अपने अधिकारों के लिए आपसी बिखराव से बचें दलित : पी. एस. कृष्णन

अनुसूचित जातियों में राजनीतिक बिखराव उनके सशक्तिकरण में सबसे बड़ा बाधक है। आवश्यकता इस बात की है कि उच्च दलितों को चाहिए कि वे पिछड़े अनुसूचित दलितों की पीड़ा को समझे और आगे बढ़ने में उनकी सहायता करें न कि उनके अधिकार पर कब्जा करें

आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास : पी.एस. कृष्णन की जुबानी, भाग – 14

(भारत सरकार के नौकरशाहों में जिन चंद लोगों ने अपने को वंचित समाज के हितों के लिए समर्पित कर दिया, उसमें पी.एस. कृष्णन भी शामिल हैं। वे एक तरह से आजादी के बाद के सामाजिक न्याय के जीते-जागते उदाहरण हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने सामाजिक न्याय संबंधी अपने अनुभवों को डॉ. वासंती देवी के साथ साझा किया। वासंती देवी मनोनमनियम सुन्दरनर विश्वविद्यालय, तमिलनाडु की कुलपति रही हैं। संवाद की इस प्रक्रिया में एक विस्तृत किताब सामने आई, जो वस्तुतः आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास है। फारवर्ड प्रेस की इस किताब का हिंदी अनुवाद प्रकाशित करने की योजना है। हम किताब प्रकाशित करने से पहले इसके कुछ हिस्सों को सिलसिलेवार वेब पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं। आज पढ़ें अनुसूचित जातियों को सशक्त बनाने के लिए सरकार के स्तर पर किस तरह की नीतियां बनायी जानी चाहिए और यह भी कि स्वयं अनुसूचित जातियों के लोगों काे कैसा व्यवहार करना चाहिए ताकि उनका इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए न किया जा सके –संपादक)


दलितों को मिले पारंपरिक पेशे से मुक्ति

  • वासंती देवी

(गतांक से आगे)

वासंती देवी : अनुसूचित जातियों के सशक्तिकरण के लिए आप किन उपायोें को प्राथमिकता के आधार पर लागू करवाना चाहेंगे?

पी.एस. कृष्णन : एससी के कमजोर होने के कई कारण हैं और इसलिए उन्हें सशक्त बनाने के लिए भी हमें समग्र रूप से विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करना होगा। सबसे महत्वपूर्ण है उनकी आर्थिक मुक्ति और उनके लिए अन्य वर्गों के समान शिक्षा प्राप्त करने के अवसरों की उपलब्धता। आर्थिक मुक्ति का अर्थ है उन्हें उन पेशों से मुक्ति दिलाना, जिनसे वे सदियों से बंधे हुए हैं। इनमें शामिल हैं खेतिहर मजदूरी, मृत पशुओं की खाल उतारना, हाथ से मैला साफ करना और शहरी असंगठित क्षेत्र में मजदूर के रूप में कार्य करना।

शिक्षा में समानता उच्चतम स्तर तक होनी चाहिए। इसके अलावा, उनके स्वास्थ्य और पोषण के स्तर और उनके आवासीय क्षेत्रों की स्थिति में सुधार भी महत्वपूर्ण हैं। जहां तक स्वास्थ्य व पोषण का प्रश्न है, माताओं व विशेषकर गर्भवती स्त्रियों के स्वास्थ्य की देखभाल और उन्हें उचित पोषण उपलब्ध करवाना आवश्यक है ताकि भ्रूण में ही एससी कमजोर न हो जाएं। इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए जो विशिष्ट कदम उठाए जाने चाहिए, उनमें नए कानून बनाना व नई योजनाएं/कार्यक्रम लागू करना शामिल हैं। इन सभी का वर्णन मैंने अपने उस रोडमैप में किया है, जिसे मैंने पूर्व और वर्तमान सरकारों के नेतृत्व और विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं को उपलब्ध करवाया है। इस रोडमैप में एससी, एसटी के अलावा एसईडीबीसी के संबंध में भी सिफारिशें शामिल हैं।

वासंती देवी : जिन दलित जातियां, जैसे तमिलनाडु के अरून्धतियार, जिन्हें एससी के लिए आरक्षण से लाभ नहीं मिल सका है, के लिए एससी आरक्षण कोटे में उपकोटा निर्धरित किए जाने की मांग के संबंध में आपके क्या विचार हैं? इस मांग का एससी के अगड़े तबकों द्वारा विरोध किया जा रहा है।

