महिषासुर समारोह 2019 : दमन के बावजूद बढ़ रहा कारवां

वर्चस्ववादी संस्कृति के प्रतिवाद और प्रतिरोध की भारत में एक लंबी परंपरा रही है। इस क्रम में महिषासुर और रावण जैसे प्रतीकों को लेकर नए विमर्श सामने आए हैं। देश के कई हिस्सों में महिषासुर और रावण का सम्मानपूर्वक स्मरण किया गया। बता रहे हैं नवल किशोर कुमार

पिछले एक दशक में समाज के वंचित तबकों के बीच सांस्कृतिक अस्मिता के सवाल महत्वपूर्ण हुए हैं। हिन्दू धर्म ग्रंथों में वर्णित वर्चस्ववादी मिथकीय संस्कृति के खिलाफ आवाज तेज होने लगी है। झारखंड, उड़ीसा, गुजरात, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में दुर्गा पूजा के मौके पर महिषासुर का शहादत दिवस समारोहों के आयोजन की जानकारी मिली है। वहीं अब यह विमर्श अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध का विषय रहा है। नार्वे के ओसलो विश्वविद्यालय की शोधार्थी मौमिता ने इस पर पोस्ट डॉक्टोरल शोध किया है। 

यह वही विषय है जिसे लेकर फरवरी, 2016 में संसद में खूब हंगामा हुआ था। तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति के बयान का सभी राजनीतिक दलों द्वारा विरोध किया गया था। यह उसी महिषासुर का विरोध था, जिसे दुर्गा पूजा के दौरान स्थापित की जाने वाली प्रतिमाओं में राक्षस के रूप में प्रदर्शित किया जाता है और यह भी दिखलाया जाता है कि शेर पर सवार दुर्गा उसका वध त्रिशुल से कर रही हैं। जबकि आदिवासी, दलित और ओबीसी समाज के लोग उन्हें अपना पुरखा और नायक मानते हैं। बहुजन महिषासुर वध के इस चित्रण का विरोध कर रहे हैं। वे मानते हैं कि महिषासुर एक दयालु राजा थे, जो श्रमण परंपरा के थे। लेकिन उनका वध बाहर से आये आर्यों ने कर दिया।

हिंदू धार्मिक मान्यताओं के समानांतर समाज के वंचित समुदायों के इस सांस्कृतिक आयोजन  की शुरूआत सबसे पहले दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में 25 अक्टूबर 2011 को हुई थी। तब अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित छात्रों ने ‘महिषासुर शहादत दिवस’ मनाया था। हालांकि इसे लेकर जेएनयू में खूब हंगामा मचा था और दिल्ली हाईकोर्ट तक को इसमें दखल देना पड़ा। जब इसकी शुरूआत हुई थी, तब यह किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह जंगल की आग के समान होगा। 

ओसलो विश्वविद्यालय में हुआ शोध 

इस वर्ष के अपडेट में पहली खबर नार्वे के ओसलो विश्वविद्यालय से आयी है। इस अंतरराष्ट्रीय शिक्षण संस्थान में महिषासुर और रावण को लेकर शोध कार्य हुआ है। यह शोध बंगाली मूल की शोधार्थी मौमिता ने किया है। उनके शोध का शीर्षक ‘महिषासुर मूवमेंट इन इंडिया : पॉलिटिक्स, ऐस्थेटिक्स एंड रिलिजोसिटी’ है। अपने पोस्ट डॉक्टोरल शोध में उन्होंने इस विमर्श को किस रूप में देखा और समझा है, इस संबंध में उन्होंने ईमेल से जानकारी दी है। उनके मुताबिक, “महिषासुर आन्दोलन एक प्रति-सांस्कृतिक आन्दोलन है जो दमित जातियों के बहुसंख्यक हिन्दुओं के मानस को ब्राह्मणवाद के चंगुल से मुक्त करना चाहता है। यह एक प्रकार के उपनिवेशवाद से मुक्ति की परियोजना है। पश्चिमीकरण और संस्कृतिकरण की प्रक्रियाओं ने अल्पसंख्यक ब्राह्मणों और अन्य उच्च जातियों के हिन्दुओं के वर्चस्व को समाप्त करने की बजाय, संस्कृति, राजनीति और समाज के क्षेत्रों में ब्राह्मणवादियों की नक़ल करने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित किया है। यह अनूठा आन्दोलन, ब्राह्मणवादी विचारधारा के मिथकीय और राजनैतिक केंद्र बिन्दुओं की पहचान कर, उन्हें इस ढंग से विखंडित करता है जिससे इस विचारधारा की नस्लवादी और नारी विद्वेषवादी जडें बेनकाब हों और एक वैकल्पिक परंपरा का प्रस्ताव करता है।” 

