ब्राह्मण हमारे पुरखों का अपमान करते हैं : पेरियार संतोष

हम युवा हैं। हम युवाओं को जोड़ रहे हैं। उन्हें बता रहे हैं कि ब्राह्मणों के बहकावे में मत आओ। वे हमारे पुरखों का ही अपमान कर रहे हैं और ऐसा करने के लिए हमें प्रेरित कर रहे हैं। महिषासुर शहादत दिवस समारोह के आयोजन के पीछे भी हमारा मकसद यही था कि वे यह समझें कि ब्राह्मणों की साजिश क्या है। बक्सर के सामाजिक कार्यकर्ता पेरियार संतोष यादव से विशेष बातचीत के संपादित अंश :

वर्ष 1912 से पहले बिहार अंग्रेजों के राज में बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा था। बंगाल में हुए समाज सुधार आंदोलनों का बिहार में कितना असर हुआ, इसका आकलन करना जटिल कार्य है, लेकिन यह तो कहा ही जा सकता है कि बिहार को उन आंदोलनों का लाभ न्यूनतम ही हुआ। इस प्रकार हम देखें तो अंग्रेजों के समय में बिहार में खासकर दलितों और पिछड़ों के दृष्टिकोण से सामाजिक आंदोलन की नींव 1933 में पड़ी, जब त्रिवेणी संघ का गठन हुआ। यह एक ऐसा मंच साबित हुआ, जो न केवल राजनीतिक, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव का सारथी बना। इसी बुनियाद पर आधारित है आज का बिहार और इसका सामाजिक ताना-बाना, जिनका प्रत्यक्ष प्रभाव राजनीति पर भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इन सबके बावजूद ब्राह्मणवाद के खिलाफ ठोस लड़ाई की शुरुआत नहीं हुई। नब्बे के दशक में लालू प्रसाद के पहले मुख्यमंत्रित्वकाल में इसकी झलकियां देखने को मिलीं। परंतु, बाद में यह संघर्ष शिथिल पड़ गया। हुआ यह कि सामाजिक चेतना तो बढ़ी, लेकिन ब्राह्मणवाद हावी रहा। हाल के वर्षों में बिहार में द्विज परंपराओं के खिलाफ संघर्ष तेज हुए हैं। मुजफ्फरपुर, नवादा, गया, पटना और वैशाली आदि जिलों में महिषासुर शहादत दिवस मनाया जाने लगा है, जो कि सवर्ण देवी-देवताओं, उनकी परंपराअाें का विरोध व अपनी सांस्कृतिक अस्मिता का परिचायक है।

बीते 28 अक्टूबर 2018 काे बिहार के बक्सर जिले में भी महिषासुर शहादत के आयोजन की तैयारी की गई थी। शहर के ज्योति चौक पर बड़ी संख्या में बहुजन समाज के लोग जुटे भी, परंतु द्विजों की शह पर पुलिस ने इस आयोजन को होने नहीं दिया। पुलिस ने इसका नेतृत्व कर रहे पेरियार संतोष यादव को गिरफ्तार भी कर लिया। उन पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने सवर्णों की देवी दुर्गा के खिलाफ फेसबुक पर टिप्पणी की है। हालांकि, उन्हें 01 नवंबर 2018 को जेल से रिहा कर दिया गया। उनके खिलाफ मामला दर्ज कराने वाले दीपक यादव ने सवर्णों की साजिश बताते हुए मामला वापस ले लिया।

पेरियार संतोष यादव

दरअसल, पेरियार संतोष यादव बिहार के उन बहुजन युवाओं में शामिल हैं, जिन्होंने द्विज परंपराओं के खिलाफ बिगुल फूंक दिया है। प्रस्तुत हैं उनसे बातचीत के संपादित अंश :

आखिर क्या वजह रही कि आपने द्विज परंपराओं का विरोध करना शुरू कर दिया?

देखिए, मेरा जन्म बक्सर जिले के महदह में एक ऐसे परिवार में हुआ, जो द्विज परंपराओं को मानता था। उनके जैसे कर्मकांड करता था। जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कार वैसे ही थे, जैसे कि द्विजों के। मेरे पिता का निधन 1990 में हो गया। उन दिनों मैं भी द्विज परंपराओं को मानता था। लेकिन, एक घटना घटित हुई जिसने मेरे जीवन को बदल दिया। मैंने जाना कि द्विज परंपराएं केवल बहुजनों को मूर्ख बनाकर उनका शोषण करने के लिए हैं।

