विशाखदत्त का नाटक ‘मुद्राराक्षस’ 

प्रेमकुमार मणि बता रहे हैं विशाखदत्त द्वारा 579-500 ईस्वी के दौरान लिखे गए नाटक मुद्राराक्षस के बारे में। यह नाटक चंद्रगुप्त के आरंभिक दिनों में राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों को बयां करता है। इस नाटक से कई सवाल भी उभरते हैं। एक तो यही कि यदि चाणक्य को चंद्रगुप्त की जगह पुष्यमित्र मिल गया होता तो क्या तब भी वह उसे वृषल यानी नीच कहकर संबोधित करता?

 

जन-विकल्प

विशाखदत्त का नाटक ‘मुद्राराक्षस’ मौर्यकालीन राजनैतिक स्थितियों की एक झांकी हमारे सामने प्रस्तुत करता है और इस रूप में प्राचीन भारत के सामाजिक-राजनैतिक इतिहास के अधिक विश्वसनीय एक पाठ से हम रु-ब-रु होते हैं। विशाखदत्त संस्कृत साहित्य के उल्लेखनीय नाटककार हैं। इनका व्यक्तिगत जुड़ाव भी किसी राजपरिवार से था। मुद्राराक्षस की प्रस्तावना में ही वह अपना परिचय सामंत बटेश्वरदत्त के पौत्र और महाराज भास्करदत्त के पुत्र के रूप में देते हैं। ऐसा लगता है उनके दादा बटेश्वरदत्त सामंत रहे होंगे और उनके पिता भास्करदत्त ने अपने कौशल-पराक्रम से महाराज पद या विरुद प्राप्त कर लिया था। कवि विषयक अन्य विवरणों से पता चलता है कि वह या तो गुप्त वंश के चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय थे, या फिर मौखरि वंश के अवन्ति वर्मा के समय। चन्द्रगुप्त द्वितीय का समय 375-413 ईस्वी है और अवन्ति वर्मा का 579-600 ईस्वी. अधिक सम्भावना मौखरि वंश के अवन्ति वर्मा के समकाल होने की है और इसके अनुसार चौथी सदी से सातवीं सदी के पूर्वार्द्ध के भीतर ही कवि की मौजूदगी होनी चाहिए। अपने समय के कई सौ वर्ष पूर्व घटित हुए राजनैतिक घटनाक्रम को अपने नाटक की कथावस्तु बनाना, महत्वपूर्ण तो है ही, उस से कहीं अधिक मुश्किल कार्य इसे नाटक के अनुरूप बनाना है। लेकिन नाटककार ने इसे संभव किया है। विशाखदत्त के दो और नाटकों ‘देवीचंद्रगुप्त’ और ‘अभिसारिकावञ्चितक’ की भी कथावस्तु राजनैतिक ही है। ‘देवीचंद्रगुप्त’ में चन्द्रगुप्त द्वितीय और उसके बड़े भाई रामगुप्त की पत्नी ध्रुवस्वामिनी देवी की कथा को नाटक का आधार बनाया गया है, जिसे अपने समय के सत्य से नत्थी करते हुए हिंदी कवि जयशंकर प्रसाद ने ‘ध्रुवस्वामिनी’ की रचना की है। जयशंकर प्रसाद का एक और हिंदी नाटक ‘ चन्द्रगुप्त’ तो ‘मुद्राराक्षस ‘ से ही प्रभावित है। 

