जाति व्यवस्था के लिए औपनिवेशिक शासकों पर दोषारोपण : ब्राह्मणवादी झूठ को औचित्यपूर्ण ठहराना है

ब्राह्मण समाजशास्त्री जी.एस. घुर्ये के जाति, राजनीति और उपनिवेशवाद के मुद्दों पर प्रतिगामी परिप्रेक्ष्य के प्रभाव में कई पश्चिमी अध्येताओं ने धर्म और जाति की विभिन्न श्रेणियों को जिस रूप में हम देख रहे हैं उसके लिए औपनिवेशिक शासकों को जिम्मेदार ठहराया। संजोय चक्रवर्ती इसी प्रतिपादन को ही आगे बढ़ा रहे हैं, जबकि सच्चाई इसके विपरीत है

(इस वर्ष के जून माह में, एशेच इंडिया ने भूगोलवेत्ता और अमरीकी अध्येता संजोय चक्रवर्ती की ताज़ा पुस्तक के प्रचार के लिए एक ज़ोरदार अभियान चलाया. यह तब, जबकि यह पुस्तक केवल कुछ मामूली परिवर्तनों के साथ, इस सिद्धांत को पुनर्प्रचारित करने का प्रयास है कि जाति एक औपनिवेशिक निर्मिती है. पुस्तक के बारे में किताब के लेखक के बीबीसी वेबसाइट, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया इत्यादि में लेख प्रकाशित हुए हैं. इनके अतिरिक्त, किताब के अंश (स्क्रॉल.इन इत्यादि) व इसकी समीक्षाएं, मुख्यतः अंग्रेजी प्रेस में प्रकाशित हुईं हैं. इनमें से अमरीकी अध्येता अनन्या चक्रवर्ती की  द वायर में प्रकाशित समीक्षा महत्वपूर्ण है. फॉरवर्ड प्रेस इस पुस्तक ही नहीं बल्कि इस विचार कि जाति एक औपनिवेशिक निर्मिती है, पर विमर्श की शुरुआत करना चाहता है. हमने  डीब्राह्मणनाइसिंग हिस्ट्री (2005-2015) और नॉलेज एंड पॉवर (2014) के लेखक ब्रजरंजन  मणि से, इस विमर्श की शुरुआत करने का अनुरोध किया – प्रधान संपादक )


  • ब्रजरंजन मणि

केवल भावनाओं को उभार कर किसी दृष्टिकोण या विचार को सही ठहराने के इस युग में, अगर आप शब्दों से खेलने में माहिर हैं तो आप झूठी खबरें ही नहीं बल्कि झूठे विचार फैला कर नाम कमा सकते हैं. केवल भाषा के कुशल इस्तेमाल से विभ्रम फैलाने के कई तरीके आज के युग में उपलब्ध हैं. और यह स्थिति केवल सोशल मीडिया – जहाँ कोई भी कुछ भी कहने के लिए स्वतंत्र है – तक सीमित नहीं है. यह उच्च शैक्षणिक जगत में भी हो रहा है – उस जगत में जो उच्च स्तर के ज्ञान का निर्माण और प्रचार-प्रसार करता है. यह ज्ञान सत्य का वाहक भी हो सकता है और गुमराह करने वाला भी; यह मुक्ति के द्वार भी खोल सकता है और दमन के नरक में भी ढकेल सकता है; या यह दोनों का मिश्रण भी हो सकता है. बहुत समय पहले, अमरीका के निर्माताओं में से एक, जॉन एडम्स, ने ज्ञान के इस दोहरे चरित्र का खुलासा अत्यंत सुस्पष्टता से किया था. उन्होंने लिखा था, “बुरे लोग ज्ञान में उतनी ही तेजी से वृद्धि करते हैं जितने कि अच्छे लोग. विज्ञान, कलाओं, लोगों की रुचियों, उनकी समझ और साहित्य का प्रयोग भलाई या अन्याय  दोनों करने के लिए किया जा सकता है.” चूँकि हमारा ज्ञान – विशेषकर समाज और राजनीति से सम्बंधित ज्ञान – बनावटी और झूठा भी हो सकता है इसलिए जो भी ज्ञान हमें प्राप्त होता है, हमें उसे सावधानी से परखना चाहिए और उसके प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखना चाहिए. यह इसलिए और ज़रूरी है क्योंकि सत्ताधारी ऐसे ज्ञान का निर्माण और प्रचार कर सकते हैं जो उनके हितों का संरक्षण करे और उनकी सत्ता को बनाये रखने में मददगार हो. यह सत्ता-ज्ञान गठबंधन अनेक तरीकों से स्थापित सत्ता, विशेषाधिकारों और सामाजिक ऊँच-नीच को मजबूती देता है. जैसा कि मैंने अपनी दो पुस्तकों डीब्राह्मणनाइसिंग हिस्ट्री  और नॉलेज एंड पॉवर  में विस्तार से बताया है, भारत जैसे जाति-ग्रस्त देश में यह समस्या और गंभीर है क्योंकि यहाँ अनादि काल से ज्ञान पर ब्राह्मणों का कड़ा नियंत्रण रहा है और इसने उच्च जातियों का वर्चस्व बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है.   

