उपरांत-सिन्धु अर्थात झूकर-संस्कृति

प्रेमकुमार मणि बता रहे हैं कि उत्तर सिंधु सभ्यता काल में नगरीय सभ्यता से लोगों का मोह भंग हुआ और वे ग्रामीण सभ्यता की ओर बढ़ने लगे जिसका मूल आधार कृषि था

जन विकल्प

हड़प्पा-मोहनजोदड़ो की खोज के बाद ही इतिहासकारों के एक खेमे ने इसके पतन के लिए आर्य आक्रमण वाले विचार को आगे बढ़ाया और कुछ समय तक के लिए उन्हें स्वीकार भी लिया गया। लेकिन बाद के अनुसंधानों ने इसे ख़ारिज कर दिया। दरअसल दुनिया भर के विद्वानों ने हड़प्पा के पतन और आर्यों की भारत भूमि में उपस्थिति के समय में जब बड़ा फासला देखा, तब आर्य आक्रमण वाले विचार पीछे हटते चले गए। आज तो इस बात पर बहुत हद तक  सर्वसम्मति बन चुकी है। इसी के साथ सिन्धु-सभ्यता के तुरंत बाद वैदिक काल या वैदिक सभ्यता का प्रसंग उठाना इतिहासकारों ने लगभग स्थगित कर दिया है। अब चूकि कार्बन-तारीखों के निर्धारण से समय को बहुत आगे-पीछे खींचना संभव नहीं रह गया है, इसलिए इतिहासकार इस बात पर एकमत हैं कि सिन्धु सभ्यता के प्रभाव की आखिरी समय सीमा 1750 ईस्वीपूर्व है। वे इस बात पर भी एकमत हैं कि इंडो-यूरोपियन अथवा आर्य-जन इस भूमि पर 1500 ईस्वीपूर्व के इर्द-गिर्द आये। मैं उनलोगों से सहमत हो सकता हूँ जो इस तारीख को और पीछे ले जाते हैं। मुझे प्रायः महसूस होता है वे छोटे-छोटे दलों में कई दफा अथवा निरंतर आते रहे, क्योंकि उन दिनों आज की तरह देश और राष्ट्र की कोई अवधारणा और तय सीमारेखा नहीं  थी। आज जैसे पक्षी कहीं भी जा सकते हैं, तब मनुष्य जाते रहे होंगे।

