दलित-मुसलमान अलग नहीं, बहुसंख्यक को कहा जा रहा अल्पसंख्यक

दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज परिसर में आयोजित दो दिवसीय दलित साहित्य महोत्सव के दूसरे दिन साहित्यकारों ने दलित साहित्य पर विमर्श करने के साथ-साथ बहुसंख्यक साहित्यकारों को अल्पसंख्यक कहने और दलित व मस्लिम साहित्यकारों से वैमनस्य का भाव रखने पर चिंता व्यक्त की। फारवर्ड प्रेस की रिपोर्ट

दलित साहित्य महोत्सव के दूसरे दिन किरोड़ीमल कॉलेज में चहल-पहल कुछ ज्यादा ही थी। इस महोत्सव में दर्शकों की संख्या इतनी अधिक रही कि ऑडिटोरियम में सीटें कम पड़ गईं और इसके चलते कॉलेज के छात्र-छात्राओं ने पीछे खड़े होकर पूरे सत्र को सुना। दलित साहित्य महोत्सव के दूसरे दिन आयोजित सत्रों में पहले सत्र का विषय था ‘भारतीय भाषाओं में दलित व अल्पसंख्यक विमर्श’। इस सत्र में अनेक मशहूर साहित्यकारों ने जहां दलित साहित्यकारों के सशक्त लेखन पर प्रकाश डाला, वहीं मुसलमानों को दलितों से अलग करने की राजनीति पर चिंता व्यक्त की। इसके साथ ही बहुजन को बांटे जाने पर दुख प्रकट किया। इस अंत में साहित्यकार व आलोचक चौथीराम यादव की पुस्तक ‘आधुनिकता का लोकपक्ष और साहित्य’ का विमोचन भी किया गया।

दलित समाज में पनप रही ऑनर-किलिंग जैसी बुराई

इस सत्र के पहले वक्ता के तौर पर बलवीर माधवपुरी ने कहा- “हम माइनॉरिटी में नहीं, मेजॉरिटी में हैं, पर एससी, एसटी, ओबीसी में और फिर इनकी उप -जातियों में बंटे हुए हैं। हमें एक-दूसरे का दुश्मन बना दिया गया है। लेकिन हमारे (एससी, एसटी, ओबीसी) के डीएनए एक समान हैं। हमारे ब्लड ग्रुप 85 प्रतिशत समान हैं। जबकि सवर्णों के ब्लड ग्रुप 70 प्रतिशित यूरोपियन लोगों से मिलते हैं। हमारा ब्लड ग्रुप ‘बी’ पोजिटिव (बी+) है। जबकि उनका ब्लड ग्रुप ‘ए’ और ‘ओ’ है। हमारे रंग, रूप, चेहरा, शरीर, दांत आपस में मिलता है, पर उनका नहीं। पंजाब में इसे लेकर एक आंदोलन भी चला था। लेकिन अब हममें भी बहुत बुराइयां आ गई हैं। हमारे यहां भी ऑनर किलिंग होने लगी है। रोटी-बेटी के संबंध में हम भी ऊंच-नीच देखने लगे हैं।”

चौथीराम यादव की पुस्तक आधुनिकता का लोकपक्ष और साहित्य का विमोचन करते दलित-मुस्लिम साहित्यकार

कहानीकार क्रांतिपाल ने कहा- “हम हर भाषा के युवा कहानीकारों को मंच प्रदान करते हैं। जो लोग वर्षों से चुप रहे, अगर आज कुछ सुना रहे हैं, तो उन्हें सुनना चाहिए। क्षेत्रीय साहित्य, जिनमें मानवीय पीड़ा लिखी जा रही है आज उन्हें मंच नहीं मिलता। अगर किसी भाषा में इंसानियत के लिए कुछ लिखी गई है, तो वह अनुवादित होकर दूसरे समुदाय तक पहुंचती ही है। आज इतना ज्यादा लिखा रहा है कि हमें क्या और क्यों पढ़ना चाहिए, यही नहीं पता है।”

कहानीकार केसराराम ने कहा- “कितनी त्रासदी है कि आज बहुसंख्यक को अल्पसंख्यक कहकर संबोधित किया जा रहा है। ये एक झूठ फैलाया गया है सवर्णों को बहुसंख्यक साबित करने के लिए। उनके झूठ से बचने का यही तरीका है कि इस तरह के साहित्य फेस्टिवल हों और हमें अपनी बात रखने के लिए मंच मिले।”

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दलितों ने खुद को मनवाया है दलित साहित्यकार

मशहूर शायर डॉ. रहमान मुसब्बिर ने कहा- “अल्पसंख्यकों में सिख, ईसाई मुस्लिम समुदाय भी आते हैं; लेकिन जब अल्पसंख्यक की बात करते हैं, तो सीधे-सीधे मुस्लिम की बात करते हैं। तो इसे आप मुस्लिम विमर्श ही क्यों नहीं कह देते। दलितों ने अपने जोर-शोर से खुद को दलित साहित्यकार मनवाया है। और वे कहते हैं कि हमारी अपनी संवेदना है, अनुभूति है, इसलिए साहित्य है। जबकि मुस्लिम लेखक कहने पर मुस्लिम भड़क जाते हैं। जब तक वे यह स्वीकार नहीं करेंगे कि हम अपने समाज की विसंगतियों को अभिव्यक्त करते हैं, तब तक मुस्लिम विमर्श कैसे खड़ा होगा। आज हलाला और तलाक पर दूसरे लोग लिख रहे हैं। वे क्या जानें कि तलाक क्या होता है। लेकिन, जब इन विषयों पर कोई मुस्लिम लिखेगा, तो शत-प्रतिशत प्रामाणिक लिखेगा। हिंदू की तरह मुस्लिम समाज में भी कई वर्ग हैं। उच्च वर्ग की संवेदनाएं अलग हैं, जबकि मध्य और निम्न वर्ग की संवेदनाएं अलग।”

