कांचा आयलैया की पुस्तकों का विरोध क्यों?

आरएसएस कांचा आयलैया की लोकतांत्रिक वैचारिकी को कैसे बर्दाश्त कर सकता है? वह कब चाहेगा कि कांचा आयलैया की किताबें दलित-बहुजनों को हिन्दू धर्म के आध्यात्मिक फासीवाद के विरुद्ध तैयार करें और ब्राह्मण राष्ट्र के निर्माण को चुनौती मिले। कंवल भारती का विश्लेषण :

जब भारत में बहुजन चिंतन नहीं आया था, या यह कहना चाहिए कि जब तक भारत में दलित-पिछड़े वर्गों में ज्ञानोदय नहीं हुआ था, तब तक ब्राह्मण चिंतन ही भारत का राष्ट्र चिंतन हुआ करता था। अभी हाल तक ‘अमर उजाला’ और ‘दैनिक जागरण’ में एक ब्राह्मण लेखक का ‘राष्ट्र चिंतन’ कालम प्रत्येक सोमवार को एक साथ छपा करता था, जो उनकी मृत्यु के बाद ही बंद हुआ था। वह राष्ट्र चिंतन इतना वर्णवादी, सांप्रदायिक और जहरीला होता था कि बर्दाश्त नहीं होता था। उन दिनों मैं अकेला दलित लेखक था, जो अपने लेखों में उस राष्ट्र चिंतन पर प्रहार करता था। हिंदी पत्रकारिता में उस राष्ट्र चिंतन को बंद करने का दबाव न प्रगतिशील लेखकों ने और न पाठकों ने बनाया था। इससे समझा जा सकता है कि हिंदी में किस तरह का चिंतन राष्ट्र चिंतन माना जाता था। यह तो थी पत्रकारिता की स्थिति, पर साहित्य की स्थिति इससे भी बदतर थी। सारा हिंदी साहित्य हिन्दू साहित्य बना हुआ था।

प्रेमचंद आदि एक-दो प्रगतिशील लेखकों को छोड़कर किसी भी लेखक का साहित्य न जन सरोकारों से जुड़ा हुआ था, और न जनता में वैज्ञानिक सोच पैदा करने वाला था, और लोकतांत्रिक तो वह था ही नहीं। उन सबकी सोच वेद-वेदांत तक सीमित थी, या फिर वे तुलसी की तरह श्रीराम के चरणों में गिरे पड़े थे। तथाकथित राष्ट्रकवि और महाकवि भी हिंदुत्व को ही राष्ट्र समझते थे, और उसी की स्तुति में भारत भारती, कामायनी, रामकी शक्ति पूजा, द्वापर, त्रेता और पंचवटी लिखकर गर्व महसूस करते थे। इस सबका कारण यह था कि वे हिन्दू समाज के विशेषाधिकार प्राप्त वर्णों में जन्मे थे, इसलिए शोषण, अपमान और जातीय तिरस्कार क्या होता है, नहीं जानते थे। अगर जानते भी थे, तो उसका कारण वे भाग्य में ढूंढते थे। उनमें इतनी मेधा नहीं थी, कि व्यवस्था में देखते। किन्तु, जिन्होंने शोषण और तिरस्कार के बीज व्यवस्था में देखे, उन्होंने हिंदुत्व से बगावत की, पर वे राष्ट्रवादी नहीं माने गए। राष्ट्रवादी माने गए निराला, पन्त, जोशी, जो छायावाद और रहस्यवाद की कुहेलिकाओं में जाकर वेदांत के ब्रह्मजाल में परम शान्ति पाते थे—ब्रह्म सत्य है, और जगत मिथ्या है।