पहले ही बता चुका हूं, हड़प्पा सभ्यता ने जब चतुर्दिक विकास किया होगा तब कृषि उत्पादन  भी बढ़ा होगा। व्यापार को लेकर होने वाले आवागमन से सिंधु-मेलुहा अथवा मेलुक्ख का हाल दिगंत तक लोग जानते होंगे। इस कीर्ति को सुनकर लोगों का यहां खिंचते आना स्वाभाविक रहा होगा। आरम्भ में इनकी लड़ाई हुई होगी इस पर भरोसा करने के कोई कारण नहीं हैं। हां, कुछ समय गुजर जाने के बाद  इनकी आपसी लड़ाइयां आरम्भ हुई होंगी। शायद इसलिए भी कि वे भिन्न संस्कृति और नस्ल के थे। अनेक प्रसंगों पर स्वाभाविक है दोनों के दृष्टिकोण अलग-अलग रहते होंगे। लेकिन मेल-जोल का सिलसिला भी निरंतर चलता रहा। हिन्दू पौराणिक कथा में शिव-पार्वती की विवाह कथा इसी मेल-जोल की संस्कृति को प्रदर्शित करती है, जिसमें एक पक्ष अनार्य और दूसरा आर्य प्रतीत होता है। यदि पौराणिकता की जड़ें यथार्थ जीवन में कहीं हैं तो इस कथा के गूढ़ार्थ कुछ विशेष अर्थ प्रक्षेपित करते हैं। इस कथा से यह जाहिर होता है कि ऐसे विवाहों को लेकर तब छोटे-मोटे कोहराम-कोलाहल भी होते होंगे। हमारे लोक गीतों में, जो कि आधुनिक जुबानों में नहीं, बोलियों में आमजन, खास कर स्त्रियों  द्वारा रची गयीं हैं इसका प्रतिबिंबन ख़ूबसूरत अंदाज़ में हुआ है। इससे पता चलता है कि शिव को पार्वती के मायके में कोई सम्मान हासिल नहीं था। पार्वती के पूर्व उनका विवाह सती से हुआ था और विवरणों के अनुसार वह भी आर्य-कन्या प्रतीत होती हैं। सती के मायके में शिव के अपमान, उनके प्रज्ज्वलित यज्ञ वेदी में कूद कर जान दे देने और फिर शिव द्वारा अपनी पत्नी के अधजले शव को लेकर भारत-यात्रा करने की रोमांचक कथा कई रूपों में आज भी विद्यमान हैं। कुछ इसी तरह की कथा कच-देवयानी की है जिसमे असुरों के गुरु शुक्राचार्य के यहां शिक्षा प्राप्त करने के लिए देवों के गुरु वृहस्पति का पुत्र कच आता है और शुक्राचार्य की बिटिया देवयानी उसके प्यार में पड़ जाती है। इसे लेकर बहुत-ही करुण, लेकिन दिलचस्प कथा महाभारत  में है। ये तमाम कथाएं केवल मिलने-जुलने के संघर्षों को ही प्रदर्शित करते हैं। यह मिलना-जुलना आज तक जारी है और आगे भी रहेगा, भले ही इसकी मात्रा कम और अधिक होती रहे।

झूकर-दो-दारो : पाकिस्तान के लरकाना शहर से करीब दस किलोमीटर दूर इस जगह पर 1928 में एन. जी. मजूमदार के नेतृत्व में उत्खनन किया गया। यहां उत्तर सिंधु सभ्यता के अवशेष मिले हैं

