जब संसद भवन में आंबेडकर का तैलचित्र लगाया गया : पी.एस. कृष्णन

संसद में आंबेडकर का तैलचित्र लगाए जाने की मांग दलितों और उनके प्रतिनिधियों द्वारा लंबे समय से की जा रही थी, परंतु सरकारें इस बहाने से ऐसा नहीं कर रहीं थीं कि केंद्रीय कक्ष की दीवार पर एक और तैलचित्र लगाने के लिए स्थान नहीं है

आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास : पी.एस. कृष्णन की जुबानी, भाग – 9

(भारत सरकार के नौकरशाहों में जिन चंद लोगों ने अपने को वंचित समाज के हितों के लिए समर्पित कर दिया, उसमें पी.एस. कृष्णन भी शामिल हैं। वे एक तरह से आजादी के बाद के सामाजिक न्याय के जीते-जागते उदाहरण हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने सामाजिक न्याय संबंधी अपने अनुभवों को डॉ. वासंती देवी के साथ साझा किया। वासंती देवी मनोनमनियम सुन्दरनर विश्वविद्यालय तमिलनाडु की कुलपति रही हैं। संवाद की इस प्रक्रिया में एक विस्तृत किताब सामने आई, जो वस्तुत : आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास है। फारवर्ड प्रेस की इस किताब का हिंदी अनुवाद प्रकाशित करने की योजना है। हम किताब प्रकाशित करने से पहले इसके कुछ हिस्सों को सिलसिलेवार वेब पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं। प्रस्तुत लेख ‘दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के लिए बने महत्वपूर्ण कानूनों व योजनाओं में पी.एस. कृष्णन की भूमिका’ शीर्षक लेख की दूसरी कड़ी है। इसमें पी.एस. कृष्णन वासंती देवी द्वारा पूछ गए निम्नलिखित सवाल का जवाब दे रहे हैं। पाठकाें की सुविधा के लिए हम इसे अलग-अलग किस्तों में प्रकाशित कर रहे हैं, ताकि वे पी.एस. कृष्णन के योगदानों को समझ सकें और यह भी कि नौकरशाह चाहें, तो विषम परिस्थितियों में भी जनपक्षीय कदम उठा सकते हैं – संपादक)

जब संसद भवन में आंबेडकर का तैलचित्र लगाया गया : पी.एस. कृष्णन

  • वासंती देवी

वासंती देवी : क्या सामाजिक न्याय और कमजोरों के सशक्तिकरण से जुड़े मुद्दों के प्रति नौकरशाहों को संवेदनशील बनाने के लिए आप किन्हीं विशिष्ट उपायों को लागू करने का सुझाव देंगे? यह इसलिए, क्योंकि आपकी यह मान्यता है कि केवल ऐसा करके ही हमारे देश में सच्चे प्रजातंत्र का आगाज हो सकता है?

पी.एस. कृष्णन (गतांक से आगे) : अनुसूचित जाति, जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 को प्रभावशाली बनाना अहम चुनौती थी। यह अधिनियम राजीव गांधी सरकार द्वारा पारित किया गया था, परंतु उस सरकार ने इस अधिनियम को अधिसूचित नहीं किया। अधिनियम में प्रावधान था कि वह सरकार द्वारा इस आशय की अधिसूचना जारी किए जाने की तिथि से प्रभावी होगा। इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए मैंने केंद्रीय कल्याण मंत्री रामविलास पासवान की अध्यक्षता में राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों की एक बैठक आयोजित करवाई। मैं चाहता था कि यह अधिनियम बिना किसी देरी के प्रभावशील हो जाए और मैंने इसके लिए 30 जनवरी, 1990 की तिथि प्रस्तावित की। मैंने राज्य सरकारों से अनुरोध किया कि इस तिथि तक वे यह सुनिश्चित कर लें कि अधिनियम के अंतर्गत सभी प्रकरण विशेष न्यायालयों को स्थानांतरित हो जाएं। इस ‘जल्दबाजी’ से विधि सचिव को बहुत आश्चर्य हुआ और उन्होंने मुझे सलाह दी कि मैं अपने गले में फंदा न डालूं। मेरा उत्तर था कि अगर मेरे गले में फंदा डालने से एससी, एसटी को मदद मिलती है, तो मुझे ऐसा करने मेें कोई संकोच नहीं होगा। सभी राज्य सरकारें इस अधिनियम को 30 जनवरी, 1990 से लागू करने के लिए सहमत हो गईं और भारत सरकार ने इस आशय की एक अधिसूचना जारी कर दी।

