क्यों फुले-आंबेडकर की वैचारिकी से दूर रहे यशपाल?

शैली किरण बता रही हैं कि यशपाल की रचनाएं वैविध्यपूर्ण व बहुआयामी होने के बावजूद कई सवालों को अनसुलझा छोड़ जाती हैं। जाहिर तौर पर ये वही सवाल हैं, जो जोतीराव फुले, सावित्रीबाई फुले और डॉ. आंबेडकर न केवल लोगों के सामने लेकर आते हैं बल्कि उनके जवाबों के लिए मुक्ति का मार्ग भी बताते हैं

पुनर्पाठ

कार्ल मार्क्स और सिग्मंड फ्रायड के प्रभाव से दुनिया में एक नई आलोचकीय दृष्टि का जन्म हुआ, जिसे फ्रैंकफर्ट स्कूल कहा जाता है। 19वीं शताब्दी में दुनिया के लगभग सभी देशों के लेखक कार्ल मार्क्स और सिग्मंड फ्रायड से प्रभावित हुए। हर्बर्ट मारकयूज़ के समकालीन यशपाल, भारतीय उपमहाद्वीप के इसी श्रेणी के लेखक हैं। वे भी रूसी समाजवाद से प्रभावित थे। परंतु, क्या वजह रही कि उनकी रचनाओं में फुले-आंबेडकर की विचारधारा की मुखर अभिव्यक्ति नहीं होती। साथ ही, उनके लेखन में जहां कथित तौर पर उनका मार्क्सवाद सिर चढ़कर बोलता है वहीं उनके पात्र ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के वर्चस्व को बढ़ावा देते नजर आते हैं।

ध्यातव्य है कि ब्रिटिश भारत के कांगड़ा हिल्स में जन्में यशपाल (3 दिसंबर 1903- 26 दिसंबर 1976) प्रेमचंद के उन समकालीन साहित्यकारों में अग्रणी थे, जिनकी रचनाओं के केंद्र में वामपंथी विचार थे। उन्होंने समाज के विविध विषयों पर खूब कलम चलायी। उनकी प्रकाशित रचनाओं में 17 कहानी संग्रह और 11 उपन्यास शामिल हैं। उन्हें राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया। महत्वपूर्ण यह है कि यशपाल स्वयं अपनी आत्मकथा (सिंहावलोकन) में खुद को वामपंथ से प्रभावित साहित्यकार मानते हैं। 

वामपंथ के प्रति उनका झुकाव उनके पहले उपन्यास “दादा कामरेड” (1941) में दिखता है। इस उपन्यास में यशपाल प्रगतिशीलता के पथ पर सरपट भागते नजर आते हैं। उदाहरण के लिए उनका नायक हरीश  क्रांतिकारी तरीके से वामपंथी दलों के बीच के द्वंद्व, द्वेष आदि को लेकर मुखर है। वहीं शैल पुरूषों के साथ अपने संबंधों को लेकर भी मुंहफट है। यानी वह अपने संबंधों का नि:संकोच खुलासा करती है। यशपाल बताते हैं कि उनका नायक आधुनिक युग का पुरुष है और वह रूढ़िवादी नहीं है। लेकिन  शैल, जिसे आजादी, मजदूरी से लेकर नारीवाद तक सभी तमाम मुद्दों की समझ है, लेकिन कई स्थानों पर यशपाल उसे बोलने का अवसर ही नहीं देते।

यशपाल (3 दिसंबर, 1903- 26 दिसंबर, 1976)

असल में, यशपाल भले ही विश्व स्तरीय वामपंथी चिंतन से खुद को जोड़ते हों, उसे आगे बढ़ाने की बात करते दिखते हों, लेकिन अन्य वामपंथी चिंतकों की तरह वे भी अपने ही देश में हो रहे सामाजिक व सांस्कृतिक बदलावों से बिलकुल अपरिचित नजर आते हैं। उदाहरण के लिए आंबेडकर नारीवाद को, सामाजिक न्याय, शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता व स्वावलंबन से जोड़ते हैं। वहीं यशपाल, अपने पात्रों के माध्यम से नारीवाद को नारी की दैहिक स्वतंत्रता से जोड़ते हैं।  हालांकि सौंदर्य के बारे में उनके विचार वामपंथ से ही प्रभावित दिखते हैं। यशपाल के साहित्य को पढ़कर यह सहज निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उनके सभी स्त्री पात्र, पुरुषों का विरोध करते हैं लेकिन उनके सामने यशपाल केवल एक ही विकल्प छोड़ते हैं और यह कि बुरा पुरूष भले न चुनो लेकिन पुरूष अवश्य चुनो। उनकी रचनाओं में पुरुष ही स्त्रियों का उद्धारक रहता है। उदाहरण के लिए “पहाड़ की स्मृति” कहानी में खुबानी वाली पूछती है, परशुराम को जानते हो?” परशुराम कोई और नहीं, उसका वह प्रेमी है, जो उसके पास एक पांच साल की बच्ची को छोड़कर चला गया और कभी लौटकर नहीं आया। लेखक यह नहीं बताता कि उसे परशुराम के प्रति क्रोध था, पहाड़िन के प्रति करुणा या परशुराम से ईर्ष्या? क्या इसका कारण समर्पित स्त्री का दुर्लभ होना है, अर्थात उस स्त्री का जिसका यशपाल रूढिवादी स्त्री के रूप में विरोध करते आएं हैं। 