सिन्धु-सभ्यता निश्चित ही आर्यों की सभ्यता नहीं थी, लेकिन यदि स्वास्तिक चिह्न से आर्यों का जुड़ाव है, जैसा कि बीसवीं सदी में हिटलर ने उसे अपने आर्य प्रभुत्व वाले  नाज़ी राष्ट्र का प्रतीक चिह्न बना कर बताया था, तो हमें यह भी देखना होगा कि हड़प्पा-मोहनजोदड़ो से प्राप्त मुहरों (सील) पर इस स्वास्तिक के भी निशान मौजूद हैं। संभव है सभ्यताओं और संस्कृतियों के समन्वय की प्रक्रिया सिन्धु-सभ्यता के उत्कर्ष-काल में ही आरम्भ हो गयी हो। क्योंकि इसी उत्कर्ष-काल में इस सभ्यता को अधिक श्रमिकों की आवश्यकता हुई होगी, और इसकी पूर्ति के लिए स्वाभाविक रूप से अन्य लोग आये होंगे। किन्ही अन्य कारणों से भी धीरे-धीरे आर्यजनों का प्रभुत्व कुछ खास क्षेत्रों में बढ़ सकने की संभावना से इंकार नहीं  किया जा सकता, लेकिन अधिक संभावना इस बात की ही है कि आर्यजनो से अधिक आर्य-संस्कृति का प्रभाव बढ़ता गया। इस बात पर हम आगे विचार करेंगे। यहां हम यही कहना चाहेंगे कि सिन्धु-सभ्यता के पतन और आर्य-संस्कृति के प्रभाव-काल, यदि ऐसा कुछ था तो, आरम्भ होने के बीच कुछ सौ वर्षों का जो अंतर है, उसे किस रूप में व्यक्त किया जाय। यह उत्तर हड़प्पा-काल है। प्रकारांतर से इसे पूर्व (प्राक नहीं) वैदिक-काल भी कहेंगे। हम देखते हैं कि उत्तर-पश्चिम के उस इलाके में जहां हड़प्पा-सभ्यता प्रभावशाली थी अपने उतार के समय में भिन्न रूपों में दिखी। सिन्ध में उत्तर हड़प्पा-काल को झूकर या झांगर कहा गया है। संभवतः इसका अर्थ प्रहीन है। हड़प्पा और झूकर में एक अन्तर्सम्बन्ध या नैरंतर्य है। लेकिन झूकर काल में तौल के बटखरों की एकरूपता कमती चली गयी और सील भी धीरे-धीरे विलुप्त होने लगे। ऐसा व्यापार की अवनति और आर्थिक संकटों के द्वारा ही हुआ होगा, जैसा कि बाद के समय पर काम करते हुए इतिहासकार दामोदर धर्मानंद कोसंबी ने बताया है कि सिक्कों में स्वर्ण की मात्रा का कम होता जाना आर्थिक स्थिति के कमजोर होते जाने का  परिचायक होता है। झूकर सभ्यता में हड़प्पा लिपि के प्रयोग भी कम होते चले गए। इस दौर में कुछ मृदभांडों पर ही लिखे हुए अवशेष मिलते हैं। घग्घर-हाकरा नदी के इर्द-गिर्द पाकिस्तानी पंजाब के इलाकों में उत्तर हड़प्पा काल सीमेट्री एच संस्कृति के रूप में जाना जाता है। इतिहासकार उपिंदर सिंह के अनुसार नगरीकरण के दौर में इस संस्कृति के 174 केंद्र थे, वे उत्तर हड़प्पा काल में घट कर 50 रह गए। इसी तरह जैसे-जैसे हम सिन्धु से पूरब और दक्षिण की ओर बढ़ते हैं उत्तर हड़प्पा काल में नगरीकरण की प्रवृति कम होती दिखती है। ऐसा प्रतीत होता है, लोग नगर-सभ्यता और विकास के इस ढांचे से ऊब या भयभीत हो चुके थे। उनलोगों ने अपने को तेजी से बदलना शुरू कर दिया था। यही कारण था कि इस काल के मिले अवशेषों में हड़प्पा के चमकीले और सुचित्रित मृदभांडों की तुलना में सादे, कम चमकीले और कम चित्रित मृदभांड मिलते हैं। लिपि का धीरे-धीरे ह्रास होता चला जाना एक विस्मय पैदा करता है। दैमाबाद से प्राप्त एक मृदभांड पर हड़प्पा लिपि के चार अक्षर पाए गए हैं। इसका अर्थ है वे लोग लिपि से तो परिचित थे, लेकिन उसके प्रयोग करने से संकोच करने लगे थे। हड़प्पा के उत्कर्ष  काल में लोग अपने भावों को व्यक्त करने के लिए अधिक लिखते थे। लिखने के प्रति यह उदासीनता कैसे विकसित हुई यह विचारणीय है। यह कम आश्चर्यजनक नहीं है कि सिन्धु सभ्यता काल में तो लिपि थी, लेकिन उसके कई सौ वर्ष बाद उभरी आर्य संस्कृति में बहुत समय तक लिपि का अभाव रहा। यही कारण रहा होगा कि ऋषियों अथवा कवियों के आदिकाव्य ऋग्वेद को लम्बे समय तक अलिखित श्रुति रूप में रहना पड़ा था। वेदों का सम्पादन और लेखन बहुत बाद में हुआ। कई सौ वर्षों तक वे एक-दूसरे को सुना कर, यानी पाठ द्वारा जीवित रखी गयीं। लेकिन इस बारे में हम अभी अधिक विचार नहीं करेंगे, क्योंकि हम एक अलग विषय पर चर्चा कर रहे हैं।

