फिल्मों के सहारे ‘राजनीति’

लोकसभा चुनाव में अब केवल कुछ ही महीने का फासला है। फिल्मों के जरिए मतदाताओं को प्रभावित करने के प्रयास किये जा रहे हैं। सवाल उठता है कि ये प्रयास कितने जनपक्षीय हैं। एक सवाल यह भी है कि एक का नकारात्मक चित्रण कर खुद को श्रेष्ठ साबित करने की यह होड़ भविष्य में कौन सा रूप अख्तियार करेगी

साहित्य, कला और सिनेमा इन्हीं तीन माध्यमों से समाज अपनी संस्कृति और समय की अभिव्यक्ति को आयाम देता आया है। इनमें सिनेमा सबसे आधुनिक और पूंजी आधारित माध्यम है। जाहिर तौर पर इसमें सबसे ज्यादा और अधिक गति से बदलाव होने की वजह मौजूद है।

पिछले दिनों ‘बुद्धा इन ट्रैफिक जाम’, ‘पद्मावती’, ‘इंदू सरकार’, ‘उरी : द सर्जिकल स्ट्राइक’, ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ और ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ जैसी फिल्में आई हैं। यह देखना रोचक होगा कि इन फिल्मों का उद्देश्य क्या है तथा ये किस प्रकार के सामाजिक व राजनीतिक बदलाव को पेश करती हैं?

कहना गैर वाजिब नहीं है कि इनमें ‘इंदू सरकार’ और ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ जैसी फिल्में तो मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के खिलाफ एक प्रोपेगैंडा फैलाने के लिए ही बनाई गई हैं। ‘इंदू सरकार’ वर्ष 2017 में तब बनाई गई जब समाज में मॉब लिंचिंग का दौर चल रहा था और देश का बुद्धिजीवी वर्ग अपने सीमित संसाधनों के बावजूद मोदी सरकार को फासीवादी व तानाशाह बताने में सफल हो रहा था। इस फिल्म को ‘पेज-3’ फेम निर्देशक मधुर भंडारकर ने निर्देशित किया था। इसके बावजूद इस फिल्म को दर्शकों ने पूरी तरह नकार दिया था। इस फिल्म के निर्माण में 120 मिलियन यानी 12 करोड़ रुपए खर्च हुए और जब यह फिल्म रिलीज हुई तब बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरी। फिल्म आधे से भी कम केवल 4 करोड़ रुपए कमा सकी।

फिल्मी पर्दे पर राजनीति : मनमोहन सिंह की भूमिका में अनुपम खेर और नरेंद्र मोदी की भूमिका में विवेक ओबेराय

अब जबकि चुनाव होने में केवल कुछ महीनों का ही फासला है, दो फिल्में लाई गई हैं। इनमें से एक पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर बनी है। इसका नाम है  ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’। कथित राजनीतिक विश्लेषक संजय बारू द्वारा लिखित कहानी पर बनी इस फिल्म के निर्माण में 30 करोड़ रुपए का खर्च हुआ है और इसका निर्देशन विजय रत्नाकर गुट्टी ने किया है। पूरी फिल्म में यह दिखाया गया है कि प्रधानमंत्री के रूप में डॉ. मनमोहन सिंह किस तरह लाचार थे।

जाहिर तौर पर फिल्म का अपना एजेंडा था। यह एजेंडा था दर्शकों में कांग्रेस की नकारात्मक तस्वीर पेश करना। फिल्म फ्लॉप साबित हो चुकी है। इस फिल्म में मनमोहन सिंह की भूमिका अनुपम खेर ने निभायी है, जिनकी पत्नी किरण खेर भाजपा कोटे से राज्यसभा सांसद हैं।