एक और कहानी “जहां हसद नहीं” देखिए। इसमें एक औरत सआदत परपुरुष के प्रेम में पड़ जाती है और फिर वह अपने पति नूरमहल को स्वयं को काट देने को कहती है। क्या यह ईश्वरीय न्याय से संचालित विचार नहीं है, जो सआदत को ग्लानि के भाव से भर देता है

“अमिता” (1956) में यशपाल अशोक द्वारा कलिंग पर आक्रमण का हृदय विदारक दृश्य प्रस्तुत करते हैं। इसमें वे विश्व शांति आंदोलन से प्रभावित दिखते हैं। हालांकि इसके कई पात्रों के जरिए यशपाल वर्तमान के सदंर्भ में कई मौजूं सवाल उठाने का साहस भी दिखाते हैं। मसलन, वह ऐतिहासिक, राजनीतिक और सामाजिक जीवन को दिखाते हैं। वे क्रांति की बात करते हैं। लेकिन क्या कभी वे जाति को तोड़ने की बात करते हैंइसका जवाब है नहीं। उन्हें सब मंजूर है सिवाय इसके कि वर्णाश्रम व्यवस्था कायम रहे, जातिभेद बरकरार रहे।

यह भी पढ़ें : फुले-आंबेडकर की विचारधारा और प्रेमचंद का साहित्य

इसके बावजूद यशपाल की खासियत यही है कि वे अपने वामपंथी उसूलों से कभी नहीं डिगे। वे अपने दर्शन के प्रति पूरी तरह ईमानदार रहे। “बात की बात” में वह स्पष्ट लिखते हैं किमैं सभी कुछ सप्रयास लिखता हूं। हां, सचेत लेखक होने के कारण सौद्देश्य लिखता हूं।”

“बारह घंटे” (1963) प्रेम और विवाह मूल्यों को पूरी तरह चुनौती देते हैं। यशपाल अक्सर कहानियों में नारीवाद की बात करते हैं और उनका नारीवाद पश्चिम के नारीवादियों की तरह दिल से जुड़ा हुआ है। भारतीय नारीवाद, जो कि सावित्रीबाई फुले द्वारा शुरू किए गए विमर्शों के आलोक में देखा जा सकता है, का प्रभाव यशपाल की रचनाओं में नदारद है। उनके स्त्री पात्र शिक्षित होते हुए भी समाज के लिए कुछ नहीं करते। एक तरह से पुरूषों की गुलामी को अपने जीवन का उद्देश्य मानते हैं। इसी तरह का स्त्री विमर्श बांग्ला साहित्य में देखने को मिलते हैं, जहां समाज सुधार के नाम पर सती प्रथा और विधवा विवाह आदि को लेकर कुछ प्रयास तो हुए, लेकिन जातिगत भेदभाव के सवाल पर खामोशी बनी रही। 

यशपाल की एक खासियत यह भी रही कि वे किसी एक खांचे में नहीं रहे। उनकी लेखनी की जद में तमाम मसले आए। मसलन, उन्होंने प्रेम पर भी विस्तार से लेखन किया है। “प्रेम के बारे में साहित्य कला और प्रेम” में वे लिखते हैं कि “साहिब, आध्यात्मिक प्रेम नपुंसक प्रेम है, वासना को पूरा करने का जब सामर्थ्य ना हो तो मन बहलाने का तरीका”। फ्रायड के यौनिकता सबन्धी विचारों से वे पूरी तरह प्रभावित हैं। काम को वे सबकी कमजोरी और ताकत दोनों मानते हैं। लेकिन इसी यथार्थ के विपरीत कभी-कभी वे अपने पात्रों को रोमांटिसाइज करते हुए देखे जा सकते हैं। जैसे उनकी कहानी “मक्रील” में एक बूढ़े कवि की प्रशंसक एक युवती है, जो उससे इतनी प्रभावित है कि उसके प्रेम में पुल की रेलिंग से कूदकर अपने प्राण त्याग देती हैं। क्या एक युवती की दैहिक आवश्यकता की पूर्ति एक बूढ़े लेखक से संभव है? यशपाल बहुधा अपनी विचारधारा को ही काटते नज़र आते हैं। 