पी.एस. कृष्णन : मूलतः भारत के हर राज्य में दो या तीन बड़ी दलित जातियां हैं जो संबंधित राज्य की एससी आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा हैं। पश्चिम बंगाल इसका एकमात्र अपवाद है, जहां पांच बड़ी दलित जातियां है। ये बड़ी दलित जातियां, जिनकी प्रत्येक राज्य में संख्या दो से तीन है, देश की एससी आबादी का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

सामाजिक न्याय के लिए संघर्षरत योद्धा पी.एस. कृष्णन

स्वाधीनता के काफी समय पूर्व, कुछ दक्षिण भारतीय राज्यों व रियासतों में आरक्षण की शुरूआत हुई। गवर्मेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 के अंतर्गत, पूरे देश में आरक्षण लागू किया गया और स्वतंत्रता के बाद, भारत के संविधान के प्रावधानों के अनुरूप, आरक्षण की व्यवस्था लागू की गई। उस समय तक देश की विभिन्न दलित जातियों की स्थिति में कोई बहुत अंतर नहीं था। सभी दलित जातियां समाज के सबसे निचले पायदान पर थीं। जैसे-जैसे दलितों ने आरक्षण की व्यवस्था व सामाजिक न्याय के लिए उठाए गए अन्य कदमों का लाभ उठाना शुरू किया, विभिन्न दलित जातियों के बीच अंतर आने लगा। कुछ दलित जातियां, अन्यों की तुलना में, अधिक प्रगति कर सकीं। इसके कई अलग-अलग कारण हैं। अगर हम क्षेत्रीय दृष्टि से देखें तो हमें पता चलेगा कि कुछ तटीय राज्यों और क्षेत्रों की स्थिति, देश के भीतरी राज्यों और क्षेत्रों से बेहतर है। इसके अतिरिक्त, कुछ क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है तो कुछ में नहीं। स्पष्टतः तटीय व सिंचित क्षेत्रों व राज्यों में रहने वाले लोगों ने तुलनात्मक रूप से अधिक प्रगति की है और यह एससी सहित सभी जातियों पर लागू होता है।

यह भी पढ़ें : द्विज और उच्च पिछड़े समझें एससी/एसटी एक्ट का महत्व : पी.एस. कृष्णन

उदाहरणार्थ, आंध्र प्रदेश के विभाजन के पूर्व, माला एससी समुदाय की अधिकांश आबादी राज्य के तटीय क्षेत्रों में रहती थी। इसके विपरीत, एक अन्य बड़े एससी समूह मडिगा, जो तमिलनाडु के अरून्धतियार के समकक्ष हैं, के अधिकांश सदस्य राज्य के भीतरी हिस्सों अर्थात तेलंगाना व रायलसीमा के निवासी थे। इसके कारण मडिगा समुदाय आरक्षण की व्यवस्था का पूर्ण लाभ नहीं उठा सका। तटीय और आंतरिक क्षेत्रों में रहने वाले व्यक्तियों की स्थिति में अंतर, रेड्डी जैसे वर्चस्वशाली समुदायों के बारे मेें भी सही है। तटीय आंध्र प्रदेश के नैल्लोर जिले, जहां सिंचाई की पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध हैं, के रेड्डी तेलंगाना और रायलसीमा के रेड्डियों से कहीं आगे हैं। स्वतंत्रता के बाद जो नए आर्थिक अवसर उपलब्ध हुए, कुछ समुदाय उनका अधिक लाभ उठा सके और कुछ कम। जिन समुदायों के सदस्य विदेशों में हैं या जिनके सदस्य सेना में हैं वे तुलनात्मक रूप से बेहतर स्थिति में थे। आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्र में रहने वाले माला समुदाय के कई सदस्य काम करने म्यांमार गए। जब वे वहां से लौटे तो उनकी जागरूकता का स्तर बढ़ चुका था और उनके सामाजिक और अन्य कौशल बेहतर बन गए थे। महाराष्ट्र के महार समुदाय और उत्तर भारत के चमार/जाटव समुदाय के सदस्यों को बड़ी संख्या में अंगे्रजों ने अपनी सेना में भर्ती किया। सैनिक जीवन ने उन्हें अधिक जागरूक बनाया और जब वे सेना में काम करने के बाद अपने गांवों में लौटे तो उनकी क्षमताएं और कौशल पहले से कहीं अधिक बेहतर थे। इसके मुकाबले, जो समुदाय हाथ से मैला साफ करने के काम से बंधे रहे उन्हें कई नुकसान उठाने पड़े। तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक का मडिगा समुदाय, जिसे तमिलनाडु में अरून्धतियार के नाम से जाना जाता है, मुख्यतः हाथ से मैला साफ करने का काम करते आए हैं। यही बात हिंदी-पंजाब क्षेत्र के वाल्मीकि समुदाय के बारे में भी सही है। इसके चलते इन समुदायों के सदस्य, आरक्षण व सामाजिक न्याय के लिए उठाए गए अन्य कदमों, विशेषकर शिक्षा, का लाभ लेने में तुलनात्मक रूप से अक्षम रहे।