मौमिता, रिसर्च स्कॉलर, ओस्लो विश्वविद्यालय, नार्वे

मौमिता इसे जातिगत राजनीति और सांस्कृतिक प्रतिकार के आंदोलन के रूप में उद्धृत करती हैं। उनके अनुसार, “बंगाल में महिषासुर आन्दोलन, धर्म और राजनीति के पृथक्करण की पश्चिमी अवधारणा पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। वह अपनी राजनैतिक विचारधारा, जिसकी जडें भारत के जाति-मुक्ति आंदोलनों में है, को बरक़रार रखते हुए अशिक्षित या अर्ध-शिक्षित ग्रामीण जनता को धार्मिक आधार पर लामबंद करता है. यद्यपि अधिकांश कार्यकर्ता स्मरण सभा या शहादत दिवस के आयोजनों में कर्मकांडों का स्पष्ट निषेध करते हैं परन्तु साधारण ग्रामीण, महिषासुर को अपने समुदाय के एक नए, असली देवता के रूप में देखते हैं। यह आन्दोलन पहचान से जुड़े प्रश्न उठाता है जो धार्मिक-राजनीतिक लामबंदी में मददगार होते हैं।”

छत्तीसगढ़ से आयी हृदय विदारक खबर

बीते 9 अक्टूबर 2019 को छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले से हृदय विदारक खबर आयी। छत्तीसगढ़ में हमारे सहयोगी तामेश्वर सिन्हा ने यह जानकारी दी कि सूरजपुर के केतका गांव में जितेंद्र मरावी उर्फ सोनू रूद्र ने खुदकुशी कर ली। इसकी वजह यह रही कि जितेंद्र मरावी के पिता धनशाय मरावी पर दबाव बनाकर उनके घर में दुर्गा का अनुष्ठान कराया गया। जबकि जितेंद्र पिछले 5-6 वर्षों से सूरजपुर और इसके आसपास के इलाके में गोंड संस्कृति और इसकी मान्यताओं को लेकर सक्रिय था। गोंड़ी परंपराओं को मानने वाला जितेंद्र रावण और महिषासुर को अपना पुरखा मानता था। 

जितेंद्र मरावी उर्फ सोनू मरावी (तस्वीर साभार : विजय मरपच्ची, सूरजपुर, छत्तीसगढ़)

इस संबंध में अक्टूबर 2018 में उसके खिलाफ मामला भी दर्ज हुआ था जिसके कारण उसे 55 दिनों तक जेल में रहना पड़ा था। खुदकुशी करने से पहले जितेंद्र ने एक सुसाइड नोट लिखा था। उसने लिखा :
“[मेरे घर में दुर्गा पूजा का आयोजन होना]  मेरी नैतिक हार थी और यह हार मैं बर्दाश्त नही कर पाया।  पर यह कदम मैने डर के नहीं उठाया है । [मैंने यह कदम] बस उन [अपने] लोगो की आखें खोलने के लिए यह कदम उठाया है । और इसकी पूरी ज़िम्मेदारी [दुर्गा पूजा] समिति वालो की है ।

[मैं अपने ] सभी साथियों से क्षमा चाहूँगा कि लड़ाई बीच मे छोड़ कर जा रहा [हूं]। एक बात याद रखना की क्रांति हमेशा शहादत मांगती है । मैं इसी शहादत को पाने की इच्छा रखता हूं । अब पुरखों के इज़्ज़त से खिलवाड़ करने वालो के खैर नही होना चाहिए । यह दुर्गा पूजा मुझे दिन रात तोड़ रही थी । [मुझे] लगा 55 दिन का बलिदान व्यर्थ गया। 