अन्य सभी वर्चस्वशाली समूहों की तरह, ब्राह्मणों और उनसे जुड़ी जातियों के लिए, अपने विशेषाधिकारों को स्थाई बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि वे अपने वर्चस्व को नैतिकता और नीतिपरायणता का चोला पहनाएं. सत्ता पर  पकड़ बनाये रखने के लिए विशेषाधिकार प्राप्त साहित्यिक और सांस्कृतिक समूह, बलि के बकरों और काल्पनिक आख्यानों की तलाश में रहते हैं. वे अपनी सत्ता को औचित्यपूर्ण ठहराने के लिए आधारहीन तर्कों का सहारा लेते हैं. ब्राह्मणवादी सत्ता की राजनीति, मिथ्या ज्ञान के सृजन में सतत रत रहती है और इस तरह सृजित मिथ्या विचार – जिन्हें बार-बार दोहराया जाता है – इस सत्ता को स्थायित्व प्रदान करते हैं.

जी.एस. घुर्ये

इसका एक ज्वलंत हालिया उदाहरण है दक्षिण एशिया पर उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययन. ये अध्ययन जातिगत श्रेष्ठि वर्ग की बौद्धिक शरणस्थली बन गए हैं और इनका इस्तेमाल भारतीय समाज और संस्कृति की समस्याओं के लिए औपनिवेशिक शासकों को दोषी ठहराने के लिए किया जा रहा है. इन समस्याओं में ‘आधुनिक भारत में जाति व्यवस्था का आचरण और उसके बारे में सोच’ शामिल है. यहाँ यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि कई ‘ज्ञानियों’ ने 19वीं सदी में जाति के स्वरुप को हमारी ‘सांस्कृतिक श्रेष्ठता’ का हिस्सा बताते हुए कहा था कि उसकी अगली सदी में भारतीय उपमहाद्वीप में जाति-विरोधी आंदोलनों के कारण, हमें जाति प्रथा में परिवर्तन करने पड़े क्योंकि यह हमारी ‘सांस्कृतिक मजबूरी’ बन गयी थी. और अब, दमित दलित-बहुजन बहुसंख्यकों के दबाव के चलते, उन्हीं ज्ञानियों के सुयोग्य उत्तराधिकारियों ने मानो जादू की छड़ी घुमाकर यह सिद्धांत अविष्कृत कर लिया है कि जाति, दरअसल, ब्रिटिश औपनिवेशवाद की निर्मिती है. इससे वे जाति के निर्माण और उसे बनाने रखने में अपनी संलिप्तता के आरोप से मुक्त हो जाते हैं. अपने ज्ञान की ताकत का प्रयोग ये पंडित जोर-शोर से यह प्रचारित करने के लिए कर रहे हैं कि वे जाति व्यवस्था के पीड़क नहीं बल्कि पीड़ित हैं. 

इसी कड़ी में इन दिनों संजोय चक्रवर्ती नामक एक स्वघोषित ज्ञानी की पुस्तक द ट्रुथ अबाउट अस: द पॉलिटिक्स ऑफ़ इनफार्मेशन फ्रॉम मनु टू मोदी  चर्चा में हैं. चक्रवर्ती, एक भूगोलवेत्ता हैं और अमरीका में रहते हैं. उनकी पुस्तक देश और विदेश के सहज-विश्वासी पाठकों को गुमराह कर रही है. यह पुस्तक उसी हास्यास्पद सिद्धांत का प्रचार करती है, जिसकी चर्चा ऊपर की गई है – अर्थात जाति को जिस रूप में हम आज जानते हैं, वह ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की निर्मिती है. यद्यपि लेखक यह दिखावा करते हैं कि वे हमें कोई नई चीज़ बता रहे हैं परन्तु सच यह है कि वे एक पुरानी, घिसे-पिटी स्थापना को नए कलेवर में अपेक्षाकृत बड़े पाठक वर्ग को परोस रहे हैं. यह स्थापना, कम से कम तीन दशकों से दक्षिण एशिया पर उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययनों  का भाग रही है और कई भूमंडलीकृत देसी पंडित, अपनी अकादमिक कृतियों में इस स्थापना को अलग-अलग तरीकों से प्रस्तुत कर उसे सही ठहराने का प्रयास करते रहे हैं.  


इस उत्तर-औपनिवेशिक स्थापना के मूल जन्मदाता ब्राह्मण समाजशास्त्री गोविन्द सदाशिव घुर्ये (1893-1983) थे. परन्तु जैसा कि हम आगे देखेंगे, अकादमिक क्ष्रेत्रों में जाति के वर्तमान स्वरुप के लिए अंग्रेजों को दोषी ठहराने का गंभीर प्रयास अमरीकी मानवशास्त्री बर्नार्ड कोहन (1987- 1996) के लेखन से शुरू हुआ और इसे आगे ले गए उनके दो शिष्य – रोनाल्ड इंडेन (1991) और निकोलस डर्क्स (2001). भारत में जाति के अध्ययन को औपनिवेशिक शासकों द्वारा सूचनाओं के संकलन, औपनिवेशिक कानूनों, जनगणना और जातियों के दस्तावेजीकरण से जोड़ कर ये अध्येता इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि ब्रिटिश औपनिवेशवाद ने जाति का राजनीतिकरण किया और उसे एक बिलकुल नया अर्थ दिया, जिस कारण जाति का पारंपरिक स्वरुप बदल गया. इस सिद्धांत को प्रतिपादित करने वाली सबसे  प्रसिद्ध पुस्तक (डर्क्स; कास्ट्स ऑफ़ माइंड; 2001), जाति को एक आधुनिक परिघटना मानती है, जो कि अंग्रेजों की देन है.   