पी.एस. कृष्णन

डाॅ. आंबेडकर जन्म शताब्दी समारोह

सामान्यतः किसी व्यक्ति का जन्म शताब्दी समारोह, उसकी जन्म तिथि से सौ वर्ष बाद प्रारंभ होना चाहिए। आंबेडकर के मामले में यह तिथि 14 अप्रैल 1991 थी। परंतु, चूंकि मुझे मालूम था कि इस सरकार की आयु लंबी नहीं है, इसलिए मैंने प्रस्तावित किया कि जन्म शताब्दी समारोह की शुरुआत 14 अप्रैल 1990 से कर दी जाए और यह 14 अप्रैल 1991 तक चले। इस पर सहमति बन गई। सामान्यतः, इस तरह के समारोहों का आयोजन संस्कृति मंत्रालय द्वारा किया जाता है। परंतु, मैंने प्रस्तावित किया कि कल्याण मंत्रालय और उसके कार्य क्षेत्र के लिए डाॅ. आंबेडकर के विशेष महत्व को देखते हुए, इस समारोह का आयोजन कल्याण मंत्रालय को करना चाहिए। इस प्रस्ताव को कल्याण मंत्री रामविलास पासवान और प्रधानमंत्री की स्वीकृति मिल गई। मेरी सोच यह थी कि संस्कृति मंत्रालय इस समारोह का आयोजन आम ढर्रे के मुताबिक करेगा, जबकि रामविलास पासवान के मंत्री और मेरे सचिव होने के कारण, कल्याण मंत्रालय समारोह को एक जीवंत स्वरूप दे सकेगा और उसमें जनभागीदारी सुनिश्चित कर सकेगा, ताकि यह एक महत्वपूर्ण और यादगार आयोजन बन सके। इसी अवधि में भारत सरकार ने डाॅ. आंबेडकर को मरणोपरांत भारत रत्न की उपाधि प्रदान कर और संसद के केंद्रीय कक्ष में उनके तैलचित्र का अनावरण कर स्वयं को सम्मानित किया। संसद में आंबेडकर का तैलचित्र लगाए जाने की मांग दलितों और उनके प्रतिनिधियों द्वारा लंबे समय से की जा रही थी, परंतु सरकारें इस बहाने से ऐसा नहीं कर रहीं थीं कि केंद्रीय कक्ष की दीवार पर एक और तैलचित्र लगाने के लिए स्थान नहीं है। परंतु, जब राजनीतिक स्तर पर यह निर्णय हो गया कि आंबेडकर का तैलचित्र लगाया जाना चाहिए, तब दीवार पर जगह भी निकल आई। जन्म शताब्दी समारोह की शुरुआत इंडिया गेट के नजदीक स्थित नेशनल स्टेडियम में एक विशाल रैली के साथ हुई, जबकि, सामान्यतः इस तरह के सरकारी आयोजनों का उद्घाटन सभागारों में किया जाता है। इस रैली से देश भर के लोगों को इकट्ठा होने और आयोजन में भागीदारी करने का मौका मिला। रैली के संबंध में पूरे देश में प्रचार किया गया और लोगों को इसमें भाग लेने के लिए निमंत्रित और प्रेरित किया गया। रैली में एक लाख से अधिक लोगों ने भागीदारी की। पूरा स्टेडियम खचाखच भरा हुआ था और उसके बाहर भी भीड़ थी।