यशपाल विरोधाभास के साहित्यकार हैं, जहां वे स्त्री के गर्भ को उसकी कमजोरी मानते हैं वहीं वे उसे स्त्री के गर्व के रूप में भी देखते हैं। “सृजन की पीड़ा” नामक कहानी में नायक अपने मित्र की पत्नी नीता को गर्भवती देखकर दुखी होता है। उससे दूर भागता है, उसका चित्र बनाता है। जब उस चित्र को नीता देखती है तो वह गुलामी भाव से भर जाती है, लेकिन इसके बावजूद वह बड़े आत्मविश्वास से उस चित्र को “सृजन की पीड़ा” नाम देती है।

“क्यों फंसे” नामक एक उपन्यास में यशपाल विवाह प्रथा का भी रूढ़ि के रूप में विरोध करते हैं। लेकिन वे वेश्यावृत्ति को एक दलित की नजर से देखने में असमर्थ हैं। यौनिक उन्मुक्तता को वे भारत की स्त्री की आजादी मान लेते हैं। जब नांगली जैसी दलित औरतें संघर्ष करके अपनी छाती को ढंकने का अधिकार पाती हैं तो वे उस दृष्टि से समाज को देखने लगते हैं जो ब्राह्मण की ही दृष्टि है। उनके स्त्री पात्रों की आजादी शहर की महिलाओं की आजादी है।  दबे हुए दलित वर्ग की औरतें रोटी, कपड़ा और मकान के लिए ही अपने पुरुष के साथ संघर्षरत है। क्या डॉ. अंबेडकर के साहित्य में औरतों की आज़ादी को किसी भी स्तर पर यौनिक आजादी बताया गया है? क्या रूस के समाजवाद में वेश्यावृति सम्मानजनक उपार्जन कर्म है? इन प्रश्नों का उत्तर है नहीं।

बहरहाल, यशपाल ब्राह्मण और बौद्ध धर्म दोनों से असहमति रखते हैं। लेकिन क्या कारण है कि उन्हें “अप्सरा का श्राप” जैसे उपन्यास में पौराणिक कथ्य का सहारा लेना पड़ता है? फिर वे शिव पार्वती”, “धर्मयुद्ध”, “अहिंसा पर कटाक्ष”, “नारद-परशुराम संवाद”, “मनु की लगाम”, “भगवान के पिता के दर्शन” जैसी कहानियां लिखते हैं। क्या मिथकों का उपहास बनाना, उन्हें मान्यता देना नहीं है?  जोतीराव फुले की “गुलामगिरी” पढ़ने के बाद सहज ही समझा जा सकता है कि उन्होंने किस तरह मिथकों में सुधार करने के बजाय उन्हें पूर्ण रूप से नकार दिया है, उनका वैज्ञानिक चेतना के आधार पर खंडन किया, बल्कि उनके अर्थ साधारण जनता के लिए खोल कर रख दिए।

संदर्भ सूची :

यशपाल, दादा कामरेड, 1941, लोकभारती प्रकाशन
यशपाल, अभिशप्त, 1944), विप्लव कार्यालय, लखनऊ
यशपाल, फूलों का कुर्ता, 1949, विप्लव कार्यालय, लखनऊ
यशपाल, वतन और देश, 1958, विप्लव कार्यालय, लखनऊ
यशपाल, देश का भविष्य, 1960, विप्लव प्रकाशन, विप्लव कार्यालय, लखनऊ
फुले, जोतीराव, गुलामगिरी, 1873, सत्यशोधक समाज
आंबेडकर, बी.आर., एनीहिलेशन ऑफ कास्ट, 1936
यशपाल, अप्सरा का शाप, 1965, विप्लव कार्यालय, लखनऊ
यशपाल, मेरी प्रिय कहानियां, 1790, राजपाल एंड संस, नई दिल्ली
यशपाल, तेरी तेरी उसकी बात, 1974, लोकभारती प्रकाशन,

(संपादन : नवल//अमरीश)

About The Author

2 Comments

  1. Kamal Reply
  2. Surendra ambedkar Reply

Reply