‘मुद्राराक्षस’ को कुछ मामलों में अद्भुत कहा जा सकता है। संस्कृत नाटकों की परंपरा से यह कुछ हट कर है। इस नाटक में न कोई प्रणय-अभिसार के दृश्य हैं और न ही कोई महत्वपूर्ण स्त्री-पात्र। यह नाटक तत्कालीन भारतीय समाज का एक ऐसा दृश्य रखता है, जिस पर हैरानी होती है कि इसके रचनाकार की चेतना कितनी दृष्टिसम्पन्न और बहुआयामी है। मंचीय और साहित्यिक दृष्टिकोण से इसकी आलोचना यदि मुझे करनी हो, तो मैं कुछ पृथक टिप्पणी करना चाहूँगा, लेकिन इतिहास के नजरिये से यह नाटक अपनी कथावस्तु के कारण बहुत खास है। नन्द साम्राज्य के पतन और चन्द्रगुप्त मौर्य के सत्ता में आने के संधि-काल की स्थितियों और समाज-मनोविज्ञान को यह नाटक हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है। नंदों का साम्राज्य बुरी तरह तहस-नहस किया जा चुका है। राजा नन्द ही नहीं, उनके परिजन भी मारे जा चुके हैं। चन्द्रगुप्त मौर्य ने सत्ता तो हासिल कर ली है, लेकिन मगध की राजधानी पाटलिपुत्र में अस्थिरता की स्थिति है। नन्द के लोग चन्द्रगुप्त के विरुद्ध सक्रिय हैं और उसे ख़त्म कर देना चाहते हैं। इतने आरंभिक दिन हैं कि राजप्रासाद में चन्द्रगुप्त का प्रवेश अभी होना है। अस्थायी अमात्य के रूप में चाणक्य ने कार्यभार तो संभाला हुआ है, लेकिन वह स्वयं को इसके लिए अनुपयुक्त समझ रहा है। शिष्यवत चन्द्रगुप्त का अमात्य होना उसे अपने सम्मान और प्रकृति के अनुकूल नहीं महसूस हो रहा है। वह क्रोधी स्वाभाव का है और अमात्य पद प्राप्त कर लेने के बावजूद सम्राट चन्द्रगुप्त को हमेशा अपमानजनक वृषल (नीच शूद्र) कह कर सम्बोधित करता है। शायद वह अपनी प्रकृति से ही मुंहफट है। लेकिन अंदर से वह बुरा नहीं है। कुल मिला कर वह चन्द्रगुप्त को निष्कंटक देखना चाहता है। उसे पता चलता है कि नन्द का अमात्य राक्षस चन्द्रगुप्त के विरुद्ध षड्यंत्र कर रहा है। पर्वतकराज मलयकेतु, जिसके पिता की चाणक्य-चन्द्रगुप्त ने विषकन्या द्वारा हत्या करा दी थी, अनेक यवन-म्लेच्छ शक्तियों के साथ मिल कर पाटलिपुत्र पर आक्रमण की योजना बना रहे हैं। चाणक्य नन्द-काल के पूर्व-अमात्य राक्षस की कूटनीतिक ताकत से सुपरिचित है। उसके कान खड़े हो जाते हैं। वह बिना देर किये तमाम स्थितियों की समीक्षा करता है। उसे जानकारी मिलती है कि राक्षस अपना परिवार सेठ चंदनदास के हवाले कर के पाटलिपुत्र छोड़ चुका है। कायस्थ शकटदास और क्षपणक जीवसिद्धि जैसे कुछ अन्य लोग भी राक्षस का सहयोग कर रहे हैं। इन तमाम स्थितियों के बीच ही नाटक की कथावस्तु है। चाणक्य अपने स्तर पर अविलम्ब सक्रिय हो जाता है और अपनी कूटनीतिक चाल से एक ऐसा फन्द तैयार करता है कि राक्षस पकड़ में आ जाता है। चाणक्य को नन्द से द्रोह था, उसकी कार्यपालिका और दूसरी नीतियों से नहीं। वह इसके लिए इच्छुक है कि राक्षस चन्द्रगुप्त का मंत्री होना स्वीकार ले। चाणक्य को इस कार्य में अंततः सफलता मिलती है। 

27 फरवरी 2018 को राजस्थान के उदयपुर में भारतीय लोक कला मंडल के 67वें स्थापना दिवस के मौके पर मंचित मुद्राराक्षस नाटक का एक दृश्य

