पी. एस. कृष्णन के संघर्ष का दस्तावेज प्रकाशित, लोकार्पण करेंगे नेशनल आइएएस एकेडमी के निदेशक डॉ. संजीव चोपड़ा

यह किताब जल्द ही बिक्री के लिए उपलब्ध होगी। यह किताब उन सभी के लिए महत्वपूर्ण है जो भारत में सामाजिक न्याय की अनिर्वायता को जानते-समझते हैं। फिर वे चाहे अध्येतागण हों या फिर प्रशासनिक अधिकारी व राजनीतिक कार्यकर्ता

भारत सरकार में सचिव रहे पी.एस. कृष्णन को सामाजिक न्याय संबंधी नीतियों का वास्तुकार माना जाता है। उनके संघर्षों के आधिकारिक दस्तावेज का हिंदी अनुवाद फारवर्ड प्रेस द्वारा “भारतीय कार्यपालिका में सामाजिक न्याय का संघर्ष : अनकही कहानी, पी. एस. कृष्णन की जुबानी” शीर्षक से प्रकाशित की गई है। इसका ऑनलाइन लोकार्पण आगामी 30 दिसंबर, 2020 को शाम साढ़े छह बजे उनकी जयंती के मौके पर आयोजित प्रथम स्मृति व्याख्यान के दौरान किया जाएगा। इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता डॉ. संजीव चोपड़ा, निदेशक, लाल बहादुर शास्त्री नेशनल एकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन होंगे। इस कार्यक्रम को यूट्यूब के जरिए सीधे प्रसारित किया जाएगा।

कार्यक्रम का फ्लायर

इस कार्यक्रम के दौरान डॉ. चोपड़ा एक व्याख्यान देंगे जिसका शीर्षक “सिविल सर्वेंट ऐज ऐन एजेंट ऑफ सोशल चेंज : रोल ऑफ ट्रेनिंग इंस्टीट्यूशंस” रखा गया है। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. राजा शेखर वुंदरू, प्रिंसिपल सेक्रेटरी, हरियाणा सरकार करेंगे। वहीं सेंटर फॉर दलित स्टडीज के अध्यक्ष मल्लेपल्ली लक्ष्मैय्या कार्यक्रम का संचालन तथा काकी माधवा राव, पूर्व मुख्य सचिव, आंध्र प्रदेश व एसीएसटी ऑफिसर्स फोरम के अध्यक्ष पी.एस. कृष्णन को याद करेंगे। इनके अलावा इस मौके पर प्रो. वी. कृष्ण, हैदराबाद विश्वविद्यालय भी मौजूद रहेंगे तथा दलित-बहुजन फ्रंट के राष्ट्रीय अध्यक्ष कोरिवि विनय कुमार धन्यवाद ज्ञापन करेंगे।

बताते चलें कि पी.एस. कृष्णन आजीवन भारत के उत्पीड़ित और शोषित तबकों के असाधारण हितैषी रहे। शोषित-उत्पीड़ित तबकों के हितार्थ उनका संघर्ष तभी शुरू हो गया था जब 1956 में वे आंध्र प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी बने। सामाजिक न्याय के क्षेत्र में उनके योगदान का आकलन इसी मात्र से किया जा सकता है कि उन्होंने दलितों के लिए विशेष घटक योजना से लेकर, एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम व मंडल आयोग की अनुशंसाएं लागू करवाने में अहम भूमिका निभायी। लेकिन यह सहज नहीं था। उनके इसी संघर्ष व प्रतिबद्धता का दस्तावेजीकरण है फारवर्ड प्रेस की नई किताब। यह किताब मनोनमेनियम सुन्दरनार विश्वविद्यालय, तमिलनाडु की पूर्व कुलपति डॉ. वी. वासंती देवी के साथ पी.एस. कृष्णन की लंबी बातचीत पर आधारित है।

पीएस कृष्णन की किताब का कवर पृष्ठ

दरअसल, यह किताब सामाजिक न्याय के विभिन्न आयामों को समझने के लिए एक समग्र दस्तावेज है जिसके जरिए देश के सभी हिस्सों में हुए आंदोलनों, सरकारी पहलों और जन-हस्तक्षेपों की बारीक से बरीक जानकारी संकलित है। फिर चाहे वे दक्षिण के राज्यों में मडिगाओं, इजावाओं व परया के सवाल हों या फिर उत्तर भारत की दलित व पिछड़े वर्ग की तमाम जातियां। यहां तक कि कृष्णन ने घुमंतू और अर्द्धघुमंतू जातियों के हक-अधिकार को लेकर भी अबतक किए गए प्रयासों को सामने रखा है। 

यह किताब 2017 में चेन्नई की प्रकाशन संस्थान साउथ विजन द्वारा अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ। इसके हिन्दी अनुवाद की योजना स्वयं पी. एस. कृष्णन की थी। वर्ष 2019 में उनके निधन के बाद इसे फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित किया गया है। इसका अनुवाद अमरीश हरदेनिया व डॉ. सिद्धार्थ ने किया है।

इस किताब में पी.एस. कृष्णन ने अपने आरंभिक दौर की परिस्थितियों का जिक्र किया है कि कैसे उन्हें दलितों और पिछड़ों के लिए काम करने से रोका जाता था। यहां तक कि गोपनीय चरित्रावली में उनके लिए किस तरह की टिप्पणियां की जाती थीं। कृष्णन ने अपनी किताब में अपने जीवन के तमाम सहयोगियों को याद किया है। इनमें सबसे खास उनके तीन मित्र हैं। इनमें श्री एस.आर. शंकरन, डॉ. बी. डी. शर्मा और डॉ. भूपिंदर सिंह शामिल हैं। इन सभी के बारे में कृष्णन ने विस्तार से लिखा है कि कैसे इन सभी ने आईएएस अधिकारी रहते हुए दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों के लिए आगे बढ़कर काम किया।

करीब 450 पन्ने की यह किताब एक तरह से अनकही कहानी है। इन कहानियों में एक कहानी मंडल आयोग के लागू होने की है। अपने संस्मरण में कृष्णन इस अति महत्वपूर्ण पहल के विभिन्न आयमों को सामने लाते हैं और यह बेनकाब करते हैं कि केवल राजनेता ही नहीं, बल्कि नौकरशाह भी इस आयोग की अनुशंसाओं के खिलाफ थे। 

बहरहाल, यह किताब जल्द ही बिक्री के लिए उपलब्ध होगी। यह किताब उन सभी के लिए महत्वपूर्ण है जो भारत में सामाजिक न्याय की अनिर्वायता को जानना-समझना चाहते हैं। फिर वे चाहे अध्येतागण हों या फिर प्रशासनिक अधिकारी व राजनीतिक कार्यकर्ता।  

(संपादन : नवल)


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