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फिल्म समीक्षकों ने इस फिल्म को नकारा ही, दर्शकों ने भी नकार दिया है। अलबत्ता कुछेक अखबारों में इसकी तारीफ में कसीदे जरूर पढ़े गए हैं। इस बीच एक और फिल्म भारतीय जन-मानस पर थोप दिया गया है। यह फिल्म है ‘उरी : द सर्जिकल स्ट्राइक’। इस फिल्म के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि किस तरह भारतीय सैनिकों ने सितंबर, 2016 में  पाकिस्तानी सीमा में घुसकर हमला बोला था और उनके कैंपों को तबाह किया था। इस फिल्म में भारतीय सैनिकों की जांबाजी का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया गया है। कहना अतिश्योक्ति नहीं कि जिस कथित सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर सवाल उठते रहे और सवालों का जवाब देने के बजाय अब यह फिल्म बतौर सबूत पेश की जा रही है। इस फिल्म का निर्देशन आदित्य धर ने किया है और फिल्म में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका रजित कपूर ने निभायी है।

वर्ष 2017 में रिलीज हुई फिल्म ‘इंदू सरकार’ का पोस्टर

दरअसल, ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ जैसे टर्म्स के जरिए उरी में सैनिकों की मौत का राजनीतिक लाभ लेने में लगी भाजपा को अतिरिक्त लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से ही  इस फिल्म के जरिए छद्म राष्ट्रवाद को फिर से सिर के बल खड़े करने की कवायद की जा रही है। देश को तीन साल तक पाकिस्तानी चीनी खिलाने वाली भाजपा सरकार को अब अपने छद्म राष्ट्रवाद के लिए ‘दुश्मन पाकिस्तान’ की तलाश है।

प्रचार के दृष्टिकोण से भी आधुनिक युग में फिल्में सशक्त माध्यम बन चुकी हैं। इसका राजनीतिक उपयोग करने के लिए एक और फिल्म परोसी जा रही है। इस फिल्म का तो नाम भी ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ रखा गया है। इस फिल्म में विवेक ओबेराय ने नरेंद्र मोदी की भूमिका निभायी है। वहीं इसका निर्देशन उमंग कुमार कर रहे हैं, जिन्होंने ‘मेरी कॉम’ और ‘सरबजीत’ जैसी फिल्मों का निर्देशन किया है। जाहिर तौर पर इस फिल्म में नरेंद्र मोदी को राष्ट्रनायक बताया गया है। फिल्म के पोस्टर में ही लिखा है – ‘देशभक्ति ही मेरी शक्ति है’

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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहाने सिनेमा जैसे सबसे सशक्त और प्रभावशाली कला के माध्यम का प्रोपेगैंडा टूल्स और प्रचार टूल्स में बदल जाना बेहद खतरनाक है। वर्ष 2014 में एक फिल्म आयी थी –  ‘बुद्धा इन ट्रैफिक जाम’। भाजपाई चेहरा बन चुके अनुपम खेर द्वारा अभिनीत यह फिल्म एक प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर द्वारा छात्रों को नक्सलवादी विचारधारा की ओर धकेलने के साथ वर्तमान राजनीति को ‘अर्बन नक्सल’ का शिगूफा देती है। इसके निर्देशक विवेक अग्निहोत्री इसे और विस्तार देते हुए ‘अर्बन नक्सल’ किताब लिखते हैं। यह हर उस व्यक्ति को जो वर्तमान सरकार की नीतियों की निंदा करता है और दलितों व आदिवासियों के प्रति चिंता व्यक्त करता है, उसे अर्बन नक्सली करार देती है। इसका इस्तेमाल बाद में सरकार बुद्धिजीवी वर्ग और सामाजिक कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित करने में करती है। भीमा कोरेगांव मामले में देश के पांच प्राख्यात बुद्धिजीवियों को इसी ‘अर्बन नक्सल’ के शिगूफे के तहत प्रताड़ित किया जा रहा है।   

विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ‘बुद्धा इन ट्रैफिक जाम’ का पोस्टर। इसी फिल्म में ‘अर्बन नक्सल’ को चित्रित किया गया है