प्रो. कांचा आयलैया शेफर्ड

इस हिन्दू चिंतन-धारा के साहित्य ने भारत में एक ऐसे अलोकतांत्रिक मानस को तैयार किया, जिसके केंद्र में हिंदुत्व के विचार के सिवा और कोई विचार था ही नहीं। जो इतिहास उन्हें ब्राह्मणों ने दिया, वही उनका इतिहास बना, जो दर्शन दिया, वही उनका दर्शन बना, और जो वैचारिकी दी, वही उनकी वैचारिकी बनी। इसके बाहर भी कोई दर्शन, इतिहास और सौन्दर्य बोध हो सकता है, यह उनका मस्तिष्क मानता ही नहीं था। इसलिए, जब अस्सी और नब्बे के दशकों में भारत में दलित चिंतन और दलित साहित्य ने दस्तक दी, तो सदियों से कोल्हू के बैल की तरह एक ही जगह विचरण और जुगाली करने वाले हिन्दू लेखकों की खोपड़ी घूम गई, और वे धड़ाम हो गए।

वे यह सुनने को ही तैयार नहीं थे कि उनके पुरखों की वर्णव्यवस्था भी वाहियात व्यवस्था हो सकती है, श्रीराम अन्यायी भी हो सकते हैं, तथा द्रोणाचार्य कपटी और अत्याचारी भी हो सकते हैं, इसलिए उन लेखकों ने दलित साहित्य और विमर्श का भरपूर विरोध किया। सब तरफ उसका बहिष्कार किया गया। पत्र-पत्रिकाओं ने उसे छापना तो दूर, उसे वे पढ़ना तक गंवारा नहीं करते थे और रद्दी में फेंक देते थे, या सालों दबाए बैठे रहते थे। जब खत लिखकर या फोन करके कोई पूछता था कि आपको अमुक रचना भेजी गई थी, क्या हुआ? तो गैर-जिम्मेदाराना जवाब होता था, हमें तो मिली नहीं, या अस्वीकृत रचनाएं हम वापस भेज देते हैं या नष्ट कर देते हैं। इस प्रकार का एक कटु अनुभव ‘हंस’ के एक कार्यक्रम में ओमप्रकाश वाल्मीकि (जन्म 30 जून, 1950 – निधन 17 नवम्बर, 2013) ने साझा किया था।

किन्तु, दलित लेखकों ने भी मुख्यधारा के साहित्य से टक्कर लेने के लिए कमर कस ली थी और पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतर गए थे। हिंदी के नामवर विद्वानों ने दलित साहित्य पर तमाम तरह के अनर्गल आरोप लगाए थे, जिनका हम दलित लेखकों ने पूरी शिद्दत से जवाब दिया था। उनके आरोप थे—दलित साहित्य गाली-गलौंच का साहित्य है, उसमें कला नहीं है, उसमें सौन्दर्य नहीं है, वह जातिवादी है, विघटनकारी है, सवर्णों के विरुद्ध नफरत फैलाने वाला है, आदि-आदि। पर, जब हमने इन सारे आरोपों के जवाब दे दिए, तो अंतिम हथियार यह फेंका गया कि क्या दलित ही दलित साहित्य लिख सकता है? यह तो कोई भी लिख सकता है। इसके जवाब में हमने कहा कि जब सवर्ण भी दलित साहित्य लिख सकता है, तो अब तक लिखा क्यों नहीं? ‘जूठन’, ‘तिरस्कृत’ और ‘अपने-अपने पिजरे’ जैसी आत्मकथाएं दलित लेखकों ने ही क्यों लिखीं, किसी सवर्ण लेखक ने क्यों नहीं लिखी?

हमने सवाल किया कि अगर किसी सवर्ण को जूठन खाने का अनुभव है, किसी सवर्ण को मरे जानवर की खाल निकालने का अनुभव है, और सिर पर मैला ढोने का अनुभव है, तो सवर्णों ने अपने इन घृणित अनुभव का साहित्य क्यों नहीं लिखा? और अगर ये घृणित अनुभव उनके पास नहीं हैं, तो वे दलित साहित्य कैसे लिख सकते हैं?