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हुआ यह कि अनंत चतुर्दशी का दिन था। जैसा कि मैंने पहले बताया कि मैं अन्य लाेगाें की तरह सवर्ण देवी-देवताओं में विश्वास रखता था। मैंने भी अनंत चतुर्दशी के दिन उपवास रखा। इस दिन ब्राह्मण के घर जाकर कथा सुनने की पंरपरा है। नमक नहीं खाया जाता है। लोग अपने-अपने घर से थाली में मिठाइयां व अनंत (एक धागा, जिसे बांह में बांधा जाता है) ले जाते हैं। मैं भी भूखे पेट रहकर ब्राह्मण के घर गया। ब्राह्मण कथा सुनाने लगा। अंत में उसने हम सबसे थाली में पानी मथने को कहा और इसे समुद्र मंथन की संज्ञा दी। फिर उसने कहा कि ‘अनंत फल’ मिला? उसने हम सभी को हां कहने के लिए कहा। हम सबने उसके कहे अनुसार हां कहा। फिर उसे सिर पर चढ़ाने को कहा।

मुझे यह बात अजीब-सी लगी। समुद्र थाली में कैसे समा सकता है। फिर जिस पानी को ब्राह्मण अनंत फल बता रहा है, वह तो हम रोज पीते हैं। फिर इसके कहने पर यह अनंत फल कैसे? उस वक्त में किशोर था। लेकिन, यह समझ गया कि ब्राह्मण ढोंग कर रहा है। फिर सवर्ण देवी-देवता और ब्राह्मणों का पाखंड समझ में आने लगा और मैंने विरोध करना शुरू कर दिया।

उन दिनों परिवार के लोगों ने आपकी इस भावना को कितना समझा?

कोई नहीं समझता था। सब मुझे डांटते और डराते रहते थे। कहते कि देवी-देवता का अपमान नहीं किया जाता। इससे पाप होता है। देवी-देवता रूठ जाएंगे, तब बहुत नुकसान होगा। मेरी उम्र भी कम थी। जब पिताजी का निधन हुआ, तब द्विज परंपराओं के जैसे अंत्येष्टि, दशकर्म और ब्रह्मभोज हुए। मैं इसका विरोध करना चाहता था, पर किसी ने मेरी बात नहीं मानी। लेकिन, मैंने हार नहीं मानी। फिर जब मैं घर का मुखिया बना, तब मैंने द्विज परंपराओं को खारिज करना शुरू कर दिया।

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इसी वर्ष 26 जनवरी को मेरे दादा जी का देहांत हुआ। मेरे परिजन मेरी बात मानते थे। मैंने सभी परिजनों को बुलाया और द्विज परंपराओं के ढोंग के बारे में समझाया। सब मान गए। बिना ब्राह्मण के अंत्येष्टि हुई और कोई रीति-रिवाज नहीं अपनाए गए। किसी ने सिर मुंडन नहीं करवाया।

मैं इस मौके को खास बनाना चाहता था। अपने समाज के लोगों को संदेश देना चाहता था। इसलिए दादा जी के निधन के एक महीने बाद 25 फरवरी को अपने घर पर एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया। इसमें हजारों की संख्या में लोग शामिल हुए। ब्राह्मणवाद और उसकी कुरीतियों के बारे में लोगों को बताया गया। कार्यक्रम के अंत में हम लोगों ने दाल-चावल-सब्जी के भोज का प्रबंध रखा था। गांवों में इसे कच्ची भोज कहते हैं। जिस भोज में पूड़ियां और मिठाई आदि का प्रबंध होता है, उसे पक्की की संज्ञा दी जाती है।

एक बात और इस श्रद्धांजलि सभा में मैंने सवर्णों को आमंत्रित नहीं किया था। हम लोगों के घर कच्ची भोज खाने से उनका धर्म भ्रष्ट हो जाता है।

आपने अपने नाम के पहले पेरियार कबसे लिखना शुरू किया?

यह नाम मुझे बक्सर के लोगों ने दिया है। मैं द्विज परंपराओं का विरोध सार्वजनिक तौर पर करने लगा। कार्यक्रमों में जाता और लोगों को इसके बारे में बताता। लोगों ने ही मुझे पेरियार कहना शुरू कर दिया। मैं स्वयं पेरियार के सिद्धांतों को मानता हूं। पेरियार द्विज परंपराओं के घोर-विरोधी थे। मैं उन्हें अपना आदर्श मानता हूं।

बक्सर जैसे शहर में, जिसके बारे में कहा जाता है कि रामायण से इसका संबंध है, आपको ब्राह्मणों का विरोध नहीं झेलना पड़ा?