“जाति (जिस रूप में आज हम उसे जानते हैं), भारत और पश्चिमी औपनिवेशिक शासन के मेल से उपजी एक आधुनिक परिघटना है. इससे मेरा यह अर्थ नहीं है कि चतुर अंग्रेजों ने इसका अविष्कार किया…परन्तु…अंग्रेजों के राज में ही जाति, भारत की विविधापूर्ण सामाजिक पहचानों, समुदायों और समूहों को आवाज़ देने, संगठित करने और उससे भी अधिक, उन्हें व्यवस्थित स्वरुप देने का माध्यम बन गई…संक्षेप में, औपनिवेशवाद ने जाति को वह बनाया जो वह आज है…भारतीय समाज का केंद्रीय प्रतीक.” (डर्क्स 2001:5)

यह सिद्धांत उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययनों का हिस्सा बन गया. परन्तु जो बात अधिकांश लोगों (अकादमिक जगत के सदस्यों सहित) को ज्ञात नहीं है वह यह है कि इस सारहीन सिद्धांत के बीज ब्राह्मणवादी समाजशास्त्र के पितामह घुर्ये ने बहुत पहले बोये थे. डर्क्स इस बात को दिल खोल कर स्वीकार करते हैं परन्तु हमारे कुटिल देसी पंडितों ने यह बात छुपाये रखी क्योंकि घुर्ये अपने जातिवादी रवैये के लिए जाने जाते थे और अति-राष्ट्रवाद और हिन्दू पुनरुत्थानवाद के हामी थे. आश्चर्य नहीं कि उनका लेखन जातिगत सद्भावना और भारतीय समाज के ब्राह्मणवादी मॉडल पर जोर देता है. अपनी विख्यात पुस्तक कास्ट एंड रेस इन इंडिया ({1932} 2000) में वे लिखते है कि जाति व्यवस्था कई घटकों से मिलकर बनी थी परन्तु ब्राह्मण पुरोहित वर्ग के अधीन, सामाजिक सौहार्द हमेशा उसकी एक महत्वपूर्ण विशेषता बनी रही. घुर्ये, जाति जनगणना और आंकड़ों के संकलन के ज़रिये जाति को खुले में लाने की औपनिवेशिक नीति से चिंतित नज़र आते हैं. कई निर्णयों, जैसे दलितों और अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण, को वे ‘खतरनाक’ मानते हैं क्योंकि उनके विचार से आरक्षण की नीति, “राष्ट्रीयता के स्थापित मानकों व सामाजिक न्याय के पथप्रदर्शक सिद्धांतों के विरुद्ध है.” वे औपनिवेशिक सरकार के इन क़दमों की कड़ी निंदा करते हुए इसे कई खतरनाक प्रवृत्तियों जैसे जाति के राजनीतिकरण और जातियों के बीच शत्रुता और टकराव – जिसे वे दक्षिण भारत और अपने गृह प्रदेश महाराष्ट्र में चले ब्राहमण-विरोधी आन्दोलन में देख रहे थे – के लिए ज़िम्मेदार मानते हैं. 

बर्नार्ड कोहन

डर्क्स उत्साहपूर्वक और अत्यंत कृतज्ञता से स्वीकार करते हैं कि, “घुर्ये भले ही वे पहले व्यक्ति न रहे हों जिन्होंने आरक्षण की नीति और जाति के राजनीतिकरण के विरुद्ध तर्क दिए; परन्तु उन्होंने स्वतंत्रता के आसपास के वर्षों में जाति और राजनीति के रिश्तों की अत्यंत अर्थपूर्ण और अकादमिक दृष्टि से मज़बूत विवेचना की…घुर्ये शायद वे पहले गंभीर अध्येता थे, जिन्होंने यह बताया कि जाति का राजनीतिकरण, इस पारंपरिक संस्था की स्वाभाविक विकास प्रक्रिया का अंग न होकर अंग्रेजों की औपनिवेशिक नीति का सोचा-समझा नतीजा था” (2001: 249). 

डर्क्स यह  स्वीकार करते हैं कि “घुर्ये ने वर्षों पहले बर्नार्ड कोहन और अन्यों के समालोचनात्मक मानवशास्त्र की उन संकल्पनाओं को लिपिबद्ध किया था, जिनसे यह (डर्क्स की) पुस्तक प्रभावित है” (पूर्वोक्त). घुर्ये की औपनिवेशवाद की विवेचना की प्रशंसा करते हुए उसे ‘भविष्यदर्शी और गंभीर’ बताते हुए डर्क्स, घुर्ये के राष्ट्रीय एजेंडा को रेखांकित करते हैं. वे कहते हैं कि घुर्ये के इस एजेंडा के मूल में थी “ब्राह्मणों और ब्राह्मणवाद के पवित्र इरादों पर हमले से हिन्दू समुदाय को होने वाली क्षति” के बारे में चिंता (पूर्वोक्त).  

