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मीडिया कंपनियों की पत्रकारिता बनाम सच की पत्रकारिता

सत्ता स्वतंत्र तरीके से पत्रकारिता करने वाले समाज के जागरुक नागरिकों में कुछेक को तरह-तरह से प्रताड़ित कर बाकी की जागरूकता को डराना चाहती है। किसी एक की गिरफ्तारी वास्तव में एक संदेश के लिए की जाती है जैसे हमने मिथकों में एकलव्य के रुप में देखा है। अनिल चमड़िया का विश्लेषण

मीडिया विमर्श 

अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल सभी लोग कर रहे हैं। लेकिन उन सभी पर हमले नहीं हो रहे हैं। हमले उन पर हो रहे हैं जो इस संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल कर संविधान के हिसाब से समाज को बनते देखना चाहते हैं। यानी संविधान को दो तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है। एक तो संविधान के अनुरूप समाज को बनाने के लिए संविधान की धाराओं का इस्तेमाल किया जा सकता है तो दूसरे उन व्यवस्थाओं को बनाए रखने के लिए संविधान का इस्तेमाल कर सकते हैं जैसे कि संविधान से पूर्व गुलामी और गैरबराबरी की स्थिति थी। अगर मौजूदा संदर्भों की भाषा में इसे समझने की कोशिश की जाय तो एक किसानी के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल करना चाहता है तो दूसरा कंपनियों के हितों में अभिव्यक्ति की आजादी को बेच रहा है।

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लेखक के बारे में

अनिल चमड़िया

वरिष्‍ठ हिंदी पत्रकार अनिल चमडिया मीडिया के क्षेत्र में शोधरत हैं। संप्रति वे 'मास मीडिया' और 'जन मीडिया' नामक अंग्रेजी और हिंदी पत्रिकाओं के संपादक हैं

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