वी.पी. सिंह

तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह समारोह के मुख्य अतिथि थे और रामविलास पासवान व अन्य मंत्री भी कार्यक्रम में मौजूद थे। योगेन्द्र मकवाना भी आमंत्रितों में थे और उन्हें मंच पर बैठाया गया था। मैं वी.पी. सिंह के ध्यान में यह बात लाया कि मकवाना भी मंच पर मौजूद हैं। उन्होंने तुरंत मकवाना को भाषण देेने के लिए आमंत्रित कर दिया। यह, इस तथ्य के बावजूद कि मकवाना कांग्रेस (जो उस समय विपक्ष में थी) के नेता थे। डाॅ. आंबेडकर भेदभाव मिटाने के हामी थे और उनकी याद ने कम-से-कम कुछ देर के लिए दलगत मतभेदों को समाप्त कर दिया। जन्म शताब्दी समारोह के आयोजन के लिए एक राष्ट्रीय समिति का गठन किया गया, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों के ऐसे लगभग सौ व्यक्ति शामिल थे, जिनका डाॅ. आंबेडकर और उनके दर्शन से जुड़ाव था। समारोह के आयोजन के अंतर्गत पासवान और मैंने कई कार्यकारी समूहों का गठन किया, जिन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गई कि वे एससी व एसटी के कल्याण संबंधी मुद्दों पर अपनी सिफारिशें दें। इन समितियों के कुछ सक्रिय सदस्यों को मैंने कुछ सुझाव दिए, ताकि वे उन पर विचार कर उन्हें लागू करने के संबंध में सिफारिशें कर सकें। उन्होंने ऐसा ही किया। सभी सिफारिशों को संकलित किया गया और इससे सरकार को कार्यवाही करने के लिए एक एजेंडा उपलब्ध हुआ। मैंने जो सुझाव इन समितियों को दिए, उनमें उस दलित घोषणा-पत्र के कई हिस्से शामिल थे, जिसे मैंने तैयार किया था और 7 मार्च 1996 को सार्वजनिक किया था। बाबा साहब डाॅ. आंबेडकर जन्म शताब्दी समारोह से उनके व्यक्तित्व और समाज की बेहतरी तथा राष्ट्र के नीति निर्माण में उनके योगदान को देश के सामने लाने में मदद मिली। इस समारोह से दलितों और सामाजिक न्याय के पैरोकारों का मनोबल बढ़ा। लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों ने डाॅ. आंबेडकर के प्रति अपने नकारात्मक या निरपेक्ष भाव को त्यागा और इसकी अंतिम परिणति यह हुई कि आज सभी राजनीतिक दल डाॅ. आंबेडकर के प्रति सम्मान का भाव व्यक्त करते हैं और उनके योगदान की सराहना करते हैं। यद्यपि उनमें से किसी ने भी अब तक डाॅ. आंबेडकर के दर्शन और उनके एजेंडे (जो संविधान का अविभाज्य हिस्सा है) को लागू करने की दिशा में समग्र कदम नहीं उठाए हैं।

रामविलास पासवान

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति व जनजाति आयोग को संवैधानिक दर्जा

इस आयोग का गठन मोरारजी देसाई सरकार द्वारा सन् 1977 में एक शासकीय आदेश द्वारा किया गया था। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री इसके प्रथम अध्यक्ष थे। शास्त्री, जाने-माने दलित नेता थे और अपनी सत्यनिष्ठा और प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते थे। मैं अपनी व्यक्तिगत जानकारी के आधार पर कह सकता हूं कि वे अत्यंत परिपक्व, बुद्धिमान व नेकनीयत व्यक्ति थे और उन्हें देश की सामाजिक स्थिति की गहरी समझ थी। समिति के चार अन्य सदस्य थे, जिनमें संविधान के अनुच्छेद-338 के अधीन नियुक्त एससी, एसटी आयुक्त (जो पदेन सदस्य थे) भी शामिल थे। उस समय समाजवादी विचारधारा के शिशिर कुमार इस पद पर थे। इस आयोग के गठन का उद्देश्य यह था कि यह पांच-सदस्यीय संस्था, संविधान के अनुच्छेद-338 के अंतर्गत नियुक्त एससी, एसटी के लिए विशेष अधिकारी (जिन्हें एससी, एसटी आयुक्त कहा जाता था) का स्थान लेगी। सरकार ने एक अन्य आदेश के द्वारा अल्पसंख्यक आयोग का गठन भी किया।

दोनों आयोगों को संवैधानिक दर्जा प्रदान करने के लिए संविधान संशोधन विधेयक संसद में प्रस्तुत किया गया। उस समय मैं संयुक्त सचिव था। यह विधेयक पारित नहीं हो सका, क्योंकि लोकसभा में इसे आवश्यक बहुमत नहीं मिला। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि कई ऐसे सांसद, जो अल्पसंख्यक आयोग को संवैधानिक दर्जा दिए जाने के विरुद्ध थे। परंतु, जिन्हें एससी-एसटी आयोग को यह दर्जा दिए जाने पर कोई आपत्ति नहीं थी; संसद से अनुपस्थित हो गए। किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पारित करने के लिए सदन के आधे से अधिक सदस्यों को उसका समर्थन करना चाहिए। दूसरी शर्त यह है कि सदन में उपस्थित और अपने मताधिकार का प्रयोग करने वाले सदस्यों में से कम-से-कम दो-तिहाई को उसके पक्ष में मत देना चाहिए। दूसरी शर्त पूरी हो गई। क्योंकि, सभी उपस्थित सदस्यों ने विधेयक के पक्ष में मत दिया; परंतु, उनकी संख्या सदन की कुल सदस्य संख्या की आधे से अधिक नहीं थी। इसलिए यह विधेयक पारित न हो सका। यह घटनाक्रम सरकार के लिए शर्मिंदगी का कारण बना; यद्यपि उसने इसे बहुत महत्व नहीं दिया। इसके बाद अनुच्छेद-338 के अंतर्गत नियुक्त एससी-एसटी विषेष आयुक्त और शासकीय आदेश द्वारा नियुक्त बहुसदस्यीय आयोग का 1990 तक असहज सह-अस्तित्व बना रहा।