साफ़ है कि घुर्ये के जाति, राजनीति और उपनिवेशवाद के मुद्दों पर प्रतिगामी परिप्रेक्ष्य के आधार पर ही बर्नार्ड कोहन और निकोलस डर्क्स ने यह प्रतिपादित किया कि धर्म और जाति की विभिन्न श्रेणियों को जिस रूप में हम आज जानते हैं, वे हमारे औपनिवेशिक शासकों द्वारा कराई गयी जनगणनाओं और जानकारी संकलित करने के अन्य उपक्रमों के नतीजे में अस्तित्व में आयीं. इसके साथ ही, इन दोनों ने बड़ी संख्या में देसी पंडितों (जो कि घुर्ये के योग्य उत्तराधिकारी थे) के साथ अध्ययन और शोध किया और उनके निकट संपर्क में रहे (जैसा कि उनके आभार प्रदर्शन में निहित है). उन्होंने देसी पंडितों (जिनका भारत में ज्ञान निर्माण करने वाले कारखानों पर लगभग एकाधिकार है) को सम्मोहित कर लिया और उनके बीच ऐसी लोकप्रियता हासिल की जो इन दोनों लेखकों के लिए मुनाफे का सबब बन सके. इससे यह स्पष्ट है कि ये श्वेत पंडित इस अद्भुत निष्कर्ष पर कैसे पहुंचे कि जातिगत पदक्रम, चार वर्णों और ब्राह्मणवादी सत्ता का निर्माण अंग्रेजों ने किया था. इस धूर्ततापूर्ण स्थापना का अर्थ यह था कि अंग्रेजों के राज के पहले, भारतीयों की जातिगत और धार्मिक पहचान थी ही नहीं और यह भी कि जातिगत पूर्वाग्रहों, भेदभाव और टकराव का ज़हर भारत के समाज में जाति जनगणना और औपनिवेशिक शासकों की अन्य कारगुजारियों के कारण फैला. घुर्ये की संकल्पना के नकलची, ज्ञान के ये सौदागर चाहते हैं कि हम यह मान लें कि अंग्रेजों के भारत के तट पर पहुँचने से पहले तक जाति और ब्राह्मणवाद पर आधारित सामाजिक व्यवस्था पूरी तरह न्यायपूर्ण थी. 

इस तर्क में कोई दम नहीं है कि अंग्रेजों द्वारा जातियों की गणना करने और उनका दस्तावेजीकरण करने से जाति व्यवस्था ने एक नया स्वरुप और अर्थ ग्रहण किया और वह गैर-पदक्रम आधारित और सामंजस्यपूर्ण के स्थान पर विवादग्रस्त और भेदभावपूर्ण बन गयी. 

जैसा कि मैंने अपनी पुस्तक में लिखा है, “अगर यह मान भी लिया जाये कि औपनिवेशवाद ने जाति को अधिक संस्थागत महत्व देकर उसका स्वरुप परिवर्तित कर दिया – जैसा कि डर्क्स, इंडेन और उनके ऊँची जातियों के भाट मानते हैं –  तब भी यह साफ़ है कि जाति के स्वरुप में किसी भी तरह का परिवर्तन तभी किया जा सकता था जब जाति पहले से मौजूद रही हो, जैसा कि ए. अहमद (1992) और एस. सरकार (1996: 1997) का तर्क है. जाति का श्रेणीबद्ध पदक्रम, उपनिवेशवादी निर्मिती नहीं था; जाति पूर्व-औपनिवेशिक काल में भी थी; और तब भी वह पहचान के कई स्वरूपों में से एक न होकर सामाजिक पहचान का मूल आधार थी. जब अंग्रेजों ने भारत में अपना शासन स्थापित किया तब भी जाति, भारत के सामाजिक और राजनैतिक जीवन के पोर-पोर में समाई हुई थी.” (डीब्राह्मणनाइसिंग हिस्ट्री, पृष्ठ 198).

निकोलस डर्क्स और उनकी पत्नी जानकी बाखले

इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययन, उस भेदभाव, शोषण और हिंसा – जो जाति के ढांचे का अविभाज्य हिस्सा हैं; जातिगत दमन के पीड़ितों के जीवन के यथार्थ और ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था के प्रति दलित-बहुजनों के अलगाव के भाव और उनके प्रतिरोध को नज़रअंदाज़ करते हैं. इन भावनाओं की जो ज्वलंत अभिव्यक्ति फुले, आंबेडकर और पेरियार के लेखन में हमें स्पष्ट दिखलाई पड़ती है, ये अध्ययन उसकी भी उपेक्षा करते हैं. जो लोग भारत के सामाजित इतिहास से वाकिफ हैं वे जानते हैं – और इसे मैंने अपनी पुस्तक डीब्राह्मणनाइसिंग हिस्ट्री में वर्णित किया है – कि जाति के राजनीतिकरण और उसके पदक्रम के निर्धारण की व्यवस्था की जड़ें इस ब्राह्मणवादी अवधारणा से हुई कि विभिन्न जातियों के सदस्यों के साथ अलग-अलग व्यवहार इसलिए किया जाना चाहिए क्योंकि उनकी बौद्धिक क्षमताओं और उनके मनोविज्ञान में मूल अंतर होते हैं. सदियों से ब्राह्मणवादी दर्शन, धार्मिक सिद्धांतों, सांस्कृतिक प्रतीकों और सामाजिक संव्यवहार को ‘सामान्य’ और ‘स्वाभाविक’ ठहराया जाता रहा और इसने जातिगत पदक्रम और पितृसत्तामकता को औचित्यपूर्ण करार दिया और यह निरुपित किया कि इसके पीछे सामाजिक नहीं वरन प्राकृतिक और अलौलिक कारण हैं. जैसा कि मैंने डीब्राह्मणनाइसिंग हिस्ट्री (पृष्ठ 26) पर लिखा है, “ब्राह्मणों ने इस कपट को पवित्रता (धर्म) का चोला पहना दिया. उनका धर्म, एक दैवीय व्यवस्था थी जो त्याग और बलिदान पर आधारित थी और यह व्यवस्था सामाजिक पदक्रम को बनाये रखने पर निर्भर थी. ब्राह्मण, धर्म (जिसमें नैतिकता और न्याय दोनों शामिल थे) की स्थापना तब तक नहीं करेगा जब तक कि धर्म के ढांचे के शीर्ष पर वह नहीं होगा, जब तक कि नैतिकता, जाति-आधारित व्यवस्था और राजनीति की रक्षक नहीं होगी, जब तक कि न्याय का आधार दंडनीति और मत्स्यन्याय (बड़ी मछली के छोटी मछली को निगलना) नहीं होगा. इस तरह, जाति के सिद्धांत को धर्म का हिस्सा बनाकर, ब्राह्मणों ने उसके विरोध की संभावनाओं को समाप्त कर दिया और धीरे-धीरे  जाति व्यवस्था को पूरे उपमहाद्वीप में स्थापित कर दिया.” 