इस तरह, पूरे एक दशक के अविराम संघर्ष के बाद दलित साहित्य को पहचान मिली। इस संघर्ष में हमें वाम प्रगतिशील लेखकों का समर्थन और सहयोग सर्वप्रथम और सबसे ज्यादा मिला। इस समर्थन और सहयोग ने दलित साहित्य को बहुत बड़ा संबल दिया। दूसरी तरफ आरक्षण की नीति और एस. के. थोराट के अध्यक्षीय कार्यकाल में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की छात्रवृत्ति योजना ने देश भर के दलित-पिछड़े वर्गों को एमफिल-पीएचडी की उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया, और सहायक प्रोफेसरों के पदों पर उनकी भर्ती का मार्ग प्रशस्त किया।

बहुजन विमर्श को विस्तार देतीं फारवर्ड प्रेस की पुस्तकें

परिणामत:, देश भर के विश्वविद्यालयों में बहुजन प्रोफेसरों और विद्यार्थियों के दबाव ने दलित साहित्य को पाठ्यक्रमों में लगाने का दबाव बनाया। दो विश्वविद्यालयों की दलित साहित्य पाठ्यक्रम समिति में मैं भी सदस्य रहा। आज भारत के संभवत: सभी विश्वविद्यालयों में दलित साहित्य पाठ्यक्रम लगा हुआ है, और तमाम छात्र दलित साहित्य और दलित नायकों पर शोध कार्य कर रहे हैं।

लेकिन पिछले चार सालों से आरएसएस और भाजपा के सत्ता में आने के बाद हिन्दू पुनर्जागरण की राजनीतिक परिस्थितियां लगभग सभी विश्वविद्यालयों में जोर पकड़ रही हैं। शोध में सीटें कम करके बहुजन छात्रों को हतोत्साहित किया जा रहा है, और आरक्षण में विभागवार नीति लागू करके सहायक प्रोफेसरों के आरक्षित पदों को आधे से भी कम करके सभी पदों पर अधिक से अधिक हिंदूवादी सवर्णों को नियुक्त किया जा रहा है। परिणामत: धीरे-धीरे दलित साहित्य और वैचारिकी को पाठ्यक्रम से हटाया जा रहा है।