मैं साथियों से चाहूँगा मेरी अधूरी लड़ाई  जोर- शोर से लड़े । मैं हमेशा आप सभी के साथ हूं। [मैं] उन तमाम लोग जो मुझसे जुड़े हुए थे, से पुनः माफी चाहूँगा । मैं घर वालों से भी माफी चाहूँगा कि मेरी वजह से आपको हमेशा शर्मिंदा होना पड़ा। बस यह आख़िरी तकलीफ़ दे रहा हूं। इसके बाद और नही । # Love _ godwana -Sonu maravi” ( अर्थ-स्पष्टता के लिए वाक्य रचना संपादित )


इस पूरे मामले में छत्तीसगढ़ की पुलिस हिन्दू धर्म के वर्चस्ववादियों के साथ दिखी। यहां तक कि पुलिस ने केवल पंचनामा दर्ज कर मामले को रफा-दफा कर दिया। इस संबंध में जब फारवर्ड प्रेस ने सूरजपुर थाने के इंचार्ज विवेक तिवारी से बात की तो उन्होंने यह तो स्वीकार किया कि जितेंद्र ने खुदकुशी की है लेकिन उसके सुसाइड नोट पर उन्होंने कुछ भी कहने से इन्कार कर दिया। जबकि भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की धारा 32 के तहत इसका प्रावधान है कि खुदकुशी के पहले लिखा गया नोट एक साक्ष्य है। इसमें जिम्मेदार ठहराए गए लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया जाना चाहिए। परंतु स्थानीय पुलिस ने इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की।

बीते 19 अक्टूबर 2019 को जितेंद्र मरावी के गांव केतका में बड़ी संख्या में लोग जुटे। इस मौके पर लोगों ने उसे अपना पेन (गोंडी परंपरा में शक्ति का प्रतीक) माना। साथ ही इस मौके पर लोगों ने बाहर से थोपी जा रही संस्कृति का विरोध करने का संकल्प लिया। 

छत्तीसगढ़ के सूरजपुर में जितेंद्र मरावी को श्रद्धांजलि कार्यक्रम में उसे पेन यानी गोंडी शक्ति के रूप में स्थापित किया गया (तस्वीर साभार : विजय मरपच्ची, सूरजपुर, छत्तीसगढ़)

बहरहाल, जितेंद्र मरावी की खुदकुशी से पहले एक और आहत करने वाली खबर इसी वर्ष 11 जुलाई 2019 को छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले से आयी थी। यह थी लोकेश सोरी की मैक्सिलरी कैंसर के कारण असमायिक मौत। लोकेश सोरी ने 2017 में कांकेर में 28 सितंबर 2017 को दुर्गापूजा के आयोजकों पर पहला मुकदमा दर्ज कराया था। कैंसर से पीड़ित होने के बावजूद लोकेश सोरी आदिवासियों के सांस्कृतिक अस्मिता के लिए लोगों को प्रेरित करते रहे। इस रिपोर्ट के लेखक से फोन पर वे अक्सर कहते – “यदि मुझे दस साल और समय मिल जाय तो मैं पूरे छत्तीसगढ़ में अपने लोगों का संगठन तैयार कर ब्राह्मणवादियों को चुनौती दूंगा।”

पश्चिम बंगाल में याद किए गए महिषासुर

दलित, पिछड़े और आदिवासी समुदाय के लोग अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के लिए किस कदर आंदोलित हैं, इसका नजारा इस बार पश्चिम बंगाल में दिखा। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता, मिदनापुर, बशीरघाट, 24 परगना, पुरूलिया और मालदा आदि जिलों में महिषासुर स्मरण दिवस का आयोजन किया गया। कोलकाता लेखक और कार्यकर्ता समुद्र विश्वास द्वारा दिये गये अपडेट के अनुसार पिछले पांच-छह वर्षों से यह आयोजन हो रहा है। पहले स्थानीय लोग जो हमारे राजा महिषासुर को भला-बुरा कहते थे, विरोध करते थे। लेकिन अब इस स्मरण दिवस समारोह में नमोशुद्रा (अनुसूचित जाति), अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग के लोग बड़ी संख्या में भाग लेने लगे हैं। समुद्र बताते हैं कि इस कारण विरोधियों का विरोध कम हुआ है। इस बार कोलकाता के दुर्गापुर में बीते 8 अक्टूबर को हमलोग महिषासुर स्मरण दिवस का आयोजन करने वाले थे, तब आरएसएस के लोगों की शिकायत पर स्थानीय पुलिस बाधा पहुंचाने की कोशिश की। लेकिन, हमलोगों ने कड़ा प्रतिकार किया और उन्हें बताया कि जैसे वे लोग दुर्गा को देवी मानते हैं, हमलोग भी महिषासुर को अपना राजा मानते हैं। यदि उनके आयोजनों में पुलिस हस्तक्षेप नहीं करती है तो हमारे आयोजन में क्यों? 