ब्राह्मणवाद ने जाति की सिद्धांतिकी और ढांचे का उपयोग, दलित-बहुजन बहुसंख्यकों का अमानवीकरण करने और उन्हें बांटने के लिए किया. आंबेडकर, जाति को श्रम-विभाजन से उपजे वर्गों के रूप में नहीं देखते थे. वे उसे श्रेणीबद्ध असमानता पर आधारित श्रमिकों का विभाजन मानते थे. किसी भी वर्ग (श्रम विभाजन पर आधारित व्यवस्था में समान स्तर का काम करने वाले व्यक्ति) की कई जातियां होने से वे विभाजित हो जाते हैं. इसी कारण, उन्होंने, ब्राह्मणवाद को “मानवता के दमन और उसे दास बनाने की शैतानी युक्ति” बताया. इस “शैतानी युक्ति” में शामिल है परस्पर बैर रखने वाली श्रेणीबद्ध असमानता पर आधारित सैकड़ों जातियां और उप-जातियां. यही कारण है कि मनुष्य जाति से बहिष्कृत और शोषित नीची जातियों के प्रतिरोध के बावजूद जाति व्यवस्था के चंगुल से समाज आजाद नहीं हो सका. 

इस प्रकार, उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययन चाहे जो कहें, तथ्य यह है कि जिस जाति-आधारित सामाजिक असमानता को आज हम देख रहे हैं, उसका निर्माण अंग्रेजों ने नहीं किया था. इसमें कोई संदेह नहीं कि औपनिवेशिक काल में जाति व्यवस्था में कुछ परिवर्तन आये, परन्तु इस तरह के परिवर्तन भारतीय इतिहास के हर दौर में होते रहे हैं. ब्राह्मणवादी सिद्धांतों और क्षत्रियों की जोर-ज़बरदस्ती पर आधारित जाति व्यवस्था को सदियों तक ‘स्वाभाविक’ और ‘सामान्य’ माना जाता रहा और इसका अस्तित्व बना रहा. जाति व्यवस्था, राजनैतिक, आर्थिक और तकनीकी बदलावों के अनुरूप स्वयं को परिवर्तित करने और अपने लचीलेपन के लिए कुख्यात है. और यही औपनिवेशिक काल में भी हुआ. 

जाति को औपनिवेशिक निर्मिती निरुपित करने से जातिगत श्रेष्ठि वर्ग को वह मिल गया, जो वह चाहता था और मन ही मन मानता भी था. इसमें सहायक बना एडवर्ड सईद की ओरिएण्टलिस्म पर प्रसिद्ध पुस्तक (1978), जो भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद की इस मूल प्रकृति को सहर्ष नज़रअंदाज़ करती है कि उसकी स्थापना में भारतीय श्रेष्ठि वर्ग की महती भूमिका थी. इन उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययनों में पांडित्य का दिखावा है और अस्पष्ट भाषा का प्रयोग किया गया है. ये अध्ययन प्रगतिशील और समतावादी दृष्टिकोण के हामी होने का दम भरते हैं परन्तु दरअसल वे जाति और ब्राह्मणवादी विशेषाधिकारों का बचाव करने वाले हैं. यही कारण है कि विशेषाधिकार प्राप्त जातियों के अध्येताओं ने इन्हें हाथों-हाथ लिया. अंग्रेजी भाषा पर अपनी पकड़ के चलते, देसी पंडितों का अमरीकी शिक्षा जगत में गैर-अनुपातिक प्रतिनिधित्व है और वे पश्चिमी जगत में स्वयं को भूरे सबाल्टर्नों के स्वर के रूप में प्रस्तुत कर, श्वेत श्रेष्ठि वर्ग पर प्रश्नचिन्ह लगा कर और उनके मन में अपराधबोध जागृत कर, मनचाही नौकरियां, पदोन्नतियां और मुंह मांगा मुनाफा प्राप्त करना चाहते हैं. परन्तु इसके साथ ही, वे भारत और उसके बाहर भी अपना उच्च दर्जा सुरक्षित रखना भी चाहते हैं.      

यह सब कहने का आशय, ब्रिटिश औपनिवेशवाद का बचाव करना नहीं हैं, जो भारत और उसके निवासियों को लूटने का एक काला अध्याय था. परन्तु अंग्रेजों को जाति व्यवस्था की क्रूरताओं और उसमें निहित असमानताओं के लिए दोषी ठहराना, गलत था, गलत है और क्षुद्र मनोवृत्ति का परिचायक है. उसकी सारी कमियों और अपराधों के बावजूद, हमें यह स्वीकार करना ही होगा कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने भारत में कानून के राज की स्थापना की, दलितबहुजनों के शिक्षा प्राप्त करने पर ब्राह्मणवादी प्रतिबन्ध को उठाया, भारत के बंद समाज को खुला बनाने की प्रक्रिया की शुरुआत की और इस तरह, भारत की कई स्थापित दुष्टतापूर्ण परम्पराओं और मान्यताओं को बदला. सन 1909 के मोरले-मिन्टो सुधारों से, अंग्रेजों ने भारत में प्रजातान्त्रिक प्रतिनिधित्व की शुरुआत की, भले ही यह प्रतिनिधित्व कितना ही अपूर्ण और सीमित रहा हो. 