नाटक सात अंकों का है। प्रथम अंक में एक सामान्य घर में चंद्रग्रहण पर ब्राह्मणों के भोज की चर्चा चल रही है कि नेपथ्य से आवाज़ गूंजती है कि मेरे रहते कौन है जो चंद्र यानी चन्द्रगुप्त को ग्रस ले। सूत्रधार मंच पर आकर बताता है कि यह तो कुटिलमति कौटिल्य है। और फिर चाणक्य का प्रवेश होता है ,जो अपनी चिंता जाहिर करता है कि नन्द वंश के विनाश से कुपित उसका अमात्य राक्षस पर्वतकराज मलयकेतु से जा मिला है और चन्द्रगुप्त के खिलाफ योजनाएं बना रहा है। चाणक्य अमात्य राक्षस की योग्यता से परिचित है और वह चाहता है कि किसी तरह उसे प्रभावित किया जाय और चन्द्रगुप्त का अमात्य बनने के लिए राज़ी कर लिया जाए। लेकिन अपनी भावनाओं को बिना ज्ञापित करते हुए वह एक कूटनीतिक योजना बनता है, जो नाटक की कथावस्तु हो जाती है। चाणक्य को पता चलता है कि अमात्य राक्षस का परिवार पाटलिपुत्र में ही सेठ चंदनदास के सान्निध्य में है। राक्षस के दो अन्य प्रिय विश्वासी कायस्थ शकटदास और क्षपणक जीवसिद्धि हैं। चाणक्य को राक्षस की एक मुद्रा मिल जाती है। वह शकटदास से एक झूठी चिट्ठी लिखवा कर उस पर राक्षस की मुद्रा के निशान बनवाता है। राक्षस और उसकी मुद्रा इस नाटक की कथावस्तु के आधार बनते हैं और इस नाटक का नाम ‘मुद्राराक्षस’ होता है। 

चन्द्रगुप्त विरोधी गतिविधियां पाटलिपुत्र में गहरा रही हैं। दूसरा अंक नन्द के विशाल और भव्य राजप्रासाद में प्रवेश करते समय चन्द्रगुप्त को मार देने की योजना की एक कहानी बयां करता है। हथिनी पर बैठ कर चन्द्रगुप्त राजप्रासाद में प्रवेश कर रहा था कि विशाल तोरण द्वार एक साजिश द्वारा गिरा दिया जाता है। यदि हथिनी तेजी से नहीं बढ़ गयी होती तो निश्चय ही चन्द्रगुप्त मारा जाता। वह बाल-बाल बच जाता है। तीसरे अंक में चन्द्रगुप्त और चाणक्य के बीच कौमुदी महोत्सव के आयोजन को लेकर कटुता बढ़ जाती है। चन्द्रगुप्त ने शरत-पूर्णिमा के रोज कौमुदी-महोत्सव के आयोजन के आदेश दिए हैं, लेकिन चाणक्य इसे बंद करा देता है। एक दूसरे अवसर पर अनुदान देने से भी चाणक्य राजा को रोक देता है। कुपित राजा ने चाणक्य की अवहेलना शुरू कर दी है। चाणक्य इस मतभेद का भी खूब प्रचार करा देता है। इतना कि यह खबर शत्रु खेमे तक पहुंच जाए। खबर पंहुच भी गयी है। चौथे अंक में अमात्य राक्षस मलयकेतु को यह खबर स्वयं देता है। किन्तु मलयकेतु की टिप्पणी है ‘चाणक्य के दोष ही चन्द्रगुप्त की प्रजा के विरक्ति के कारण हैं। चाणक्य के हट जाने पर चन्द्रगुप्त के प्रति पहले से अधिक अनुरक्त प्रजा इस समय उस से अधिक लगाव महसूस करेगी।’ पाँचवे अंक में पर्वतकराज मलयकेतु को ज्ञात होता है कि उसके पिता चाणक्य की साजिश से नहीं, अमात्य राक्षस की ‘दुष्ट-योजना’ द्वारा मारे गए हैं। धीरे -धीरे मलयकेतु और राक्षस में मतभेद उभरने शुरू हो जाते हैं। मलयकेतु राक्षस को संदेह की दृष्टि से देखने लगता है। दोनों के बीच कहा-सुनी हो जाती है और अमात्य राक्षस अब स्वयं को असहाय और हतभाग्य अनुभव कर रहा है। गहरी निराशा में डूबी उसकी अभिव्यक्ति है – कितना अभागा हूँ, अब क्या करूँ ? (हा धिकाष्टम ! … तत्किमिदानीं मन्दभाग्य: करवाणि) 