जहां तक मडिगा/अरुन्धतियर समुदाय का प्रश्न है, वे न केवल हाथ से मैला साफ़ करने के काम से जुड़े हुए हैं वरन वे मृत जानवरों की खाल उतारने और खेतिहर श्रमिक के रूप में भी कार्य करते आये हैं। उत्तर भारत का चमार/जाटव समाज भी पारंपरिक रूप से मृत पशुओं की खाल उतरने का काम करता आ रहा है, परन्तु उनकी स्थिति कुछ बेहतर इसलिए है क्योंकि उनके सदस्य सेना में भी भर्ती होते आ रहे हैं और उत्तर भारत के कई इलाकों में इस समुदाय के सदस्यों ने स्वयं को इस निकृष्ट पेशे से मुक्त करने के लिए कई आन्दोलन भी चलाए हैं। यही बात महाराष्ट्र के महारों के बारे में भी सही है।


 इस अंतर ने विभिन्न दलित जातियों, विशेषकर प्रमुख दलित जातियों, के बीच तनाव उत्पन्न कर दिया है। इस समस्या का हल यह है कि इस तरह के कदम उठाये जाएं जिनसे इन समुदायों के बीच की खाई और मतभेद और गहरे न हों। तुलनात्मक रूप से अगड़ी एससी जातियों को, पीछे छूट गयी जातियों की पीड़ा और बदहाली को समझना चाहिये। साथ ही, तुलनात्मक रूप से पिछड़ी जातियों को अपनी स्थिति के लिए अगड़ी जातियों को दोष नहीं देना चाहिए।

राजनैतिक दल हमेशा वोट पाने के लिए दलित जातियों के बीच मतभेद पैदा करने वाले स्वार्थी दलित तत्वों का उपयोग करते आए हैं। आंध्र प्रदेश में एक वर्चस्वशाली समुदाय, जो उसी इलाके में रहता है जहां माला समुदाय की खासी आबादी है, ने मडिगा समुदाय की अपने लिए उप-कोटे की मांग का समर्थन कर, अपने नेतृत्व वाली पार्टी के लिए मडिगाओं के वोट हासिल कर लिए और वह भी उनकी हित में कुछ भी किये बगैर। एक अन्य वर्चस्वशाली समुदाय, जो मडिगा-बहुल क्षेत्र का है, को अपना लाभ इसमें दिखा कि वह माला समुदाय द्वारा उप-कोटे की मांग के विरोध में उनका साथ दे और इस प्रकार अपने नेतृत्व वाले दल के लिए उनके वोट हासिल कर ले। उसने भी इस समुदाय के लिए कुछ नहीं किया।