महिषासुर स्मरण दिवस के मौके पर पश्चिम बंगाल के पुरूलिया में दसाईं नाच करते आदिवासी (तस्वीर साभार : चरणजीत विश्वास)

उत्तरी 24 परगना के बीड़ा निवासी चरणजीत विश्वास ने बताया कि उनके यहां धुमधाम से महिषासुर स्मरण दिवस का आयोजन हुआ। इस बार आयोजन एक सरकारी स्कूल के प्रांगण में हुआ। हालांकि पहले स्कूल में कार्यक्रम की इजाजत नहीं दी जा रही थी। परंतु, हमलोगों के द्वारा स्कूल के प्राचार्य को बार-बार बताए जाने पर कि महिषासुर हमारे पुरखे थे और ग्रंथों में यह दर्ज है, वे मान गए। चरणजीत ने बताया कि इस बार भी आयोजन में दसाईं नाच आकर्षण का केंद्र रहा। उनके मुताबिक, “ऐसी मान्यता है कि जब दुर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया तब चारों ओर दुर्गा के लोग थे। महिषासुर के मारे जाने की कोई खबर नहीं मिली थी। उनकी प्रजा ने उन्हें खोजना शुरू किया। लेकिन चुनौती दुश्मनों से बचने की थी। इसलिए हमारे पुरखों ने महिलाओं का वस्त्र पहना और खोजना शुरू किया। यही दसाईं नाच है। हम आज भी अपने राजा महिषासुर को खोजते हैं।”

उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर में असुरोत्सव

जिस महिषासुर को हिंदू धर्म ग्रंथों में असुर कहकर अपमानित किया जाता है, उसी महिषासुर के सम्मान में उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर में असुरोत्सव मनाया गया। फारवर्ड प्रेस के सहयोगी उज्जवल विश्वास के अनुसार, यह आयोजन 2 अक्टूबर को मूलनिवासी छात्र और यूवा साम्मुख के द्वारा किया गया। इस अवसर पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसका विषय था ‘असुर पूर्वजों को महापुण्यानुमोद व समानता के लिये असुरों का संघर्ष’। इस मौके पर वक्ताओं ने कहा कि वैदिक युग में हमारे पूर्वजों का नाम असुर था, तो बुद्ध और सम्राट अशोक से लेकर आधुनिक काल के बाबासाहब तक जो हमारे उद्धारकर्ता लोग हैं, सभी असुर ही थे। हमारे इन उद्धारकर्ताओं को स्मरण कर के उनके कामों का मान्यता देना या अनुमोदन करने के तरीके को ही बौद्ध परंपरा में महापुण्यानोमोदन कहा गया है। इस अवसर पर बौद्ध भिक्षु भंते मेत्तानंद सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे। 

छत्तीसगढ़ में सीएम भूपेश बघेल के पिता ने किया खास आह्वान

आदिवासी बहुल छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के मानपुर ब्लॉक के कोरचा में 9 अक्टूबर को एक बड़ा आयोजन किया गया। इस मौके पर प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पिता नंद कुमार बघेल मुख्य अतिथि थे। सर्व आदिवासी समाज के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने महिषासुर और मेघनाद का शहादत दिवस मनाया।

गौर तलब है कि छत्तीसगढ़ के मानपुर ब्लॉक के कोरचा को राजगढ़ के रुप में जाना जाता है  कोरचा में 124 गांव हैं और इन गांवों के आदिवासियों ने अपनी पेन (पुरखे) परम्परा को संवैधानिक मान्यता देते हुए ग्राम सभा का आयोजन कर राजा रावण के दहन को प्रतिबंधित कर दिया है। 

