मध्य प्रदेश : हाशिए पर वनाधिकार कानून, आदिवासियों के बेघर होने का खतरा बरकरार

मध्य प्रदेश में बड़ी संख्या में आदिवासियों व परंपरागत वननिवासियों को वनाधिकार अधिनियम, 2006 के तहत पट्टा नहीं दिया जा रहा है। इससे उनके सामने रहने-जीने का संकट उत्पन्न हो गया है। वे दहशत में हैं कि कहीं सरकार उन्हें बेघर न कर दे। बता रहे हैं राजन कुमार

मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले में वनाधिकार पट्टे दिए जाने की मांग को लेकर जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) संगठन के नेतृत्व में जंगलों में निवास करने वाले आदिवासी एवं वननिवासी बीते 17 अक्टूबर, 2020 से अनिश्चितकालीन धरने पर हैं। उनकी मांग है कि वनाधिकार पट्टा देने के लिए कलेक्टर लिखित में आदेश दें। उन्हें डर है कि उन्हें बेघर न कर दिया जाय। जयस संगठन के इस धरना प्रदर्शन को क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं अन्य क्षेत्रीय आदिवासी संगठनों का समर्थन भी मिल रहा है। साथ ही सोशल मीडिया (फेसबुक और ट्वीटर) पर भी काफी समर्थन मिल रहा है। 

क्या है मामला?

धरने का नेतृत्व कर रहे जयस संगठन के मध्यप्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष राजू पटेल ने बताया कि बड़वानी जिले में वनाधिकार अधिनियम 2006 के तहत सन 2005 से पहले से जंगलों में रह रहे आदिवासियों एवं परंपरागत वननिवासियों को पट्टा दिया जाना है। बड़वानी जिले में 11,600 लोगों को पट्टे के लिए पात्र पाया गया है। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार ने ‘वनाधिकार उत्सव’ का आयोजन कर मात्र 80 लोगों को ही पट्टे वितरित किये और शेष 11, 500 से अधिक दावों पर कोई विचार ही नहीं किया।

प्रदर्शन करते जयस के कार्यकर्ता

राजू पटेल बताते हैं कि “‘वनाधिकार उत्सव’ में जिन 80 लोगों को पट्टे दिए गए उन्हें हाल ही में ‘वनमित्र ऐप’ के माध्यम से मान्य किया गया था जबकि पूर्व के मान्य पट्टों का वितरण नहीं किया गया। पूछने पर कलेक्टर और आदिवासी विकास आयुक्त द्वारा बताया गया कि ‘संचिकाएं गुम हो गई है। संचिकाओं को ढूंढने के लिए समिति गठित की गई है। ऐसा प्रतीत होता है कि मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार, भाजपा के स्थानीय जनप्रतिनिधियों एवं जिले के कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से आदिवासियों/वननिवासियों को वनाधिकार पट्टा नहीं देना चाहती है।” 

पटेल ने बताया कि “बड़वानी जिले की ग्राम पंचायत सिदड़ी के ग्राम खड़क्यामहू में वनाधिकार अधिनियम 2006 के तहत पट्टे के 11 प्रकरण जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में दिनांक 25 जून, 2018 को आयोजित बैठक में मान्य किये गए लेकिन अभी तक उक्त 11 लोगों को पट्टे नही मिल सके हैं। वनाधिकार पट्टे के मान्य दावों की फाइल गुम होने की जांच के संबंध में बड़वानी कलेक्टर सिर्फ मौखिक आश्वासन दे रहे हैं। वे लिखित में जांच का आदेश देने को तैयार नहीं है और ना ही पूर्ववर्ती मान्य दावों के पट्टे वितरण करने का आदेश जारी कर रहे हैं। इसलिए जयस संगठन के सदस्य अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हैं।”

