“सच्ची रामायण” से आगबबूला हुए छत्तीसगढ़ के द्विज, ओबीसी वकील के खिलाफ मुकदमा

पेरियार के विचारों से आज भी भारत का ब्राह्मणवादी समाज आगबबुला हो उठता है। ऐसी ही एक घटना छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चाम्पा जिले में पिछले दिनों घटित हुई, जहां द्विजों ने ओबीसी वर्ग के एक अधिवक्ता के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया है। नवल किशोर कुमार की रिपोर्ट

दक्षिण भारत के महान दार्शनिक ई. वी. रामासामी पेरियार के विचारों पर आधारित एक फेसबुक पोस्ट लाइक और शेयर किए जाने पर छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले में द्विजवादियों ने जम कर बवाल काटा। उन्होंने 5 अप्रैल, 2020 को जिले के बाराद्वार  थाने में अधिवक्ता और आम आदमी पार्टी से जुड़े विजय कुमार मौर्य के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया।

विजय कुमार मौर्य ने कथित तौर पर उत्तरप्रदेश के प्रभात मौर्य नामक फेसबुक यूजर के पोस्ट को लाइक और शेयर किया था। इससे स्थानीय द्विजवादी भड़क उठे। जानकारी के अनुसार, वे 5 अप्रैल के दोपहर से ही विजय कुमार मौर्य के खिलाफ लामबंद होने लगे। विश्व हिंदू परिषद, आरएसएस और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं की भीड़ बाराद्वार पुलिस थाना के सामने जुटने लगे । बाद में इन लोगों ने विजय कुमार मौर्य की गिरफ्तारी की मांग को लेकर नारेबाजी की। कोरोना लॉकडाउन के बावजूद, थाने के सामने पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में जमघट लगाया गया। इन लोगों के दबाव में आकर पुलिस ने विजय कुमार के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 298 और 34 व आईटी एक्ट 67 के तहत मामला दर्ज कर लिया।

पेरियार द्वारा लिखित व ललई सिंह यादव द्वारा प्रकाशित पुस्तक “सच्ची रामायण’ का मुख्य पृष्ठ

दरअसल, विजय कुमार मौर्य ने 29 मार्च, 2020 को रात 10 बजे के करीब फेसबुक पर एक पोस्ट शेयर की.  प्रभात मौर्य की इस पोस्ट में पेरियार की किताब “सच्ची रामायण” की कवर इमेज के साथ एक संदेश डाला गया था। इसमें इस किताब के अंशों को शामिल किया गया। 

माफी मांगने के बावजूद थाने में दी जान से मारने की धमकी

मौर्य ने फारवर्ड प्रेस से दूरभाष पर कहा कि उन्होंने 29 मार्च को एक पोस्ट अपने वॉल पर शेयर की। 5 अप्रैल को दोपहर में स्थानीय लोगों के एक व्हाट्सएप ग्रुप में किसी ने उस पोस्ट को शेयर कर दिया। इसके बाद एक व्यक्ति, जिसने स्वयं को हिंदू संगठन का सदस्य बताया, ने मोबाइल पर उन्हें धमकी दी।

अचानक हुए इस बवाल से विजय कुमार दहशतजदा हो गए। उन्होंने अपने एक अधिवक्ता मित्र की सलाह पर जिले के पुलिस अधीक्षक के नाम एक पत्र भी लिखा जिसमें उन्होंने कहा कि उक्त पोस्ट भूलवश शेयर हो गया है। इस पत्र को उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर इस उद्देश्य से शेयर किया ताकि मामला आगे न बढ़े। परंतु, द्विजवादी माफी से संतुष्ट नहीं हुए। मौर्य ने बताया कि जब वे इस पत्र को लेकर बारद्वार थाना पहुंचे तब वहां पहले से ही कई लोग मौजूद थे। वे थाना प्रभारी पर एफआईआर दर्ज करने का दबाव बना रहे थे। उनमें से एक ने उन्हें थाने में ही जान से मारने की धमकी भी दी।

मौर्य ने बताया कि पुलिस ने जिन धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है, वे सभी जमानती हैं। जब मामला अदालत में जाएगा तब वे जमानत लेंगे और आगे की लड़ाई लड़ेंगे।

सुप्रीम कोर्ट में सच्ची रामायण के खिलाफ हार चुके हैं द्विजवादी

यह पहला मौका नहीं है जब उत्तर भारत में पेरियार के विचारों से द्विजवादी बेचैन हुए हैं। दरअसल, पेरियार यह मानते थे कि रामायण एक धार्मिक किताब नहीं है। उनके मुताबिक यह यह एक राजनीतिक पुस्तक है; जिसे इस मकसद से लिखा गया ताकि द्विजवर्ग अपने प्रभुत्व को जायज ठहरा सके। यह पुस्तक 1944 में तमिल भाषा में प्रकाशित हुई थी। इसका जिक्र पेरियार की पत्रिका “कुदी अरासू” (गणतंत्र) के 16 दिसंबर 1944 के अंक में किया गया है। इसका अंग्रेजी अनुवाद द्रविड़ कषगम पब्लिकेशन्स ने “द रामायण : अ ट्रू रीडिंग” नाम से 1959 में प्रकाशित किया गया। इसका हिंदी अनुवाद 1968 में “सच्ची रामायण” नाम से किया गया। हिंदी अनुवाद के प्रकाशक ललई सिंह यादव और अनुवादक राम आधार थे। ललई सिंह यादव उत्तर प्रदेश-बिहार के प्रसिद्ध मानवतावादी संगठन “अर्जक संघ” से जुड़े लोकप्रिय सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता थे।

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9 दिसंबर, 1969 को तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने “सच्ची रामायण” पर प्रतिबंध लगा दिया। इसी के साथ पुस्तक की सभी प्रतियों को जब्त कर लिया गया। उत्तर भारत के पेरियार नाम से चर्चित ललई सिंह यादव ने जब्ती के आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। वे हाईकोर्ट में मुकदमा जीत गए। सरकार ने हाईकोर्ट के निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट में इस ऐतिहासिक मामले की सुनवाई तीन जजों की खंडपीठ ने की। खंडपीठ के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर तथा सदस्य न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती और सैयद मुर्तज़ा फ़ज़ल अली थे। 16 सितंबर 1976 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सर्वसम्मति से फैसला देते हुए राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में निर्णय सुनाया। 

विजय कुमार मौर्य के समर्थन में उतरे सामाजिक कार्यकर्ता

दलित सामाजिक कार्यकर्ता व पीयूसीएल के प्रांतीय अध्यक्ष डिग्री प्रसाद चौहान ने फारवर्ड प्रेस को दूरभाष पर बताया कि द्विज ताकतें आज भी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि भारत के मूलनिवासियों पर आर्यों ने जुल्म किये और उनकी संस्कृति को तहस-नहस कर उनपर अपनी संस्कृति थोप दी। वहीं, छत्तीसगढ़ के दलित सामाजिक कार्यकर्ता संजीत बर्मन के मुताबिक, वर्तमान में अभिव्यक्ति की आजादी को दबाने की कोशिशें की जा रही हैं। पुलिस को दबाव में आकर कानून से परे किसी के खिलाफ मामला दर्ज नहीं करना चाहिए। 

(संपादन : अमरीश/गोल्डी)

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  1. मणि एस अंचल Reply

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