खैर, यह ज़रूरी नहीं है कि पूरी फिल्म ही राजनीतिक प्रोपेगैंडा के एजेंडे पर आधारित हो। कभी-कभी फिल्म के एक डायलॉग से भी यह किया जा सकता है। जैसे इसी साल आई फिल्म ‘सत्यमेव जयते’ में फिल्म के नायक जॉन अब्राहम द्वारा बोला गया यह डायलॉग – ‘दो टके की जान के लिए 9 मिमी की गोली नहीं, 56 इंच का जिगरा चाहिए’। आज के सामाजिक-राजनीतिक हालात की विकृतियों को ग्लोरीफाई करता है। कितना हास्यास्पद है कि 56 इंच के जिगर ने आम इंसान की जान को दो टके का बना दिया है। जिसे जब चाहे तब कुछ लोग घेरकर मार देते हैं। लिंचिंग संस्कृति वाले आज के राजनीतिक समय में आम आदमी के जान की कीमत दो टके से ज्यादा है भी नहीं। इंस्पेक्टर सुबोध सिंह, पहलू खान और अखलाक के हत्यारों को प्रमोट किया जा रहा है। उनकी तस्वीरें भीमकाय होर्डिंग आदि के जरिए चौक-चौराहों पर टांग कर गौरवान्वित की जा रही है।

पिछले साल एक फिल्म बनी ‘टॉयलेट एक प्रेमकथा’, जो कि भाजपा सरकार के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ का विज्ञापन साबित हुई। अक्षय कुमार की यह फिल्म अपनी स्टोरी ट्रीटमेंट के जरिए दिखाती है कि समाज में सारी गंदगी लोगों की अपनी पैदा की हुई है। इसके लिए सरकार कतई जिम्मेदार नहीं है। बड़ी बेशर्मी से फिल्म लोगों के आर्थिक हालात को पूरे विमर्श से गायब कर देती है। बिहार के औरंगाबाद जिले के डीएम कंवल तन्नौज ने एक जागरुकता कार्यक्रम में कहा था कि जो लोग अपने घरों में शौचालय नहीं बनवा सकते, उन्हें अपनी पत्नी को बेच देना चाहिए। ‘टॉयलेट एक प्रेमकथा’ फिल्म में भी नायक अपनी मोटर साइकिल बेचकर शौचालय का निर्माण करवाता है। लेकिन जिसके पास बेचने के लिए मोटर साइकिल जैसी चीजें न हों, वो क्या करें? तो क्या फिल्म के मुताबिक वो औरंगाबाद के डीएम के बयान पर अमल करें?

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साथ ही फिल्म मौजूदा सरकार के उस बेशर्म कुकृत्य को भी जस्टीफाई करती है जिसके तहत खुले में शौच करती महिलाओं और पुरुषों की तस्वीरें खींचने का हुक्म स्थानीय नगर निकाय कर्मचारियों को सरकार की ओर से जारी किया गया था। इस तरह यह फिल्म राजस्थान के नेता जफ़र हुसैन की हत्या को भी जस्टीफाई करती है, जो राजस्थान के प्रतापगढ़ में सरकारी मुलाजिमों द्वारा खुले में शौच करती महिलाओं की फोटो खींचने का विरोध करने पर उन मुलाजिमों द्वारा ही पीट-पीटकर मार दिए जाते हैं।

बहरहाल, आने वाले लोकसभा चुनाव के नतीजे इन फिल्मों से कितने प्रभावित होंगे, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन 1960-70 के दशक में आई ‘जय संतोषी माँ’, और ‘मुग़ल-ए-आजम’ आदि फिल्मों ने आज के समाज में भी जिस तरह से संतोषी माँ और अनारकली जैसे नए मिथकों को गढ़ा और फिर उसी मजबूती से स्थापित कर रखा है, उससे भारतीय समाज में सिनेमा के प्रभाव स्वीकृति और व्यापकता का पता चलता है। पिछले वर्ष संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ भी खास एजेंडे के तहत ही बनाई गई, जिसका मकसद जाति विशेष के लोगों को गौरवान्वित करना और मुसलमानों के प्रति नफरत के बीज बोना था। इस प्रकार कहा जा सकता है कि  ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ और ‘पीएम नरेंद्र मोदी’  जैसी फिल्मों के जरिए राजनीतिक विपक्ष को चुनावी मैदान में मात देने की रणनीति, बेहद वीभत्स और कुरूप है।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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