आपने सही कहा। रामायण में बक्सर का खास महत्व द्विजों ने बताया है। यदि उनका कहा मान भी लें, तो बक्सर तो हम बहुजनों का हुआ न? असुर वीरांगना तारका हमारे बक्सर की शासक थीं, जिन्हें राम ने षड्यंत्र करके मार दिया था। मैं तो कहता हूं कि यह पूरा इलाका बहुजनों का था। गया का ही उदाहरण लें, गया का नाम गयासुर के नाम पर है। ब्राह्मणों ने उनकी हत्या कर दी और ऐसे प्रचारित किया कि ब्राह्मणों के द्वारा मारे जाने के बाद भी गयासुर को मोक्ष प्राप्त हुआ। यह सब ब्राह्मणों की साजिश है और कुछ नहीं।

आपके ऊपर दुर्गा के खिलाफ टिप्पणी करने का आरोप लगाया गया और मुकदमा भी दर्ज हुआ। आपको जेल भी जाना पड़ा।

यह सवर्णों की साजिश थी। उन लोगों ने हमारे ही समाज के एक व्यक्ति दीपक यादव के द्वारा मामला दर्ज कराया। मैंने फेसबुक पर वही लिखा, जो द्विजों ने बताया है। उन्हें बताना चाहिए कि क्या दुर्गा ने महिषासुर की हत्या छल से नहीं की? क्या वह दुल्हन के वेश में महिषासुर के पास नहीं गई थी? जो मेरे लिखे का विरोध कर रहे हैं, उन्हें पूरी बात बतानी चाहिए। मैंने जो लिखा, वह किसी का अपमान करने के लिए नहीं, बल्कि बहुजन समाज के अपने लोगों को यह बताना था कि कैसे हमारे पुरखे महिषासुर की हत्या छल से की गई थी और उन्हें खलनायक बना दिया गया।

महिषासुर शहादत दिवस समारोह को पुलिस ने रोक दिया। क्या हुआ था उस दिन?

देखिए, हम लोगों ने एक सप्ताह पहले ही स्थानीय प्रशासन को इस आयोजन के संबंध में सूचना दे दी थी। हम कई संगठनों के लोग थे इस आयोजन में। जहां मेरी संस्था जनहित अभियान के अलावा दलित अधिकार मंच व सत्य शोध संघ के सदस्य भी शामिल थे। 28 अक्टूबर को 11 बजे से लेकर शाम के 5:00 बजे तक यह आयोजन होना था। हम लोगों ने ज्योति प्रकाश चौक पर टेंट आदि का इंतजाम कर रखा था। लेकिन, उसी बीच पुलिस आई और उसने आयोजन रोकने को कहा। जब यह सब चल रहा था, तब मेरे एक मित्र मेरे मोबाइल से वीडियो बना रहे थे। पुलिस ने उनसे मोबाइल छीन लिया और अपने साथ लेते गए। मैंने जब इस बारे में एसडीओ को बताया, तो उन्होंने कहा कि मेरे साथ थाने चलिए, मोबाइल मिल जाएगा।

मैं और मेरे कुछ साथी एसडीओ की गाड़ी में बैठने के लिए आगे बढ़े, तभी कई द्विज लोगों ने हमला बोल दिया। वे मुझे जान से मार देना चाहते थे। यह पुलिस की शह पर किया गया। लेकिन, जब हमारे साथियों ने इसका विरोध किया, तब पुलिस मुझे थाने ले गई। थाने में मुझे बताया गया कि मेरे खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। मैंने भी अपने ऊपर हुए हमले की बाबत तीन लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया।

अब आपकी रणनीति क्या है? आप इस सांस्कृतिक प्रतिरोध की लड़ाई को आगे कैसे ले जाएंगे?

हम युवा हैं। हम युवाओं को जोड़ रहे हैं। उन्हें बता रहे हैं कि ब्राह्मणों के बहकावे में मत आओ। वे हमारे पुरखों का ही अपमान कर रहे हैं और ऐसा करने के लिए हमें प्रेरित कर रहे हैं। महिषासुर शहादत दिवस समारोह के आयोजन के पीछे भी हमारा मकसद यही था कि वे यह समझें कि ब्राह्मणों की साजिश क्या है? महिषासुर हमारे पूर्वज थे। लेकिन, उनकी हत्या दुर्गा ने कैसे छलपूर्वक कर दी। हम विरोध करेंगे और अपनी सांस्कृतिक अस्मिता- जो बुद्ध से जुड़ी है और वर्चस्ववादी व्यवस्था के विरोध में है -उसके बारे में अपने लोगों को जागरूक करेंगे।

(कॉपी संपादन : प्रेम/एफपी डेस्क)


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