अभी हाल की घटना दिल्ली विश्वविद्यालय की है, जिसके अकादमिक मामलों को देखने वाली स्टैंडिंग कमेटी ने राजनीति शास्त्र के पाठयक्रम से प्रख्यात बहुजन लेखक कांचा आयलैया की तीन पुस्तकें निकालने का निर्णय लिया है। ये तीन किताबें हैं : (1) ‘व्हाई आई एम नॉट हिन्दू’, (2) ‘पोस्ट हिन्दू इंडिया’ और (3) ‘बफैलो नेशनलिजम’। ‘पोस्ट हिन्दू इंडिया’ वही पुस्तक है, जिसे पढ़कर तेलगुदेशम पार्टी के सांसद टी. जी. वेंकटेश ने कांचा आयलैया को सरे आम सड़क पर फांसी देकर मारने की घोषणा की थी। इस सांसद ने उनके खिलाफ इतनी दहशत पैदा कर दी थी कि उन्होंने आपने आप को अपने घर में कैद कर लिया था। उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में, जो 30 सितम्बर 2017 के अंग्रेजी समाचार पत्र इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हुआ है, उन्होंने अपनी किताब ‘पोस्ट-हिन्दू इंडिया’ के बारे में विस्तार से चर्चा की है। यह किताब 2009 में प्रकाशित हुई थी। एक छोटे प्रकाशक ने इसका तेलगु अनुवाद कराकर प्रत्येक अध्याय को अलग-अलग पुस्तिकाओं में छाप दिया। इसका पहला अध्याय आदिवासी लोगों पर है, जिसका नाम है ‘अवैतनिक शिक्षक’। दूसरा अध्याय चमारों पर है, जिसका नाम उन्होंने ‘हाशिये के वैज्ञानिक’ रखा है। तीसरा अध्याय महारों पर है, जिसका नाम ‘उत्पादक सैनिक’ है। उसके बाद का अध्याय धोबी समुदाय पर है, जिसका नाम ‘उपेक्षित नारीवादी’ है। एक अध्याय नाइयों पर है, जिसका नाम ‘सामाजिक चिकित्सक’ है। इसके बाद एक अध्याय लुहारों, सुनारों और कुम्हारों पर है, जिसका नाम ‘अज्ञात इंजीनियर’ है। इसी तरह एक अन्य अध्याय ‘दुग्ध और मांस अर्थव्यवस्था’ पर है, तो एक ‘खाद्य उत्पादक’ जाट, गूजरों और कप्पुओं पर है। अंतिम अध्याय उन्होंने वैश्य समुदाय पर लिखा है, जिसका नाम ‘सामाजिक तस्कर’ है। सारा विवाद इसी ‘सामाजिक तस्कर’ अध्याय पर है, जिसे तेलगु प्रकाशक ने तेलगु में अलग पुस्तिका में छापा है. इसी ‘सामाजिक तस्कर’ को पढ़कर वैश्य समुदाय ने कांचा आयलैया का लगातार विरोध किया था। ‘सामाजिक तस्कर’ में कांचा आयलैया ने क्या स्थापित किया है? इसे भी उन्होंने अपने इंटरव्यू में स्पष्ट किया है. वह कहते हैं, “उत्तर-गुप्त काल से ही सारा व्यापार वर्णव्यवस्था के द्वारा वैश्यों के लिए सुरक्षित हो गया था। और वे वस्तुओं की खरीद-फरोख्त में लोगों के साथ धोखा करते थे। इतिहास बताता है कि वे अपने धन को जमीन में दबा कर रखते थे, जिसे वे ‘गुप्त धन’ कहते थे। वे उस धन को वापस कृषि उत्पादन के कार्यों में कभी व्यय नहीं करते थे। इस संस्कृति में परोपकार की भी कोई अवधारणा नहीं है। दूसरी जातियों के साथ अन्तर्विवाह की भी अवधारणा भी इसमें नहीं है। वे त्योहारों पर भी मिलते-जुलते नहीं हैं। वे लगभग हर किसी को अछूत समझते हैं। यही संस्कृति उच्चतम स्तर पर चली गई है। आज भारतीय व्यापार की 46 प्रतिशत पूंजी इसी बनिया समुदाय के हाथों में है। इस तरह ‘सामाजिक तस्कर’ पर यह छोटा सा अध्याय बताता है कि किस तरह तस्करी करके राष्ट्र की पूंजी को अवैध रूप से उसकी सीमाओं के बाहर ले जाया जा रहा है। सामाजिक तस्करी तब होती है, जब धन देश के भीतर रहता है। लेकिन यह मनु के धर्मशास्त्र के अनुसार निर्धारित की गई एक ही जाति तक सीमित है। इसलिए वे कोई निवेश नहीं करते, सिर्फ जमाखोरी करते हैं। और यह जमाखोरी किसी सामाजिक कार्य में व्यय नहीं होती है।”

कांचा आयलैया की तीन किताबें जिन्हें लेकर उठाया जा रहा है सवाल

कांचा आयलैया ने यह भी साबित किया है कि अडाणी और अंबानी ने आज जितनी पूंजी बनाई है, वह किसी भी सामाजिक उत्तरदायित्व की संस्कृति से नहीं जुडी हुई है। वह न किसी मानवीय सहानुभूति के काम में व्यय हुई है, और न उसने कोई मानवीय हितों का कोष स्थापित किया है। एक जाति के द्वारा किए जाने वाले व्यापार ने भारत में किसी भी व्यापारिक पूंजी का विकास स्वीकार नहीं किया है, मध्यकाल से ही वह किसी भी स्वदेशी उद्योग के विकास का पक्षधर नहीं रहा है। बनिया-ब्राह्मण नेटवर्क के कारण ही सोने के विशाल भंडार को मंदिरों में रखा गया था। इस तरह धन को दूर छिपाया गया था। परिणामत:, देशी उद्योग-धंधों का विकास नहीं हुआ। आज भी यही स्थिति बनी हुई है। यही कारण है कि वे निजी क्षेत्र में आरक्षण देने से मना कर देते हैं, और सरकारी क्षेत्र में नौकरियां नहीं हैं। इसलिए कांचा आयलैया का कहना है कि वैश्य ‘सामाजिक तस्कर’ हैं, और मनु के धर्मशास्त्र के अंतर्गत ब्राह्मणों ने उनके लिए किले बनाए हुए हैं, जिसे ‘आध्यात्मिक फासीवाद’ कहा जाता है। इसी इंटरव्यू में वह याद दिलाते हैं, “आज भी 46 प्रतिशत पूंजी बनियों के हाथों में है। नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद, निजी क्षेत्र पर फोकस और भी बढ़ गया है। यदि वे अब भी सामाजिक उत्तरदायित्वों को नहीं निभाते हैं, तो किसानों की आत्महत्याएं नहीं रुक सकतीं।”