इसके अतिरिक्त, उत्तर-औपनिवेशिक पंडित इस शोचनीय तथ्य से मुंह फेर रहे हैं कि बहुसंख्यक दलित-बहुजनों के लिए पारंपरिक जाति और ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था, ब्रिटिश शासन से कहीं अधिक दमनकारी थी. और ना ही वे इस सत्य को समझ पा रहे हैं कि जाति की भावना को उभारने के लिए ब्राह्मणवादी राष्ट्रवाद उतना ही दोषी था जितना कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद. इस तथ्य पर प्रकाश डालते हुए मैंने अपनी पुस्तक में लिखा है:   

संजोय चक्रवर्ती की ‘ट्रुथ अबाउट अस’

“जाति की भावना के मज़बूत होने की प्रक्रिया में राष्ट्रवाद के ब्राह्मणवादी उन्मुखीकरण से और तेज़ी आई. शब्दाडंबर को अलग करके देखने से हमें पता चलेगा कि इस राष्ट्रवाद ने दलित-बहुजनों के एक बड़े तबके को ‘राष्ट्र’ से बहिष्कृत रखा. सत्ता की राष्ट्रवादी राजनीति के समानांतर, स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर पर पूरे उपमहाद्वीप में दलितबहुजन, संगठित होकर दमनकारी शक्तियों के प्रतिरोध में अनेक आन्दोलन चला रहे थे.  शिक्षा के सीमित किन्तु महत्वपूर्ण प्रसार और बढ़ती राजनैतिक जागरूकता ने दलित-बहुजनों के एक तबके को अपने अधिकारों के प्रति जागृत कर दिया था. जाति जनगणना करने के औपनिवेशिक शासकों के निर्णय के बहुत पहले से, देश भर में जाति-आधारित और जाति-विरोधी आन्दोलन खड़े हो रहे थे. परन्तु राष्ट्रवादी नेतृत्व इस तरह के आंदोलनों को ‘विघटनकारी’ और ‘राष्ट्रहित’ के विरुद्ध बताकर उन्हें नीची निगाह से देखता था. अपने स्थापित हितों की रक्षा के लिए, उच्च जातियों के श्रेष्ठि वर्ग ने राष्ट्रवाद के चोले में ब्राह्मणवादी सिद्धातों को छुपाये रखा और आमजनों की प्रजातान्त्रिक महत्वाकांक्षाओं और उनमें व्याप्त असंतोष को राष्ट्रविरोधी निरुपित किया और उनकी देशभक्ति पर प्रश्नचिन्ह लगाये.” (डीब्राह्मणनाइसिंग हिस्ट्री, पृष्ठ 338). 

ऐसा लगता है कि जाति और औपनिवेशिक शासन के जटिल अंतर्संबंधों पर प्रकाश डालने की बजाय, उत्तर-औपिनिवेशिक अध्ययनों का एकमात्र उद्देश्य किसी न किसी तरीके से ब्राह्मणवादी निष्कर्षों तक पहुंचना और दलित-बहुजनों की अपने दमन की स्मृतियों और जातिगत भेदभाव के अनुभवों को गलत ठहराना है.    

उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययन इस विद्रूप सच्चाई पर भी कोई ध्यान नहीं देते – जैसा कि मैंने डीब्राह्मणनाइसिंग हिस्ट्री के अध्याय 4 में विस्तार से बताया है – कि भारत में औपनिवेशिक शासन की स्थापना, अंग्रेजों और भारतीय श्रेष्ठि वर्ग की मिलीभगत से हुई थी. दोनों के हित समान थे. अपना शासन चलाने के लिए, जो भी जानकारियां औपनिवेशिक शासकों ने एकत्रित कीं, वे भी नस्लवादी उपनिवेशवादियों और जातिवादी भारतीयों के संयुक्त प्रयासों का नतीजा थीं. ब्राह्मणवाद हमेशा से सत्ता की राजनीति खेलने में सिद्धहस्त रहा है और राज्य की विचारधारा को आकार देने में हमेशा उसकी भूमिका रही है. और यही औपनिवेशिक काल में भी हुआ. बल्कि तथ्य तो यह है कि जातिगत श्रेष्ठि वर्ग, एक सदी से भी ज्यादा समय तक, औपिनिवेशिक खेल का हिस्सा बना रहा और ब्रिटिश शासन के अंतिम 30-40 वर्षों में ही वह अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा हुआ और वह भी इसलिए क्योंकि वह सत्ता पर अपना एकाधिकार चाहता था. जातिगत श्रेष्ठि वर्ग ने अपने हितों की पूर्ति के लिए अंग्रेज़ शासकों के नीतियों को सफलतापूर्वक प्रभावित किया परन्तु जाति व्यवस्था के दमितों की बढ़ती शिकायतों और मांगों को सुनना भी सरकार की मजबूरी थी. जातिगत श्रेष्ठि वर्ग यह जान कर बहुत खफा हुआ कि अंग्रेज़, उन आदर्श हिन्दू शासकों की तरह नहीं थे जो देश पर इस ब्राह्मणवादी सिद्धांत के अनुरूप शासन करते थे कि दलित-बहुजनों को अनंत काल तक दास बनाकर रखा जाना चाहिए.  

