दलितों, पिछड़ों व आदिवासियों की नागरिकता छीन द्विजों काे राज सौंपने की साजिश : प्रकाश आंबेडकर

सीएए, एनआरसी और एनपीआर के विरोध में अब दलित, पिछड़े,आदिवासी व मुसलमान एकजुट हो रहे हैं। ऐसी ही एकजुटता बीते 4 मार्च को प्रकाश आंबेडकर के नेतृत्व में दिल्ली के जंतर-मंतर पर देखने को मिली। सुशील मानव की खबर

बीते 4 मार्च 2020 को दिल्ली के जंतर मंतर पर “देश बचाओ संविधान बचाओ समन्वय समिति” द्वारा एनआरसी, एनपीआर, सीएए के खिलाफ़ विरोध में धरना का आयोजन किया गया। इसमें देश के अलग-अलग क्षेत्रों से आए बहुजन समाज के हजारों लोग शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों के “जय ज्योतिबा, जय भीम” के नारे से पूरा जंतर मंतर गूँज उठा। इस मौके पर मुख्य वक्ता प्रकाश आंबेडकर ने कहा कि जब हिंदू धर्म में दलितों (अति शूद्र) और पिछड़ों (शूद्रों) को धन और ज्ञान का अधिकार ही नहीं है, फिर सरकार को बताना चाहिए कि वे अपनी नागरिकता कैसे साबित करें।

मोदी सरकार कंगाल, असफलता छिपाने को थोप रही नागरिकता कानून

उन्हाेंने देश के विभिन्न राज्यों से आए लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि “यदि एनआरसी लागू हुआ तो इसका असर सबके उपर पड़ेगा। आरएसएस अपना मनुवादी एजेंडा लागू कर रहा है, जिसके लिए वह किसी भी हद तक जा सकता है।” उन्होंने मोदी सरकार को चुनौती देते हुए कहा कि पिछले साल के भयानक आर्थिक मंदी के दौरान सरकार ने 1 लाख 35 हज़ार करोड़ रुपए कहाँ से खर्च किए जबकि कुल प्राप्त आय केवल 90 हजार करोड़ ही था। उन्होंने कहा कि असलियत यह है कि भारत का खजाना खाली हो चुका है। मौजूदा केंद्र सरकार ने देश को गहरे संकट में डाल दिया है। उन्होंने संभावना व्यक्त करते हुए कहा कि “हो सकता है कि दो-तीन महीने के बाद सरकारी कर्मियों की तनख्वाह भी सरकार न दे सके।” 

जंतर-मंतर पर धरना को संबोधित करते प्रकाश आंबेडकर

उन्होंने आशंका व्यक्त की कि सरकार आम आदमी के बैंक एकाउंट में जमा पैसा को किसी भी समय सीज कर सकती हैं। सरकार पहले भी ऐसा कर चुकी है। नोटबंदी के समय सरकार ने बैंक ग्राहकों को महीने में 20 हजार से ज़्यादा नहीं निकालने दिया था। हो सकता है कि आगे आने वाले महीनों में वह एकबार फिर लोगों को बैंकों से सिर्फ़ 2-3 या 5 हजार तक की राशि ही निकालने दे। आंबेडकर ने कहा कि हम लोग एक भयानक आर्थिक संकट में घिर चुके हैं। जैसे सरकार ने नागरिकों की “डी लिस्ट” बना ली है, वैसे ही जल्द ही बैंकों में भी ग्राहकों के “डी लिस्ट” बन जाएंगे।” 

कहां जाएंगे घुमंतू जातियों/जनजातियों के लोग?

नागरिकता संशोधन कानून को आडे हाथ लेते हुए उन्होंने कहा की 12 प्रतिशन पिन्डारी लोग मुसलमान नहीं, हिंदू हैं, जिन्होंने अंग्रेजों से लोहा लिया था। ऐसे समुदायों के लिए अंग्रेजों ने “क्रिमिनल ट्राइब एक्ट” के तहत “आदतन अपराधी” की पहचान दी। वर्ष 1890 में अंग्रेजों ने इसी तरह डिटेंशन कैम्प बनाया था और करीब करीब सभी घुमंतू जनजातियों को उसमें रखा था। मोदी सरकार ने भी इसी तर्ज पर डिटेंशन कैंप बनवाए हैं। उन्होंने कहा कि 1962 में नेहरू सरकार ने इन खानाबदोशों की नागरिकता को बहाल किया था। लेकिन आज भी इनके पास न जमीन है और न कोई पक्का ठिकाना। ये घुमंतू समुदाय के लोग भारत का नागरिक होने का दस्तावेज कहां से लाएंगे। जाहिर तौर पर ये 12 प्रतिशत लोग “डि लिस्ट” में जाएंगे। सरकार इन्हें भी डिटेंशन कैंप में डाल देगी। 

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धरना को संबोधित करते हुए लगभग सभी वक्ताओं ने एक स्वर में सीएए और एनआरसी को देश के लिए घातक बताया। उनका कहना था कि इस कानून से केवल मुसलमान ही प्रभावित नहीं होंगे बल्कि दलित, पिछड़े और आदिवासी सभी की नागरिकता पर सवाल उठेगा। 

