“असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों में बहुलांश दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के, इनकी समस्याओं को अलग कर नहीं देखा जाना चाहिए”

आप देखिए कि श्रम क़ानूनों को किस तरह शिथिल किया जा रहा है। श्रमिकों के अधिकारों को कम किया जा रहा है। सौ साल के संघर्ष से जो कानून बने, उन्हें एक झटके में खत्म किया जा रहा है। मज़दूरों से बेगार करवाने की तैयारी सरकार के स्तर पर चल रही है। नवल किशोर कुमार की निखिल डे से बातचीत

देश में लॉकडाउन की सबसे अधिक मार मज़दूरों पर पड़ी है। अब तक विभिन्न दुर्घटनाओं में करीब 600 मजबूर मारे जा चुके  हैं। ये वे लोग थे जो किसी तरह अपने घर जा रहे थे। एक तरफ ऐसी दर्दनाक खबरें आ रही हैं तो दूसरी तरफ केंद्र सरकार के स्तर से श्रम कानूनों को शिथिल करने संबंधी एडवाइजरी जारी की जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 लाख करोड़ रुपए के पैकैज की घोषणा की, जिसमें से 40 हजार करोड़ रुपए मनरेगा के तहत ग्रामीण मज़दूरों के लिए आवंटित किए जाने की बात केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कही। इन्हीं सवालों को लेकर मजबूर किसान शक्ति संगठन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे से नवल किशोर कुमार ने दूरभाष पर विशेष बातचीत की। प्रस्तुत हैं संपादित अंश

सबसे पहले आज के दौर में मज़दूरों की जो दुर्दशा है, उस पर आपकी प्रतिक्रिया क्या है?

देखिए, आज के हालात में यह साफ-साफ नजर आ रहा है कि इस देश में मजबूर होने के क्या मायने हैं।  वैसे यह पहली बार हो रहा है कि उनके महत्व को भी समझा जा रहा है और उनका दमन भी किया जा रहा है। आज यह सभी समझ रहे हैं कि मज़दूरों का महत्व क्या है। उनके बगैर अर्थव्यवस्था रेत के महल की तरह एक झटके में ढह जाएगी। पहले सब ढंका हुआ था। कई सारी रिपोर्टें थीं जिनमें मज़दूरों की हालत के बारे में जानकारियां थीं। परंतु अब जब वे मारे-मारे फिर रहे हैं, तब उनकी स्थिति सब को दिख रही है। आप इनका महत्व ऐसे समझिए कि सरकारें इन्हें घर तक नहीं जाने दे रही हैं। उनके लिए ट्रेन, बस, सड़क सब पर रोक है। ऐसा वे इसलिए कर रही हैं ताकि वे अपने घर न जा सकें। अगर मजबूर अपने घर चले गए फिर उद्योगों में कौन काम करेगा? कौन उनके लिए इमारतें, सड़कें और पुल बनाएगा? 

दूसरी तरफ आप यह भी देखिए कि कैसे श्रम कानूनों को शिथिल किया जा रहा है। श्रमिकों के अधिकारों को कम किया जा रहा है। सौ साल के संघर्ष से जो कानून बने, उन्हें एक झटके में खत्म किया जा रहा है। मज़दूरों से  बेगार करवाने की तैयारी सरकार के स्तर पर चल रही है। देश के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है।

क्या आपको नहीं लगता है कि आप जिन मज़दूरों की बात कर रह हैं, उनमें से अधिकांश दलित, पिछड़े और आदिवासी वर्ग के हैं और इस कारण भी उनकी यह हालत है?

इससे कहां इनकार किया जा सकता है। आज असंगठित क्षेत्र में जो भी लोग हैं वे इन्हीं वंचित समुदायों के लोग हैं। आप कहीं भी किसी भी मजबूर से पूछ लें। आपको जानकारी मिल जाएगी। कोई दलित है या फिर आदिवासी है या फिर पिछड़ा वर्ग का है। चाहे बिहार के मजबूर हों या फिर यूपी या फिर झारखंड या किसी और राज्य के। ये भूमिहीन हैं। इनकी समस्याओं को अलग रखकर नहीं देखा जा सकता।

निखिल डे

केंद्र सरकार ने मनरेगा को लेकर बड़ा एलान किया है। इस घोषणा को कितना महत्वपूर्ण मानते हैं?