इसका यह अर्थ नहीं है की ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन घृणास्पद नहीं था. वह निश्चित तौर पर घृणास्पद ही था. परन्तु यह उतना घृणास्पद नहीं था जितना कि ब्राह्मणवाद और यह इससे साबित होता है की अंग्रेजी शासन ने फुले, पेरियार, बिरसा और आंबेडकर जैसे लोगों को शिक्षा और ज्ञान प्राप्त से नहीं रोका. 

ब्रज रंजन मणि की ‘डीब्राह्मणनाइसिंग हिस्ट्री’

उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययन इस मूल सत्य को नकारते हैं कि पूर्व-औपनिवेशिक भारत में जाति-आधारित सामाजिक ढ़ांचा, दलित-बहुजन जनता के भौतिक और सांस्कृतिक शोषण का औजार था. यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि इस स्वयंसिद्ध सत्य को बहस का विषय बना दिया गया है. मैं इस विषय में रूचि रखने वाले पाठकों से यह अनुरोध करूंगा कि वे डीब्राम्हणनाईसिंग हिस्ट्री का अध्ययन करें जिसमें मैंने भारतीय समाज में ब्राम्हणवादी वर्चस्व और उसके दलित-बहुजन प्रतिरोध की समग्र समीक्षा की है. यहां मैं ज्ञान और जाति की राजनीति पर संक्षेप में अपने विचार प्रस्तुत करूंगा क्योंकि यही इस लेख के विषय का मूल तत्व है.

“शिक्षा जगत और ज्ञान निर्माण के उच्च स्तरों पर निहित स्वार्थों का एकाधिकार है, यह एक तथ्य है और यही तथ्य सारी समस्याओं की जड़ है. यह तथ्य उन सभी बौद्धिक प्रयासों का हिस्सा है जो भारत के इतिहास और संस्कृति को अलग-अलग तरीकों से ब्राम्हणवादी सांचे में प्रस्तुत करते हैं. यही कारण है कि इन बौद्धिक प्रयासों ने कभी समाज के पारंपरिक ढ़ांचे, जाति और ब्राम्हणवाद को स्वभाविक और प्राकृतिक मान लिए जाने और विषेषाधिकार प्राप्त जातियों की संस्कृति को भारतीय संस्कृति का दर्जा दिए जाने जैसी मूल अवधारणाओं पर कोई प्रश्न नहीं उठाए. अगर आप जाति और ब्राम्हणवाद की आलोचना करते हैं तो आपकी सोच को यूरोप-केन्द्रित बताया जाता है और आप पर यह आरोप लगाया जाता है कि आप भारतीय सभ्यता के मूलभूत मूल्यों पर हमला कर रहे हैं. यह कहना भी मुहाल हो गया है कि जाति और नस्ल व ब्राम्हणवाद और औपनिवेशवाद एक दूसरे के संगी-साथी हैं. एक से एक नए सिद्धांत प्रस्तुत किए जा रहे हैं. उनमें अवांछित पांडित्य भी है और दस्तावेजों का कुशल प्रयोग भी. यह कहा जा रहा है कि जाति एक औपनिवेशिक निर्मिती है जिसका आधार जनसंख्या सर्वेक्षण और जनगणना रपटें हैं  (इंडेन 1990; डर्क्स 1990); साम्प्रदायिकता एक ‘प्राच्य शब्दावली’ और ‘औपनिवेशिक ज्ञान की उपज है’ (पाण्डे 1990). धर्मनिरपेक्षता एक ‘विदेशी सांस्कृतिक विचारधारा’, ‘ईसाई धर्म का उपहार’ है और ‘पारंपरिक समाज में न तो कट्टरवादी थे और ना ही पुनरूत्थानवादी’ (मदान 1987: 748-9). इन सभी धारणाओं का अविष्कार उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययनों के नाम पर किया जा रहा है और इसका उद्देश्य यह बताना है कि जब पश्चिमी औपनिवेशिकतावादी भारत में आए तब उन्होंने यहां किस तरह का सीधा-सच्चा और निष्कपट समाज पाया (नंदी, 1983). ये अध्ययन सदियों की जातिगत और वर्गीय हिंसा और पितृसत्तातमकता का भारतीय इतिहास से लोप कर देना चाहते हैं. दूसरे शब्दों में, औपनिवेशिक त्रासदी को एक ऐसे औपनिवेशिक प्रहसन के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है जिससे ब्राम्हणवादी श्रेष्ठि वर्ग, जातिगत और वर्गीय शोषण की उत्पत्ति को रहस्य के आवरण में लपेट सके और ब्राम्हणवादी यह दिखा सकें कि वे दमनकर्ता नहीं बल्कि दमित थे.

