h n

गरीब सवर्णों के लिए कोटा : आरक्षण पर लगे कलंक को मिटाने में मददगार

गरीब सवर्णों के आरक्षण को मायावती से लेकर रामविलास पासवान और रामदास आठवले तक ने समर्थन किया है। इस प्रकार इस विधेयक ने दलित समुदाय के बीच से उठती आवाज़ों को एक किया है। इसके पीछे एक कारण है। दरअसल, देश में दलित नेतृत्व गरीब जनता द्वारा गरीब जनता के लिए है

आरक्षण पर चल रही बहस मुझे एक पुराने किस्से की याद दिलाती है, जिसमें कुछ अंधे लोग एक हाथी के समीप जाते हैं। उनमें से एक हाथी की सूंड़ छूने पर उसे साँप समझ बैठता है। दूसरा व्यक्ति हाथी के शरीर को छूता है और उसे दीवार समझ लेता है,  इत्यादि। इसी तरह आरक्षण की भी व्याख्या बड़े पैमाने पर व्यक्ति के पूर्वाग्रहयुक्त अनुमानों तथा अनुभवों के आधार पर की जाती है। अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति समुदाय के सदस्यों के लिए, यह सामाजिक उत्थान की सीढ़ी है। संविधान के रचयिताओं ने ऐतिहासिक तथा सामाजिक कारणों को ध्यान में रखते हुए शिक्षा एवं रोज़गार के क्षेत्र में दलितों और आदिवासियों के निमित्त ऐसे प्रावधान तैयार किये थे, जो उन्हें विशेषाधिकार प्रदान करते हों।

आरक्षण को लेकर नैतिक दृष्टिकोण में बुनियादी बदलाव 1990 के दशक में ही देखे गए, जब सकारात्मक कार्रवाई की नीतियों को राजनीतिक रंग दिया गया। इसके विपरीत, अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण की नीति, कुछ एक उदाहरणों को छोड़कर, बिना किसी सामाजिक उथल-पुथल के लागू की गयी थी। समाज का शेष वर्ग अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के कल्याण पर काफ़ी ज़ोर देता था।

यह भी पढ़ें : सवर्ण आरक्षण : इन सवालों पर भी विचार हो

मंडल आयोग की सिफ़ारिशों ने पहले से मौजूद सामाजिक विभेद को और बढ़ा दिया। भूस्वामी तथा आर्थिक रूप से संपन्न समुदायों ने हिंसा के बलबूते अपने हिस्से के अधिकार की माँग की जिससे आरक्षण के मूलतत्व को क्षति पहुँची। जिस उद्देश्य के साथ इसकी परिकल्पना की गई थी, उस पर सार्वजनिक रूप से बहसें हुईं और इसको जारी रखने के पक्ष और विपक्ष में तर्क दिए गए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

हाल में केंद्र सरकार द्वारा गरीब तबके के लिए सकारात्मक कार्रवाई की घोषणा से आशा की एक नई किरण नज़र आ रही है। संविधान में 124वां  संशोधन अधिनियम स्पष्ट रूप से कहता है कि अतिरिक्त 10 प्रतिशत आरक्षण दलितों, आदिवासियों और सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए मौजूदा कोटा के इतर होगा। यह अधिनियम भारत में सामाजिक न्याय को एक नयी दिशा देगा।

दुर्भाग्यवश, इस प्रयास को यथोचित श्रेय न देने के क्रम में कई भ्रामक विचार व्यक्त किए जा रहे हैं। आरोप लगाया जा रहा है कि यह संशोधन आरक्षण को ही कलंकित कर देगा। हालांकि राजनीतिक तंत्र पर अपनी मज़बूत पकड़ रखने वाले दलित नेतृत्व ने इस अधिनियम का खुलकर समर्थन किया है। इस अधिनियम ने मायावती से लेकर रामविलास पासवान तथा रामदास आठवले तक, दलित समुदाय के बीच से उठती आवाज़ों को एक किया है। इसके पीछे एक कारण है। दरअसल, देश में दलित नेतृत्व गरीब जनता द्वारा गरीब जनता के लिए है। समाज में दलित समुदाय आज भी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों से वंचित है। आरक्षण से भले ही इस समुदाय के कई लोगों की स्थिति में सुधार आया हो, लेकिन इससे भी आगे बहुत कुछ करने की आवश्यकता है।

यह भी पढ़ें : संविधान की मूल भावना के खिलाफ है आर्थिक आधार पर आरक्षण : पी. एस. कृष्णन