मध्यप्रदेश में 98 प्रतिशत दावे अमान्य, वन विभाग कर रहा बेदखल

बीते दिनों विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में राज्य के आदिम जाति कल्याण मंत्री द्वारा बताया गया कि आदिवासियों एवं परंपरागत वननिवासियों द्वारा को उनके कब्ज़े की वन भूमि का पट्टा के लिए मध्यप्रदेश सरकार को 6 जुलाई, 2020 तक 3.79 लाख आवेदन प्राप्त हुए। इनमें से मात्र 716 आवेदन स्वीकृत किए गए। लगभग 2.85 लाख आवेदनों को ख़ारिज कर दिया गया और शेष पर निर्णय लिया जाना बाकी है। इतनी बड़ी संख्या में आवेदनों को खारिज किए जाने से वनों में रहने वाले लगभग 4 लाख ज्यादा आदिवासियों एवं परंपरागत वनवासी परिवारों के समक्ष आवास और जीविका की समस्या उत्पन्न हो गई है। 

शिवराज सिंह चौहान की बात भी नहीं सुन रहा वन विभाग

गत 27 जून, 2020 को वनाधिकार पट्टों के आवेदनों के निराकरण की समीक्षा के दौरान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि “निरस्त किए गए 3.58 लाख से अधिक पट्टे आदिवासियों को दिए जाएंगे। अधिकारी माइडंसेट बना लें, गरीब के अधिकारों को मैं छिनने नहीं दूंगा। काम में थोड़ी भी लापरवाही की तो सख्त कार्रवाई होगी।” मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश में बड़ी संख्या में आदिवासियों/वननिवासियों के वनाधिकार दावों को निरस्त किया जाना दर्शाता है कि अधिकारियों ने इस काम को गंभीरता से लिया ही नहीं।

उन्होंने आगे कहा था कि, “आदिवासी/वननिवासी समुदाय ऐसा वर्ग है, जो अपनी बात ढ़ंग से रख भी नहीं पाता। ऐसे में उनसे साक्ष्य मांगना तथा उसके आधार पर पट्टों को निरस्त करना नितांत अनुचित है। सभी कलेक्टर एवं डीएफओ सभी प्रकरणों का पुनरीक्षण करें एवं एक सप्ताह में रिपोर्ट दें। वनवासियों को पट्टा देना ही है।”

परंतु, शिवराज सिंह चौहान के आश्वासन के बावजूद भी वन विभाग, वनाश्रितों को लगातार प्रताड़ित कर जंगलों से बेदखल कर रहा है। बीते 22 जुलाई, 2020 को अनुपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ तहसील के ग्राम बेंदी के डूमर टोला में बैगा आदिवासी समुदाय के लगभग 50 परिवारों की 103 एकड़ खेती की जमीन पर वन विभाग ने कब्जा कर लिया और खेतों में लगी धान की तैयार फसल को नष्ट कर दिया। इसके पहले 11 जुलाई, 2020 को रीवा जिले की गुढ़ तहसील के ग्राम हरदी में वन विभाग ने आदिवासियों-वनवासियों के लगभग 100 मकान बिना किसी सूचना के तोड़ दिए। वहीं 27 जून, 2020 को सिंगरौली जिले के बंधा गांव में आदिवासियों के घरों पर वन विभाग ने बुल्डोज़र चला दिया। होशंगाबाद जिले में भी वनों से सटे वनग्राम डांगपुरा, खकरापुरा, मानागांव समेत अनेक गांवों में वन कर्मियों द्वारा ज़बरदस्ती लोगों को हटाया जा रहा है, जिसके विरोध में जयस संगठन ने 6 अक्टूबर, 2020 को रैली निकालकर राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपा था। वहीं बैतूल जिले में भी 32 गांवों के हजारों आदिवासियों को बेदखल करने की कोशिश हो रही है।  

विकासखंड एवं जिला स्तर की समितियों की नियम विरूद्ध कार्यवाही

वन अधिकार अधिनियम, 2006 के मध्यप्रदेश में लागू होने से लेकर आज तक प्रदेश में विकासखंड एवं जिला स्तर की समितियों द्वारा 95 प्रतिशत से अधिक दावों को तीन पीढ़ियों के कब्जे के प्रमाण उपलब्ध नहीं होने के बहाने कहकर खारिज किया जा चुका है। जबकि अधिनियम की धारा 2(ण) एवं धारा 4(3) में तीन पीढ़ियों के कब्जे के प्रमाण उपलब्ध करवाने का कोई उल्लेख नही है बल्कि 13 दिसंबर, 2005 तक आदिवासियों-वनवासियों द्वारा संबंधित भूमि पर काबिज रहने का उल्लेख है। ब्लाॅक, तहसील और जिला स्तर के राजस्व अधिकारी तथा वन अधिकारी ग्रामसभा की भूमिका को भी नजरअंदाज कर रहे हैं। उसी क्षेत्र में निवास करने से संबंधित शासकीय रिकॉर्ड में उपलब्ध अभिलेख एवं दस्तावेजों का विवरण पंचायत, विकासखंड  एवं जिला स्तरीय वनाधिकार समितियों को उपलब्ध नही करवाया जा रहा है। 