जब मैं कल्याण मंत्रालय में सचिव था, तब अपने एजेंडे के अनुपालन में मैंने राष्ट्रीय एससी-एसटी आयोग को संवैधानिक दर्जा दिलवाने के लिए प्रयास शुरू किया। मैंने इस आशय के संविधान संशोधन विधेयक का मसौदा तैयार किया और बहुत कठिनाई से कैबिनेट सचिव की स्वीकृति प्राप्त करने के पश्चात उसे कैबिनेट से अनुमोदित करवाया। यह विधेयक सन् 1990 के बजट सत्र में संसद में प्रस्तुत किया गया। जो 1980 में नहीं हो सका था; वह 1990 में हो गया। आयोग को संवैधानिक दर्जा तो मिल गया; परंतु कुछ कमियों के कारण वह अपना काम उतने प्रभावशाली ढंग से नहीं कर पा रहा है, जितने प्रभावशाली ढंग से कर सकता है। इन कमियों को दूर किया जा सकता है। परंतु, सरकार की ओर से ऐसे कदम नहीं उठाए जा रहे हैं, जिनसे आयोग अपने संवैधानिक दायित्वों का प्रभावकारी ढंग से पूर्ण निर्वहन कर सके।     

शासकीय सेवाओं में एससी, एसटी के लिए आरक्षण हेतु विधेयक का पारित न हो पाना

एससी, एसटी के कल्याण के लिए एक पहल जो सफल नहीं हो सकी और जिस पर आज भी ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है, वह है- शासन के अधीन पदों और सेवाओं में एससी, एसटी के लिए आरक्षण हेतु विधेयक का मेरे द्वारा तैयार किया गया मसौदा।केंद्र सरकार और राज्यों में एससी-एसटी को आरक्षण प्रदान किया गया है। परंतु, इसका आधार शासकीय आदेश हैं। मेरा यह मत है कि आरक्षण के संबंध में विधायिका द्वारा कानून बनाया जाना चाहिए, ताकि आरक्षण की व्यवस्था और उसके क्रियान्वयन को बेहतर बनाया जा सके; ताकि आरक्षण की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बने और आरक्षण संबंधी आदेशों की अवहेलना करना कठिन हो सके। कैबिनेट में इस प्रश्न पर चर्चा हुई कि आरक्षण की व्यवस्था के संबंध में कानून बनाया जाना चाहिए अथवा इसे शासकीय आदेशों के आधार पर बनाए रखा जाना चाहिए। मैंने कैबिनेट को बताया कि कानून की आवश्यकता क्यों है और इसके क्या लाभ होंगे? एक अन्य वरिष्ठ व सम्मानित अधिकारी ने इस आशय के तर्क प्रस्तुत किए कि आरक्षण व्यवस्था को शासकीय आदेशों से लागू किया जाना पर्याप्त है और इस सिलसिले में कानून बनाए जाने की आवश्यकता नहीं है। सामान्यतः नौकरशाही किसी भी व्यवस्था के संबंध में कानून बनाने की जगह, उसे शासकीय आदेश द्वारा लागू किया जाना पसंद करती है। तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद यह तय किया कि आरक्षण के संबंध में कानून बनाया जाना चाहिए। मैंने इस हेतु विधेयक का मसौदा तैयार किया; परंतु कैबिनेट सचिव वी.सी. पांडे (जो कॉलेज के दिनों से वी.पी. सिंह के विश्वस्त साथी थे) ने इसे कैबिनेट के समक्ष प्रस्तुत किए जाने में इतनी देर कर दी कि अंततः वह कैबिनेट के विचारार्थ प्रस्तुत ही नहीं किया जा सका। वी.पी. सिंह को इस कैबिनेट नोट और विधेयक के मसौदे के संबंध में जानकारी थी। वे आसानी से कैबिनेट सचिव की आपत्ति को खारिज कर विधेयक को संसद से पारित करवा सकते थे; परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया और उनकी इस असफलता का खामियाजा देश अब भी भुगत रहा है। मेरे और कुछ अन्य लोगों के अथक प्रयासों के बावजूद, यह विधेयक आज तक पारित नहीं हो सका है। मैं इसके बारे में आगे विस्तार से वर्णन करूंगा।

(कॉपी संपादन : प्रेम/एफपी डेस्क)


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