय को अपनी परंपराओं/संस्कृति/इतिहास/ तथा साहित्य की ओर लौटने का संदेश दिया गया है। मैं भी इस लेख के बहाने आधुनिकता की दौड़ में भाग रहे दलितों को तथा अपने भीतर जाने-अनजाने ब्राह्मणी परंपराओं को विकसित करने वालों को यही संदेश देना चाहता हूं।

 

फारवर्ड प्रेस के अक्टूबर, 2015 अंक में प्रकाशित

 

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