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उत्तर हड़प्पा काल की एक और विशेषता है कि गुजरात और सिन्ध  के समुद्री तटों पर तो नगरीकरण में बहुत ह्रास के चिह्न नहीं मिलते, लेकिन पूरब-दक्षिण में जैसे-जैसे हम बढ़ते हैं लोग नगर-संस्कृति की जगह कृषि संस्कृति से अधिक जुड़ते पाए गए हैं। नगर संस्कृति में जो मेधा दुर्ग और उपभोग व साज-सज्जा के सरंजाम निर्मित करने में लग रही थी, अब कृषि उत्पादन और सिंचाई के साधन विकसित किये जाने में  लगने लगी। इसका परिणाम हुआ कि बृहद ग्रामीण बस्तियां विकसित होने लगीं और लोग कृषि में दिलचस्पी लेने लगे। हुलास नामक स्थान पर जो पुरातात्विक अवशेष उपलब्ध हुए हैं उसमे कई प्रकार के अनाज हैं। जाऊ, गेहूं, चावल, ज्वार, ओट, बाजरा, कुलथी, खेसारी, मड़ुआ, मसूर, बादाम, मटर और रुई-कपास के अवशेष यहां से मिले हैं। अभी भी कृषि और पशुपालन के क्षेत्र में इतिहास का अपेक्षित अध्ययन नहीं हुआ है। इस अध्ययन से इतिहास की कई उलझनें और गुत्थियां सुलझ सकती हैं।

उत्तर हड़प्पा काल का अध्ययन हमें इंगित करता है कि हड़प्पा का पतन एक विकसित सभ्यता से विद्रोह भी हो सकता है। आज भी  नगर जीवन के कारण प्रदूषण के कई रूप उभर रहे हैं। जब भी हम प्रकृति को रौंदते हैं, विनष्ट करते हैं, तब प्रकृति उलट कर हमें दण्डित करती है। पुरावशेषों से ही हड़प्पा सभ्यता के जिस  ताम-झाम का अनुमान होता है, उसी से हम यह भी अनुमान कर सकते हैं कि उस समय के लोगों में भी उससे वितृष्णा हुई होगी। यही कारण रहा होगा कि लोग कृषि जीवन की ओर लौटने लगे। नगरीय जीवन के प्रति भारतीय जन सामान्य प्रायः उदासीन बना रहता है। इसके दूसरे कारणों  की मैं उपेक्षा नहीं करना चाहता। लेकिन यह बात भी मन में अवश्य उठती है कि आम भारतीय सुविधा और विलासिता से घिरे रहने के बजाय प्रकृति की छांव में रहना अधिक पसंद करता है। हड़प्पा की विकास-केंद्रित कृत्रिम सभ्यता के विरुद्ध तत्कालीन भारत के किसानों ने चुपचाप एक सांस्कृतिक विद्रोह किया और देखते-देखते वह बड़ी सभ्यता ढह गयी, विनष्ट हो गयी। समय जो भी रहा हो, 1900 ईसापूर्व अथवा 1750 ईसापूर्व, वह महान अथवा महत्वपूर्ण सभ्यता अपने ही वजन से टूट कर बिखर गयी। कुछ समय तक इस अवसान से उपजी चुप्पी बनी रही। जिन नदियों के किनारे वह सभ्यता विकसित हुई थी, उसमें से कुछ ने अपनी धारा बदली, कुछ ने रास्ते। कहा जाता है कि सरस्वती जैसी नदी, जिसका वैदिक ऋषियों  ने बार-बार उल्लेख किया है, कहीं खो गयी। संभव है प्रकृति के उठा-पटक ने कुछ भौगोलिक परिदृश्य परिवर्तित कर दिए हों। लेकिन बहुत हद तक अब भी वही सब है जो तीन-साढ़े तीन हजार वर्ष पूर्व थी। कुछ के नाम भले बदल गए हों और इलाकों की राजनीति भले बदल गयी हो, लेकिन इतिहास अपनी जगह पर अपनी कथा कहने के लिए अडिग है।

(कॉपी संपादन : नवल)


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