कांचा आयलैया की दूसरी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘व्हाई आई एम नॉट हिन्दू’ है। इसके हिंदी में भी दो अनुवाद हो चुके हैं, एक के अनुवादक मुकेश मानस हैं और दूसरा अनुवाद ओमप्रकाश वाल्मीकि ने किया था। वाल्मीकि वाला अनुवाद मैं नहीं देख सका हूं, पर मुकेश मानस द्वारा किए गए अनुवाद ‘मैं हिन्दू क्यों नहीं हूँ’ (2003) से मैं यहाँ कुछ अंश उद्धरित करना चाहूँगा। एक स्थान पर कांचा आयलैया लिखते हैं-

“मैंने उस्मानिया विश्वविद्यालय में पढ़ाना शुरू किया। यहां मैंने महसूस किया कि वैज्ञानिक शिक्षा और पश्चिमी प्रभाव भी हिन्दुओं को विवेकपूर्ण प्राणियों में नहीं ढाल पाए हैं। आधुनिक विज्ञान उन पर कोई असर नहीं डाल पाया है। इसका एक कारण यह है कि वे कभी भी उत्पादन क्षेत्रों में नहीं रहे हैं। जीवन के उन अनुभवों से उनका कोई वास्ता नहीं रहा है, जिनसे एक साधारण भारतीय दो-चार होता है। इसलिए वे उत्पादन से पैदा होने वाले ज्ञान का कोई मोल नहीं समझते हैं।” (पृष्ठ 57)

छह सौ साल पहले कबीर ने भी ब्राह्मण से यही कहा था—‘मैं कासी का जुलाहा, तू चीन्ह न मोर ग्याना।’

कांचा आयलैया एक अन्य जगह पर लिखते हैं-

“शहरों में केवल ब्राह्मण, बनिया और कम्मा दुकानें ही नहीं थीं, बल्कि वहां जाति गलियां और जाति कालोनियां भी थीं। दलित-बहुजन इन उच्च जातीय गलियों और कालोनियों में केवल एक नौकर, दूधिया, सब्जीवाला, या राजमिस्त्री के रूप में ही प्रवेश पा सकते थे। वे कौशल के विक्रेता थे और कौशल रहित तथाकथित ऊंची जाति वाले उनके खरीदार थे। अधिकतर दलित-बहुजन झुग्गी-झोपड़ियों में ही रहते थे। उन्हें वे सारे काम करने की अनुमति नहीं है, जिससे उनकी सामाजिक स्थिति सुधर सकती है या वे ब्राह्मण-बनिया स्तर तक पहुंच सकते हैं।” (पृष्ठ 60)