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राजू पटेल विकास खण्ड एवं जिला स्तर के अधिकारियों द्वारा ग्रामसभा के अधिकारों का उल्लंघन किए जाने को भी रेखांकित करते हैं। वे कहते हैं कि पेसा [पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996] ग्रामसभा, जिसके बारे में कहा जाता है “लोकसभा न राज्यसभा, सबसे बड़ी ग्रामसभा,” को शक्ति संपन्न बनाता है। लेकिन ग्रामसभा जिस दावे का अनुमोदन करती है उसे विकासखंड और जिला स्तरीय समितियां वन विभाग और राजस्व विभाग के बीच विवादित मामला बताकर अमान्य कर देती हैं। जबकि वनाधिकार कानून 2006 के खंड 13 के तहत 2005 से पहले संबंधित भूमि पर काबिज होने की दंड रसीद या भूमि से संबंधित अन्य दस्तावेज अथवा नियम 13 (झ) के तहत ग्राम के बुजुर्ग के कथन को ग्रामसभा के सदस्य एक नोडल (विकासखण्ड) अधिकारी की उपस्थिति में कब्ज़े के प्रमाण के रूप में स्वीकार करते हैं। विकासखंड स्तरीय समिति द्वारा ग्रामसभा के दावों को खारिज किया जाना एक तरह से ग्रामसभा के अधिकारों का उल्लंघन हैं। 

देश भर में 8-10 प्रतिशत वनाधिकार पट्टों का वितरण 

बीते 10 अगस्त 2020 को भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्री अर्जुन मुंडा व वन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर द्वारा अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के संयुक्त महामंत्री विष्णुकांत एवं गिरीश कुबेर की उपस्थिति में जनजातियों के हितों के संवर्धन के लिए बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में अर्जुन मुंडा ने स्वीकार किया कि सामुदायिक संसाधनों के वनाधिकार को अब तक मात्र 8 से 10 प्रतिशत मामलों में मान्यता दी गयी है। उसे निश्चित कालावधि में मिशन मोड से 100 प्रतिशत करना सुनिश्चित किया जाए।

राज्य सरकार की बड़ी लापरवाही

जंगल-जमीन के मामलों का ऐतिहासिक अध्ययन कर मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में लंबे समय से लोगों के हकों की लड़ाई लड़ने वाले सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता अनिल गर्ग कहते हैं कि “वन अधिकार कानून 2006 की धारा 2(घ) में वनभूमि की परिभाषा दी गई है, जिसमें भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 27 एवं धारा 34अ के अनुसार राजपत्र में डीनोटीफाईड की गई भूमियों को एवं सुप्रीम कोर्ट की याचिका क्रमांक 202/95 में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा प्रस्तुत आई.ए. क्रमांक 791-792 में दिनांक 1 अगस्त, 2003 के सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार बड़े झाड़ के जंगल, छोटे झाड़ के जंगल मद में दर्ज जमीनों को वन संरक्षण कानून 1980 के दायरे से मुक्त घोषित किया गया है। लेकिन राज्य स्तरीय वनाधिकार समिति एवं राज्य मंत्रालय डीनोटीफाईड भूमि एवं अदालत द्वारा मुक्त की गई भूमि को गैर वनभूमि माने जाने बाबत अभी तक कोई पत्र, परिपत्र या आदेश जारी ही नही किया। और उक्त डीनोटीफाईड भूमि, बड़े झाड़ के जंगल, छोटे झाड़ के जंगल मद में दर्ज भूमियों को संरक्षित वन मानकर वन विभाग द्वारा उन पर कब्जा किया गया, उन पर काबिज आदिवासियों और वननिवासियों पर अत्याचार किए गए, उनके घरों-खेतों को नष्ट किया और मामले दर्ज कर प्रताड़ित भी किया गया।”