आदिवासियों के इस आयोजन में नंद कुमार बघेल के अचानक शरीक होने से प्रशासनिक हलके में हडकंप मच गया।  अपने संबोधन में उन्होंने अपनी किताब ‘ब्राह्मण कुमार रावण को मत मारो’ का जिक्र किया और राम को कबंध व संभूक कुर्मी का हत्यारा करार दिया। उन्होंने राम को देश की शिक्षा व्यवस्था समाप्त करने वाला तथा ब्राह्मणों को आरक्षण देने वाला करार दिया। कार्यक्रम में  उपस्थित आदिवासी समाज के विभिन्न वक्ताओं ने राजा महिसासुर, राजा रावण के तथाकथित असली इतिहास का बखान किया। 

वहीं आदिवासी नेता सुरजू टेकाम ने रावण दहन न करने का प्रस्ताव रखा। कार्यक्रम में तय किया गया कि क्षेत्र के 124 गांवों में रावण दहन में कोई भी आदिवासी शामिल नहीं होगा, न ही कोई सहयोग देगा, क्योंकि आदिवासी रावण को अपना पुरखा मानते हैं। आयोजकों में से एक विवेक कुमार ने इस संबंध में बताया कि बीते दिनों आदिवासियों ने स्थनीय प्रशासन से भी दुर्गा के साथ  महिषासुर की प्रतिमा ना रखने व रावण का पुतला दहन ना करने की अपील की थी। उनका कहना था कि इससे उनकी धार्मिक भावना आहत होती है। उन्होंने यह भी बताया कि पिछले वर्ष भी महिषासुर के अपमान के मामले में आदिवासियों ने थाने में मामला दर्ज करवाया था, जिसमें कई आरएसएस एवं बीजेपी के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी भी हुई थी।

बिहार में दमन

वहीं बिहार में इस बार भाजपा-जदयू सरकार का दमन चक्र खूब तेजी से चला। इस दौरान आधा दर्जन से अधिक नौजवानों को गिरफ्तार किया गया।  मसलन 30 सितंबर को सुपौल जिले के बीरपुर थाने के इलाके में संतोष कुमार नामक एक दलित युवक को गिरफ्तार कर लिया गया। उस पर आरोप लगाया गया कि उसने फेसबुक पर हिंदू धर्म ग्रंथों में वर्णित दुर्गा के बारे में अशोभनीय टिप्पणी लिखी।

वहीं  3 अक्टूबर 2019 को जमुई के चकाई प्रखंड के माधोपुर बाजार में प्रकाश राज आंबेडकर नामक 24 वर्षीय नवयुवक को भीड़ ने उस वक्त घेर लिया जब वह अपने 15 दिन के नवजात भांजे को लेकर अपनी मां के साथ डाक्टर के पास जा रहा था। भीड़ में शामिल लोगों ने भलुआ गांव के निवासी प्रकाश और उसकी मां को खदेड़-खदेड़ कर पीटा। इस क्रम में नवजात बच्चा भी गिर गया, जिसे एक दूसरी महिला ने बचाया। गाय के नाम पर होने वाले मॉब लिंचिंग के तर्ज पर इस घटना को अंजाम दिया गया। भीड़ प्रकाश को तबतक मारती रही जबतक कि वह बेहोश नहीं हो गया। बाद में भीड़ ने उसे अचेतावस्था में ही पुलिस के हवाले कर दिया। इस संबंध में प्रकाश की मां ने पुलिस को लिखित शिकायत दी, लेकिन पुलिस ने उन्हें डांटकर भगा दिया। बाद में पुलिस ने स्थानीय मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के समक्ष पेश किया, जहां उसे जेल भेजे जाने का आदेश जारी किया गया। प्रकाश को 23 दिनों के बाद 26 अक्टूबर 2019 को जमानत मिली। 