देखिए, केंद्रीय सरकार ने लॉकडाउन के दौरान जितनी भी घोषणाएं कीं हैं, उनमें से किसी मतलब तो केवल एक यही है। इसका सरोकार देश के मज़दूरों से है। मैं आपको बताऊं कि यह योजना जनांदोलनों की उपज है। इसकी मांग तब शुरू हुई थी जब इंडिया शाइनिंग का नारा दिया जा रहा था।

क्या आप मानते हैं कि चालीस हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त प्रावधान पर्याप्त है, आज के लिहाज से?

नहीं। पर्याप्त तो मैं नहीं मानता। लेकिन फिलहाल जिस तरह के हालात हैं, उसके हिसाब से कहा जा सकता है कि इसके जरिए सरकार चाहे तो मनरेगा में जान फूंक सकती है। देखिए इसको ऐसे समझिए कि अभी वित्तीय वर्ष की शुरूआत हुई है। सरकार ने पहले ही 60 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया था। अब इसमें 40 हजार करोड़ और बढ़ा दिया है। इसमें से सोलह हजार करोड़ का आवंटन सरकार कर चुकी है। इस तरह 84 हजार करोड़ रुपए अभी भी शेष है। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि यदि सरकार चाहे तो अगले दो-तीन महीनों तक लोगों को रोज़गार दे सकती है।

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लेकिन मनरेगा के क्रियान्वयन को लेकर पहले से सवाल उठते रहे हैं।

बिल्कुल सवाल उठते रहे हैं। हमारा तो यह कहना है  कि आप एक परिवार में केवल एक को जॉब गारंटी देने की बजाय सभी वयस्क सदस्यों को यह अधिकार दें। यदि ऐसा हुआ तो जो लोग गांवों में लौट रहे हैं, उन्हें रोज़गार मिल सकेगा। फिर मनरेगा में पहले से यह प्रावधान रहा है कि बाढ़ और सूखे जैसी आपदा की स्थिति में सौ दिनों के रोजगार को और पचास दिनों तक बढ़ाया जा सकता है। अभी तो विश्व स्तर पर आपदा है। ऐसे में सौ दिनों की बजाय डेढ़ सौ दिनों की रोज़गार गारंटी दी जानी चाहिए।

मनरेगा के अंतर्गत परिसंपत्तियों के सृजन को लेकर सवाल उठाया जा रहा है। सरकार का रही कि उसके पास गांवों में लोगों को देने के लिए रोजगार नहीं है।

देखिए, मनरेगा के प्रावधानों के हिसाब से गांवों में 259 तरह के काम हैं। सरकार यदि कहती है कि उसके पास काम नहीं है तो इसका मतलब यह है कि वह इस योजना को लागू नहीं करना चाहती । मैं तो कहता हूं कि लोगों को सामुदायिक परिसंपत्तियों के निर्माण में लगाया जाय। अभी कुछ लोग कह रहे हैं कि वेज सब्सिडी मिले। लेकिन मेरा मानना है कि मनरेगा लोगों को सामंती ताकतों से आजाद करने के लिए है। उन्हें फिर से किसी सामंत का गुलाम नहीं बनने दिया जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि सरकार अपनी जिम्मेदारियों को समझे। मैं 1930 में अमेरिका में हुए “ग्रेट डिप्रेशन” का उदाहरण देना चाहता हूं। उस समय के हालात को देखकर तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने सबको उनकी दक्षता के हिसाब से काम देने की बात कही। वे लोगों को काम देना चाहते थे और दिया भी। जो सड़क बनाने में सक्षम थे उन्होंने सड़क बनाई। जो फर्नीचर बनाते थे, उन्होंने फर्नीचर बनाए। जो चित्रकार थे, उन्हें चित्र बनाने का काम दिया गया। मूल बात यह है कि लोगों को काम मिले।

अंत में एक सवाल राजनीतिक दलों को लेकर। खासकर वामपंथी दलों के के बारे में कहा जा रहा है कि उन्हें मजदूरों की परवाह नहीं रह गयी है।

देखिए, राजनीतिक दलों से मुझे निराशा ही मिली है। उन्हें इस समय जो काम करना चाहिए था, वे नहीं कर रहे हैं। ऐसे में जबकि संसद बंद है, लोगों की आवाजाही प्रभावित है, राजनीतिक दलों की भूमिका बढ़ जाती है। लेकिन यह केवल ट्वीट करने और न्यूज चैनलों व अखबारों में बयान देने से काम नहीं चलने वाला। यदि राजनीतिक दलों ने कुछ ठोस नहीं किया तो जनांदोलनों से रास्ता निकलेगा।

(संपादन : अमरीश)

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