कांचा आयलैया हिन्दू देवताओं के बारे में भी लिखते हैं—

“हिन्दू धर्म ने एक सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरचना बनाई है। यह संरचना व्यवस्थित ढंग से दलित-बहुजनों की चेतना को प्रभावित करती है। हिन्दू धर्म ने ब्राह्मणवादी शक्तियों के प्रभुत्व को कायम करने वाले अनेक संस्थाओं की रचना की है। इसके लिए हिंदुत्व बरसों से दो पद्धतियों का इस्तेमाल करता रहा है—(1) इसने सहमति की एक व्यवस्था बनाई है। वह इस व्यवस्था को विभिन्न देवी-देवताओं के रूपों के जरिए बनाए रखता है। इसने कुछ रूपों को सीधे उस सामाजिक आधार से ले लिया है, जिसका यह शोषण करना चाहता है। (2) जब-जब सहमति की व्यवस्था असफल होती है, या जनसमूह पर उसकी पकड़ ढीली हो जाती है, तब यह हिंसा का सहारा लेता है। दरअसल हिन्दूवाद के लिए नियंत्रण का प्रमुख तंत्र हिंसा ही बनी रही है। यही कारण है कि दूसरे धर्मों के देवताओं के विपरीत हिन्दू देवता तमाम हथियारों से लैस हैं। पूरी दुनिया में कोई ऐसा दूसरा धर्म नहीं है, जिसने जनसमूह को अपने प्रभाव में रखने के लिए इतने किस्म के देवताओं की रचना की हो। इसलिए हिन्दू देवताओं और दलित-बहुजनों के बीच का सम्बन्ध शोषक और शोषित तथा छली और छले जाने वाले का संबंध है। हिन्दू धर्म की एक विशेषता यह भी रही है कि यह शोषित को दिमाग और शरीर दोनों स्तरों पर प्रभावित करता है।” (पृष्ठ 65)

कांचा आयलैया ने किताब के अंत में भारतीय समाज के दलितीकरण की आवश्यकता पर जोर दिया है। वे कहते हैं कि ‘भारतीय समाज दलितवाड़ों से सीखे। दलितवाड़ों की चेतना वैयक्तिक नहीं, बल्कि सामूहिक होती है।’ (पृष्ठ 106) यहां उन्होंने उन हिन्दुओं को चेतावनी दी है, जो राष्ट्रवाद की बात करते हैं, पर जिनकी नस-नस में जाति का जहर भरा हुआ है। अंत में वे कहते हैं, “अगर ब्राह्मणवाड़ा उनका आदर्श है, तो दलितवाड़ा हमारा आदर्श है। वे अपने घरों की छतों से चिल्ला रहे हैं, ‘भारत का हिन्दूकरण करो’, तो हम भी ताड़ के पेड़ों से, खेतों से, पेड़ों के शिखरों से और दलितवाड़ों से चिल्लाएंगे कि भारत का दलितीकरण होना चाहिए।” (पृष्ठ 120)

कांचा आयलैया की तीसरी किताब ‘बफैलो नेशनलिज्म’ है, जिसे हटाने की सिफारिश की गयी है। यह पुस्तक द हिंदू, डेक्कन हेराल्ड, द डेक्कन क्रॉनिकल, द हिंदुस्तान टाइम्स, और मेनस्ट्रीम जैसे पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में उनके प्रकाशित लेखों का एक संग्रह है। इसमें उन्होंने आम लोगों की उत्पादकता पर बल देते हुए उनकी स्थिति का चित्रण तेलुगू दलित कवि ग़दर की इन पंक्तियों को उद्धृत किया है—

हे मां लचुमम्मा, आपका ब्लाउज फटा हुआ है,

आपके बाल गंदे हैं, आपकी साड़ी भी फटी हुई है,

आपके पास नई साड़ी खरीदने के लिए पैसा नहीं है।

उस स्थिति में भी आपने क्या किया है?

आपने पौधे लगाए, एक बैल की तरह पीछे की ओर चलते हुए,

मिट्टी से भोजन का उत्पादन करने के लिए।’