एससी को अपनी कीमत पर इस तरह की राजनीति नहीं होने देनी चाहिए। हर राज्य के विभिन्न एससी समुदायों के नेताओं को एक साथ बैठकर, सभी समुदायों की स्थिति और समस्याओं को समझ कर उनके अल्पावधि और दीर्घावधि हल निकलने चाहिए। राजनैतिक दलों और सामाजिक दृष्टि से संवेदनशील व संविधान में आस्था रखने वाले गैर-दलित व्यक्तियों को दलित जातियों के एक दूसरे के करीब आने को प्रोत्साहित करना चाहिए और उन्हें उनकी समस्याओं का हल ढूंढने में उनकी मदद करनी चाहिए। इस हल को सत्ताधारी दलों और सरकारों द्वारा स्वीकार कर उसका क्रियान्वयन किया जाना चाहिए। सभी दलित जातियों को तमिलनाडु की अरुन्धतियर जैसी अति-पिछड़ी जातियों के प्रति सहानुभूति रखनी चाहिए। तमिलनाडु की अगड़ी दलित जातियों को मेरी तो यही सलाह होगी कि वे राज्य में अरुन्धतियर समुदाय के लिए किये गए विशेष प्रावधानों का विरोध न करें। उन्हें यह याद रखना चाहिए कि दलित जातियों के बीच एकता, सभी दलितों के वैध हितों की रक्षा और उनकी उन्नति के लिए आवश्यक हैं। उनकी अनेक समस्याएं समान हैं जैसे भूमिहीनता, खेतों और अन्य प्रकार के शारीरिक श्रम से उन्हें बाँध दिया जाना, अछूत प्रथा, अत्याचार और वंचना। मुद्दा केवल आरक्षण के कोटे में भागीदारी का है। व्यापक परिदृश्य को दृष्टिगत रखते हुए, उन्हें केवल एक मुद्दे पर मतभेद को अपनी एकता में बाधक नहीं बनने देना चाहिये। इस प्रश्न पर सभी दलित जातियों को विचार करना चाहिये परन्तु इस मामले में सही दिशा दिखाने की ज़िम्मेदारी उन जातियों की है, जिन्होंने तुलनात्मक रूप से अधिक प्रगति की है और जिनके अधिक सदस्य शिक्षित हैं। यह ध्यान में रखा जाना ज़रूरी है कि तुलनात्मक रूप के उन्नत एससी जातियां भी, सामाजिक रूप से अगड़ी जातियों से मीलों पीछे हैं और एसईडीबीसी से भी अधिक पिछड़ी हैं।

यह भी पढ़ें : मेरे संघर्षों के कारण लागू हुआ मंडल कमीशन : पी.एस. कृष्णन

तमिलनाडु के पहले, पंजाब, हरियाणा और आंध्र प्रदेश में भी एससी का वर्गीकरण कर उप-कोटों की व्यवस्था लागू की गयी थी। आंध्र प्रदेश का मामला उच्चतम न्यायालय तक गया, जिसने एससी के वर्गीकरण को असंवैधानिक बताते हुए, सरकार के निर्णय को रद्द कर दिया। इसके बाद, भारत सरकार ने एक-सदस्यीय आयोग की नियुक्ति की, जिसे उषा मेहरा आयोग के नाम से जाना जाता है। इस आयोग ने अपनी रपट कुछ वर्षों पहले सरकार को सौंप दी है और सरकार ने इस मामले में अटॉर्नी जनरल की राय भी प्राप्त कर ली है। मुद्दा यहीं पर लटका हुआ है।

विभिन्न दलित जातियों और आदिवासियों में असमानताओं को दूर करने के उपायों और उच्चतम न्यायलय के आंध्रप्रदेश के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण निर्णय पर चर्चा के लिए अधिक समय की ज़रुरत होगी। परन्तु इस मुद्दे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि राजनैतिक दलों और वर्चस्वशाली जातियों को, दलितों के बीच के मतभेदों से लाभ उठाने की कोशिश नहीं करना चाहिए और दलितों को भी यह समझना चाहिए कि उनके बीच आपसी विवादों से सभी दलितों को हानि होगी, सामाजिक न्याय और सामाजिक समानता का आन्दोलन कमज़ोर पड़ेगा। इसलिए, सभी दलित जातियों को इस प्रश्न पर विचार करना चाहिए कि आरक्षण की व्यवस्था का लाभ उठाने की क्षमता में विभिन्न जातियों में जो फर्क आ गया है, उससे कैसे निपटा जाए। अगर यह समस्या – जो एकमात्र ऐसी समस्या है जिसके कारण दलित जातियाें में फूट पड़ गई है – सुलझ जाती है तो सभी दलित जातियां एक होकर अन्य मुद्दों जैसे भूमिहीनता, अछूत प्रथा और दलितों को शिक्षा के अवसरों से वंचित किये जाने, उन पर अत्याचार आदि पर एक होकर संघर्ष कर सकेंगी।

(क्रमश: जारी)

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें

आरएसएस और बहुजन चिंतन 

मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

About The Author

Reply