फुले-आंबेडकरवाद में मिथकों का महत्व

हमारे मिथक हमारी ऊर्जा हैं। जोती राव फुले ने सबसे पहले अपनी पुस्तक गुलामगिरी में बहुजन मिथकों के महत्व को उकेरा था। बाद में आंबेडकर ने भी बहुजन मिथकों के बारे में विस्तार से चर्चा की। इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में ये मिथक और भी महत्वपूर्ण हो गये हैं, बता रहे हैं कंवल भारती :

यह विडम्बना ही है कि अभी तक इस बात को नहीं समझा जा रहा है कि आलोचना और विमर्श की दक्षिण और वाम धाराओं के अलावा कोई तीसरी धारा भी है, जिसे बहुजन की धारा कह सकते हैं। वाम धारा तो अत्याधुनिक धारा है, जबकि भौतिक और अभौतिक दो धाराएं भारत में प्राचीन काल से रही हैं। इसे हम वैदिक और अवैदिक चिन्तन धाराएं भी कह सकते हैं। इस दृष्टि से देखा जाये तो वाम धारा तीसरी धारा है। परन्तु आज जिस तरह दक्षिण और वाम दो धाराएं सर्वमान्य बन गई हैं, उनके समानांतर बहुजन धारा तीसरी धारा बन गई है। यह तीसरी धारा न धर्मविरोधी है, और न धर्मभीरु है; न यह दक्षिण विरोधी है और न वाम विरोधी है। इसलिए इस धारा को ठीक से न समझने के कारण ही वाम धारा के लोग, जो खुद बंगाल में दुर्गा पूजा में बढ़चढ़कर हिस्सा लेते हैं, बहुजन मिथकों को न सिर्फ खारिज कर देते हैं, बल्कि उसका उपहास भी उड़ाते हैं। इसके विपरीत दक्षिण पंथ के हिन्दूवादी लोग बहुजन मिथकों से बौखला जाते हैं। यह कितना दिलचस्प है कि बहुजन मिथकों का वाम चिंतक उपहास उड़ाते हैं, और हिन्दू चिंतक परेशान हो जाते हैं। पिछले साल जब बहुजन समाज ने महिषासुर बलिदान दिवस मनाया था, तो भारत की संसद में भी भूकम्प आ गया था। हिन्दुत्ववादियों का बहुजन मिथकों से उत्तेजित होना अकारण नहीं है। वे यह अच्छी तरह जानते हैं कि मिथकों में बहुजन नायक ब्राह्मणवाद और वैदिक संस्कृति के विरोधी हैं। वे शूद्रों के विद्रोह की जमीन तैयार करते हैं। इसलिए उन्हें अगर रोका न गया तो वे हिंदुत्व के लिए खतरा बन जायेंगे।

पूरा आर्टिकल यहां पढें फुले-आंबेडकरवाद में मिथकों का महत्व

 

 

 

 

 

About The Author

Reply