बिना दस्तावेज के हैं आदिवासी

जेएनयू में प्रोफेसर सोना झरिया मिंज ने अपने संबोधन में कहा कि संविधान के अनुसार हम आदिवासियों पर हिंदू कानून लागू नहीं होता। हमारे समुदायों के लिए 1950 में ही कानून बनना चाहिए था, जिसके माध्यम से उनके कागजात तैयार होता। आज तक ऐसा कोई कानून नहीं बना। यही वजह है कि आज भी आदिवासी समुदाय के लोग अपने ही जंगलों और पहाड़ों में बिना किसी दस्तावेज के जी रहे हैं। 

धरना में महिलाओं की रही खासी भागीदारी

वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी इलाकों में आरएसएस और बीजेपी का हमला रोज-ब-रोज तीखा होता जा रहा है। कभी नक्सली बताकर मारना, कभी सलवा जुडुम के माध्यम से हमला, तो कभी उनके जल जंगल, जमीन, सम्पति, खनिज, संस्कृति को सरेआम लूटना इनका मुख्य एजेंडा है। सवाल यह है कि आदिवासियों के पास जब कागजात ही नहीं हैं तो फिर सरकार को बताना चाहिए कि वे कहां जाएंगे। क्या वह उन्हें डिटेंशन कैंप में डाल देगी?

वहीं क्रांतिकारी युवा संगठन के प्रतिनिधियों ने “साझी शहादत, साझी विरासत और साझी नागरिकता” की बात करते हुए कहा कि हमें आजादी कई कुर्बानियों के बाद मिली है और इन कुर्बानियों का एक ही मकसद था कि भारत हम सबका हो। एक ऐसा भारत जहां लोगों को अपनी बात रखने की आजादी हो। लेकिन आज की सरकार हमसे हमारी आज़ादी छीनने की कोशिश कर रही है। हमारा ध्यान शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी, बेरोजगारी से हटाकर कागज बनाने की ओर लगा रही है।

ट्रांसजेंडर कहां से लाएंगे नागरिकता का दस्तावेज

ट्रांसजेंडर समुदाय के प्रतिनिधि दिशा पिंकी शेख ने कहा कि हम ट्रांसजेंडर्स को लंबी लड़ाई के बाद 2014 में नागरिकता मिली। ऐसे में हम 1960 या 1970 के दशक में नागरिकता का सबूत और कागजात कहाँ से लाएंगे। अभी तो हमारी शत-प्रतिशत जनगणना भी नहीं हुई है। बड़ी संख्या में ट्रांसजेंडरों के पास अभी तक मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड और पैन कार्ड भी नहीं हैं। पिंकी ने कहा कि इस लड़ाई में बाबासाहेब आंबेडकर का संविधान ही हमारा हथियार है। 

संभाजी भगत ने कहा – ये हिटलर के साथी, जनाजों के बराती 

इस मौके पर मुंबई से आये लोक-साहिर (जनकवि व गायक) संभाजी भगत ने साहित्यकारों कलाकारों की तरफ से प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने कहा कि बाबासाहेब ने संविधान दिया और उस संविधान का सहारा लेते लेते हुए हमारे देश में फासिस्ट ताकते सत्ता में बैठी हैं। इस अवसर पर उन्होंने अपना प्रसिद्ध गीत भी सुनाया। 

‘ये हिटलर के साथी, जनाजों के बराती, 

पूछते नहीं इंसां को कि कौन है तू, ये पूछते हैं उनकी धर्म और जाति 

इनकी सूरत को पहचानो रे भाई, इनसे सम्हल के रहना रे भाई, 

गलती करोगे आहें भरोगे, जालिम का जमाना झरे न भाई , 

चोर चीटर बैठे हैं भाई बड़े सेलर बैठे हैं भाई, 

कुछ दिल्ली में बैठे हैं भाई और कुछ यूपी में बैठे हैं भाई 

बातें राम की चली है भाई, बाते रहीम की चली है भाई 

बाते वेद की चली हैं भाई, बाते भेद की चली हैं भाई 

बाते कुरान की चली हैं भाई, बातें पुरान की चली हैं भाई, 

रामकथा में डूबे हम बाई, रामलीला में डूबे हम भाई , 

अरे राम रहीम तो अपनी जगह पर रोजी रोटी कहां ढूँढ़े रे भाई 

अरे चोर चीटर ले बैठे हैं भाई, अरे बड़े सेलर बैठे हैं भाई 

धरना में शामिल लोग

इस मौके पर सीएए, एनआरसी और एनपीआर के विरोध में प्रस्ताव अजय राय ने प्रस्तुत किया। वहीं वक्ताओं में प्रकाश आंबेडकर के अलावा डेनियल गोंजाल्विस, मुफ्ती अशफाक़, अंसार बनारस, कमलनाथ साह, एस आर दारापुरी, थिरुमावलवन्, बीना पल्लीक्कल, रमेशनाथन, पॉल दिवाकर, विजय, लेनिन विनोबर, जीत बाउथ, जितेंन्द्र मीणा, लक्ष्मण यादव, अभय कुमार, सुजीत सम्राट, जितेन्द्र सुना व कई प्रदेशों से आए विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे। कार्यक्रम का संचालन दिल्ली यूनिवर्सिटी की अध्यापिका नीतिशा खलखो ने किया।

(संपादन : गोल्डी/नवल)

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