दलित साहित्य महोत्सव में मंचासीन साहित्यकार

पसमांदा विमर्श को खड़ा करना होगा

प्रसिद्ध साहित्यिक आलोचक चौथीराम यादव ने कहा- “जब वे कहते हैं कि ‘गर्व से कहा हम हिंदू हैं।’ विरासत के नाम पर दलितों को जो पीड़ा, जो जहालत मिली है, उसके बाद दलित, अल्पसंख्यक गर्व से कैसे कहेंगे कि हम हिंदू हैं। भीमा कोरेगांव को इस मीडिया ने हिंदू बनाम दलित कहकर दिखाया। मुस्लिम विमर्श गलत है, ये अपने उलट हिंदू विमर्श खड़ा करेगा। विमर्श धार्मिक आधार पर नहीं होता। विमर्श में सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक तत्व शामिल होते हैं। इसीलिए जायसी का साहित्य चिंतन है, विमर्श नहीं। हां, पसमांदा विमर्श हो सकता है। पाकिस्तान के पहले गवर्नर जनरल के रूप में शपथ लेते हुए मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा था कि अगर पसमांदा मुसलमानों ने हमारा साथ दिया होता, तो पाकिस्तान की सरहद आज दिल्ली तक होती।

श्रोताओं को संबोधित करते चौथीराम यादव

पसमांदा मुस्लिम खुद को भारत का मूल-निवासी मानते हैं। 20 प्रतिशत अशर्फियां (वर्चस्व वाले मुस्लिम) सत्तावर्ग से साठ-गांठ करके इन 80 प्रतिशत पसमांदा मुस्लिमों का शोषण करती हैं। दरअसल, पसमांदा लोग कनवर्टेड मुस्लिम हैं। इस्लाम स्वीकार करने का बावजूद इनके साथ धोखा हुआ है। धर्म बदलने के बावजूद उनका पेशा नहीं बदला। जो हिंदू नाई थे, वे मुस्लिम नाई हो गए। जो यहां धोबी थे, वे वहां जाकर भी धोबी ही रहे। मेरठ में इन लोगों के बीच अभी भी संबंध जिंदा है। इसीलिए वहां एक नारा गूंजता है- पिछड़ा-पिछड़ा एक समान, हिंदू हो या मुसलमान।”

दलित साहित्य महोत्सव में उपस्थित श्रोतागण

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सबसे ज्यादा धर्म परिवर्तन दलितों ने किया

अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए मशहूर उपन्यास ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ के रचनाकारअब्दुल बिस्मिल्लाह ने कहा- “लोग कहते हैं कि मुसलमानों को मुख्यधारा में ले आओ। मैं कहता हूं- मुसलमान मुख्यधारा में हैं। मुसलमान मुख्यधारा में क्यों नहीं हैं? दरअसल, यह प्रश्न पूछकर मुसलमान को अलग-थलग करने की साजिश की जा रही है। इस देश में मुसलमान दलित ही हैं। बल्कि कुछ हद तक तो दलितों से भी गए-गुजरे हैं। आज एक दलित संस्कृत पढ़ सकता है, पर एक मुस्लिम संस्कृत पढ़ सकता है क्या? आज हिंदी हिंदुओं की भाषा बना दी गई है और उर्दू को मुस्लिमों की भाषा। ये लोग अब हिंदी को भारत की भाषा और उर्दू को विदेशी भाषा तक बता रहे हैं। अरे भाई, उर्दू हिंदुस्तान की भाषा है; विदेशी नहीं। हिंदी विषय से एमए करने के बाद मैं कई यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में इंटरव्यू के लिए जाता, तो हर जगह मुझसे पहला सवाल यही पूछा जाता कि मुसलमान होते हुए भी आपने हिंदी से एमए क्यों किया? नौकरी तो कहीं मिलनी नहीं थी, मैंने झल्लाकर कहा कि संस्कृत में एडमीशन नहीं मिला, इसलिए हिंदी से एमए कर लिया। आज मुस्लिम गाय नहीं पाल सकता। दलितों ने सबसे ज्यादा धर्म परिवर्तन किया है। आप इस्लाम का इतिहास देख लीजिए। इस्लाम अरब में पैदा हुआ और ईरान गया। इस्लाम ने ईरान में धार्मिक विजय तो पाई, पर सांस्कृतिक विजय नहीं प्राप्त कर सका। आज रोजा, नमाज और खुदा जैसे जिन तीन शब्दों के बिना किसी मुसलमान का काम नहीं चल सकता। ये इस्लाम धर्म के नहीं, बल्कि ईरान संस्कृति के शब्द हैं। ये तीनों कुरान के शब्द नहीं हैं। कुरान तो अरबी भाषा में है। लेकिन आज भारतीय मुसलमानों से उनकी दलित संस्कृति छीनी जा रही है। खुदा हाफिज के अल्लाह हाफिज होने का मतलब ही है कि वे अपना दलितपन छोड़ना चाहते हैं।”

अंतिम सत्र में मशहूर साहित्यकार व आलोचक चौथीराम यादव की पुस्तक ‘आधुनिकता का लोकपक्ष और साहित्य’ का विमोचन भी किया गया।

(कॉपी संपादन : प्रेम बरेलवी)


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