वे आगे कहते हैं, “जनवरी 2008 से लागू वन अधिकार कानून 2006 की धारा 3(1)ज के अनुसार वनग्रामों को राजस्व ग्राम का दर्जा दिया जाना था। लेकिन वन विभाग ने यह कार्यवाही जानबूझकर आज तक नहीं की। साथ ही वनग्राम नियम, 1928 के अनुसार वन विभाग द्वारा आजादी के पूर्व वनभूमि पर कृषि करने व आवास बनाने की  अनुमतियों से संबंधित विभागीय अभिलेखों, मानचित्रों की प्रतियां जनवरी, 2008 से वन अधिकार कानून 2006 लागू होने के बाद भी ग्रामवासियों, ग्रामसभा एवं ग्राम पंचायतों को उपलब्ध नहीं कराए गए। राज्य शासन के आदेश दिनांक 28 फरवरी, 1980 से वनग्रामों का बंदोबस्त कर पटवारी मानचित्र, खसरा पंजी, निस्तार पत्रक एवं 31 दिसंबर, 1976 तक के काबिजों की पात्रता निर्धारित कर पंजी बनाई गई, लेकिन इन शासकीय अभिलेखों एवं मानचित्रों की प्रति भी वन विभाग ने ग्रामसभा एवं ग्रामवासियों को आज तक उपलब्ध नहीं करवाए। प्रदेश में वन अधिकार कानून 2006 लागू किए जाने के बाद वन विभाग ने वनग्रामवासियों के कब्जे के आधार पर सीमांकन कर व्यक्तिगत वन अधिकार पत्रों से संबंधित कोई भी कार्यवाही स्वप्रेरणा से आज तक नहीं की बल्कि इस विषय में लगातार अन्याय एवं अत्याचार पूर्ण कार्यवाही वन विभाग के द्वारा की जाती रही है।”

क्या है वनाधिकार कानून

देश को आजादी मिलने के साठ साल बाद देश की संसद ने वनाश्रितों के साथ ऐतिहासिक अन्याय होना स्वीकार किया और 2006 में वनाश्रित समुदाय के अधिकारों को मान्यता देने के लिए अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वनाधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 बनाया। यह केवल वनाश्रित समुदाय के अधिकारों को ही मान्यता देने का नहीं, बल्कि देश के जंगलों एवं पर्यावरण को बचाने में वनाश्रित समुदाय के योगदान को भी मान्यता देने वाला कानून है। यह कानून, 1927 के औपनिवेशिक युग के भारतीय वन अधिनियम के असंतुलन को ठीक करने के लिए लाया गया। वन अधिकार अधिनियम, 2006 पहला और एकमात्र कानून है जो भूमि और खेती पर महिलाओं के स्वतंत्र अधिकारों को मान्यता देता है। इस कानून में जंगलों में रहने वाले आदिवासी समूहों और अन्य वननिवासियों को संरक्षण देते हुए उनके पारंपरिक भूमियों पर अधिकार देने का प्रावधान है। सामुदायिक पट्टे का भी प्रावधान है, जिसके अनुसार ग्राम के जंगल और जमीन पर स्थानीय ग्रामसभा का ही अधिकार होगा। आदिवासी लोगों को कुछ निश्चित दस्तावेज दिखाकर जमीनों पर अपना दावा जताने के बाद, अधिकारी द्वारा इन दस्तावेजों के आधार पर आदिवासियों और वननिवासियों के दावों की जांच कर वनाधिकार पट्टा दिया जाता है।

लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि वनाधिकार कानून 2006 बनने के डेढ़ दशक बाद भी  पात्र होने के बावजूद देश में बड़ी संख्या में आदिवासियों एवं परंपरागत वननिवासियों के दावे को मान्य नहीं किया जा सका है। उल्टे वन विभाग के अधिकारियों द्वारा आदिवासियों/परंपरागत वननिवासियों के विरुद्ध अनैतिक कार्यवाहियां की गईं, उनके घर जलाए गए, उनके साथ मारपीट की गई और उनके विरुद्ध प्रकरण भी दर्ज किए गए। 

(संपादन : नवल/अमरीश)


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