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छठे अंक में मलयदास से अपमानित होकर अमात्य राक्षस पाटलिपुत्र में प्रवेश करता है। उसे पता चलता है कि उसके मित्र चंदनदास पर मुसीबतों के पहाड़ टूट पड़े हैं। उसका दोष केवल यह है कि उसने अमात्य राक्षस के परिवार को छुपा कर रखा है और मित्रधर्म के नाते राजा को बता नहीं रहा है। उसे राजा से मृत्युदंड मिल चुका है और उसे फांसी देने की तैयारी हो रही है। उसके बाद सातवें और अंतिम अंक में अमात्य राक्षस अपने मित्र चंदनदास से मिलता है और वह ज्ञापित कर देता है कि मैं ही राक्षस हूँ, जिसके संधान के लिए इसे मृत्युदंड दिया जा रहा है। तभी नेपथ्य से चाणक्य का प्रवेश होता है –‘चन्द्रगुप्त की विशाल सेना और मेरी बुद्धि एक साथ बहुत दिनों तक जिसे ढूँढने में चकराती रही, ओ अमात्य राक्षस! मैं विष्णुगुप्त आपको प्रणाम करता हूँ।’ इसके बाद चाणक्य उसे हासिल करने की अपनी कूटनीतिक चाल को बता देता है कि मैंने ही शकटदास से उसकी अज्ञानता में झूठी चिट्ठी लिखवाई थी। इसी समय मंच पर चन्द्रगुप्त का प्रवेश होता है। चाणक्य उस से कहता है कि अत्यंत आदरणीय अमात्यमुख्य (राक्षस ) को प्रणाम करो। चन्द्रगुप्त उन्हें प्रणाम निवेदित करता है। अमात्य राक्षस ‘राजन विजयस्व’ केआशीर्वचन के साथ मन ही मन चन्द्रगुप्त की बाल-छवि को याद करता है। ‘यह तो बचपन से ही लोक में अपनी सम्भावनापूर्ण स्थिति को जताता था, जैसे कोई भविष्णु गजशावक अपने पूरे यूथ का नेतृत्व पा ले।’ 

बाल एव हि लोकेस्मिन संभावित महोदयः 

क्रमेणा रूढ़वान राज्यं यूथेश्वर्यमिव .

नाटक सुखांत है। थोड़े से ना-नुकुर के पश्चात चंदनदास की जीवनरक्षा हेतु राक्षस चाणक्य के उस प्रस्ताव को स्वीकार लेता है, जिसमें उसे चन्द्रगुप्त का महामंत्री बनना है। इस नए अमात्य के रूप में उसका पहला निवेदन राजा से यह होता है कि मलयकेतु के प्राणों की रक्षा की जाए। चाणक्य इस पर हामी भरता है कि अमात्य राक्षस का यह प्रथम आदेश है। हमें इसे स्वीकार करना ही पड़ेगा। चन्द्रगुप्त मलयकेतु को उसका पैतृक राज्य वापस कर देता है। इसके साथ ही चंदनदास को पूरे साम्राज्य के व्यापारिक संघ का प्रमुख घोषित किया जाता है। अंततः सुखद स्थिति में चन्द्रगुप्त की मंगल-कामना के भरतवाक्य के साथ नाटक समाप्त होता है। आरम्भ से अंत तक नाटक हमें बांधे रखता है। छोटे-छोटे चुटीले संवाद विशाखदत्त की नाट्यप्रतिभा को स्थापित करते हैं। 