कर्नाटक में महिषा दासरा-2019 पर धारा 144 की छाया

दक्षिण भारत के राज्य कर्नाटक के मैसूर शहर को दलित, पिछड़े और आदिवासी समुदाय के लोग महिषासुर की राजधानी मानते हैं। उनके मुताबिक महिषा प्रिय बौद्ध राजा थे। इस बार यहां 26 सितंबर 2019 को महिषा की स्मृति में कार्यक्रम आयोजित हुए। आयोजकों में महिषा मंडल इंटरनेशनल बुद्धिस्ट कल्चरल ट्रस्ट, दलित संघर्ष समिति, दलित स्टूडेंट फेडरेशन, बहुजन स्टूडेंट्स फेडरेशन, रिसर्च स्कॉलर्स एसोसिएशन, जय भीम एसोसिएशन, भीम सेना और अन्य प्रगतिशील संगठन शामिल रहे। हालांकि इस बार आयोजन पर स्थानीय प्रशासन द्वारा धारा 144 की छया पड़ी। आयोजकों में शामिल प्रो. बी.पी. महेशचंद्र गुरू के मुताबिक, “हिन्दूवादियों के दबाव पर कर्नाटक सरकार ने महाबलगिरि में महिषा की प्रतिमा के पास, जहां कार्यक्रम का आयोजन होना था, वहां धारा-144 लगा दी गयी। इसमें मैसूर के स्थानीय सांसद प्रताप सिम्हा की भूमिका रही। वे आयोजन को विफल कर देना चाहते थे। लेकिन वे नाकाम रहे। हमें समय रहते जानकारी मिल गयी थी कि स्थानीय प्रशासन ने आयोजन स्थल पर धारा-144 लगा दिया है और हमें वहां कार्यक्रम का आयोजन नहीं करने दिया जाएगा। हमलोगों ने सोशल मीडिया के जरिए अपने साथियों से संपर्क किया और हम बड़ी संख्या में अशोकापुरम इलाके के आंबेडकर पार्क में जुटे।”  प्रो. गुरू ने यह भी बताया कि “मैसूर के अलावा कर्नाटक के सभी तीस जिलों के करीब 100 प्रखेंडों में महिषा दासरा का आयोजन हुआ। यह हिन्दू वर्चस्ववादियों को हमारा जवाब था।” 

सूरत में निकली रैली, दादरा नगर हवेली में बैठकों तक सीमित

गुजरात की आर्थिक राजधानी में इस बार धुमधाम से महिषासुर के सम्मान में दो रैलियां निकाली गयीं। सूरत से फारवर्ड प्रेस के शुभचिंतक देवेन्द्र नाथ पटेल ने बताया कि पिछले करीब आठ वर्षों से यहां रावण और महिषासुर के सम्मान में रैलियां निकाली जा रही हैं। इस साल भी शहर में दो रैलियां निकाली गयीं। एक रैली का आयोजन गोंडवाना समाज के लोगों ने महागोंगों (महान पूजा) के  रूप में किया। इस क्रम में एक ट्रक लॉरी पर धुमधाम से महिषासुर और रावण की प्रतिमा की झांकी निकाली गयी। बैंड-बाजे के साथ निकाली गयी इस रैली में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। जबकि दूसरा आयोजन समता सैनिक दल के द्वारा किया गया। इस रैली में दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के लोग शामिल हुए। रैली के बाद एक जनसभा का आयोजन किया गया। इस मौके पर महिषासुर और रावण को राक्षस कह उनका अपमान करने को लेकर हिन्दू धर्म के वर्चस्ववादियों की आलोचना की गयी। साथ ही बुद्ध, आंबेडकर और फुले के बताए रास्ते पर चलने का संकल्प लिया गया।

बहरहाल, दमनात्मक कार्रवाइयों के बावजूद वंचितों के सांस्कृतिक प्रतिकार के रूप में महिषासुर विमर्श अब आगे बढ़ रहा है। इससे कई सवाल भी जन्म लेते हैं। सांस्कृतिक अस्मिता का जो सवाल भारत के आदिवासियों, दलितों और ओबीसी के द्वारा उठाया जा रहा है, उसका जवाब भारतीय सांस्कृति के ध्वजवाहकों द्वारा दिया जाएगा? एक सवाल यह भी कि क्या भारतीय अकादमिक जगत ओसलो विश्वविद्यालय कि तरह अपने हृदय को बड़ा कर सकेगा। ताकि वंचितों की संस्कृति और परंपराओं पर शोध हो सके।

(कॉपी संपादन : सिद्धार्थ/अनिल)


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