दलित समुदाय का एक अभिजात वर्ग, जो आरक्षण पर अपना एकाधिकार जमाते हुए उससे लाभान्वित होता आया है, गरीब सवर्णों के आरक्षण के खिलाफ़ बोल रहा है। लेकिन सामान्य तौर पर मध्यम वर्ग के आकांक्षी दलित इस अधिनियम से संतुष्ट हैं क्योंकि वे इसे आरक्षण पर लगे कलंक को मिटाने की प्रक्रिया में एक पहल के रूप में देख रहे हैं। दलित अक्सर कार्यस्थलों पर संघर्ष करते हैं, जहां उनकी योग्यता पर सवाल उठाए जाते हैं। जब एक बार आर्थिक रूप से पिछड़ों का एक बड़ा तबका आरक्षण के बूते सशक्त होना शुरू हो जाएगा, तब आरक्षण से लाभान्वित होने वाले लोगों के प्रति उनकी सहानुभूति जागृत होगी।

दलितों द्वारा इस प्रयास के समर्थन के पीछे व्यावहारिक कारण हैं। यह समुदाय सरकारी सेवाओं के नियमन का एक प्रबल समर्थक रहा है और इसने ठेका-आधारित सेवाओं, एडहॉक और बाहरी स्रोत से सेवाएँ लेने की प्रवृत्ति (आउटसोर्सिंग) के खिलाफ़ आवाज़ उठाई है। यह केवल वर्तमान सरकार के तहत ही संभव हो पाया है कि दलितों को पारंपरिक संवैधानिक सशक्तीकरण के प्रावधानों से परे भी उद्यम करने के लिए प्रोत्साहन दिया गया। ‘मुद्रा’, ‘पीएमजेडीवाई, ‘स्टैंड-अप इंडिया’ और ‘नेशनल एससी/एसटी हब’ जैसे कदम आर्थिक अस्पृश्यता को समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप साबित हुए हैं। उन्हें ख़ास तौर पर ऋण के संबंध में संस्थागत सम्बल प्राप्त हुआ है और उद्भवन (इन्क्यूबेशन) केंद्रों का सबाल्टर्न युवा वर्ग पर परिवर्तनकारी प्रभाव पड़ा है।

124वें संवैधानिक संशोधन के बाद, ‘भीख’ के रूप में माने जाने वाले आरक्षण को ‘समता’ स्थापित करने वाले उपकरण के रूप में देखा जाएगा।

(ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं)

(यह लेख अंग्रेजी दैनिक ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ द्वारा बीते 18 जनवरी 2019 को प्रकाशित लेख का अनुवाद है)

(अनुवाद : डॉ. देविना अक्षयवर, कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

 

अमेजन व किंडल पर फारवर्ड प्रेस की सभी पुस्तकों को एक साथ देखने के लिए तस्वीर पर क्लिक करें

मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

लेखक के बारे में

संजय पासवान

बिहार के पटना विश्वविद्यालय में शिक्षक डॉ. संजय पासवान पूर्व केंद्रीय मंत्री व भारतीय जनता पार्टी के अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। दलित विषयक इनकी छह किताबें प्रकाशित हैं। इनमें बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री की आत्मकथा के अलावा ‘द प्रोब्लेम्स ऑफ शेड्यूल कास्ट्स ऑफ बिहार’, ‘द रूट्स ऑफ रूरल वायलेंस’, ‘द इनसाइक्लोपीडिया ऑफ दलित्स इन इन्डिया (11 खंडों में), ‘राष्ट्र निष्ठा बाबू जगजीवन राम’ और ‘द सोशल फेस ऑफ इन्डियन पार्लियामेंट’आदि शामिल हैं

संबंधित आलेख

बिहार : 65 प्रतिशत आरक्षण पर हाई कोर्ट की रोक, विपक्षी दलों की सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की मांग
राजद के राज्यसभा सदस्य प्रो. मनोज झा और भाकपा माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में...
किसानों की नायिका बनाम आरएसएस की नायिका
आरएसएस व भाजपा नेतृत्व की मानसिकता, जिसमें विरोध प्रदर्शन कर रहे किसानों को खालिस्तानी बताना शामिल है, के चलते ही कंगना रनौत की इतनी...
जानिए, मोदी के माथे पर हार का ठीकरा क्यों फोड़ रहा आरएसएस?
इंडिया गठबंधन भले ही सरकार बनाने में कामयाब नहीं हुआ हो, लेकिन उसके एजेंडे की जीत हुई है। सामाजिक न्याय और संविधान बचाने के...
अमेरिका के विश्वविद्यालयों में हिंदू पाठ्यक्रम के मायने
यदि हिंदू दर्शन, जिसे वेदांतवादी दर्शन का नाम भी दिया जाता है, भारत की सरहदों से बाहर पहुंचाया जाता है तो हमें इसके विरुद्ध...
बसपा : एक हितैषी की नजर में
राजनीति में ऐसे दौर आते हैं और गुजर भी जाते हैं। बसपा जैसे कैडर आधरित पार्टी दोबारा से अपनी ताकत प्राप्त कर सकती है,...