यह अंदाजा लगाना कठिन नहीं है कि ‘समुदाय‘ और ‘संस्कृति‘ के स्वनियुक्त रक्षकों को पूर्व-औपनिवेशिक काल के समाज के निर्दोष होने के सिद्धांत से कितना लाभ हो सकता है क्योंकि औपनिवेशिक शासकों के अपराध, जाति और ब्राम्हणवाद के अपराधों की तुलना में कुछ भी नहीं हैं. जाति व्यवस्था और ब्राम्हणवाद ने दलित-बहुजनों (जो भारत की आबादी का लगभग अस्सी प्रतिशत हैं) को लगभग तीन हजार सालों तक प्रताड़ित और लांछित किया और उन्हें नीची निगाहों से देखा. दूसरे शब्दों में, एक शैतानी नव-ब्राम्हणवादी इतिहास का निर्माण करने का प्रयास किया जा रहा है जिसका मूल तर्क यह है कि समकालीन भारत की समस्त समस्याओं के लिए पश्चिमी औपनिवेशवाद उत्तरदायी है. मजे की बात यह है कि इस अवधारणा के निर्माता वे अध्येता हैं जो यूरोप और अमरीका के विश्वविद्यालयों में काम कर रहे हैं और उनके पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है. जैसा कि एजाज अहमद (1992: 196-7) लिखते हैं, ‘उपनिवेशवाद को न केवल उसकी क्रूरताओं के लिए बल्कि हमारी क्रूरताओं के लिए भी दोषी ठहराया जा रहा है’ (डीब्राम्हणनाईसिंग हिस्ट्री, पृष्ठ 12-13)

उत्तर-औपनिवेशिक पंडितों के अतिरिक्त, सभी को यह स्पष्ट है कि सत्ताधारी हिन्दुत्ववादी शक्तियां (जो भारत के प्रजातांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष तानेबाने को तहसनहस कर देना चाहती हैं) को इस अवधारणा से शक्ति मिलती है कि जाति एक औपनिवेशिक निर्मिती है. इससे उनके लिए यह दावा करना आसान हो जाता है कि जाति कभी भी एक हिन्दू परिघटना नहीं थी. भारतीय इतिहास और संस्कृति की इस तरह की अंधकारवादी व्याख्या से जातिगत वर्चस्व को बनाए रखने में मदद मिलती है. ब्राम्हणवादी ज्ञान के जड़ें जमा लेने के बाद हिन्दू दक्षिणपंथियों के लिए लोगों को उल्लू बनाना आसान हो जाएगा. वे मिथकों को इतिहास के रूप में प्रस्तुत कर सकेंगे और हमारे अतीत और वर्तमान के निस्पृह मूल्यांकन की सभी संभावनाओं को समाप्त कर सकेंगे. यही आज हमारे समक्ष प्रस्तुत सबसे बड़ी चुनौती है. हमारे सामने इसके सिवाए कोई रास्ता नहीं है कि हम भारतीय इतिहास और संस्कृति के इस प्रतिगामी मिथ्याकरण का विरोध करें. हमें यह समझना होगा कि ‘मालिक के उपकरण कभी भी मालिक के घर को ध्वस्त करने के लिए प्रयुक्त नहीं किए जा सकते’.          

सन्दर्भ :

अहमद, एजाज़. 1992. इन थ्योरी: क्लासेज, नेशन्स, लिटरेचर्स. लन्दन एंड न्यूयॉर्क: वर्सो

कोहन, बर्नार्ड. 1987. एन अन्थ्रोपोलोगिस्ट अमोंग द हिस्टोरियंस एंड अदर एसेसेस. ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस

कोहन, बर्नार्ड. 1996. कोलोनिअलिस्म एंड इट्स फॉर्म्स ऑफ़ नॉलेज: द ब्रिटिश इन इंडिया. प्रिन्सटन. प्रिन्सटन यूनिवर्सिटी प्रेस.

डर्क्स, निकोलस बी. (2001) 2002. कास्ट्स ऑफ़ मंद: क्लोनिअलिस्म एंड द मेकिंग ऑफ़ मॉडर्न इंडिया. दिल्ली: परमानेंट ब्लैक. 

घुर्ये, जी एस. कास्ट एंड रेस इन इंडिया. (1932) 2000. बॉम्बे: पॉपुलर प्रकाशन.

इन्डेन, रोलैंड. (1992) 2000. इमेजिनिंग इंडिया. लन्दन: हर्स्ट

मणि, ब्रज रंजन. (2005) द्वितीय संशोधित संस्करण. 2015. डीब्राह्मणनाइसिंग हिस्ट्री: डोमीनेन्स एंड रेजिस्टेंस इन इंडियन सोसाइटी. दिल्ली. मनोहर

मणि, ब्रज रंजन. 2014. नॉलेज एंड पॉवर: ए डिस्कोर्स फॉर ट्रांसफॉर्मेशन. दिल्ली: मनोहर 

नंदी, आशीष. द इंटिमेट एनिमी: लोस एंड रिकवरी ऑफ़ सेल्फ अंडर कोलोनिअलिस्म. नयी दिल्ली. ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1983 

पाण्डेय ज्ञानेंद्र. द कंस्ट्रक्शन ऑफ़ कम्युनालिस्म इन कोलोनियल नार्थ इंडिया. नयी दिल्ली: ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1990

सईद, एडवर्ड. 1978. ओरिएंटालिस्म: वेस्टर्न कन्सेप्शनस ऑफ़ द ओरिएंट. लन्दन. पेंगुइन

सरकार, सुमित. 1996. डेविड ल्युडेन द्वारा सम्पादित मेकिंग इंडिया हिन्दू में ‘इंडियन नेशनालिस्म एंड द पॉलिटिक्स ऑफ़ हिंदुत्व, पृष्ठ 270-93: ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस

सरकार सुमित. 1996.  राइटिंग सोशल हिस्ट्री. दिल्ली. ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस.

एन. मदान, ‘सेकुलरिज्म इन इट्स प्लेस’, जर्नल ऑफ़ एशियाई स्टडीज, 46.4 (1987): 748-9. 

(अनुवाद -अमरीश हरदेनिया, संपादन- सिद्धार्थ ) 


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