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जैसा कि मैंने पहले ही बतलाया है यह एक राजनैतिक नाटक है। आरम्भ से अंत तक राजनीति ही राजनीति है। पुष्यमित्र शुंग के बेटे अग्निमित्र को लेकर भी कालिदास ने एक नाटक ‘मालविकाग्निमित्र’ लिखा है और उससे भी तत्कालीन राजनीति की कुछ जानकारी मिलती है, लेकिन वह नाटक एक प्रेमकथा ज्ञापित करता है। यूँ जब सामंतकालीन पृष्ठभूमि पर कुछ लिखा गया हो, तो राजनीति के कुछ अंश आ जाने स्वाभाविक हो जाते हैं। इस आधार पर किसी भी रचना को राजनैतिक नहीं कहा जा सकता। लेकिन मुद्राराक्षस राजनैतिक कृति है, क्योंकि यह राजनीति के छल-छद्म और बिना युद्ध के एक बड़े शत्रु-पक्ष को परास्त कर देने और उससे भी अधिक अपने पक्ष में कर लेने की कथा बतलाता है। यदि इसकी सूक्ष्म व्याख्या करें तो यह तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों को हमारे समक्ष चित्रवत प्रस्तुत कर देता है। नाटक के अनुसार चन्द्रगुप्त का लालन-पालन भी नन्द परिवार में ही होता है, क्योंकि राक्षस उसे बचपन से ही जानता है। चन्द्रगुप्त उसके होनहार होने की बात भी स्वीकार करता है। एक और तथ्य यह प्रकट होता है कि चाणक्य हमेशा चन्द्रगुप्त को अपमानजनक सम्बोधन वृषल कह कर सम्बोधित करता है। वृषल का अर्थ शूद्र अथवा नीच जाति है। कोई भी इससे चिढ़ेगा। इसका अर्थ है चाणक्य न केवल नंदों से, बल्कि चन्द्रगुप्त से भी नफरत करता है। लेकिन वह यह भी जानता है कि इस वक़्त शूद्र शक्तियां प्रबल है, इसलिए इस या उस, राज तो इन्ही लोगों को करना है। ब्राह्मणों या अन्य द्विजों की हैसियत अभी राज्य हासिल करने की नहीं हुई है। अतएव अपनी तमाम घृणा के बावजूद नंदों को खत्म करने के बाद उसे एक अन्य ‘ वृषल’ (शूद्र ) को ही राजा बनाना पड़ा है। यह चाणक्य की विवशता थी। चाणक्य में कुटिलता और अन्य बुराइयां चाहे जितनी हो धन और पद का वह बिलकुल लोभ नहीं करता। नाटक उसकी अपनी स्थिति ज्ञापित करता है जिसके अनुसार वह गंगा किनारे अपने शिष्यों के द्वारा लाए गए कुश निर्मित एक झोपडी में रहता है, जहाँ कुछ उपले और उसे तोड़ने के लिए एक पत्थर को छोड़ कर उस के पास कोई अन्य ठोस संपत्ति नहीं है। वह क्रोधी अवश्य है और उसके क्रोध का ही फल नन्द को भुगतना पड़ा है। नन्द की पूरी कार्यपालिका से उसका उसका कोई विरोध नहीं है। क्योकि उसके अमात्य राक्षस को चन्द्रगुप्त का अमात्य बनाने के लिए ही वह सारी कूटनीति करता है ,जो इस नाटक का विषय है। 

