जाति का अवसान अर्थात हिन्दू राष्ट्र के स्वप्न का अवसान

गोलवलकर के लिए राष्ट्र का अर्थ था, चार वर्णों से निर्मित ‘विराट पुरुष। इतना ही नहीं, सावरकर क्रूर पेशवा (ब्राह्मण) शासनकाल को गौरवशाली मानते थे

हिन्दू राष्ट्रवादियों की विचारधारा और गतिविधियों का अंतिम लक्ष्य है, ऋग्वेद  में निर्धारित सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखना। वे समाज को चार वर्णों में विभाजित करते हैं। सामान्य तौर पर माना जाता है कि हिन्दू राष्ट्रवाद के मूल में मुसलमानों और ईसाईयों के प्रति घृणा है। परन्तु यह घृणा, हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा की केवल ऊपरी सतह है।

पूरा आर्टिकल यहां पढें : जाति का अवसान अर्थात हिन्दू राष्ट्र के स्वप्न का अवसान

About The Author

Reply