कांचा आयलैया ने इस किताब में हिन्दू धर्म के आध्यात्मिक फासीवाद को रेखांकित करते हुए सत्ताधारी अभिजात वर्ग की कट्टरता, उच्च जातियों के नेतृत्व, हिन्दू गाय, राष्ट्रवादी ब्राह्मण बनाम कम्युनिस्ट ब्राह्मण जैसे विषयों पर चर्चा की है और इस सबको उन्होंने ‘भैंस राष्ट्रवाद’ का नाम दिया है, जिसे, उनके अनुसार, ‘गऊ राष्ट्रवाद’ ने बाहर कर दिया है। उन्होंने दर्शाया है कि यह उच्च जातियों का राष्ट्रवाद है, जिसे फासीवाद के रूप में आरएसएस संचालित कर रहा है। एक लेख में वह लिखते हैं कि दलित-बहुजनों की स्थिति उस काली और खूबसूरत भैंस की तरह है, जो भारत की गायों की तुलना में सबसे ज्यादा और सफ़ेद दूध देती है, लेकिन नागरिक समाज में न तो उनकी कोई पवित्र स्थिति है, और न उनको संविधान में कानूनी संरक्षण मिला हुआ है। यह स्थिति हमें यह सोचने के लिए मजबूर करती है कि आखिर यह किनका भारत है? कांचा आयलैया की नजर में भारत की दो संभावित परिभाषाएं हो सकती हैं। अगर एक भारत, जमीन के सीने को चीर कर अनाज पैदा करने वाले, बर्तन, पहिए, जूते और मूर्तियां बनाने वाले उत्पादन कौशल का होता है, तो वह आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों का भारत होगा। किन्तु अगर भारत को शास्त्रों (ऋग्वेद से गीता तक और गोलवलकर की ‘बंच ऑफ़ थाट्स’ तक), मंदिरों और उनके सैद्धांतिक स्वामित्व के राष्ट्र के रूप में परिभाषित किया जाता है, तो वह ब्राह्मणों का भारत होगा। और, यदि उस परिभाषा में धन का स्वामित्व भी शामिल है, तो वह भारत उच्च जातियों का भी भारत होगा। दुर्भाग्य से, भारत को बलपूर्वक ब्राह्मणों और उच्च जातियों का भारत बनाया जा रहा है।

ब्राह्मण भारत और उत्पादन कौशल के भारत को समझने के लिए, तथा यह जानने के लिए कि आरएसएस किस तरह का आध्यात्मिक फासीवाद कायम कर रहा है, और वह दलित-बहुजनों के लिए कितना घातक है, ‘बफैलो नेशनलिज्म’ का अध्ययन करना बहुत जरूरी है।

आरएसएस का हिन्दू तंत्र इस लोकतांत्रिक वैचारिकी को कैसे बर्दाश्त कर सकता है? वह कब चाहेगा कि कांचा आयलैया की किताबें दलित-बहुजनों को हिन्दू धर्म के आध्यात्मिक फासीवाद के विरुद्ध तैयार करें और ब्राह्मण राष्ट्र के निर्माण को चुनौती मिले। इसलिए दिल्ली विश्वविद्यालय की ब्राह्मणवादी स्टैंडिंग कमेटी से, जिसमें एक भी लोकतांत्रिक प्राणी सदस्य नहीं है, कांचा आयलैया के लोकतांत्रिक विचारों को पाठ्यक्रम से निकालने की ही अपेक्षा की जा सकती है। कमेटी के लोग कांचा आयलैया के विरोधी नहीं हैं, वरन सच यह है कि उनका मस्तिष्क उसी हिन्दू साहित्य से निर्मित हुआ है, जो ब्राह्मण, मनु, राम, वेद, वेदांत और पुराण के बाहर सोचना ही नहीं चाहता।

लेकिन इन मनुवादियों को यूं ही नहीं छोड़ देना है। इनके खिलाफ लगातार आन्दोलन करने की जरूरत है। क्योंकि इनको नष्ट किए बिना भारत में सही मायने में लोकतंत्र स्थापित नहीं किया जा सकता। दुनिया में विचार आगे विकास करता है, परन्तु भारत दुनिया का एक मात्र देश है, जिसमें विचार को सदियों पीछे धकेलने की लगातार कोशिश हो रही है। लेकिन आरएसएस सिर्फ साहित्य को रोक सकता है, विचार को नहीं। बहुजन वैचारिकी ब्राह्मणवाद के लिए हमेशा चुनौती बना रहेगा, क्योंकि यह वह प्रवाह है, जिसे कोई बांध नहीं रोक सकता।

(कॉपी संपादन – एफपी डेस्क)


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