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मैं नहीं कह सकता नाटक का सत्य इतिहास का सत्य है या नहीं। लेकिन कुछ स्थितियां तो बिलकुल स्पष्ट हैं। प्रथम तो यह कि चन्द्रगुप्त निश्चित ही निम्नवर्ग से आता है। दूसरा यह कि नंदों के बारे म इतिहास में मनगढ़ंत बातें अधिक हैं। नन्द अपनी अलोकप्रियता के कारण नहीं परास्त हुआ था , बल्कि वह साजिश के तहत मारा गया था। पाटलिपुत्र में उसका जनाधार चन्द्रगुप्त के सत्तासीन होने के बाद तक बना रहा। कुछ अन्य सामाजिक स्थितियों और मनोदशाओं पर भी हमें विश्वास करना होगा जो इस नाटक में उभर कर आये हैं। नन्द और चन्द्रगुप्त समान सामाजिक स्थिति और मनोदशा का प्रतिनिधित्व करते हैं। मुट्ठी भर द्विज ताकतें उनसे घृणा कर सकती हैं, लेकिन सामान्य प्रजा में उनकी स्वीकार्यता है। लेकिन चाणक्य और राक्षस सामाजिक स्तर पर भले ही समान हों, मानसिक स्तर पर भिन्न मनोदशा के हैं। चाणक्य कुटिल और किंचित जातिवादी चरित्र का है। वह न केवल नंदों से बल्कि चन्द्रगुप्त से भी नफरत करता है। वह उसे हमेशा वृषल कह कर ही सम्बोधित करता है और जनता के समक्ष अपनी हेकड़ी का खुला प्रदर्शन करता है। चन्द्रगुप्त को वह इसलिए मजबूत करना चाहता है क्योंकि इसी रास्ते नंदों का समूल नाश किया जा सकता है। इस चाणक्य नीति का इस्तेमाल आधुनिक ज़माने की द्विज शक्तियां भी खूब करती रही हैं। यही कारण है कि द्विजों के बीच चाणक्य की अतीव प्रतिष्ठा इस ज़माने में भी है। लेकिन राक्षस की प्रवृत्ति भिन्न है। वह ब्राह्मण अवश्य है, किन्तु अधिक लोकतान्त्रिक चरित्र का है। अपनी पूरी योग्यता से ईमानदारी पूर्वक वह उस सत्ता का समर्थन करता है, जो कुछ लोगों की नजर में नीच जनों का राज है। राक्षस उन बदलती सामाजिक स्थितियों को स्वीकार चुका है जो बुद्ध की धम्म-क्रांति के बाद मगध के समाज की मनोदशा को आमूलचूल बदल चुकी है। निम्नवर्गीय उभरती चेतना का वह अनुमोदन और समर्थन करता है।


इस नाटक की मानें तो नंदों के तख्तापलट का आधार चन्द्रगुप्त की महत्वाकांक्षा और चाणक्य का प्रतिशोध भाव था। मजबूत बल और कुटिल बुद्धि के इस संयोग से नंदवंश का तख्तापलट हुआ और उसी दरबार से किसी स्तर पर जुड़े चन्द्रगुप्त का राज्यारोहण संभव हुआ। नंदों और मौर्यों के राजकाज में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ। यह सिलसिला बिम्बिसार तक चला। हाँ, अशोक की धम्म-नीति ने एक बड़ा बदलाव लाया और इसकी प्रतिक्रिया उसकी मृत्यु के कोई पचास वर्ष बाद पुष्यमित्र शुंग के रूप में संभव हो सकी। इस समय चाणक्य की जगह पतंजलि पुष्यमित्र का गुरु था। निश्चय ही वह उसे वृषल नहीं कहता होगा। यदि चाणक्य को पुष्यमित्र उपलब्ध हुआ होता तो कोई भी अनुमान कर सकता है कि क्या होता। लेकिन इतिहास में अनुमानों की व्याख्या नहीं होती है। लेकिन अभी हम थोड़ी बात करने के लिए स्वतंत्र हैं, क्योंकि एक नाटक पर बात कर रहे हैं।  

 

(संपादन : नवल)


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