हम अब तक गलत इतिहास पढ़ते आए हैं : मोहनदास नैमिशराय

बीते 10 जनवरी, 2020 को केरल के पत्तनमतिट्टा में एक कॉलेज में दलित साहित्य को लेकर एक दिवसीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसके मुख्य अतिथि मोहनदास नैमिशराय थे। उन्होंने इस मौके पर कहा कि हमें भाषा के अवरोध को खत्म कर आपस में दलित-बहुजन वैचारिकी को साझा करना चाहिए

हमने आजादी के बाद अपने ही देश में, अपने ही स्कूल में, अपने ही कॉलेज में जो इतिहास पढ़ा, वह गलत था। यह बात देर से हमारी समझ में आई। जब हमारे भीतर चेतना जागृत हुई, तब हमें पता चला कि हम अब तक गलत इतिहास पढ़ते आए हैं। ये बातें वरिष्ठ दलित लेखक व पत्रकार मोहनदास नैमिशराय ने बीते 18 जनवरी, 2020 को केरल के पत्तनमतिट्टा जिले के कैथोलिकेट कॉलेज के पोस्ट ग्रेजुएट एण्ड रिसर्च डिपार्टमेण्ट ऑफ हिन्दीके द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में कही।

उन्होंने कहा कि दलित साहित्य आंदोलन के गर्भ से उपजा है। उसके सामाजिक संदेश हैं। दलित कवियों और लेखकों का उद्देश्य सामाजिक विषमता को समाप्त कर स्वस्थ समाज का निर्माण करना है। दलित साहित्य में इतिहास, संस्कृति और अस्मिता पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया है। उन्होंने मन्दिरों में भक्तों द्वारा दिये जा रहे दान में सोने, चांदी के साथ अथाह धन पर भी सवाल उठाए। साथ ही, धार्मिक आधार पर दक्षिण भारत में लंबे समय तक कायम रही देवदासी प्रथा तथा उसके जिम्मेदार पुरोहितों और पुजारियों के चरित्र पर भी सवाल उठाए।

सम्मेलन के दौरान मोहनदास नैमिशराय का सम्मान करते आयोजक

नैमिशराय ने सुझाव दिया कि लेखकों, समीक्षकों, तथा शिक्षाविदों को भाषा के अवरोध को खत्म कर आपस में विचारों का आदान-प्रदान करना चाहिए।

इससे पहले कार्यक्रम की भव्य शुरूआत हुई। अपने स्वागत संबोधन में कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. मिनी जार्ज ने मोहनदास नैमिशराय लेखन की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि हिंदी दलित साहित्य की प्रामाणिकता, उसमें उभरी दलित चेतना के विस्तार में मोहनदास नैमिशराय की अहम भूमिका रही है। वे हमारे लिए प्रेरक हैं। उनके बाद काॅलेज के प्रधानाध्यापक डॉ. मैथ्यू पी. जोसेफ ने अध्यक्षीय संबोधन में मोहनदास नैमिशराय के योगदानों के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

इस अवसर पर करीब 50 शोधार्थियों ने अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया, जिनमें  डॉ. प्रिया, डॉ. वीणा, डॉ. जिनसो, डॉ. लेजा, डॉ. श्याम प्रसाद, डॉ. कविता, डॉ. विनसी, रेशमा, फातिमा बीबी, देवी कृष्णा, नेजुमा आदि शामिल रहे।

वहीं डॉ. शीना इयेन, डॉ. ज्योति बालकृष्णनन (एन.एस.एस. कालिज, चंगनाशेरी), डॉ. राॅय जोसेफ (एस.बी. कालिज, चंगनाशेरी, में विभागाध्यक्ष), डॉ. मेथ्यू एब्राहम तथा डॉ. बेबी आदि ने दलित साहित्य और उसके विकास को लेकर अपने विचार रखे।

धन्यवाद ज्ञापन डॉ. जिनेय मैथ्यू ने किया। उन्होंने अपने संबोधन में ओमप्रकाश वाल्मीकि, जयप्रकाश कर्दम, मोहनदास नैमिशराय आदि लेखकों के योगदानों की चर्चा की। 

(संपादन : नवल/इमामुद्दीन)

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